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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 196

१४६ सौन्दर्य लहरी
चन्द्र मण्डल पर होने लगती है और चन्द्र मण्डल से प्रसवित अमृत
सब नाडियों को सींचने लगता है।
इस विषय पर विशेष जानकारी के लिये लेखक की Divine
Power नाम की अंग्रेजी पुस्तक देखें।
श्रीमद् भागवत के प्रथम स्कन्द के १५ वें अध्याय में ४१,
४२ श्लोक संपूर्ण योग मार्ग के अनुष्ठान का बडा सुन्दर वर्णन करते
हैं। जब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान के परम धाम चले जाने का
समाचार जाना तो उन्होंने जिस क्रम से ब्रह्मात्मैक्य कर के
उत्तरा खण्ड की ओर प्रस्थान किया था। उक्त श्लोक इस प्रकार हैं।
वाचं जुहाव मनसि तत्प्राणे इतरे च तं ।
मृत्यावपानं सोत्सर्गं तं पञ्चत्वेह्यजोहवीत् ॥ ४१
त्रित्वे हुत्वाथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः ।
सर्वमात्मन्यजुहवीद्ब्रह्मण्यात्मानमव्यये ॥ ४२
अर्थः— उस मुनि (युधिष्ठिर) ने बाणि की मन में आहुति
दी, और मन की प्राण में, प्राण की अपान में और उत्सर्ग सहित
अपान की मृत्यु में और मृत्यु की आहुति पञ्चत्व में दी, फिर
पञ्चत्व की त्रित्व में आहुति देकर, उस (त्रित्व) की एकत्व में
आहुति दी, इस प्रकार सब की आत्मा में आहुति देकर आत्मा की
आहुति अव्यय ब्रह्म में दी। अर्थात मौन धारण कर के और मन
को संकल्प विकल्प रहित एकाग्र कर के बाणि को मन में लीन कर
लिया, फिर मन का प्राण से और प्राण का अपान से योग किया,