सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ सौंदर्य लहरी
शशिनी, चन्द्रिका, कान्ति, ज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अङ्गदा,
पूर्णा और पूर्णामृता ।
आज्ञाचक्र के नीचे वायु और आकाश में रुद्रग्रन्थि है, रुद्रकी
१० कलायें हैं, जिनके नाम ये हैं—तीक्ष्णा, रौद्री, भया, निद्रा,
तन्द्रा, क्षुधा, क्रोधिनी, क्रिया, उद्गारी, और मृत्यु ।
मणिपूर के ऊपर अग्नि और सूर्य मण्डलों में विष्णुग्रन्थि है, विष्णु
की भी १० कलायें हैं, जिनके नाम ये हैं। जरा, पालिनी, शान्ति,
ईश्वरी, रति, कामिका, वरदा, ह्लादिनी, प्रीति, और दीर्घा ।
मूलाधार और स्वाधिष्ठान में पृथिवी और जलकी ब्रह्मग्रन्थि है,
ब्रह्माकी १० कलायें ये हैं।—सृष्टि, ऋद्धि, स्मृति, मेधा, कान्ति,
लक्ष्मी, द्युति, स्थिरा, स्थिति, और सिद्धि । तीनों के मध्य चार
रंग की दीप शिखा तुल्य ईश्वर कला है, जिसके रंग पीत, श्वेत,
अरुण और कृष्ण ( असित ) हैं । इसका स्थान हृदय में है । शिखा
के ऊपर उसीका अग्रभागवत् सदाशिव कला है । जो विद्युत्
सदृश कही जाती है ।
तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता ।
नलितोयद मध्यस्थाद्विद्युल्लेखेव भास्वरा ॥
नीवारशूकवत्तन्वी पीताभास्वत्यणूपमा ।
तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः ॥
सब्रह्मा सशिवः सहरिः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥
नारायणोपनिषद् खण्ड (१३-२)