संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द संग्रह ५१
(६)
हरि जू राख लेहु पत मेरी ॥ टेक ॥
काल को त्रास भयो उर अंतर, सरन गह्यो.प्रभ तेरो ।
भय मरने को बिसरत नाहीं, तेहिँ चिंता तन जारो ॥१॥
किये उपाय मुक्ति के कारन, दह दिसि को उठि धाया ।
घट ही भीतर बसै निरंतर, ता को मर्म न पाया ॥२॥
नाहीं गुन नाहीं कछु जप तप, कौन करम अब कीजै ।
नानक हार पर्यो सरनागत, अभय दान प्रभ दीजै ॥३॥
(७)
या जग मीत न देख्यो कोई ।
सकल जगत अपने सुख लाग्यो, दुख मैं संग न होई ॥१॥
दारा मीत पूत संबंधी, सगरे धन सेँ लागे ।
जबहीँ निरधन देख्यो नर को, संग छाड़ि सब भागे ॥२॥
कहा कहूँ या मन बौरे को, इन सेँ नेह लगाया ।
दीनानाथ सकल भय-भंजन, जस¹ ता को बिसराया ॥३॥
स्वान पूँछ ज्यौँ भयो न सूधो, बहुत जतन मैं कीन्हो ।
नानक लाज बिरद की राखो, नाम तिहारो लीन्हो ॥४॥
(८)
जीव जंतु सब ता के हाथ, दीनदयाल अनाथ को नाथ ॥१॥
जिस राखै तिस कोइ न मारै, सो मूआ जिस मनैँ बिसारै २
तिस तजि अवर कहाँ को जाय, सब सिर एक निरंजनराय ३
जिय की जुगत जा के सब हाथ, अंतर बाहर जानो साथ ॥४
गुन-निधान बेअंत अपार, नानक दास सदा बलिहार ॥५॥
(१) इहसान ।