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संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

42. गर्भवतीके लक्षण

गर्भवतीके लक्षण ।

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ही नहीं चलता । वे इसी विचारमें रहती हैं कि अभी रजस्त्राव-
का समय नहीं आया है । यदि गर्भावधान हो गया तो अनेक
कारणोंसे विश्वास ही नहीं होता । क्योंकि वे ऐसे ही लक्षणों-
को ठीक मानती हैं कि जो रुग्णावस्थामें भी पाये जाते हैं ।
इसलिये उन लक्षणोंको भी जानना जरूरी है कि जो गर्भवतीमें
होते हैं । इसके अनेक लक्षण हैं ।

१. वैद्यकका मत

१. स्तनोंके अगले भागका काला हो जाना, पेटपर वालोंकी
सेली उठी सी दिखलाई देना, नंब्रोंकी पलकोंका विशेष
रूपसे मिचना, बिना किसी दूसरे कारणके कै होना,
सुगन्ध बुरी लगना, थूक अधिक आना, थकावट
मालूम होना । (सु० ३० अ० ३७४० १३ वा १४ )

२. रज बन्द हो जाना, बार बार मुखमें पानी भर आना,
अन्नसे अरुचि, कै, खटाई खानेकी इच्छा होना, शरीर-
का भारी पड़ जाना, दोनों आखें मिचीसी जान पड़ना,
स्तनोंमें दधका संचार होना, ओठ और स्तनोंका अगला
भाग काला पड़ जाना, पैरों में थोड़ीसी सूजनका होना,
कभी कभी रोमांच हो जाना । (च० ३० अ० २३४० २१ )

३. मैथुनकी चाह न होना, मुखका पीला पड़ जाना, स्तनों-
का बढ़ना, न खाने योग्य वस्तुओंके खानेको चिन्त
चाहना, बालकका उछलना, आलस्य, डकारोंका आना
और अपच । (३० क० )

२. बिद्वानोंकी राय ।

१. गर्भमें बालकके हृदयकी धड़कन मालूम होती है । यह
धड़कन घड़ीके समान हृदयपेशियोंके संकोचनसे होती

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सन्तति-शास्त्र ।

है । इस थड्कनके मालूम करनेसे बालकका गर्भाशयमें होना निश्चय होता है । यदि यह थड्कन न हो तो मूढ़ गर्भ ( False pregnancy ) समझना चाहिये । ऐसी थड्कन माताकी वार्ड कोखके बीचमें सुनाई पड़ती है । इसकी बाल बालकके सवल और निर्वल होनेपर है । ऊपर जितने लक्षण कहे गये हैं वे सब मूढ़गर्भमें होते हैं; परन्तु उसमें हृदयकी थड्कन नहीं होती । इसीसे गर्भका निश्चय ठीक तीरसे होता है ।

(३३) गर्भमें क्या है ?

उन लोगोंके लिये कि जो आस्त्रके मर्मको जानते हैं, यह मालूम कर लेना कि गर्भमें क्या है, कुछ कठिन नहीं । परन्तु वे लोग जिन्होंने कभी ऐसे विषयपर विचार नहीं किया, जो सदैव इससे अलग रहे, जिन्होंने स्वयंमें भी अपने गार्हस्थ्य-जीवनपर दृष्टि नहीं डाली, उनके लिये तो यह अत्यन्त कठिन विषय है । इसके लक्षण प्रारंभसे ही प्रकट होने हैं; परन्तु दो तीन महीने बाद वे अच्छी तरह मालूम होने लगते हैं । इसमें आचर्य्याके अनेक मत हैं ।

१. वैद्यकका मत ।

१. गर्भाधान समयमें रक्त-वीर्य मिल कर जब गर्भ धारण होता है, यदि उस समय नाभिकी दहिनी ओर थोड़ासा हटकर कुछ दूर हो, तो पुत्र; और यदि नाभिकी बाई ओर कुछ हटकर दूर हो, तो कन्या तथा नाभिके नीचे हो, तो नपुंसकका गर्भ समझना चाहिये । (ततिशास्त्र)

२ दूसरे महीनेमें गर्भ तीन प्रकारसे जाहिर होता है ।

(३०-१०-३०-२-१०-१८)