संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
27. कन्या और पुत्र पैदा करना मनुष्यके आधीन है
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सन्तति-शास्त्र ।
३. वैद्यकका मत ।
१. गर्भाधान समयमें वीर्य अधिक होनेसे पुत्र और रज अधिक होनेसे कन्या, दोनों बराबर होनेसे नपुंसक सन्तान होती है। (सु० श० अ० ६ श्लो० ४)
(भोज वैद्य और चरकने भी ऐसा ही कहा है।)
२. रजस्वला होनेसे ६-८-१०-१२-१४ और १६ वीं रातमें गर्भाधान होनेसे पुत्र और ५-७-९-११-१३ और १५ वीं रातमें कन्या उत्पन्न होती है। (सु० श० अ० ६ श्लो० ११)
(विदेहाचार्य भोज वैद्य और भावमिश्र भी ऐसा ही कहा है।)
३. पुरुषके दाहिने अङ्गसे पुत्र और बाएँसे कन्या, इसी भाँति स्त्रीके दाहिने अङ्गसे पुत्र और बाएँसे कन्या उत्पन्न होती हैं। (श० क०)
४. स्त्रीके काममन्दिरवाले मुखमें तीन नाड़ी होती हैं। गर्भाधान समय में इनमें वीर्य गिरने से गर्भ रहता है। इनका च्यौरा इस प्रकार है। (भा० न० प्र० ६ श्लो० १७ से २०)
(१) ममीरुषा—इस नाड़ीमें वीर्य गिरने से गर्भ नहीं रहता।
(२) चन्द्रमसी—इसका मुख थोड़े ही संयोगसे खुल जाता है। इसमें वीर्य गिरने से कन्या होती है।
(३) गौरी—इसका मुख खूब अन्दो तरह कामोद्दीपन होनेसे खुलता है। इसमें वीर्य गिरनेसे पुत्र उत्पन्न होता है।
४. हिन्दुओंका प्राचीन मत ।
१. एक बार महापानी लीलावतीने महाराज भोजसे कहा
कन्या या पुत्र उत्पन्न करत्वा मनुष्यके अधीन है। १३७
कि—“आपके दरबार में अनेक विद्वानोंके रहते हुएभी यह निश्चय नहीं हुआ कि कन्या और पुत्रका गर्भ कैसे बनता है।” उस समय महाराज चुप रहे। दूसरे दिन दरबारमें महाराजने प्रश्न किया कि—“मातापिताका रजवीर्य ही कन्या और पुत्र उत्पन्न होनेका कारण है, इसलिये एक माता पिताके रजवीर्यसे कभी कन्या और कभी पुत्र उत्पन्न होनेका कारण क्या है ?” सभामें अनेक विद्वान थे, उनमेंसे राज्यवैद्यने कहा—“राजन स्त्री और पुरुष अपने अपने प्रधान अङ्गसे कन्या और पुत्र उत्पन्न करने हैं। पुरुषका प्रधान दाहिना और स्त्री का प्रधान वार्ष अङ्ग है। जब पुरुषके दाहिने अङ्गसे निकला हुआ वीर्य स्त्रीके दहिने अङ्गसे निकले रजसे मिलता है, तो पुत्र और जब पुरुषके वार्ष अंगसे निकला वीर्य स्त्रीके वार्ष अंगसे निकले हुए रजके साथ मिलता है, तो कन्या उत्पन्न होती है। (भो० जी० च० दुर्गादत्त ० लि०)
५. वौद्ध लोगोंका मत।
१. कन्या और पुत्रका होना माता पिता के सबल और निर्बल रजवीर्यपर निर्भर है।
६. यूनानीमत।
१. वीर्यके प्रबल होनेसे पुत्र और रजके प्रबल होनेसे कन्या होती है।
२. स्त्रीपुरुषके दाहिने अंग के अवयवसे पुत्र और वार्षसे कन्या उत्पन्न होती है। (अस्तू)
७. युरोपीय विद्वानोंकी राय
१. प्रोफेसर मोन्सथ्यूरीकी राय है कि रजोदर्शनसे चौथे
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दिन शुद्ध होनेपर तीन चार दिन पीछे रज पक जाता है। इसलिये रजोधर्मसे सात, आठ या दस दिन पीछे संयोग होने से पुत्र और रजोदर्शन से शुद्ध होनेपर उसी दिन या दूसरे तीसरे दिनोंके संयोगसे कन्या उत्पन्न होती है।
२ डाकूर सीक्स्टकी राय है कि पुरुषके दहिने अण्डसे निकला हुआ वीर्य स्त्रीके दहिने अण्डसे निकले रजके साथ मिलकर पुत्र और पुरुषकी वार्द्ध गोली अर्थात् अण्डसे निकला हुआ वीर्य स्त्रीके वार्द्ध अण्डसे निकले हुए रजके साथ मिलकर कन्या उत्पन्न करता है।
३ डाकूर वेल्हिग की राय है कि स्त्रीके दहिने अण्डसे पुत्र और वार्द्ध से कन्या उत्पन्न होती है। एक स्त्रीके नौ पुत्र हुए थे। उसके मर जानेपर गर्भाशयकी जाँचकी गई, तो मालूम हुआ कि इस स्त्रीके दहिनी ओरका अण्ड अच्छा था और वार्द्ध ओरका सूख कर सिकुड़ गया। इसलिये उसके लड़के ही हुए।
८ यूरोपियन विद्वानोंके जाँच
१. डाकूर क्लमेन के इलाजमे एक पेसा व्यक्ति था कि जिसके वार्द्ध अण्डमें चोट लग गई थी। वह अच्छा हो गया, परन्तु डाकूर महोदय को अण्डकोषके विंगड़ जानेका सन्देह रहा। इसके बाद उस व्यक्तिके जितनी सन्तानें हुईं वे सब पुत्र थे। मरने पर देखा गया, तो मालूम हुआ कि उसका वार्द्ध अण्ड किसी कामका नहीं था।
२. डाकूर वेल्हिगने इसी प्रकार एक स्त्री की जाँचकी
कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अधीन है। १३६
जिसका बायाँ अण्ड सूख गया और उसके पुत्र ही पुत्र हुए।
६. मेरी स्वयं जाँच मनुष्योंके विषयमें।
१. बाबू मदनमोहन श्रोड़ा जो मेरे पास दो मासतक रहे उनसे इस विषयपर बातचीत होनेसे मालूम हुआ कि उनकी स्त्रीके बायें ( Ovary ) अण्डमें मवाद पड़ गया था। जनाने अस्पतालमें वह अण्ड निकाल लिया गया। इसके पीछे उनकी स्त्रीको चार पुत्र उत्पन्न हुए।
२. मेरे मित्र पण्डित राजवल्लि मिश्रके फोर्तामें पानी भर जाया करता था। उसे आप एक नाईसे निकलवा दिया करते थे। एक बार अंधेरेमें नश्तर देते समय नाईने दहिने अण्डमें लोहेकी छुच्छी कर दी। बेतुरन्त बेहोश हो गये। अस्पताल आये। दहिना अण्ड निकाल लिया गया। वे अच्छे हो गये। इसके बाद उनके तीन कन्यायें उत्पन्न हुईं।
१०. मेरी स्वयं जाँच पशुओंके विषयमें।
१. देवीपाटनके मेलेमें एक सौदागरके पास सांड घोड़ा था। सौदागर यह कहा करता था कि इस सांडसे बछेरी नहीं होती। सांड तीन घोड़ियोंपर छोड़ा गया। दोको गर्भ रहा और बछेरे पैदा हुए। तीसरे वर्ष सौदागर फिर उस सांडको लेकर आया, तो देखनेसे मालूम हुआ कि सांडके दहिने ओरका ही अण्ड है, चोट लगनेसे बायाँ काट कर निकाल दिया गया था।
( सन् १९१६ ई० )
२. मेरे मास्टर पण्डित मालती प्रसादके पास एक कुत्ता
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सन्तति-शान्त ।
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था । दूसरे कुत्तोंसे भगडा होनेके कारण उसका 'वायाँ' अण्ड बाहर निकल आया । एक मुसलमानने चीर कर निकाल लिया । इस कुत्तेसे दो कुत्तियोंके गर्भ रहा । दोनोंके सात बच्चे हुए । सब कुत्ते थे, कुत्ती एक भी नहीं थी । (सन् १९०१)
३. मेरे एक परममित्र शेखजीने दो बकरीके बच्चोंको बधिया कराया । इनमेंसे एक पूरा बधिया नहीं हुआ । अर्थात् एक औरका अण्ड नहीं निकला । कुछ दिनोंके बाद मालूम हुआ कि एक बकरेके दहिता अण्ड रह गया है । इस बकरेसे दो बकरियोंको गर्भ रहा । दोनोंके छ बच्चे हुए जो सारे बकरे थे, बकरी एक भी नहीं थी ।
(सन् १९०९ ई०)
४. मेरे पास एक पालतू बिल्ली थी । वह एक ऐसे बिलावसे गर्भवती हुई कि जिसका वायाँ अण्ड चोट लगनेसे कुछ छोटा पड़ गया था और कभी कभी फूलकर बहुत बड़ा हो जाया करता था । बिल्लीके तीन बच्चे हुए, सब बिलाव थे ।
(सन् १९०६ ई०)
जिन लोगोंने इन बातोंपर विचार नहीं किया है उनका कहना है कि कन्या और पुत्र होना ईश्वरके आधीन है या भाग्य में जो हो वही होता है । परन्तु जिन्होंने इसकी वार्षिकियोंपर विचार किया है, उनका अटल विश्वास यही है कि कन्या या पुत्र पैदा करना मनुष्यके हाथमें है । हम इस विषयमें बहुत खुलासा साफ साफ लिखना चाहते हैं कि जिससे सर्वसाधारण इस विषयको अच्छी तरह समझ जायँ ।
पुत्र अर्थवा कन्या कैसे पैदा होती है? इस विषयमें हमारा विश्वास इस बातपर है कि स्त्री और पुरुष अपने अपने प्रधान
कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अधीन है। १४१
अङ्गसे कन्या और पुत्र उत्पन्न करते हैं। पुरुषका दाहिना और स्त्रीका बायाँ अङ्ग प्रधान हैं। जब पुरुषके दहिने अण्डसे वीर्य निकलकर स्त्री के दहिने अण्डसे निकले रजके साथ मिलता है तो पुत्र; और जब पुरुषके बाएँ अण्डसे निकला वीर्य स्त्रीके बाएँ अण्डसे निकले रजके साथ मिलता है तो कन्या उत्पन्न होती है। ऐसा कभी नहीं होता कि पुरुषके दहिने अण्डसे निकला वीर्य स्त्रीके बाएँ या पुरुषके बाएँ अण्डसे निकला वीर्य स्त्रीके दहिने अण्डके रजसे मिले। इससे यह बात सिद्ध है कि स्त्री और पुरुष दोनोंके दहिने और बाएँ अण्डसे निकला रज वीर्य दहिनेका दहिने और बाएँका बाएँसे मिलता है। इसका कारण यह है कि पुरुषका दहिना अङ्ग प्रधान है इसलिये पुरुष के दहिने अण्डमें पुत्रका वीर्य और बाएँमें कन्याका। इसी भाँति स्त्रीका बायाँ अङ्ग प्रधान है इस कारण स्त्रीके बाएँअण्ड में कन्या और दहिनेमें पुत्रका रज रहता है। इसलिये पुरुषके दहिने अण्डसे पुत्रका वीर्य निकलकर स्त्रीके दहिने अण्डसे निकले पुत्रके रजसे मिलकर पुत्र उत्पन्न करता है और इसी प्रकार स्त्रीके बाएँ अण्डसे कन्याका रज निकलकर पुरुषके बाएँ अण्डसे निकले कन्याके वीर्यसे मिलकर कन्या उत्पन्न करता है।
यहाँ पर पाठकोंको यह शङ्का होगी कि कुछ लोगोंका यह मत है कि पुरुष अथवा स्त्रीके दोनों अण्डोंमें एक ही प्रकारका पदार्थ रहता है तो फिर दहिनेमें पुत्र और बाएँमें कन्याका रज वीर्य कैसे रहता है? यह एक बड़े भूलकी शङ्का है। सबसे पहली बात तो यह है कि यदि दोनोंमें एक ही पदार्थ होता तो प्रकृतिको दो अण्डे बनानेकी जरूरत ही क्या थी? इसके अतिरिक्त डाकुओंकी जाँचसे यह पता चलता है कि जब पुरुषका बायाँ अण्ड खराब हुआ तो पुत्र ही पुत्र हुए और जब स्त्रीका
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दहिना अण्ड खराब हुआ तो कन्या ही कन्याएँ हुईं। इससे साफ जाहिर है कि स्त्री और पुरुषके दहिने अण्डोंमें पुत्र और बाएँमें कन्याका रज वीर्य रहता है।
अब हम पाठकोंको यह दिखलायेंगे कि हम इस विषयमें जितने मत लिख चुके हैं वे सब हमारे माने हुए मतसे मिलते हैं या नहीं। इनमें एक एक मत पर विचार करनेकी आवश्यकता है।
१ वेद, धर्मशास्त्र, बौद्ध और यूनानी मतसे यह बात कही जाती है कि वीर्य बलवान होनेसे पुत्र और रज बली होनेसे कन्या उत्पन्न होती है। अब यह देखना चाहिये कि रज और वीर्य बलवान कब होता है। इस विषयमें एक विद्वानकी राय है कि पुरुषके दहिने और स्त्रीके बाएँ अङ्गने निकला वीर्य और रज प्रबल होता है।
( रतिशान्त )
इमने इस बातको माना कि पुरुषके प्रधान दहिने अङ्गसे वीर्य निकल कर स्त्रीके दहिने अङ्गसे निकले रजसे मिलकर पुत्र और स्त्रीके प्रधान बाएँ अङ्गसे निकला रज पुरुषके बाएँ अङ्गसे निकले वीर्यसे मिल कर कन्या उत्पन्न करता है। हमरे मतसे ऊपर कहे हुए यह मत कि “बलवान् वीर्यसे पुत्र और बली रजसे कन्या उत्पन्न होती है” इस कारण मिलता है कि पुरुषके दहिने अङ्ग अर्थात् दहिने अण्डसे निकला हुआ बलवान् वीर्य स्त्रीके दहिने अण्डसे निकले निर्बल रजके साथ मिलकर पुत्र और स्त्रीके बाएँ अण्डसे निकला बली रज पुरुषके बाएँ अण्डसे निकले निर्बल वीर्यसे मिलकर कन्या उत्पन्न करता है अतएव हमारे माने हुए मतसे यह सिद्धान्त पूरा मिलता है।
कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अधीन है। १४३
२. धर्मशास्त्र और वैद्यकसे यह बात कही जाती है कि रजस्वला होने से ६-८-१०-१२-१४ और १६ वीं रात्रि में संयोग करने से पुत्र और ५-७-९-११-१३ और १५ रात्रिमें, गमन करने से कन्या उत्पन्न होती है। इन रात्रियों में रजकी दशा पर विचार करना आवश्यक है। इस विषयमें विदेहाचार्यने लिखा है कि ४-६-८-१०-१२-१४-१६ इन रात्रियोंमें रज बहुत ही कम और ५-७-९-१३-१५ इन रात्रियोंमें बहुत ज्यादा निकलता है। एक और विद्वान् की राय है कि ४-६-८-१०-१२-१४-१६ इन रात्रियोंमें स्त्रीको रज कम निकलता है और इससे पुत्र उत्पन्न होता है। यदि इन रात्रियों में वार्ध अंगसे रज निकले तो वह किसी योग्य नहीं होता। इसी प्रकार ५-७-९-११-१३-१५ इन रात्रियोंमें स्त्रीके रज अधिक निकलता है और उससे कन्या उत्पन्न होती है। यदि इन रात्रियोंमें रज दहिने अंगसे निकले तो वह भी किसी योग्य नहीं होता। (रतिशाम्भ)
इन प्रमाणों से यह बात सिद्ध हुई कि ४-६-८ इत्यादि सम रात्रियों में स्त्रीके दहिने अंगसे निकला रज पुत्र और ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियोंमें वार्ध अंगसे निकला रज कन्या उत्पन्न करता है। यदि इसके विपरीत ४-६-८ इत्यादि रात्रियोंमें वार्ध अंग से और ५-७-९ इत्यादि रात्रियोंमें दहिने अंगसे निकला रज किसी योग्य नहीं होता, तो इससे यह बात सिद्ध होती है कि जब सम रात्रियोंमें रज स्त्रीके दहिने अङ्गसे निकल कर पुरुषके दहिने अंगसे निकले वीर्यसे मिलेगा तो पुत्र और जब स्त्रीके वार्ध अङ्गसे विषम दिनोंमें निकल कर पुरुषके वार्ध अंगसे निकले हुए वीर्यसे मिलेगा तो कन्या होगी। यह
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सिद्धान्त हमारे माते हुए मतसे जुदा नहीं है। इसलिये हमारी मानी हुई बात और यह सिद्धान्त एक ही है।
२. धर्मशास्त्र और वैद्यकसे यह बात कही जाती है कि जब वीर्य अधिक हो और रज कम हो, तो पुत्र, यदि रज अधिक हो तथा वीर्य कम हो, तो कन्या उत्पन्न होती है। इस विषयमें यह देखना है कि रज और वीर्य अधिक कब निकलता है। नम्बर २ में विदेशाचार्यका मत लिखा गया है कि ४-६-८ इत्यादि सम रात्रियोंमें रज कम और ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियोंमें अधिक निकलता है। एक विद्वान्की राय है कि ४-६-८ इत्यादि सम रात्रियोंमें कम निकले हुए रजसे पुत्र और ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियोंमें निकले हुए अधिक रजसे कन्या उत्पन्न होती है। यदि ४-६-८ इत्यादि सम रात्रियों में स्त्रीके वार्प अंगसे रज निकले या ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियोंमें दाहिने अंगसे निकले, तो दोनों अयोन्म्य होते हैं।
(रतिशास्त्र)
जब इस प्रकार ४-६-८ आदि सम रात्रियों में रज स्त्रीके दाहिने अंग से कम निकलकर पुरुषके दाहिने अंग से निकले हुए अधिक वीर्यके साथ मिलेगा, तो पुत्र होगा। इसी प्रकार जब ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियों में रज स्त्रीके वार्प अंगसे अधिक निकल कर पुरुष के वार्प अङ्गसे निकले हुए कम वीर्य के साथ मिलेगा, तो कन्या होगी। इसमें यह बात है कि जब स्त्रीका रज कम होगा तो पुरुषका वीर्य अधिक होगा। कारण स्त्रीका रज अधिक होगा तो पुरुषका वीर्य कम होगा। यह कि पुरुषका प्रधान अङ्ग दाहिना है, इसलिये दाहिने से अधिक और वार्प से कम वीर्य निकलता है। इसी प्रकार स्त्री-
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के प्रधान वार्ध अंगसे अधिक और दहिने अंगसे कम रज निकलता है। अतएव पुरुषके दहिने अंगसे निकला हुआ अधिक वीर्य स्त्रीके वार्ध अंगसे निकले हुए कम रजके साथ मिलकर पुत्र और स्त्रीके दहिने अंगसे निकला अधिक रज पुरुषके वार्ध अंगसे निकला कम वीर्यके साथ मिलकर कन्या उत्पन्न करता है। इस कारण यह सिद्धान्त हमारे विरुद्ध नहीं, क्योंकि हमारी मानी हुई बात और यह सिद्धान्त एक ही है।
४. वैद्यक, हिन्दुओंका प्राचीन मत, यूनानी मत, यूरोपीय
विद्वानोंकी राय, यूरोपीय विद्वानोंकी जाँच-पशुओं और मनुष्यों पर अनुभव करनेसे और मित्रों द्वारा जो बातें मालूम हुई उससे यह कहा जाता है कि स्त्री-पुरुष के दहिने अंगसे पुत्र और वार्धसे कन्या उत्पन्न होती है। इस विषयका खुलासा यह है कि पुरुषके दहिने अण्डमें पुत्र और वार्धमें कन्याका वीर्य रहता है।
इसी प्रकार स्त्रीके दहिने अण्डमें पुत्र और वार्धमें कन्याका रज रहता है। इसलिये जब पुरुषके दहिने अण्डसे वीर्य निकलकर स्त्रीके दहिने अण्डसे निकले रजसे मिलता है, तो पुत्र और जब स्त्रीके वार्ध अण्डसे निकला रज पुरुषके वार्ध अण्डसे निकले वीर्यसे मिलता है, तो कन्या उत्पन्न होती है। यहाँ पर पाठक यह शङ्का करेंगे कि पुरुषके दहिने और स्त्रीके वार्ध या स्त्रीके दहिने और पुरुषके वार्ध अण्डोंसे निकले रज-वीर्यसे क्या होता है? इस विषयमें एक विद्वानकी राय है कि दहिनेका वार्ध और वार्धका दहिने अण्डसे निकला रज वीर्य मिलता ही नहीं। (रतिशास्त्र)
५. वैद्यकके मतसे यह कहा जाता है समीरण, चन्द्रमसी
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और गौरीमें वीर्य गिरनेसे कन्या और पुत्र उत्पन्न होते हैं । भावमिश्र जहाँ इस प्रकारणको अपने ग्रन्थ भाव-प्रकाशमें लिखते हैं, वहाँ यों लिखा है कि “ स्त्रियों के काम मन्दिरके मुखमें समीरणा, चन्द्रमसी और गौरी तीन नाडियाँ होती हैं । काममन्दिर क्या है ? इस विषयमें एक विद्वानकी राय है कि काममन्दिर गर्भाशयको कहते हैं । (रतिशास्त्र )
अब यह सिद्ध हुआ कि गर्भाशयके मुखमें तीन नाडियाँ होती हैं । इतमें समीरणा वह भाग है जो गर्भाशयके मुखके बीचमें होता है । इस स्थानपर वीर्य गिरनेसे बाहर निकल आता है । चन्द्रमसी गर्भाशयकी बाई ओर है । इस रास्तेसे वीर्य जाकर स्त्रीके वार्प अण्डके निकले हुए रजसे मिलता है । इस मार्गसे गया हुआ वीर्य कन्या उत्पन्न करता है । इसी प्रकार गौरी गर्भाशयके दहिनी ओर है, इस रास्तेसे वीर्य जाकर स्त्रीके दहिने अण्डके निकले हुए रजसे मिलता है, इस मार्गसे गया हुआ वीर्य पुत्र उत्पन्न करता है । गर्भाशयके दहिने वार्प दो अण्ड होते हैं । इन्हीं अण्डोंसे गर्भाशयमें रज पहुँचता है । इधरसे चन्द्रमसी रास्तेसे बाई ओर होकर वीर्य पहुँचता है और वार्प अण्डके निकले रजसे मिलकर कन्या उत्पन्न करता है । जब वीर्य गर्भाशयके दहिने ओर गौरीके रास्तेमें पहुँचता है तब दहिने अण्डके रजसे मिलकर पुत्र उत्पन्न करता है । अतएव यह सिद्धान्त हमारे माने हुए मतसे पूरा पूरा मिलता है ।
६. एक डाकूका मन है कि शत्रुदर्शनमें ७-८-१० दिन बाद सयोग करनेसे पुत्र और ज्ञान करके दूसरे तीसरे दिनोंके गर्भ पड़नेसे कन्या उत्पन्न होती है । इसका कारण
कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अधीन है। १४०
यह कहा जाता है कि श्रीराममें स्त्रीको संयोगकी बहुत इच्छा रहती है, अतएव कन्या और ७-८-१० दिनोंके बाद संयोग करनेसे पुत्र होता है। कारण यह कि उस समय स्त्रीको संयोगकी विशेष इच्छा नहीं रहती। यह सिद्धान्त निर्मूल है। क्योंकि बहुतसे बच्चे ऐसे मौजूद हैं कि जिनका गर्भाधान इस मनुष्यके विरुद्ध हुआ है। मेरे एक मित्रके यहाँ स्नानके दूसरे दिन अर्थात् छठे दिनोंके गर्भाधानसे पुत्र और स्नानसे ग्यारह दिन बादके गर्भाधानसे कन्या उत्पन्न हुई। अतएव ऐसे सिद्धान्त पर विश्वास नहीं किया जा सकता। हमारा माना हुआ मत इसके विरुद्ध है और वही ठीक है।
हमारे पाठकोंने इस विषयमें अनेक भेद देखे हैं, परन्तु प्रायः जितने मत हैं उन सबका सिद्धान्त यही है कि पुरुषके दहिने अण्डसे निकला हुआ वीर्य जब स्त्रीके दहिने अण्डसे निकले रजके साथ मिलता है, तो पुत्र और जब स्त्रीके बाएँ अण्डसे निकला रज पुरुषके बाएँ अण्डसे निकले वीर्यके साथ मिलता है, तो कन्या उत्पन्न होती है।
हम इस बातको पहले कह आये हैं कि कन्या वा पुत्र पैदा करना मनुष्यके आधीन है, इस लिये यह बतलाना आवश्यक है कि स्त्री वा पुरुष अपने अण्डोंसे रज-वीर्य कैसे निकाल सकते हैं, क्योंकि जबतक यह न मालूम होगा उस समय तक यह बात नहीं कही जा सकती कि कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके आधीन है।
यह प्रकृतिका नियम है कि जिस समय रज-वीर्य निकलने लगता है उस समय अण्डकोष कुछ ऊपरको चढ़ जाते हैं।