संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
32. प्रेम द्वारा उत्तम संन्तानकी उत्पत्ति
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सन्तति-शास्त्र ।
१. अरण्डोंमें रक्तका जमाव होनेमें या और किसी कारण
वजन बढ़ जानेसे ।
२. गर्भाशयके हटनेसे ।
३. फलवाहिनी नलीके विकार या उसके टेढ़े होनेसे ।
४. कड़ी चोट या दबाव पहुँचनेसे ।
इसके अनेक लक्षण हैं ।
१. पाखना जाते समय पेड़ और अरण्डोंके स्थानोंमें दर्द होता ।
२. मैथुनमें अत्यन्त कष्ट होता ।
३. पेड़ और अरण्डोंकी जगह दवानेसे पीड़ा होता ।
४. घुमनी पेटका भारीपन और कुपच होता ।
५. जिस और अण्ड भुका हो उधर के पेड़में दर्द होता ।
अण्डोंकी गाँठें ।
१ ये दो प्रकारकी होती हैं ।
(१) शैलीदार ।
(२) गूच मरी हुई दोस ।
२ शैलीदार गाँठें तीन प्रकार की होती हैं ।
(१) मामूली ।
(२) जिसमें कुछ गाढ़ा पदार्थ रहता है ।
(३) जिसमें चरबीका भाग होता है ।
दोस और तीसरी तरहकी गाँठें बहुत कम पाई जाती हैं । ये अण्डोंपर होती हैं । प्रायः अण्डों और गर्भाशयके बीचमें भी पाई जाती हैं । प्रारम्भमें कुछ जान नहीं पड़ता, पर गाँठें ज्यों ज्यों बढ़ती जाती हैं, त्यों त्यों कष्ट भी बढ़ता जाता है । रोग उत्पन्न होने ही सारे लक्षण प्रकट नहीं होते । विषवा और कुमारी
अरडोके रोग ।
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स्त्रियों में यह रोग अधिक होता है । पहले पहल प्रायः तीन लक्षण होते हैं ।
१. मैथुनमें कष्ट ।
२. पाचनशक्तिका कम हो जाना ।
३. रजो-धर्मका न होना या थोड़े कष्टके साथ होना ।
रोगके साथ पेटकी सूजन बढ़ती जाती है । मुख, हाथ-पांव और पेटसे गर्भके लक्षण प्रगट होते हैं । पेशी दशामें जब रजोधर्म बन्द होजाता है, तो गर्भका सन्देह होता है । जिनके रजोधर्म बन्द नहीं होता उनके मोटे होनेका सन्देह रहता है । कुछ दिन बीतनेपर अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. हथेली, तलुचे और भगमें जलन उत्पन्न होना ।
२. आंतोंका भारी पड़ जाना ।
३. पेशाबका रक्त २ कर आना ।
४. सिवा पेटके और सब अङ्गोंसे क्षय (तपेदिक) के लक्षण प्रतीत होना ।
५. बड़े हुए रोगमें सारे शरीर में कठिन पीड़ा होना ।
६. फेफड़ेका विगड़ जाना और साँसका जल्दी चलना ।
७. सारे शरीरका पीला पड़ जाना ।
८. खड़े करके देखनेमें गाँठोंका दिखलाई देना ।
९. अत्यन्त बड़े रोगमें सारे शरीरपर सूजन का होना ।
यह रोग बहुत धीरे धीरे होता है । इसके तीन तीन चार चार वर्षके रोगी पाए जाते हैं । इतने दिनोंमें गाठों से सारा पेट भर जाता है । सबसे अच्छा इलाज चीरकर गाठें निकाल लेना है ।
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