संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
24. गर्माधानमें स्त्री और पुरुषकी अवस्था
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सन्तति-शास्त्र ।
२ वैचकका मत
१. रजस्वला होनेके दिनसे सोलह रात्रियोंमें पहिलेकी तीन और एक तेरहवीं रात्रि कुल चार रात्रि निर्दिष्ट हैं। बारह रात्रि उत्तम हैं।
(सु० श० अ० २ श्लो० ३१ और अ० ३ श्लो० ५)
२. रजोदर्शनके तीन दिन पीछे जब रज न निकले, तो तेरह दिन गर्भाधान योग्य हैं। (शु० श० अ० २ श्लो० २)
३. सोलह दिनोंमें पहिलकी चार रात्रियोंको छोड़कर बारह रात्रियां गर्भाधान करते योग्य हैं। (श० ६०)
अब धर्मशास्त्र और वैचकमें कई मत भेद हैं। मनुमहाराजि पहिलकी चार रात्रियां, ब्यारहवीं और तेरहवीं छोड़कर इस रात्रि उत्तम मानते हैं, परंतु याज्ञवल्क्य और व्यास केवल चार रात्रि निकाल कर बारह उत्तम मानते हैं। इसी प्रकार वैचकमें सुश्रुत महाराज आदिकी तीन और तेरहवीं निर्दिष्ट मानकर बारह रात्रि शुभ और गर्भाधान योग्य मानते हैं। महात्मा चरकके मतसे जब रज न निकले उसके बाद सव रात्रियां उत्तम हैं। इसी प्रकार शरीर-कल्पद्रुमके लेखक भेडाचार्य आरुम्मकी चार रात्रियां छोड़कर बारह रात्रि उत्तम मानते हैं। अतएव इन भेदोंका निर्णय होना ज़रूरी है।
२. आदिकी चार रात्रियां क्यों वर्णित हैं ?
इसके अनेक कारण हैं।
१. पहली रात्रि—वैचकका मत
१. रजस्वला होनेके पहले दिन संयोग करनेसे पुरुषकी उमर कम होती है और यदि गर्भाधान हो भी जाय तो जन्म होते ही बालककी मृत्यु होती है।
(सु० श० अ० २ श्लो० २२)
गर्भाधानका समय ।
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२. रजवती के साथ पहले दिन गमन करने से पुरुषको कुछ रोग होनेका भय रहता है। यदि गर्भ रह जाय, तो बालक गर्भमें या पैदा होते ही मर जाता है। ( १० क० )
२. दूसरी रात्रि—वैद्यका मत।
१. रजस्वला होनेके दूसरे दिन संयोग करने से पुरुष की उमर कम होती है। यदि गर्भ रह जाय तो जन्म लेने ही वा सौरीहीमें बालक १० दिनमें मर जाता है।
( सु० १० अ० ३ अ० ३३ )
२ दूसरे दिन गमन करने से उपदंश ( गरमी ) और रक्त विकार हो जाता है और स्त्रियों को गर्भाशय के रोग हो जाते हैं। ( १० क० )
३. तीसरी रात्रि—वैद्यका मत।
१. रजस्वलाके साथ तीसरे दिन संयोग करने से पुरुषकी उमर कम होती है। यदि गर्भ रह जाय तो अधूरे अंगकी और थोडे दिन जीनेवाली सन्तान उत्पन्न होती है।
( सु० १० अ० ११ अ० ३२ )
२. तीसरे दिन गमन करने से पुरुषके आँखों की रोशनी जाती रहती है और गर्भ रह जाने पर बालक अंगहीन उत्पन्न होता है। ( १० क० )
४. चौथी रात्रि—वैद्यका मत
१. रजस्वला के चौथे दिन गमन करनेसे बालक सब अंगों से पूर्ण बहुत दिनोंतक जीनेवाला होता है।
( सु० १० अ० २१ अ० ३२ )
२. चौथे दिन गर्भमें आया हुआ बालक उत्तम और वीर्यायु होता है, परन्तु इस दिनके संयोगसे गर्भाशय को हानि पहुँचती है। ( १० क० )
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सन्तति-शास्त्र ।
५. चारों राजियोंके मयोंगपर विचार—वैधक कामतं ।
१. तीन राजियों में रजवती स्त्री से संयोग करने से अनेक प्रकारके रोग हो जाते हैं । जैसे, कुण्ड गरमी, भ्रूचक्रुच्छ, रक्त-विकार और चौथी रात्रि में गमन करने से गर्भाशय को बहुत बड़ी हानि पहुँचती है । कारण यह है कि रज निकलने से उसमें कुछ परिवर्तन हो जाता है । अतएव संयोग की रपाड से हानि पहुँचती है । (रतिशास्त्र )
२. जब तक रज निकलता है, उस समयतक गमन करने-से पुरुषके वीर्य का नाश हो जाता है । (श० क०)
२. धर्मशास्त्रका मत
१. रजवती स्त्री के साथ गमन करने से पुरुष की बुद्धि, तेज, बल नेत्र की ज्योति और उमर घट जाती है ।
(मनु० अ० ४० श्लो० ४१)
२. रजस्वला होने पर आरम्भ की चार राजियों में गमन न करना चाहिये, क्यों कि इनमें स्त्री पुरुष दोनों को रोग उत्पन्न हो सकता है । (१० मनु०)
३. चौथी रात्रिमें गमन करने से थोड़े दिनों जीने वाला और दण्डित पुत्र उत्पन्न होता है । (नि० सिद्ध०)
अद्युत समय में जब कि चार दिन रज निकलता है या चौथे दिन जब कि रज न निकलता हो, संयोग करना चाहिये या नहीं ? पहलेके तीन दिन में संयोग या गर्भाधानके लिये तो सर्वसम्पति है—कि न करना चाहिये । परन्तु चौथे दिनके ावपय में मतभेद है वैधकके आचार्य लोग दोनों बात मानते हैं । धर्मशास्त्र में भी दोनों बातें मानी हैं । क्यों कि मनुने रजवती के गमनसे पुरुषकी बुद्धि इत्यादिका ह्रास माना है । केवल रजवती कहने से यह पता नहीं चलता कि तीन दिनके लिये
गर्भाधानका समय ।
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कहा गया है या चार दिनके लिये । इससे तो यही मालूम होता है कि जबतक रज निकला करे तबतक संयोग न करना चाहिये ।
चौथे दिन संयोगके लिये सुश्रुतकी भी आज्ञा है, परन्तु चरकने यह नहीं माना है । इनका मत है कि जब रज न निकलता हो तो चौथे दिन संयोग करे ।
शरीर कल्पद्रुम ( वैद्यक ) के मतसे चौथे दिन संयोग न करना चाहिये, क्योंकि इस दिनके संयोग से स्त्रीको रोग उत्पन्न होता है ।
धर्मशास्त्र ( वृ० मनु० ) से भी ऐसा ही मालूम होता है और निर्णय-सिन्धुका मत भी है कि चौथे दिन गर्भाधान होने से अल्पायु और दरिद्र सन्तान उत्पन्न होती है । इसलिये यह विचार निश्चय किया गया कि अल्पायु और दरिद्र सन्तानको लेकर ही मनुष्य क्या करेगा, जिसके उत्पन्न होनेसे स्त्रीको भी रोगी बनना पड़े । अतएव चौथे दिन संयोग न करना चाहिये यही सार सम्मति है ?
४. ग्यारहवीं रात्रि क्यों वर्जित है ?
इसमें अनेक मत हैं ।
१ धर्मशास्त्रका मत ।
१. मनुने इस बातको कहा है कि ग्यारहवीं रात्रिमें गर्भाधान न करना चाहिये, परन्तु कोई कारण नहीं बताया । दूसरे ग्रन्थोंसे पता चलता है कि—
ग्यारहवें दिनके गर्भाधानसे धर्महीन कन्या उत्पन्न होती है ( नि० सिन्धु )
है ।
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सन्तति-शास्त्र ।
२. वैद्यकका मत ।
१. ग्यारहवीं रात्रिके गर्भाधानसे त्रेक्ष्या या गुप्त व्यभिचार करानेवाली कन्या उत्पन्न होती है । (रतिशास्त्र)
३. हिन्दुओंका प्राचीन मत ।
१ एक बार भोजने कालिदाससे पूछा कि—“कर्मका बुरा फल कैसे होता है ?” कालिदासने उत्तर दिया कि—जिस प्रकार ग्यारहवीं रात्रिके गर्भसे दुष्ट सन्तान है। (भो०का०प०)
४. तेरहवीं रात्रि क्यों वर्जित है।
१ धर्मशास्त्रका मत ।
१. इस बातको कि तेरहवीं रात्रिमें गर्भाधान न करना चाहिये मनु और सुश्रुतने माना है । परन्तु फारण नहीं लिखा । केवल इतना ही लिखा है कि यह निन्दित रात्रि है । दूसरे ग्रन्थोंसे पता चलता है कि—
तेरहवीं रात्रिमें गर्भाधान होनेसे पापिनी और वर्षासंकर करनेवाली अर्थात् व्यभिचारिणी, अन्य पुत्रोंसे संयोग करनेवाली, कन्या उत्पन्न होती है । (नि० विन्दु)
२ वैद्यकका मत ।
१. नेरहवीं रात्रिको गर्भाधान होनेसे कुरुपा और कुलटा कन्या उत्पन्न होती है । (रतिशास्त्र)
चारों रात्रि पहलेकी और ग्यारहवीं व तेरहवीं रात्रियों का निर्णय, जहाँ तक प्रमाण मिले हैं, किया गया है । सोलह रात्रियोंमें ये छ रात्रियाँ जो निषिद्ध मानी गई हैं, निकास कर दस रात्रि बचीं । श्रव इनका विचार करना भी जरूरी है ।
५. गर्भधारण योग्य दस रात्रियाँ ।
१ धर्मशास्त्रका मत ॥
१. इन रात्रियोंके निर्णयका सम्बन्ध धर्मशास्त्रसे विशेष है;
गर्भाधानका समय ।
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क्योंकि मनु महाराजने इन्होंको अंग माना है। इनमें पर्व, तिथि, दिन और समयका विचार आवश्यक है।
६. पर्व और तिथिपर विचार ।
१. धर्मशास्त्रका मत ।
१. अमावस्या, अष्टमी, पूर्णिमा और चतुर्दशीको खीसे संयोग न करना चाहिये । ( मनु० ॐ २ श्लो० १२८ )
२. ऊपर कहे हुए मनुको प्रमाणके अनुसार गौतम स्मृति अ० ५ श्लो० १ और वृ० पा० अ० ४ श्लो० ६६ और विष्णु स्मृति अ० ६८ में भी पाया गया है ।
३. छठ, अष्टमी, चौथ, दोनों पक्षोंकी चतुर्दशी और अमावस्या तथा पूर्णिमा इनमें संयोग व गर्भाधान न करना चाहिये । ( नि० विष्णु )
४. श्राद्ध तिथियोंमें संयोग न करना चाहिये । ( वृ० नारद )
७. पर्व दिनका विचार ।
१. धर्मशास्त्रका मत ।
१. खियोंसे संयोग करनेमें मनुष्यको पर्व दिन छोड़ देना चाहिये । ( मनु० ॐ ४ श्लो० ८५ )
२. ऊपर कहे हुए प्रमाणके अनुसार वसिष्ठ स्मृति अ० १२ श्लो० १८ और वृ० पा० अ० ४ श्लो० ६६ में भी पाया गया है ।
पर्व दिनमें व्यतीपात, प्रदोष, एकादशी, संकान्ति, ग्रहण, रामनवमी, जन्माष्टमी इत्यादि हैं ।
८. पर्व समयपर विचार ।
१. धर्मशास्त्रका मत ।
१. पर्व समयमें खी-संयोग न होना चाहिये । ( वृ० पा० अ० ४ )
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सन्तति-शास्त्र ।
१. दिन, सन्ध्या और रात्रिपर विचार ।
१. प्रमोक्षसूत्रका नव ।
२. संन्यासे समय गर्भाधान या स्त्री-श्रतद्रु नही होना चाहिये ।
( ३० पा० ॥ ३० २ श्लो० ६६ )
२. रात्रिका गर्भाधान उत्तम है ।
( ज्ञान० ॥ २ श्लो० ३३ )
= वैदिकका मत ।
१. दिनों गमन करनेसे मनुष्यकी आयु, बुद्धि और आर्त्तिका ज्योति कम होती है ।
( २० ॥ ३० )
२. दिनों गमन करनेसे सूर्यमुखी वातक उत्पन्न होनेका भय रहता है ।
( रनिगात्र )
३. प्रातःकाल और आधी रातके समय संयोग करनेसे वायु ऊषित होती है ।
( २० ॥ ३० )
४. गुणका नव ।
१. सायङ्कालके समय गमन करनेसे कल्प और आदिति ऐसे सुयोग्य मातापिताके होते हुए भी हिरण्यकशिपुका जन्म हुआ ।
( नाव )
२. आधी रातके पश्चात् गमन करनेसे पुत्रका अनेक रोग उत्पन्न होने हैं ।
( न० भा० )
इससे सिद्ध है कि दिनमें, सन्ध्याको और रात्रिमें आधी रातके बाद संयोग न करना चाहिये ।
इस विषयके पुरे विचारसे भातृम होता है कि रजस्वता होनेके दिनों चार रात्रि, न्यारहवीं और वेरहवीं रात्रिकों छोड़ कर दश रात्रि संयोग और गर्भाधान करने योग्य हैं । इन दश रात्रियोंमें पर्वतिथि, पर्वदिन, पर्वसमय, आद्वितीथि, दिन-सन्ध्या और आधी रातके बादका समय इत्यादि छोड़
बिना रजस्वला हुए भी गर्भ स्थित हो जाता है। १३३
देना चाहिये। परन्तु यह विचार रहे कि जो समय प्रायः आठ बजेसे ग्यारह बजे तक का मिलता है इसमें भोजन करनेके नीन घण्टे वाद संयोग किया जाय। जो जो बातें निषिद्ध मानी गई हैं, उनको छोड़कर रात्रिमें ६ बजेसे ११ बजे तकका समय संयोगके लिये उत्तम है।
(२६) बिना रजस्वला हुए भी गर्भ स्थित हो जाता है।
लोग यह कहा करते हैं कि बिना रजस्वला हुए भी गर्भ रहता है, यह बात असम्भव नहीं है। ईश्वर सब कुछ कर सकता है। उसकी माया बड़ी विचित्र है कि जिसको समझने वाला अकेला वही है। इस विषयमें आचार्योंका मत यों है।
१. वैयकका मत।
१. रजस्वला न होनेपर भी ऋतुकाल अर्थात् गर्भ स्थितिका समय कभी कभी हो जाता है। (सु० श० अ० २ श्ल० ५)
१. ऐसा ऋतुकाल स्त्रियोंको ऐसे समयमें होता है जब कि बालक दूध पीता हो और छोड़ दे या दूध पीते हुए बालककी मृत्यु हो जाय या बालक गोदमें हो और बहुत दिनोंसे पतिकी इच्छा हो। यदि ऐसे समयपर संयोग हो जाय तो गर्भ रह जाता है। इसको इनामका गर्भ कहते हैं। (श० क०)
३. इस प्रकारसे जो स्त्री ऋतुमती होती है उसका मुख पुष्ट और प्रसन्न होता है। शरीर, मुख, और मस्तिष्क गल-गलाये हुए से होते हैं। स्त्रीको पुरुषकी इच्छा होती है, मीठी, प्यारी बातें करती है; कुक्षि, नेत्र और बाल ढीले हो जाते हैं; हाथ, छाती, कमर, नाभि, जानु और जाँघें
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सन्तति-शास्त्र ।
फड़कने लगती हैं। हर्ष और आनन्दमें स्त्री मग्न हो जाती है। जब ऐसे लक्षण हों, तो बिना रजस्वला हुए भी स्त्रीको अतुमती समझना चाहिये।
(सु० शा० अ० ६ श्लो० ६ व०)
२. जब कि रजस्वला होनेको दो चार दिन बाकी हों और पुरुषकी प्रबल इच्छा हो तो ऐसे समयमें भी पुरुष-संयोगसे गर्भ रह जाता है। (रति शास्त्र)
इस प्रकार बिना रजवती हुए भी स्त्रियाँ गर्भवती हो जाती हैं।
(२७) कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके आधीन है।
हम लोगोंमें बहुतसे लोग ऐसे हैं कि कर्तव्यको न समझ कर अपनी सारी बातें भाग्यपर ही छोड़ देते हैं। हम कोई बात ऐसी नहीं देखते जो कर्तव्यके आधीन न हो। कुछ पढ़े लिये लोग प्रकृति (कुदरत) को प्रधान मानकर उसीके भरोसे रहते हैं। ऐसे लोगोंका कहना है कि प्रकृति आप ही आप कार्य कर लेती है; परन्तु इसके साथ ही साथ यह भी जानना पड़ेगा कि प्रकृतिके गुप्त भेदोंका पता लगा कर उसको सहायता देना हमारा परम कर्तव्य है। यह बात तो सब जानते हैं कि संयोग करनेपर पुत्र या कन्या होती है। इसी अन्य-विश्वासपर रहते हुए प्रकृतिके गुप्त भेदोंका पता नहीं लगता। इन बातोंके न जाननेसे देशकी जो हानि हो रही है, वह विचार-सूत्रसे कहीं बाहर है। यही कारण है कि कहीं लड़के ही लड़के और कहीं लड़कियाँ ही लड़कियाँ दिखाई पड़ती हैं। लोग इसको ईश्वरकी देन समझते हैं। हाँ, यह देन अवश्य है; परन्तु ईश्वर देता कैसे है? घर आकर तो दे नहीं जाता? उसका
कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अधीन है। १३५
देना भी तो हमारी क्रियाओंके अधीन है। अतएव हमारा काम है कि हम विद्वानोंकी बतलाई उन क्रियाओंको देखे कि जिनका उपदेश धर्मशास्त्र, वैद्यक और अनेक रीतियोंसे किया गया है, और जिसको हमने केवल भाग्य के भरोसे भुला दिया है। किसी समयमें हम इस विषयके मर्मज्ञ और हमारी स्त्रियाँ इन गुप्त भेदोंकी पण्डिता थीं, परन्तु आज इन बातोंका पता नहीं है। केवल भाग्यकी ही महिमा दिखलाई पड़ती है। इस विषयमें प्रकृतिके अनेक भेद हैं और उनमें नये और पुराने अनेक मत हैं, जिनके अनुसार कन्या और पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अधीन है।
१. वेदका मत।
१. वीर्य बलवान होनेसे पुत्र और रज बलवान होनेसे कन्या उत्पन्न होती है। (गर्भोपनिषद्)
२. धर्मशास्त्रका मत।
१. रजस्वला होनेके दिनसे ६-८-१०-१२-१४ और १६वीं रातमें गर्भाधान करतेसे पुत्र और ५-७-६-१-१३ और १५ वीं रातके गर्भाधानसे कन्या उत्पन्न होती है।
(मनु० अ० ३ श्लोक० ४८)
२. पिताका वीर्य अधिक होनेसे पुत्र और माताका रज अधिक होनेसे कन्या होती है। यदि रज और वीर्य बराबर हों, तो नपुंसक या दो सन्तान होती हैं। यदि वीर्य क्षीण या कम हो तो गर्भ ही नहीं रहता।
(मनु० अ० ३ श्लोक० ४९)
३. गर्भाधानके समय रज बलवान होनेसे कन्या और वीर्य बली होनेसे पुत्र उत्पन्न होता है। (वा० प्र० अ० १३)