संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
15. वन्ध्या रोग
वन्द्या रोग ।
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चिन्तामें व्याकुल हों, जो बूढ़े या बूढ़ी हों, जो रोगी हों, जिनको पाखाने पेशाबकी हाजत हो, जो रजवती और पुरुषसे उमरमें बड़ी, तपेदिक, स्वास प्रमेह, प्रदर, गरमी, सूजाक का रोगी हों, जिनके कामदेव न जगा हों, शृङ्गार-रहित, नशेवाज, उन्मत्त और अति दुर्बल हों, उनसे संयोग न करना चाहिये। ( १० क० )
(३) जो अपनेको मिय न हो, जिसके देखनेसे चित्त बिगड़ जाय, जिससे अनवन रहें, विरक्त, जो गुरुके खानदानकी हो दुष्ट योनिवाली और वन्दचलन हो, इनसे संयोग न करना चाहिये। ( १० क० )
इस प्रकारके स्त्री और पुरुषोंसे संयोग न होना चाहिये; क्योंकि इससे अनेक रोग उत्पन्न होकर हानि पहुँचाते हैं।
(१५) वन्द्या रोग ।
हमारे देशमें वन्द्याओंके लिये लोगोंका अनोखा विचार है। जहाँ चार छः वर्ष वच्चा न हुआ तुरन्त स्त्रीको वन्द्या मान बैठते हैं और भाग्य भगवान्के भरोसे पड़े रहकर कुछ यल नहीं करते वैद्यकमें जितनी वन्द्याओंका जिक्र किया गया है, उनमेंसे कुछ ही ऐसी हैं कि जिनके सन्तान नहीं हो सकती, किन्तु औषधि करनेपर वन्द्याएँ निरोग हो सकती हैं। प्रायः लोग यही समझते हैं कि वन्द्याएँ आठ प्रकार की होती हैं और यही बात प्रसिद्ध भी है, परन्तु और दूसरे ग्रन्थोंके देखनेसे पता चलता है कि वन्द्याएँ अठारह प्रकारकी होती हैं। इनकी व्याख्या पृथक् पृथक् की जाती है। [ रतिशात्र ]
(१) जन्मवन्द्या—उसको कहते हैं जो गर्भ ही धारण न कर सके। जाँच करनेपर मालूम हुआ है कि ऐसी स्त्रियोंके
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गर्भाशय ही नहीं होता । अतएव इसका इलाज नहीं हो सकता । क्योंकि इस रोग का सामान जन्म ही से रहता है । इस को पएडी भी कहते हैं ।
(२) काकवन्था—उसको कहते हैं कि जिसके एक ही सन्तान उत्पन्न होकर रह जाय, दूसरी न हो । जाँच करने पर यह मालूम हुआ है कि ऐसी स्त्रियोंमें पहला बच्चा होनेके समय गर्भाशय नष्ट हो जाता है । इस कारण दूसरी सन्तान नहीं होती । इसमें औषधि करना व्यर्थ है ।
(३) सूतवत्सा—उसको कहते हैं कि जिसके सन्तान उत्पन्न होती हो, परन्तु मर जाया करे । इस विषयमें धर्म-शास्त्रने यह माना है कि स्त्री पूर्व जन्मके पापोंसे सूतवत्सा होती है । यह बात गीता और वेदान्त-शास्त्रसे सिद्ध है कि मनुष्यको पूर्वजन्मका कर्म इस जन्ममें अवश्य भोगना पड़ता है । परन्तु इस विषयमें डाक्टोंका मत यह है कि जिस स्त्रीके बच्चे वारंवार मर जाते हैं, उसके दूध में एक प्रकारका विष होता है । मेरे एक मित्रके तीन बच्चे मर गए । चौथेको पैदा होते ही गायका दूध दिया गया, वह जिन्दा है; परन्तु पाचवाँ गायका दूध पिलाने पर भी मर गया । इसमें औषधि करना व्यर्थ है ।
(४) गर्भध्रावी—उसको कहते हैं कि जिसके गर्भ धारण होकर गिर जाया करे । जाँच करनेसे मालूम हुआ है कि यह रोग गर्भाशय के निकम्मे होनेसे होता है । यदि गर्भाशयमें थोड़ा विकार हो तो इसकी औषधि हो सकती है, परन्तु रोग अधिक होनेपर औषधि भी व्यर्थ होती है । धर्म-शास्त्रने इस रोगको भी पूर्व जन्मके पापोंका फल माना है ।
बन्ध्या रोग ।
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(५) गल्हगर्भा—उसको कहते हैं कि जिसके गर्भ रहकर गल्ह जावे और बढ़ न सके। इस विषयमें जाँच करने से मालूम हुआ है कि यह रोग गर्भाशयके विकार से होता है। खास कर उस स्त्री को कि जिसको 'सरतान रहम' अर्थात् गर्भाशय में कीड़े पैदा हो गए हों। 'सरतान रहमका' मत हकीमाका है अथवा उस स्त्री को होता है, जिस स्त्री की योनि अचरणा हो। अचरणा योनि उसको कहते हैं कि जिस में साफ न करने के कारण छोटे छोटे कीड़े पड़ गए हों और खुजली उत्पन्न होती हो। (च० चि० ३० ३७ श्लो० ११) ऐसे रोगी के होने पर गर्भाशय नष्ट होकर गर्भ गल्हकर गिर जाया करता है। इस रोग का दूसरा कारण गर्भाशयकी गर्मी है। गर्भाशय की बढ़ी हुई गर्मी गर्भ को गला देती है। तीसरा कारण अत्यन्त बढ़ा हुआ गर्मी और सूजाक का प्रकोप है कि जिस से बच्चे का रक्त विगड़ जाता है और गल्ह कर गिर पड़ता है। बड़े हुए कारणोंमें औषधि व्यर्थ होती है।
(६) कन्यापत्या—उसको कहते हैं कि जिस के कन्याएँ ही उत्पन्न हों। जाँच करने से मालूम हुआ है ऐसी स्त्रियाँ वही होती हैं कि जिनके दहिने और का अरुड नहीं होता या निकम्मा हो जाता है। क्यों कि स्त्री के दहिने अरुड से निकले हुए रज द्वारा पुत्र होता है। जब दहिना अरुड ही नहीं है तो पुत्र हो कैसे? अतएव ऐसी दशा में भी औषधि व्यर्थ है।
(७) भूठगर्भा—उसको कहते हैं कि गर्भ रह कर उस की बुद्धि न हो, वैसा ही रह जावे और दूसरा गर्भ भी न रहे। भूठगर्भ वह है कि जिस में बच्चे के स्थान में माँस का लोथड़ा हो। इसका कारण यह है कि जब
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चौथे दिन स्नान करके स्त्री स्पर्श में पुत्र्य संयोग करे या दो स्त्रियाँ आपस में स्त्री पुत्र्य की भाँति संयोग करें तो एककी योनि से वीर्य निकल कर जब दूसरी की योनि में पहुँच जाय तो वह रज से मिलकर गर्भ में पिंड बना देता है । इसे गर्भाका मांस-पिंड कहते हैं ।
( सु० श० अ० २ श्लोक ५१ मे ५३ )
इस विषय में एक विद्वान् की राय है कि सृष्टगर्भ गृहने पर फिर अस्ली गर्भ नहीं रहता । ( श० क० )
डाक्टर लोग उसको ( Falsc pregnancy ) कहते हैं और इसका कारण रज-विकार मानते हैं । डाक्टरी मत के अनुसार उपचार हो सकता है ।
(८) रजोहीना—उसको कहते हैं कि जो रजस्वला हो न हो । इस विषय में जांच करने से मालूम हुआ है कि ऐसी स्त्रियोंके गर्भ-अण्ड ही नहीं होते । ऐसी दशा में सन्तान भला कैसे हो सकता है । अतएव औषधि करना व्यर्थ है ।
(९) मेही—उस को कहते हैं कि जिसके शरीर में चरवी अत्यन्त बढ़ गई हो । ऐसी स्त्री के सन्तान इस कारण नहीं हो सकती कि चरवी बढ़ने से गर्भाशय निकम्मा हो जाता है । चरवी गर्भकोष को विगाड़ देती है और मुख सकुचित हो जाता है । इसकी औषधि हो सकती है ।
(१०) अतिसूला—उसको कहते हैं जो अत्यन्त मोटी हो । ऐसी स्त्री के सन्तान इस कारण नहीं होती कि उनका गर्भ-अण्ड विगाड़ जाता है और मोटाई के कारण लिंगेंद्रिय गर्भाशय के मुख तक न पहुँच कर वीच में ही रह जाती है । अतएव वीर्य भी वहाँ तक नहीं पहुँच सकता । इसकी औषधि हो सकती है ।
(११) नष्ट कोष्ठी—उसको कहते हैं कि जिसका कोष्ठ अर्थात्
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गर्भाशय नष्ट हो गया हो और इस कारण गर्भ न रहता हो । इसके तीन भेद हैं—
(१) स्त्री का थोड़ी अवस्था में पुरुष से संयोग हो जाना । ऐसा होने पर गर्भाशय नष्ट और धातु क्षीण हो जाती है । एक विद्वान् की राय है ऐसा होने पर गर्भाशय दग्ध हो जाता है। (श० क०)
इसमें सन्देह नहीं कि थोड़ी अवस्था में संयोग हो जाने से गर्भाशय और गर्भश्राव इतने निर्बल और निकम्मे होजाते हैं कि वे अपना काम नहीं कर सकते । इसकी औषधि हो सकती है, परन्तु इसे लग भग असाध्य ही समझना चाहिये ।
२. यह कि अनेक रोगोंके कारण गर्भाशय का नष्ट हो जाना, इसमें बहुत से रोगों की औषधि हो सकती है और बहुतों की नहीं ।
३. योनि-रोग कि जिससे गर्भाशय नष्ट हो जाता है । इसमें भी कुछ रोगों की औषधि हो सकती है, कुछ की नहीं । जब योनिरोग से गर्भाशय नष्ट हुआ हो, तो योनि और गर्भाशय दोनों की चिकित्सा होनी चाहिये ।
(१२) बलधर्मी—उसको कहते हैं कि जिसको निर्बलताके कारण गर्भ न रहता हो । ऐसी स्त्रियाँ बही होती हैं कि जो अत्यन्त मैथुनप्रिय हैं और जिनके शरीर में रक्त नहीं है । इनकी औषधि हो सकती है, परन्तु बहुत कठिनाई से ।
(१३) शकसयोगिता—उसको कहते हैं कि रजस्वला होने के पहले ही जिसका पुरुष से संयोग हो गया हो । ऐसी स्त्री का गर्भाशय दग्ध होकर सिकुड़ जाता है और फिर गर्भ नहीं रहता । इसी कारण सुधरने लिखा है कि
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सोलह वर्ष से पहले पुरुष से संयोग न होना चाहिये । ऐसी दशा में श्रोवधियां प्रायः व्यर्थ होती हैं, परन्तु डाकुर लोग साहस रखते हैं ।
(१४) वामिनी—उसको कहते हैं कि जिसके गर्भाशय में पड़ुचा हुआ वीर्य छू या सात दिनों में बाहर निकल आचे । यह रोग गर्भाशय के विकार से होता है, खास कर उस समय में जब कि गर्भाशय का मुख चौड़ा हो गया हो, अथवा गर्भाशय के दूसरे रोगों से । इसकी श्रोवधि हो सकती है ।
(१५) सूचीमुखी—उसको कहते हैं कि जिसके गर्भाशयका मुख बहुत छोटा हो, जिससे वीर्य भीतर न जा सके । यह रोग जन्म से होता है । इसकी श्रोवधि करना व्यर्थ है ।
(१६) रक्तवावी—उसको कहते हैं कि जिसके हमेशा रक्तगिरा करता हो । ऐसी दशामें गर्भ नहीं रहता । यह कई प्रकार से होता है ।
१. रक्त और पिस्त के विगड़ जाने से ।
२. छोटी अवस्थावाली स्त्रीका पूरे जवान पुरुष के समागमके कारण गर्भाशय और फलवाहिनी नली की किसी रगके फट जानेसे ।
यह रोग कठिनाई से अच्छा हो सकता है परन्तु अच्छे होने पर सन्तान होने की वाबत ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता । होना और न होना दोनों समभव है । श्रोवधि का प्रयोग कठिन ही है ।
(१७) स्त्री—उसको कहते हैं कि जिसके योनिसे सफेद या रगतदार पतला या लुवाबदार पदार्थ निकला करे यह कई कारणों से होता है ।
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१. वात, पित्त और कफके प्रकोपसे ।
२. प्रदर रोगसे ।
३. गर्भाशयके अनेक रोगोंसे ।
इसकी औपधि हो सकती है, परन्तु कव, जबकि केवल साव ही हो। जब गर्भाशयमें मस्ते और गाँठसवन्धी रोग होगा, तब प्रारम्भमें कुछ कठिनाई और रोग बढ़नेमें अत्यन्त कठिनाता होगी। इसे प्रायः असाध्य ही जानना चाहिये।
( १८ ) शृण्वी—इस प्रकारकी वन्ध्याके दो भेद होते हैं।
१. वह कि जिसके गर्भाशयमें वीर्य पहुँचकर जल जावे।
ऐसी दशामें रज निकलनेमें अत्यन्त जलन जान पड़ती है। रज काला और गाढ़ा होता है। गर्मी बहुत मालूम होती है। यह रोग उस समय होता है जब कि गर्भाशयकी गर्मी अत्यन्त बढ़ गई हो। इसकी औपधि हो सकती है।
२. वह कि जब गर्भाशयमें वीर्य सूख जावे। ऐसी दशामें गर्मी अधिक जान पड़ती है। योनि और गर्भाशय सूखे रहते हैं। जलन और गर्मी अधिक होती है। यह भी अत्यन्त गर्मीके बढ़नेसे होता है। इसकी औपधि हो सकती है।
इन प्रकार अटारह तरहकी वन्ध्याओंमें सबको पूर्ण वन्ध्या न समझना चाहिये। जिनका वन्ध्यत्व औपधिसे छूट सकता है, उनके लिये औपधि अवश्य करनी चाहिये। विद्वान् लोग प्रायः उन्हीं स्त्रियोंको वन्ध्या मानते हैं कि जिनके गर्भ उत्पन्न करनेका अवयव ही न हो। इस प्रकार जाँच करके यल्ल करना आवश्यक है।
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(१६) मेद-वृद्धि अर्थात् शरीरमें
चरबीका बढ़ना ।
शरीरमें चर्बीके बढ़नेको मेद वृद्धि कहते हैं। यह रोग स्त्रियोंको विशेष रीतिसे होता है, खासकर उनको जो वैठी रहती हैं। और कुछ काम नहीं करतीं या जिन्हें उत्तमोत्तम भोजन मिलता है। वैद्यकका मत है कि दिनोंमें सोनेसे, कफ उत्पन्न करनेवाले चिकने मोटे पदार्थों के सेवन करनेसे, भोजनका रस मधुर होकर मेदको बढ़ाता है। बढ़ती हुई चर्बीका असर शरीरमें हर जगह होता है। इस कारण रसवाही शिराओंका रास्ता बंद हो जाता है। ऐसी दशामें हड्डी, मज्जा और चीन्य पुष्ट न होकर फेंचल चर्बी ही बढ़ती है। अतएव मनुष्य सुकुमार और आलसी होकर सच कामोंमें पीछपहीन हो जाता है।
( श० क० )
स्वर्वास रोग, व्यास, निद्रा, आलस्य, भूख, पसीना और दुर्गंध ये बातें चर्बी बढे हुए मनुष्यमें अवश्य होती हैं। प्रायः देखा गया है कि ऐसे रोगी खाते बहुत हैं। शरीरके सच स्थानों में तो चर्बी बढ़ती ही है, परन्तु पेट, नितम्ब, छाती और पिंड-लियोंमें अधिक, किन्तु ताकत कम हो जाती है। स्त्रियोंमें गर्भाशयका मुँह मोटा पड जाता है और चर्बीसे मिश्रित कोई पदार्थ उस जगह रहता है। चर्बीके कारण योनि संकुचित अर्थात् सक्की पड जाती है ऐसी स्त्रियोंमें स्नान ठीक ठीक नहीं बनता। यही कारण है कि सबसे पहले रजका चिगाड होता है। जब स्त्रुय अच्छी तरह चर्बी बढ़नेमें छा जाती है, तो