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संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

12. रजस्वलाके कर्तव्य

रजोध्यर्मके रोग ।

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३. हाथ पाँव और शरीर पर शोथ ।

४. शरीरमें वायुका फैल जाना ।

५. गर्भाशय और अण्डोंमें विशेष पीड़ा ।

६. प्यास और पेशाबका अधिक होना ।

७. दस्तकी रुकावट ।

ऐसी दशामें बहुत कम स्त्रियाँ बचती हैं । इसमें शरीरका सारा रक्त निकल जाता है । कभी कभी रक्तकी धार भी निकलती है, और कभी छिछड़ेदार रक्त निकलता है अतएव रोग प्रारंभ होते ही उपाय करना चाहिये ।

६. टीक समयपर रजस्वला न होना ।

इसके दो भेद हैं । (श० क०)

१. समयके पहिले होना । इसके अनेक कारण हैं ।

१. स्तनका विगड़ जाना ।

२. रज टीक न बनना और शरीरमें रक्तकी कमी ।

३. अण्ड फलवाहिनी नली और गर्भाशयका रोगग्रस्त होना । इसके अनेक लक्षण हैं ।

१. सुस्ती, सरदर्द, चेहरेपर रूखापन, थोड़े परिश्रममें रुकावट, छातीमें दर्द पेटमें पेंठन और आँखोंमें जलन ।

स्त्रियाँ इसे सामान्य रोग समझती हैं । प्रारम्भमें तो कुछ नहीं, परन्तु रोग बढ़नेपर बड़ी कठिनाई पड़ती है ॥

इस प्रकार रजोध्यर्मके अनेक रोगोंसे स्त्रियोंको अत्यन्त कष्ट होता है । अतएव स्तुत्यर्थमें जैसे ही कुछ विकार उत्पन्न हो तुरन्त उपाय करना चाहिये ।

( १२ ) रजस्वलाके कर्तव्य ।

स्त्रीका रजस्वला होना प्राकृतिक है । जिस प्रकार किसान-

५

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सन्तति-शास्त्र ।

को खेतीके लिये समय पाकर उत्तम खेत बनाना पड़ता है, उसी प्रकार स्त्रियोंको ऋतुकालमें अपनेको सुयोग्य बनाना पड़ता है । जिस खेतको किसानने नहीं कमाया, जिसकी कुछ परवाह नहीं की, उस खेतसे उत्तम फसिल पैदा करनेकी आशा करना मूर्खता नहीं, तो और क्या है ? इसी प्रकार जिन स्त्रियोंने ऋतु-कालमें अपनेको सुयोग्य नहीं बनाया, उनका उत्तम सन्तानकी इच्छा करना भी व्यर्थ है । जिस प्रकार खेतके भले बुने होनेका भार किसानकी मेहनतपर है, इसी तरह स्त्रियोंका अपने लिये सुयोग्य बना लेना उनके कर्तव्योंपर निर्भर है ।

यदि खेत उत्तम है, तो खेती भी मनमानी तैयार की जा सकती है, परन्तु निकाभमें खेतमें घरकी पूँजी (बीज)का धोटा ही रहता है । इसलिये भावी माताओंको ऋतुकालमें अपने कर्तव्योंसे न नूकना चाहिये ।

सन्तानके लिये माताका कर्तव्य रजो-दर्शनसे ही प्रारम्भ हो जाता है । सबसे पहला काम तो यह है कि रजवती होते ही उसे एकात्मवास करना चाहिये । यह हमारे देशकी पुरानी प्रथा है । इसका मतलब यह है कि—

रजोदर्शनके दिनोंमें माताका जैसा चित्त, चरित्र और व्यवहार होता है, उसी गुण-त्रोपके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है ।
( श० क० )

अलग रहनेसे चित्त स्थिर रहता है, किसी तरहका विकार हृदयमें नहीं आता ।

माताका हृदय एक तसवीर खींचनेवाले यंत्रके समान है । जैसे यंत्रकी डिव्ही हटाते ही उसके सामनेवाली चीजोंका अफस शीशेपर आ जाता है, इसी प्रकार रजोदर्शनके समय माताके चित्त, चरित्र और व्यवहारसे हृदयपर पड़े हुए गुण-

21. मत्तानेके रोग

रजस्वलाके कर्तव्य ।

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द्रोप सन्तानमें आ जाते हैं। इसी लिये एकान्त-वासकी विधि कही गयी है। ऐसे समयमें स्त्रियाँ भोजनका ज़रा भी विचार नहीं करतीं। पुरानी रीतिके अनुसार वासी भोजन करती हैं, परन्तु यह आलस्य पैदा करता है। गरम भोजनसे रजवाहिनी नलियोंमें गरमी पहुँचती है, जिससे अधिक रज निकलनेका भय रहता है। अतएव ताज़ा भोजन ठंडा करके खाना चाहिये! गव्दा, कसैला, वादी, चरपरा और तैलसे बना हुआ भोजन हानि पहुँचाता है। इस लिये वैद्यकका मत है कि मीठा और जल्दी पचनेवाला भोजन करना उत्तम है। ( श० क० )

रजवतीको सिवा एकान्त-वासके और कुछ न करना चाहिये, क्योंकि वैद्यकका मत है कि “अद्यु समयमें दिनमें सोने-से बहुत सोने वाली, काजल लगानेसे श्रंथी, रोनेसे नेत्र विकारवाली, स्नान करने, उवटन और चन्दन लगानेसे दुःखी, नैल लगानेसे कुशी, तारखुन काटनेसे खराब नाखूनोंवाली, दीड़कर चलनेसे चंचल, हँसनेसे काले दांतों और काले ओठ वालू तथा काली जीभ वाली, बहुत बोलनेसे वकवादी, तेज आवाज़ सुननेसे वहिरी, बालोमें कंधी करनेसे गंज रोगवाली, अधिक हवा खाने और कष्ट करनेसे मतवाली सन्तान उत्पन्न होती है।”

( सु० श० अ० २ श्लो० २३-२४ )

एक विद्वानकी राय है कि अश्लील गीत गानेसे बुढ़ी पुस्तकों-के पढ़ने, हँसी दिल्लागी, मज़ाक और बेहूदी बातें बफनेसे निर्लज्ज, परिश्रम करनेसे रोगी, सीनेसे नेत्र विकारवाली, पुरुष संयोग-से अनेक रोगयुक्त यदि कन्या हो तो वेश्या या गुप्त व्यभिचार वाली और यदि पुत्र हो तो वेश्याओंसे अदल प्रेम रखनेवाला वदचलन, शूद्धार करनेसे कामी, व्यभिचारी और शौकीन, भूठ बोलनेसे पारखंडी, क्रोध करनेसे दुष्ट, मांस खानेसे पापी, शराब

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मन्वर्ति-शास्त्र ।

पतिस्थ मनवाली, उपवास करनेमें पेटके रोगवाली सन्तान उत्पन्न होती है ।

यह विचार केवल रजोधर्मके तीन दिनोंके लिये ही है । इसका मतलब यह है कि रजवतीके हृदयमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न न होना चाहिये ।

धर्मशास्त्रका मत है कि रजवती पहले दिन चांडाली दूसरे दिन त्रासवानिनी, तीसरे दिन रजकी (धोविन) के नमन अथुद्ध रहकर चौथे दिन शुद्ध होती है ।

( ध० मगूह )

यह बात विचार करने योग्य है कि जो स्त्री आज त्रासवाणी है, वह कल रजन्वला होनेपर चांडाली हो जावे । नहीं, धर्मप्रकरणमें यह बात इस कारण ले ली गयी है कि धर्मसमभ्कन ही रजवती किसीको स्पर्श न करे । इसी कारण तीन दिन अलग रहने और किसीको स्पर्श न करनेमें यह है कि रजवतीमें बड़ा लाभ तो किसीके स्पर्श न करनेमें नहीं पहुँचता । पग्लु आजकल किसी प्रकारकी छूतका असर नहीं पहुँचता । पग्लु आजकल हीन भी बहुत बड़ी होती है । कड़ाकेका जाड़ा पड़ रहा है । शतका समय है, वहजी एक पतली धोतीमें चँडी पिड़गिडा रही है । श्रावाम करनेके लिये परेडी चारपाई या तरता, चिल्लाने को चढाई और आठनेको एक पुराना कम्बल बहुत है । धर्मकी प्रेमियों और छूत अछूत पर जान देनेवाली स्त्रियोंका क्या यही धर्मकी मर्यादा है ? यदि रहे कि शरीरहीसे धर्म होता है । जब शरीर ही नहीं, तो धर्म कहाँसे होगा ? इसलिये धर्मशास्त्रने शरीरकी रक्षा करना ही परम धर्म माना है । ऐसी दशामें रजवतीको यदि सदी लग जावे तो अरुडे, फलवाहिनी नली और गर्भाश्रयमें अनेक रोग लिपट जाते हैं । परिणाम यह होता है स्त्रियाँ और बच्चोंसे मातापै सदाके लिये कि...