संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
सामान्यप्रकरणम् ३३
ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये—इदं न मम ॥
ओम् इन्द्राय स्वाहा ॥ इदमिन्द्राय—इदं न मम ॥
इन दोनों मन्त्रों से वेदी के मध्य में दो आहुति देनी।
उसके पश्चात् चार आहुति अर्थात् आधारावाज्यभागाहुति
देके, जब प्रधानहोम अर्थात् जिस-जिस कर्म में जितना-जितना
होम करना हो करके, पश्चात् भी पूर्णाहुति से पूर्व पूर्वोक्त चार
(आधारावाज्यभागा०) देवें।
पुनः शुद्ध किये हुए उसी घृत में से स्रुवा को भरके प्रज्वलित
समिधाओं पर व्याहृति की चार आहुति देवें—
ओं भूरग्नये स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदं न मम ॥
ओं भुवर्वायवे स्वाहा ॥ इदं वायवे—इदं न मम ॥
ओं स्वरादित्याय स्वाहा ॥ इदमादित्याय—इदं न मम ॥
ओं भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः स्वाहा ॥
इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः—इदं न मम ॥
ये चार घी की आहुति देकर, स्विष्टकृत् होमाहुति एक
ही है, यह घृत की अथवा भात की देनी चाहिए। उसका
मन्त्र—
ओं यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम्।
अग्निष्टत्स्विष्टकृद्विद्यात् सर्वं स्विष्टं सुहुतं करोतु मे। अग्नये
स्विष्टकृते सुहुतहुते सर्वप्रायश्चित्ताहुतीनां कामानां समर्द्धयित्रे
सर्वान्नः कामान्त्समर्द्धय स्वाहा ॥ इदमग्नये स्विष्टकृते—इदं
न मम ॥
इससे एक आहुति करके, प्राजापत्याहुति करें। यह नीचे
लिखे मन्त्र को मन में बोलके देनी चाहिए—
ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये—इदं न मम ॥
इससे मौन करके एक आहुति देकर चार आज्याहुति घृत
की देवें, परन्तु ये नीचे लिखी आहुति चौल, समावर्त्तन और
विवाह में मुख्य हैं, वे चार मन्त्र ये हैं—
३४ संस्कारविधिः
ओं भूर्भुव॒: स्व॑: । अग्न॒ आयू॑ंषि पवस॒ आ सु॒वोर्ज॒मिषं॑ च
नः । आ॒रे बा॑धस्व दु॒च्छुनां॑ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये पवमानाय—इदन्न
मम ॥ १ ॥
ओं भूर्भुव॒: स्व॑: । अ॒ग्निरृषि॒: पव॑मान॒: पाञ्च॑जन्यः पु॒रोहि॑तः ।
तमी॑महे महा॒गयं॑ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये पवमानाय—इदन्न
मम ॥ २ ॥
ओं भूर्भुव॒: स्व॑: । अग्ने॒ पव॑स्व॒ स्वपा॑ अ॒स्मे वर्च॑: सु॒वीर्य॑म् ।
दध॑द्र॒यिं मयि॒ पोषं॑ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये पवमानाय—इदन्न
मम ॥ ३ ॥ —ऋ० मं० ९ । सू० ६६ । मं० १९-२१ ॥
ओं भूर्भुव॒: स्व॑: । प्र॒जाप॑ते॒ न त्वदे॒तान्य॒न्यो विश्वा॑
जा॒तानि॒ परि॒ ता ब॑भूव । यत्का॑मास्ते जु॒हुमस्तन्नो॑ अस्तु व॒यं
स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णां स्वाहा॑ ॥ इदं प्रजापतये—इदं न मम ॥ ४ ॥
—ऋ० मं० १० । सू० १२१ । मं० १० ॥
इनसे घृत की चार आहुति करके “अष्टाज्याहुति”
निम्नलिखित मन्त्रों से सर्वत्र मङ्गल-कार्यों में आठ आहुति देवें,
परन्तु किस-किस संस्कार में कहाँ-कहाँ देनी चाहिएँ, यह विशेष
बात उस-उस संस्कार में लिखेंगे। वे आठ आहुति-मन्त्र ये
हैं—
ओं त्वं नो॑ अग्ने॒ वरु॑णस्य वि॒द्वान् दे॒वस्य॑ हेळोऽव॑
यासिसीष्ठाः । यजि॑ष्ठो वह्नि॑तमः शोशु॑चा॒नो विश्वा॒ द्वेषां॑सि प्र
मु॑मु॒ग्ध्य॒स्मत् स्वाहा॑ ॥ इदमग्निवरुणाभ्याम्—इदं न मम ॥ १ ॥
ओं स त्वं नो॑ अग्नेऽव॒मो भ॑वो॒ती नेदि॑ष्ठो अ॒स्या उ॒षसो॑
व्यु॑ष्टौ । अव॑ यक्ष्व नो॒ वरु॑णं ररा॑णो वी॒हि मृ॑ळी॒कं सु॒हवो॑ न
एधि॒ स्वाहा॑ ॥ इदमग्निवरुणाभ्याम्—इदं न मम ॥ २ ॥
—ऋ० मं० ४ । सू० १ । मं० ४, ५ ॥
सामान्यप्रकरणम् ३५
ओम् इ॒मं मे॑ वरुण श्रु॒धी हव॑म॒द्या च॑ मृळय।
त्वाम॑व॒स्युराच॑के॒ स्वाहा॑॥ इदं वरुणाय—इदं न मम॥ ३॥
—ऋ० मं० १। सू० २५। मं० १९॥
ओं तत्त्वा॑ यामि॒ ब्रह्म॑णा॒ वन्द॑मान॒स्तदा शा॑स्ते॒ यज॑मानो
ह॒विर्भि॑:। अहे॑ळमानो वरुणे॒ह बो॒ध्युरु॑शंस॒ मा न॒ आयु॒: प्र
मौषी॒: स्वाहा॑॥ इदं वरुणाय—इदं न मम॥४॥
—ऋ० मं० १। सू० २४। मं० ११॥
ओं ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता
महान्तः। तेभिर्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः
स्वर्काः स्वाहा॥ इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो
देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वर्केभ्यः—इदं न मम॥५॥
ओम् अयाश्चाग्नेऽस्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्त्वमया
असि। अया नो यज्ञं वहास्यया नो धेहि भेषजꣳ स्वाहा॥
इदमग्नये अयसे—इदं न मम॥ ६ ॥
ओम् उदु॑त्त॒मं व॑रुण॒ पाश॑म॒स्मदवा॑ध॒मं वि म॑ध्य॒मं श्र॑थाय।
अथा॑ व॒यमा॑दित्य व्र॒ते तवाना॑गसो॒ अदि॑तये स्याम॒ स्वाहा॑॥
इदं वरुणायाऽऽदित्यायाऽदितये च—इदं न मम॥७॥
—ऋ० मं० १। सू० २४। मं० १५॥
ओं भवत॑न्नः॒ सम॑नसौ॒ सचै॑तसावरे॒पसौ॑। मा य॒ज्ञꣳ हि॑ꣳसिष्टं
मा य॒ज्ञप॑तिं जातवेदसौ शि॒वौ भ॑वत॒मद्य न॒: स्वाहा॑॥
इदं जातवेदोभ्याम्—इदं न मम॥८॥ —युजः० ५।३
सब संस्कारों में मधुर स्वर से मन्त्रोच्चारण यजमान ही
करे। न शीघ्र न विलम्ब से उच्चारण करे, किन्तु मध्यभाग
३६ संस्कारविधिः
जैसाकि जिस वेद का उच्चारण है, करे। यदि यजमान न पढ़ा
हो, तो इतने मन्त्र तो अवश्य पढ़ लेवे। यदि कोई कार्यकर्त्ता
जड़, मन्दमति, काला अक्षर भैंस बराबर जानता हो, तो वह
शूद्र है, अर्थात् शूद्र मन्त्रोच्चारण में असमर्थ हो, तो पुरोहित
और ऋत्विज् मन्त्रोच्चारण करें, और कर्म उसी मूढ़ यजमान
के हाथ से करावें।
पुनः निम्नलिखित मन्त्र से पूर्णाहुति करें। स्रुवा को घृत
से भरके—
ओं सर्वं वै पूर्णँᳵ स्वाहा ॥
इस मन्त्र से एक आहुति देवें। ऐसे दूसरी और तीसरी
आहुति देके, जिसको दक्षिणा देनी हो देवें, वा जिसको जिमाना
हो जिमा, दक्षिणा देके सबको विदाकर स्त्री-पुरुष हुतशेष घृत,
भात वा मोहनभोग को प्रथम जीमके पश्चात् रुचिपूर्वक उत्तमान्न
का भोजन करें।
मङ्गलकार्य
अर्थात् गर्भाधानादि संन्यास-संस्कार पर्यन्त पूर्वोक्त [कार्य]
और निम्नलिखित सामवेदोक्त महावामदेव्यगान अवश्य करें।
वे मन्त्र ये हैं—
१ २उ ३क २२ १ २ ३ १ २२ ३ २ ३ १ २ ३ १ २
ओं भूर्भुवः स्वः। कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा।
२ ३ १ २ ३ २
कया शचिष्ठया वृता ॥ १ ॥
१ २उ ३क २२ १ २ ३ १ २२ ३ १ २ ३ १ २
ओं भूर्भुवः स्वः। कस्त्वो सत्यो मदानां मंहिष्ठो मत्सदन्धसः।
३ १ २ ३ २ ३ १ २
दृढा चिदारुजे वसु ॥ २ ॥
१ २उ ३क २२ ३ २उ ३ १ २ ३ १ २ ३ २
ओं भूर्भुवः स्वः। अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्।
३ १ १ ३ १ २
शतं भवास्यूतये ॥ ३ ॥
सामान्यप्रकरणम् ३७
महावामदेव्यम्
क॑ाऽ५या । नश्चा४३ यित्रा२३ आभुवा४त् ५। ऊ१ । ती स२दा१वृ२धः
स१। खा। औ२३ हो२हा२यि। कया२३ शचायि१। ष्ठयौ३हो२३। हुँम१ा५२।
वाऽ२र्तॊ३ऽ५हा२यि ॥ (१)॥
क१ाऽ५स्त्व२ाँ। सत्यो४३मा२३दा४ना५म्। मा१। हिष्ठो३मा२त्सा१दन्ध२।
सा। औ२३हो२हा२यि। दृढा२३ चिदा१। रुजौ३हो२३। हुँम१ा५२।
वा१ऽ२सो२३ऽ५हा२यि ॥ (२)॥
आ३ऽ५भी१। षुणाँ४३ः स२ा३खीना४म् ५। आ१। वि२ता जरा१यि तृ२।
णाँ१म्। औ२२३ हो२ हायि२। शंता२३म्२भवा। सियौ३हो२३ हुँम१ा५२।
ता१ऽ२ यो२३ऽ५हा२यि ॥ (३)॥
—साम० उत्तरार्चिके। अध्याये १। खं० ४। मं० १, २, ३॥
यह [महा] वामदेव्यगान होने के पश्चात् गृहस्थ स्त्रीपुरुष,
कार्यकर्त्ता सद्धर्मी, लोकप्रिय, परोपकारी, सज्जन, विद्वान् वा
त्यागी, पक्षपातरहित संन्यासी, जो सदा विद्या की वृद्धि और
सबके कल्याणार्थ वर्त्तनेवाले हों उनको नमस्कार, आसन, अन्न,
जल, वस्त्र, पात्र, धन आदि के दान से उत्तम प्रकार से
यथासामर्थ्य सत्कार करें। पश्चात् जो कोई देखने ही के लिए
आये हों, उनको भी सत्कारपूर्वक विदा कर दें।
अथवा जो संस्कार-क्रिया को देखना चाहें, वे पृथक्-
पृथक् मौन करके बैठे रहें, कोई बातचीत हल्ला-गुल्ला न करने
पावें। सब लोग ध्यानावस्थित प्रसन्नवदन रहें। विशेष कर्मकर्त्ता
और कर्म करानेवाले शान्ति, धीरज और विचारपूर्वक क्रम से
कर्म करें और करावें।
यह सामान्यविधि अर्थात् सब संस्कारों में कर्त्तव्य है॥
॥ इति सामान्यप्रकरणम्॥
अथ गर्भाधानविधिं वक्ष्यामः
निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः।
—मनुस्मृति-द्वितीयाध्याये, श्लोकः १६ ॥
अर्थ—मनुष्यों के शरीर और आत्मा के उत्तम होने के
लिए निषेक अर्थात् गर्भाधान से लेके श्मशानान्त अर्थात्
अन्त्येष्टि=मृत्यु के पश्चात् मृतक शरीर का विधिपूर्वक दाह करने
पर्यन्त १६ संस्कार होते हैं।
शरीर का आरम्भ गर्भाधान और शरीर का अन्त भस्म
कर देने तक सोलह प्रकार के उत्तम संस्कार करने होते हैं।
उनमें से प्रथम गर्भाधान-संस्कार है।
गर्भाधान उसको कहते हैं कि जो "गर्भस्याऽऽधानं
वीर्यस्थापनं स्थिरीकरणं यस्मिन् येन वा कर्मणा, तद्
गर्भाधानम्" गर्भ का धारण, अर्थात् वीर्य का स्थापन गर्भाशय
में स्थिर करना जिससे होता है।
जैसे बीज और क्षेत्र के उत्तम होने से अन्नादि पदार्थ भी
उत्तम होते हैं, वैसे उत्तम, बलवान् स्त्री-पुरुषों से [उत्पन्न]
सन्तान भी उत्तम होते हैं। इससे पूर्ण युवावस्था [पर्यन्त] यथावत्
ब्रह्मचर्य का पालन और विद्याभ्यास करके, अर्थात् न्यून-से-
न्यून १६ वर्ष की कन्या और २५ वर्ष का पुरुष अवश्य हो
और इससे अधिक वयवाले होने से अधिक उत्तमता होती है,
क्योंकि बिना सोलहवें वर्ष के गर्भाशय में बालक के शरीर
को यथावत् बढ़ने के लिए अवकाश और गर्भ के धारण-पोषण
का सामर्थ्य कभी नहीं होता और २५ वर्ष के बिना पुरुष का
वीर्य भी उत्तम नहीं होता। इसमें यह प्रमाण है—
गर्भाधानप्रकरणम् ३९
पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे ।
समत्वागतवीर्यौ तौ जानीयात्कुशलो भिषक् ॥ १ ॥
—सुश्रुते सूत्रस्थाने, अ० ३५ । १० ॥
ऊनषोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम् ।
यद्याधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विपद्यते ॥ २ ॥
जातो वा न चिरं जीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः ।
तस्मादत्यन्तबालायां गर्भाधानं न कारयेत् ॥ ३ ॥
—सुश्रुते सूत्रस्थाने, अ० १० । ४७-४८ ॥
ये सुश्रुत के श्लोक हैं। शरीर की उन्नति वा अवनति का
विधि जैसा वैद्यकशास्त्र में है, वैसा अन्यत्र नहीं। जो उसका
मूल विधान है, वह आगे वेदारम्भ में लिखा जाएगा, अर्थात्
किस-किस वर्ष में कौन-कौन धातु किस-किस प्रकार का
कच्चा वा पक्का, वृद्धि वा क्षय को प्राप्त होता है, यह सब
वैद्यकशास्त्र में विधान है, इसलिए गर्भाधानादि संस्कारों के करने
में वैद्यकशास्त्र का आश्रय विशेष लेना चाहिए।
अब देखिए सुश्रुतकार परम वैद्य कि जिनका प्रमाण सब
विद्वान् लोग मानते हैं, वे विवाह और गर्भाधान का समय न्यून-
से-न्यून १६ वर्ष की कन्या और २५ वर्ष का पुरुष अवश्य
होवे, यह लिखते हैं।
जितना सामर्थ्य २५वें वर्ष में पुरुष के शरीर में होता है,
उतना ही सामर्थ्य १६वें वर्ष में कन्या के शरीर में हो जाता
है। इसलिए वैद्य लोग पूर्वोक्त अवस्था में दोनों को समवीर्य
अर्थात् तुल्य सामर्थ्यवाले जानें ॥ १ ॥
सोलह वर्ष से न्यून अवस्था की स्त्री में २५ वर्ष से कम
अवस्था का पुरुष यदि गर्भाधान करता है, तो वह गर्भ उदर
में ही बिगड़ जाता है ॥ २ ॥
४० संस्कारविधिः
और जो उत्पन्न भी हो तो अधिक नहीं जीवे, अथवा
कदाचित् जीवे भी तो उसके अत्यन्त दुर्बल शरीर और इन्द्रिय
हों। इसलिए अत्यन्त बाला अर्थात् सोलह वर्ष की अवस्था
से कम अवस्था की स्त्री में कभी गर्भाधान् नहीं करना
चाहिए ॥ ३ ॥
चतस्रोऽवस्थाः शरीरस्य वृद्धियोंवनं सम्पूर्णता
किञ्चित्परिहाणिश्चेति । आषोडशाद् वृद्धिराचतुर्विंश-
तेर्यौवनमाचत्वारिंशतः सम्पूर्णता ततः किञ्चित्परिहाणि-
श्चेति ॥
अर्थ—सोलहवें वर्ष से आगे मनुष्य के शरीर के सब
धातुओं की वृद्धि और पच्चीसवें वर्ष से युवावस्था का आरम्भ,
चालीसवें वर्ष में युवावस्था की पूर्णता अर्थात् सब धातुओं की
पूर्णपुष्टि, और उससे आगे किंचित्-किंचित् धातु=वीर्य की हानि
होती है, अर्थात् चालीसवें वर्ष [तक] सब अवयव पूर्ण हो
जाते हैं। पुनः खान-पान से उत्पन्न जो वीर्य धातु होता है, वह
कुछ-कुछ क्षीण होने लगता है।
इससे यह सिद्ध होता है कि यदि शीघ्र विवाह करना चाहें,
तो कन्या १६ वर्ष की और पुरुष २५ वर्ष का अवश्य होना
चाहिए। मध्यम समय कन्या का बीस वर्षपर्यन्त और पुरुष
का चालीसवाँ वर्ष, और उत्तम समय कन्या का चौबीस वर्ष
और पुरुष का अड़तालीस वर्षपर्यन्त का है।
जो अपने कुल की उत्तमता, उत्तम सन्तान, दीर्घायु, सुशील,
बुद्धि-बल-पराक्रमयुक्त, विद्वान् और श्रीमान् करना चाहें, वे
सोलहवें वर्ष से पूर्व कन्या और पच्चीसवें वर्ष से पूर्व पुत्र का
विवाह कभी न करें। यही सब सुधार का सुधार, सब सौभाग्यों
का सौभाग्य और सब उन्नतियों की उन्नति करनेवाला कर्म है
कि इस अवस्था में ब्रह्मचर्य रखके अपने सन्तानों को विद्या
और सुशिक्षा ग्रहण करावें कि जिससे उत्तम सन्तान होवें।
गर्भाधानप्रकरणम् ४१
ऋतुदान का काल
ऋतुकालाभिगामी स्यात् स्वदारनिरतस्सदा।
पर्ववर्जं व्रजेच्चैनां तद् व्रतो रतिकाम्यया ॥ १ ॥
ऋतुः स्वाभाविकः स्त्रीणां रात्रयः षोडश स्मृताः ।
चतुर्भिरितरैः सार्द्धमहोभिः सद्भिगर्हितैः ॥ २ ॥
तासामाद्याश्चतस्रस्तु निन्दितैकादशी च या।
त्रयोदशी च शेषास्तु प्रशस्ता दश रात्रयः ॥ ३ ॥
युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु।
तस्माद्युग्मासु पुत्रार्थी संविशेदार्त्तवे स्त्रियम् ॥ ४ ॥
पुमान्पुंसोऽधिके शुक्रे स्त्री भवत्यधिके स्त्रियाः।
समे पुमान्पुंस्त्रियौ वा क्षीणेऽल्पे च विपर्ययः ॥ ५ ॥
निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन्।
ब्रह्मचार्येव भवति यत्र तत्राश्रमे वसन् ॥ ६ ॥
—मनुस्मृति अ० ३॥
अर्थ—मनु आदि महर्षियों ने ऋतुदान के समय का निश्चय
इस प्रकार से किया है कि—
सदा पुरुष ऋतुकाल में स्त्री का समागम करे और अपनी
स्त्री के बिना दूसरी स्त्री का सर्वदा त्याग रक्खे। वैसे स्त्री भी
अपने विवाहित पुरुष को छोड़के अन्य पुरुषों से सदैव पृथक्
रहे। जो स्त्रीव्रत अर्थात् अपनी विवाहित स्त्री ही से प्रसन्न रहता
है, जैसेकि पतिव्रता स्त्री अपने विवाहित पुरुष को छोड़ दूसरे
पुरुष का संग कभी नहीं करती, वह पुरुष जब ऋतुदान देना
हो, तब पर्व अर्थात् जो उन ऋतुदान के १६ दिनों में पौर्णमासी,
अमावास्या, चतुर्दशी वा अष्टमी आवे, उसको छोड़ देवे। इनमें
४२ संस्कारविधिः
स्त्री-पुरुष रतिक्रिया कभी न करें॥ १॥
स्त्रियों का स्वाभाविक ऋतुकाल १६ रात्रि का है, अर्थात्
रजोदर्शन दिन से लेके सोलहवें दिन तक ऋतु-समय है। उनमें
से प्रथम की चार रात्रि अर्थात् जिस दिन रजस्वला हो उस
दिन से लेके चार दिन निन्दित हैं। प्रथम, द्वितीय, तृतीय और
चतुर्थ रात्रि में पुरुष स्त्री का स्पर्श और स्त्री पुरुष का सम्बन्ध
कभी न करे, अर्थात् उस रजस्वला के हाथ का छुआ पानी
भी न पीवे। न वह स्त्री कुछ काम करे, किन्तु एकान्त में बैठी
रहे, क्योंकि इन चार रात्रियों में समागम करना व्यर्थ और
महारोगकारक है। रजः अर्थात् स्त्री के शरीर से एक प्रकार
का विकृत उष्ण रुधिर, जैसाकि फोड़े में से पीव वा रुधिर
निकलता है, वैसा है॥ २॥
और जैसे प्रथम की चार रात्रि ऋतुदान देने में निन्दित
हैं, वैसे ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रि भी निन्दित हैं। और बाकी
रहीं दश रात्रि, सो ऋतुदान देने में श्रेष्ठ हैं॥ ३॥
जिनको पुत्र की इच्छा हो, वे छठी, आठवीं, दसवीं,
बारहवीं, चौदहवीं और सोलहवीं—ये छह रात्रि ऋतुदान में उत्तम
जानें, परन्तु इनमें भी उत्तर-उत्तर श्रेष्ठ हैं। और जिनको कन्या
की इच्छा हो, वे पाँचवीं, सातवीं, नववीं और पन्द्रहवीं—ये
चार रात्रि उत्तम समझें*। इससे पुत्रार्थी युग्म रात्रियों में ऋतुदान
देवे ॥ ४॥
पुरुष के अधिक वीर्य होने से पुत्र और स्त्री के आर्त्तव
अधिक होने से कन्या, तुल्य होने से नपुंसक पुरुष वा बन्ध्या
स्त्री, क्षीण और अल्पवीर्य से गर्भ का न रहना वा रहकर गिर
जाना होता है॥ ५॥
जो पूर्व निन्दित आठ रात्रि कह आये हैं, उनमें जो स्त्री
का संग छोड़ देता है, वह गृहाश्रम में बसता हुआ भी ब्रह्मचारी
- रात्रिगणना इसलिए की है कि दिन में ऋतुदान का निषेध है।
गर्भाधानप्रकरणम् ४३
ही कहाता है ॥ ६ ॥
उपनिषदि गर्भलम्भनम् ॥
—यह आश्वलायनगृह्यसूत्र का वचन है॥
जैसा उपनिषद् में गर्भस्थापन-विधि लिखा है, वैसा करना
चाहिए, अर्थात् पूर्वोक्त जैसाकि सोलहवें और पच्चीसवें वर्ष
में विवाह करके ऋतुदान लिखा है, वही उपनिषद् में भी विधान
है।
अथ गर्भाधानᳵस्त्रियाः पुष्पवत्याश्चतुरहादूर्ध्वᳵ स्नात्वा
विरुजायास्तस्मिन्नेव दिवा ‘आदित्यं गर्भमिति' ॥
—यह पारस्करगृह्यसूत्र का वचन है॥
ऐसा ही गोभिलीय और शौनकगृह्यसूत्रों में भी विधान है।
इसके अनन्तर स्त्री जब रजस्वला होकर चौथे दिन के
उपरान्त पाँचवें दिन स्नान कर रज-रोगरहित हो, उसी दिन
(आदित्यं गर्भमिति) इत्यादि मन्त्रों से, जिस रात्रि में गर्भस्थापन
करने की इच्छा हो, उससे पूर्व दिन में सुगन्धादि पदार्थों सहित
पूर्व सामान्यप्रकरण के लिखित प्रमाणे हवन करके निम्नलिखित
मन्त्रों से आहुति देनी। यहाँ पत्नी पति के वाम-भाग में बैठे,
और पति वेदी के पश्चिमाभिमुख पूर्व-दक्षिण वा उत्तर दिशा
में यथाभीष्ट मुख करके बैठे, और ऋत्विज भी चारों दिशाओं
में यथामुख बैठें—
ओम् अग्ने प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्याः पापी लक्ष्मीरूस्तनूस्तामस्या
अपजहि स्वाहा ॥ इदमग्नये- इदन्न मम ॥ १ ॥
ओं वायो प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्राश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्याः पापी लक्ष्मीरूस्तनूस्तामस्या
अपजहि स्वाहा ॥ इदं वायवे - इदन्न मम ॥ २ ॥
४४ संस्कारविधिः
ओं चन्द्र प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्याः पापी लक्ष्मीस्तनूस्तामस्या
अपजहि स्वाहा ॥ इदं चन्द्राय—इदन्न मम ॥ ३ ॥
ओं सूर्य प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्याः पापी लक्ष्मीस्तनूस्तामस्या
अपजहि स्वाहा ॥ इदं सूर्याय—इदन्न मम ॥ ४ ॥
ओम् अग्निवायुचन्द्रसूर्याः प्रायश्चित्तयो यूयं देवानां
प्रायश्चित्तयः स्थ ब्राह्मणो वो नाथकाम उपधावामि यास्याः
पापी लक्ष्मीस्तनूस्तामस्या अपहत स्वाहा ॥ इदमग्निवायु-
चन्द्रसूर्येभ्यः —इदन्न मम ॥ ५ ॥
ओम् अग्ने प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्याः पतिघ्नी तनूस्तामस्या अपजहि
स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ ६ ॥
ओं वायो प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्याः पतिघ्नी तनूस्तामस्या अपजहि
स्वाहा ॥ इदं वायवे—इदन्न मम ॥ ७ ॥
ओं चन्द्र प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्याः पतिघ्नी तनूस्तामस्या अपजहिं
स्वाहा ॥ इदं चन्द्राय—इदन्न मम ॥ ८ ॥
ओं सूर्य प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्याः पतिघ्नी तनूस्तामस्या अपजहि
स्वाहा ॥ इदं सूर्याय—इदन्न मम ॥ ९ ॥
गर्भाधानप्रकरणम् ४५
ओम् अग्निवायुचन्द्रसूर्याः प्रायश्चित्तयो यूयं देवानां
प्रायश्चित्तयः स्थ ब्राह्मणो वो नाथकाम उपधावामि यास्याः
पतिघ्नी तनूस्तामस्या अपहत स्वाहा ॥ इदमग्निवायुचन्द्र-
सूर्येभ्यः—इदन्न मम ॥ १० ॥
ओम् अग्ने प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्या अपुत्र्या तनूस्तामस्या अपजहि
स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ ११ ॥
ओं वायो प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्या अपुत्र्या तनूस्तामस्या अपजहि
स्वाहा ॥ इदं वायवे—इदन्न मम ॥ १२ ॥
ओं चन्द्र प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्या अपुत्र्या तनूस्तामस्या अपजहि
स्वाहा ॥ इदं चन्द्राय—इदन्न मम ॥ १३ ॥
ओं सूर्य प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्या अपुत्र्या तनूस्तामस्या अपजहि
स्वाहा ॥ इदं सूर्याय—इदन्न मम ॥ १४ ॥
ओम् अग्निवायुचन्द्रसूर्याः प्रायश्चित्तयो यूयं देवानां
प्रायश्चित्तयः स्थ ब्राह्मणो वो नाथकाम उपधावामि यास्या
अपुत्र्या तनूस्तामस्या अपहत स्वाहा ॥ इदमग्निवायुचन्द्र-
सूर्येभ्यः—इदन्न मम ॥ १५ ॥
ओम् अग्ने प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्या अपसव्या तनूस्तामस्या अपजहि
स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ १६ ॥
४६ संस्कारविधिः
ओं वायो प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्या अपसव्या तनूस्तामस्या अपजहि
स्वाहा ॥ इदं वायवे—इदन्न मम ॥ १७ ॥
ओं चन्द्र प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्या अपसव्या तनूस्तामस्या अपजहि
स्वाहा ॥ इदं चन्द्राय—इदन्न मम ॥ १८ ॥
ओं सूर्य प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि यास्या अपसव्या तनूस्तामस्या अपजहि
स्वाहा ॥ इदं सूर्याय—इदन्न मम ॥ १९ ॥
ओम् अग्निर्वायुचन्द्रसूर्याः प्रायश्चित्तयो यूयं देवानां
प्रायश्चित्तयः स्थ ब्राह्मणो वो नाथकाम उपधावामि यास्या
अपसव्या तनूस्तामस्या अपहत स्वाहा ॥ इदमग्निर्वायुचन्द्र-
सूर्येभ्यः—इदन्न मम ॥ २० ॥
इन बीस मन्त्रों से बीस आहुति देनी* और बीस आहुति
करने से यत्किंचित् घृत बचे, वह काँसे के पात्र में ढाँकके
रख देवे। इसके पश्चात् भात की आहुति देने के लिए यह
विधि करना, अर्थात् एक चाँदी वा काँसे के पात्र में भात रखके
उसमें घी, दूध और शक्कर मिलाके कुछ थोड़ी देर रखके जब
घृत आदि भात में एकरस हो जाएँ, पश्चात् नीचे लिखे एक-
एक मन्त्र से एक-एक आहुति अग्नि में देवे और स्रुवा का
शेष घृत आगे धरे हुए काँसे के उदकपात्र में छोड़ता जावे—
- इन बीस आहुतियों को देते समय वधू अपने दक्षिण हाथ से वर
के दक्षिण स्कन्ध पर स्पर्श कर रक्खे।
गर्भाधानप्रकरणम् ४७
ओम् अग्नये पवमानाय स्वाहा।
इदमग्नये पवमानाय–इदन्न मम॥ १ ॥
ओम् अग्नये पावकाय स्वाहा।
इदमग्नये पावकाय–इदन्न मम॥ २ ॥
ओम् अग्नये शुचये स्वाहा।
इदमग्नये शुचये–इदन्न मम॥ ३ ॥
ओम् अदित्यै स्वाहा॥ इदमदित्यै–इदन्न मम॥ ४॥
ओं प्रजापतये स्वाहा॥ इदं प्रजापतये–इदन्न मम॥ ५॥
ओं यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम्।
अग्निष्टत्स्विष्टकृद्विद्यात्सर्वं स्विष्टं सुहुतं करोतु मे।
अग्नये स्विष्टकृते सुहुतहुते सर्वप्रायश्चित्ताहुतीनां कामानां
समर्धयित्रे सर्वान्नः कामान्त्समर्धय स्वाहा॥
इदमग्नये स्विष्टकृते–इदन्न मम॥ ६॥
इन छह मन्त्रों से उस भात की आहुति देवें। तत्पश्चात्
पूर्व सामान्यप्रकरणोक्त ३४-३५ पृष्ठ-लिखित आठ मन्त्रों से
अष्टाज्याहुति देनी। उन आठ मन्त्रों से आठ, तथा निम्नलिखित
मन्त्रों से भी आज्याहुति देवें—
विष्णुर्योनि॑ कल्पयतु॒ त्वष्टा॑ रू॒पाणि॑ पिंशतु।
आ सि॑ञ्चतु प्र॒जाप॑तिर्धा॒ता गर्भं॑ दधातु ते॒ स्वाहा॑ ॥ १ ॥
गर्भं॑ धेहि सिनीवालि॒ गर्भं॑ धेहि सरस्वति।
गर्भं॑ ते अ॒श्विनौ॑ दे॒वावा ध॑त्तां पुष्क॑रस्त्रजा॒ स्वाहा॑ ॥ २ ॥
हिर॒ण्ययी॑ अ॒रणी॒ यं नि॒र्मन्थ॑तो अ॒श्विना॑।
तं ते॒ गर्भं॑ हवामहे दश॒मे मा॒सि सूत॑वे॒ स्वाहा॑ ॥ ३ ॥
—ऋ० मं १०। सू० १८४॥
४८ संस्कारविधिः
रेतो॒ मूत्रं॑ वि॒ जहा॑ति॒ योनिं॑ प्र॒विश॑दिन्द्रि॒यम्।
गर्भो॑ जरा॒युणावृ॑त॒ऽउल्बं॑ जहाति॒ जन्म॑ना।
ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं वि॒पान॒ग्ं शुक्र॒मन्ध॑स॒ऽ
इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒ऽमृतं॒ मधु॒ स्वाहा॑ ॥ ४ ॥
यत्ते सुसीमे हृदयं दिवि चन्द्रमसि श्रितम्। वेदाहं तन्मां
तद्विद्यात् ॥ पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतꣳ
शृणुयाम शरदः शतं प्रब्र॑वाम॒ शरदः शतमदी॑नाः स्याम
शरदः शतं भूय॑श्च॒ शरदः शतात् स्वाहा॑ ॥ ५ ॥
-यजुर्वेदे॥
यथे॒यं पृ॑थि॒वी म॒ही भू॒तानां॒ गर्भ॑मा॒दधे॑।
ए॒वा ते॑ ध्रियतां॒ गर्भो॒ अनु॑ सू॒तुं सवि॑त॒वे स्वाहा॑ ॥ ६ ॥
यथे॒यं पृ॑थि॒वी म॒ही दा॒धारे॒मान् व॒न॒स्पती॑न्।
ए॒वा ते॑ ध्रियतां॒ गर्भो॒ अनु॑ सू॒तुं सवि॑त॒वे स्वाहा॑ ॥ ७ ॥
यथे॒यं पृ॑थि॒वी म॒ही दा॒धार॒ पर्व॑तान् गि॒रीन्।
ए॒वा ते॑ ध्रियतां॒ गर्भो॒ अनु॑ सू॒तुं सवि॑त॒वे स्वाहा॑ ॥ ८ ॥
यथे॒यं पृ॑थि॒वी म॒ही दा॒धार॒ विष्ठि॑तं॒ जग॑त्।
ए॒वा ते॑ ध्रियतां॒ गर्भो॒ अनु॑ सू॒तुं सवि॑तवे॒ स्वाहा॑ ॥ ९ ॥
-अथर्व० कां० ६। सू० १७॥
इन ९ मन्त्रों से नव आज्य और मोहनभोग की आहुति
देके, नीचे लिखे मन्त्रों से भी चार घृताहुति देवें-
ओं भूरग्नये स्वाहा॥ इदमग्नये-इदन्न मम ॥ १ ॥
ओं भुवर्वायवे स्वाहा॥ इदं वायवे-इदन्न मम ॥ २ ॥
गर्भाधानप्रकरणम् ४९
ओं स्वरादित्याय स्वाहा ॥ इदमादित्याय-इदन्न मम ॥ ३ ॥
ओम् अग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा।
इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः-इदन्न मम ॥ ४ ॥
पश्चात् नीचे लिखे मन्त्रों से घृत की आहुति देनी—
ओम् अयास्यग्नेऽवर्षट्कृतं यत्कर्मणोऽत्यरीरिचं देवा गातुविदः
स्वाहा ॥ इदं देवोभ्यो गातुविद्भ्यः-इदन्न मम ॥ १ ॥
ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये-इदन्न मम ॥ २ ॥
इन कर्म और आहुतियों के पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे
( ओं यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं० ) इस मन्त्र से एक स्विष्टकृत्
आहुति घृत की देवें।
जो इन मन्त्रों से आहुति देते समय प्रत्येक आहुति के स्रुवा
में शेष रहे घृत को आगे धरे हुए काँसे के उदकपात्र में इकट्ठा
करते गये हों, जब आहुति हो चुकें, तब उन आहुतियों के शेष
घृत को वधू लेके स्नानघर में जाकर उस घी का पग के नख
से लेके शिरपर्यन्त सब अङ्गों पर मर्दन करके स्नान करे।
तत्पश्चात् शुद्ध वस्त्र से शरीर पोंछ, शुद्ध वस्त्र धारण करके
कुण्ड के समीप आवे। तब दोनों वधू-वर कुण्ड की प्रदक्षिणा
करके सूर्य का दर्शन करें। उस समय—
ओम् आ॒दि॒त्यं गर्भं॒ पर्य॑सा॒ सम॑ङ्ग्धि स॒हस्र॑स्य प्रति॒मां
वि॒श्वरू॑पम्। परि॑वृङ्ग्धि॒ हर॑सा॒ माभिर्म॑थ्स्थाः श॒तायु॑षं
कृणुहि ची॒यमा॑नः ॥ १ ॥
सूर्यो॑ नो दि॒वस्पा॑तु॒ वातो॑ अ॒न्तरि॑क्षात्।
अ॒ग्निर्नः॒ पार्थि॑वेभ्यः ॥ २ ॥
जोषा॑ सवितृर्यस्य॑ ते॒ हरः॑ श॒तं स॒वाँ अर्ह॑ति।
पा॒हि नो॑ दि॒द्युतः॒ पत॑न्त्याः ॥ ३ ॥
५० संस्कारविधिः
चक्षु॑र्नो दे॒वः स॑वि॒ता चक्षु॑र्न उ॒त पर्व॑तः ।
चक्षु॑र्धाता द॑धातु नः ॥ ४ ॥
चक्षु॑र्नो धेहि॒ चक्षु॑षे॒ चक्षु॑र्वि॒ख्यै त॒नूभ्यः॑ ।
सं चे॒दं वि च॑ पश्येम ॥ ५ ॥
सु॒संदृशं॑ त्वा व॒यं प्रति॑ पश्येम सूर्य ।
वि प॑श्येम नृ॒चक्ष॑सः ॥ ६ ॥
इन मन्त्रों से परमेश्वर का उपस्थान करके, वधू—
ओम् अमुंक१ गोत्रा शुभदा अमुक२ दा अहं भो
भवन्तमभिवादयामि।
ऐसा वाक्य बोलके अपने पति को वन्दन अर्थात् नमस्कार
करे। तत्पश्चात् स्वपति के पिता पितामहादि और जो वहाँ अन्य
माननीय पुरुष तथा पति की माता तथा अन्य कुटुम्बी और
सम्बन्धियों की वृद्ध स्त्रियाँ हों, उनको भी इसी प्रकार वन्दन
करे।
इस प्रमाणे वधू वर के गोत्र की हुए पश्चात् अर्थात् वधू
पत्नीत्व और वर पतित्व को प्राप्त हुए। पश्चात् दोनों पति-
पत्नी शुभासन पर पूर्वाभिमुख वेदी के पश्चिम भाग में बैठके
वामदेव्यगान करें।
तत्पश्चात् यथोक्त३ भोजन दोनों जने करें और पुरोहितादि
सब मण्डली को सन्मानार्थ यथाशक्ति भोजन कराके आदर-
१. इस ठिकाने वर के गोत्र अथवा वर के कुल का नामोच्चारण करे।
२. इस ठिकाने वधू अपना नाम उच्चारण करे।
३. उत्तम सन्तान करने का मुख्य हेतु यथोक्त वधू वर के आहार पर
निर्भर है। इसलिए पति-पत्नी अपने शरीर, आत्मा की पुष्टि के
लिए बल और बुद्धि आदि की वर्द्धक सर्वौषधि का सेवन करें।
सर्वौषधि ये हैं—
गर्भाधानप्रकरणम् ५१
सत्कारपूर्वक सबको विदा करें।
इसके पश्चात् रात्रि में नियत समय पर जब दोनों का
शरीर आरोग्य, अत्यन्त प्रसन्न और दोनों में अत्यन्त प्रेम बढ़ा
हो, उस समय गर्भाधान-क्रिया करनी। गर्भाधान-क्रिया का
समय प्रहर रात्रि के गये पश्चात् प्रहर रात्रि रहे तक है। जब
वीर्य गर्भाशय में जाने का समय आवे तब दोनों स्थिरशरीर,
प्रसन्नवन्दन, मुख के सामने मुख, नासिका के सामने नासिकादि
सब सूधा शरीर रक्खें। वीर्य का प्रक्षेप पुरुष करे। जब वीर्य
स्त्री के शरीर में प्राप्त हो, उस समय अपना पायु, मूलेन्द्रिय
और योनीन्द्रिय को ऊपर संकोच और वीर्य को खैंचकर स्त्री
गर्भाशय में स्थिर करे। तत्पश्चात् थोड़ा ठहरके स्नान करे। यदि
शीतकाल हो तो प्रथम केसर, कस्तूरी, जायफल, जावित्री, छोटी
दो खण्ड आँबाहल्दी, दूसरी खाने की हल्दी, चन्दन, मुरा
(यह नाम दक्षिण में प्रसिद्ध है) कुष्ठ, जटामांसी, मोरवेल (यह
भी नाम दक्षिण में प्रसिद्ध है), शिलाजीत, कपूर, मुस्ता, भद्रमोथ।
इन सब ओषधियों का चूर्ण करके, सब समभाग लेके, उदुम्बर
के काष्ठपात्र में गाय के दूध के साथ मिला उनका दही जमा और
उदुम्बर ही की लकड़ी की मन्थनी से मन्थन करके उसमें से
मक्खन निकाल उसको ताय, घृत करके, उसमें सुगन्धित द्रव्य
केशर, कस्तूरी, जायफल, इलायची, जावित्री मिलाके अर्थात् सेर-
भर दूध में छटांकभर पूर्वोक्त सर्वोषधि मिला, सिद्धकर, घी हुए
पश्चात् एक सेर में एक रत्ती कस्तूरी और एक मासा केशर और
एक-एक मासा जायफलादि भी मिलाके, नित्य प्रातःकाल उस
घी में से नित्य होम ३२ पृष्ठ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति
४ चार और पृष्ठ ४१ में लिखे हुए (विष्णुर्योनिं०) इत्यादि ७ सात
मन्त्रों के अन्त में स्वाहा शब्द का उच्चारण करके जिस रात्रि में
गर्भस्थापन क्रिया करनी हो उसके दिन में होम करके उसी घी
को दोनों जने खीर अथवा भात के साथ मिलाके यथारुचि भोजन
करें।
५२ संस्कारविधिः
इलायची डाल गर्म कर रखे हुए शीतल दूध का यथेष्ट पान
करके पश्चात् पृथक्-पृथक् शयन करें। यदि स्त्री-पुरुष को
ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाए कि गर्भ स्थिर हो गया तो उसके
दूसरे दिन, और जो गर्भ रहे का दृढ़ निश्चय न हो तो एक
महीने के पश्चात् रजस्वला होने के समय स्त्री रजस्वला न
हो तो निश्चित जानना कि गर्भ स्थित हो गया है।
अर्थात् दूसरे दिन वा दूसरे महीने के आरम्भ में निम्नलिखित
इस प्रकार गर्भस्थापन करें तो सुशील, विद्वान्, दीर्घायु,
तेजस्वी, सुदृढ़ और नीरोग पुत्र उत्पन्न होवे। यदि कन्या की इच्छा
हो तो जल में चावल पका पूर्वोक्त प्रकार घृत, गूलर के एक
पात्र में जमाये हुए, दही के साथ भोजन करने से उत्तम गुणयुक्त
कन्या भी होवे, क्योंकि—
‘‘आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः॥’’
यह छान्दोग्य० का वचन है, अर्थात् शुद्ध आहार जोकि मद्य-
मांसादिरहित घृत, दुग्धादि, चावल, गेहूँ आदि के करने से
अन्तःकरण की शुद्धि, बल, पुरुषार्थ, आरोग्य और बुद्धि की प्राप्ति
होती है। इसलिए पूर्ण युवावस्था में विवाह कर इस प्रकार विधिकर
प्रेमपूर्वक गर्भाधान करें तो सन्तान और कुल नित्यप्रति उत्कृष्टता
को प्राप्त होते जाएँ। जब रजस्वला होने के समय में १२-१३
दिन शेष रहें, तब शुक्लपक्ष में १२ दिन तक पूर्वोक्त घृत मिलाके
इसी खीर का भोजन करके १२ दिन का व्रत भी करें और मिताहारी
होकर ऋतु समय में पूर्वोक्त रीति से गर्भाधान क्रिया करें तो अत्युत्तम
सन्तान होवें। जैसे सब पदार्थों को उत्कृष्ट करने की विद्या है,
वैसे सन्तान को उत्कृष्ट करने की यही विद्या है। इसपर मनुष्य
लोग बहुत ध्यान देवें, क्योंकि इसके न होने से कुल की हानि,
नीचता और होने से कुल की वृद्धि और उत्तमता अवश्य होती
है।