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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 40

३६ संस्कारविधिः
जैसाकि जिस वेद का उच्चारण है, करे। यदि यजमान न पढ़ा
हो, तो इतने मन्त्र तो अवश्य पढ़ लेवे। यदि कोई कार्यकर्त्ता
जड़, मन्दमति, काला अक्षर भैंस बराबर जानता हो, तो वह
शूद्र है, अर्थात् शूद्र मन्त्रोच्चारण में असमर्थ हो, तो पुरोहित
और ऋत्विज् मन्त्रोच्चारण करें, और कर्म उसी मूढ़ यजमान
के हाथ से करावें।
पुनः निम्नलिखित मन्त्र से पूर्णाहुति करें। स्रुवा को घृत
से भरके—
ओं सर्वं वै पूर्णँᳵ स्वाहा ॥
इस मन्त्र से एक आहुति देवें। ऐसे दूसरी और तीसरी
आहुति देके, जिसको दक्षिणा देनी हो देवें, वा जिसको जिमाना
हो जिमा, दक्षिणा देके सबको विदाकर स्त्री-पुरुष हुतशेष घृत,
भात वा मोहनभोग को प्रथम जीमके पश्चात् रुचिपूर्वक उत्तमान्न
का भोजन करें।
मङ्गलकार्य
अर्थात् गर्भाधानादि संन्यास-संस्कार पर्यन्त पूर्वोक्त [कार्य]
और निम्नलिखित सामवेदोक्त महावामदेव्यगान अवश्य करें।
वे मन्त्र ये हैं—
१ २उ ३क २२ १ २ ३ १ २२ ३ २ ३ १ २ ३ १ २
ओं भूर्भुवः स्वः। कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा।
२ ३ १ २ ३ २
कया शचिष्ठया वृता ॥ १ ॥
१ २उ ३क २२ १ २ ३ १ २२ ३ १ २ ३ १ २
ओं भूर्भुवः स्वः। कस्त्वो सत्यो मदानां मंहिष्ठो मत्सदन्धसः।
३ १ २ ३ २ ३ १ २
दृढा चिदारुजे वसु ॥ २ ॥
१ २उ ३क २२ ३ २उ ३ १ २ ३ १ २ ३ २
ओं भूर्भुवः स्वः। अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्।
३ १ १ ३ १ २
शतं भवास्यूतये ॥ ३ ॥