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सर्वकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 318 में से

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पृष्ठ 54

५० संस्कारविधिः
चक्षु॑र्नो दे॒वः स॑वि॒ता चक्षु॑र्न उ॒त पर्व॑तः ।
चक्षु॑र्धाता द॑धातु नः ॥ ४ ॥
चक्षु॑र्नो धेहि॒ चक्षु॑षे॒ चक्षु॑र्वि॒ख्यै त॒नूभ्यः॑ ।
सं चे॒दं वि च॑ पश्येम ॥ ५ ॥
सु॒संदृशं॑ त्वा व॒यं प्रति॑ पश्येम सूर्य ।
वि प॑श्येम नृ॒चक्ष॑सः ॥ ६ ॥
इन मन्त्रों से परमेश्वर का उपस्थान करके, वधू—
ओम् अमुंक१ गोत्रा शुभदा अमुक२ दा अहं भो
भवन्तमभिवादयामि।
ऐसा वाक्य बोलके अपने पति को वन्दन अर्थात् नमस्कार
करे। तत्पश्चात् स्वपति के पिता पितामहादि और जो वहाँ अन्य
माननीय पुरुष तथा पति की माता तथा अन्य कुटुम्बी और
सम्बन्धियों की वृद्ध स्त्रियाँ हों, उनको भी इसी प्रकार वन्दन
करे।
इस प्रमाणे वधू वर के गोत्र की हुए पश्चात् अर्थात् वधू
पत्नीत्व और वर पतित्व को प्राप्त हुए। पश्चात् दोनों पति-
पत्नी शुभासन पर पूर्वाभिमुख वेदी के पश्चिम भाग में बैठके
वामदेव्यगान करें।
तत्पश्चात् यथोक्त३ भोजन दोनों जने करें और पुरोहितादि
सब मण्डली को सन्मानार्थ यथाशक्ति भोजन कराके आदर-
१. इस ठिकाने वर के गोत्र अथवा वर के कुल का नामोच्चारण करे।
२. इस ठिकाने वधू अपना नाम उच्चारण करे।
३. उत्तम सन्तान करने का मुख्य हेतु यथोक्त वधू वर के आहार पर
निर्भर है। इसलिए पति-पत्नी अपने शरीर, आत्मा की पुष्टि के
लिए बल और बुद्धि आदि की वर्द्धक सर्वौषधि का सेवन करें।
सर्वौषधि ये हैं—