सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

५२ संस्कारविधिः
इलायची डाल गर्म कर रखे हुए शीतल दूध का यथेष्ट पान
करके पश्चात् पृथक्-पृथक् शयन करें। यदि स्त्री-पुरुष को
ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाए कि गर्भ स्थिर हो गया तो उसके
दूसरे दिन, और जो गर्भ रहे का दृढ़ निश्चय न हो तो एक
महीने के पश्चात् रजस्वला होने के समय स्त्री रजस्वला न
हो तो निश्चित जानना कि गर्भ स्थित हो गया है।
अर्थात् दूसरे दिन वा दूसरे महीने के आरम्भ में निम्नलिखित
इस प्रकार गर्भस्थापन करें तो सुशील, विद्वान्, दीर्घायु,
तेजस्वी, सुदृढ़ और नीरोग पुत्र उत्पन्न होवे। यदि कन्या की इच्छा
हो तो जल में चावल पका पूर्वोक्त प्रकार घृत, गूलर के एक
पात्र में जमाये हुए, दही के साथ भोजन करने से उत्तम गुणयुक्त
कन्या भी होवे, क्योंकि—
‘‘आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः॥’’
यह छान्दोग्य० का वचन है, अर्थात् शुद्ध आहार जोकि मद्य-
मांसादिरहित घृत, दुग्धादि, चावल, गेहूँ आदि के करने से
अन्तःकरण की शुद्धि, बल, पुरुषार्थ, आरोग्य और बुद्धि की प्राप्ति
होती है। इसलिए पूर्ण युवावस्था में विवाह कर इस प्रकार विधिकर
प्रेमपूर्वक गर्भाधान करें तो सन्तान और कुल नित्यप्रति उत्कृष्टता
को प्राप्त होते जाएँ। जब रजस्वला होने के समय में १२-१३
दिन शेष रहें, तब शुक्लपक्ष में १२ दिन तक पूर्वोक्त घृत मिलाके
इसी खीर का भोजन करके १२ दिन का व्रत भी करें और मिताहारी
होकर ऋतु समय में पूर्वोक्त रीति से गर्भाधान क्रिया करें तो अत्युत्तम
सन्तान होवें। जैसे सब पदार्थों को उत्कृष्ट करने की विद्या है,
वैसे सन्तान को उत्कृष्ट करने की यही विद्या है। इसपर मनुष्य
लोग बहुत ध्यान देवें, क्योंकि इसके न होने से कुल की हानि,
नीचता और होने से कुल की वृद्धि और उत्तमता अवश्य होती
है।