संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
२७४ संस्कारविधिः
वैसे नाममात्र आश्रम से कुछ भी नहीं होता, किन्तु अपने-अपने
आश्रम के धर्मयुक्त कर्म करने ही से आश्रमधारण सफल होता
है, अन्यथा नहीं ॥ १३ ॥
इस पवित्र आश्रम को सफल करने के लिए संन्यासी पुरुष
विधिवत् योगशास्त्र की रीति से सात व्याहृतियों के पूर्व सात
प्रणव लगाके, जैसाकि पृष्ठ २१८ में प्राणायाम का मन्त्र लिखा
है, उसे मन से जपता हुआ तीन भी प्राणायाम करे तो जानो
अत्युत्कृष्ट तप करता है॥१४॥
जैसे अग्नि में तपाने से धातुओं के मल छूट जाते हैं, वैसे
ही प्राण के निग्रह से इन्द्रियों के दोष नष्ट हो जाते हैं॥१५॥
इसलिए संन्यासी लोग प्राणायामों से दोषों को धारणाओं
से अन्तःकरण के मैल को, प्रत्याहार से सङ्ग से हुए दोषों और
ध्यान से अविद्या, पक्षपात आदि अनीश्वरता के दोषों को छुड़ाके,
पक्षपातरहित आदि ईश्वर के गुणों को धारण कर, सब दोषों
को भस्म कर देवे ॥१६॥
बड़े-छोटे प्राणी और अप्राणियों में जो अशुद्धात्माओं से
देखने के योग्य नहीं है, उस अन्तर्यामी परमात्मा की गति, अर्थात्
प्राप्ति को ध्यानयोग से ही संन्यासी देखा करे॥१७॥
जो संन्यासी यथार्थ ज्ञान वा षड्दर्शनों से युक्त है, वह
दुष्ट कर्मों से बद्ध नहीं होता और जो ज्ञान, विद्या, योगाभ्यास,
सत्सङ्ग, धर्मानुष्ठान वा षड्दर्शनों से रहित विज्ञानहीन होकर
संन्यास लेता है, वह संन्यास पदवी और मोक्ष को प्राप्त न होकर
जन्म-मरणरूप संसार को प्राप्त होता है और ऐसे मूर्ख, अधर्मी
को संन्यास का लेना व्यर्थ और धिक्कार देने के योग्य है॥१८॥
और जो निर्वैर, इन्द्रियों के विषयों के बन्धन से पृथक्,
वैदिक कर्माचरणों और प्राणायाम, सत्यभाषणादि उत्तम, उग्र
कर्मों से सहित संन्यासी लोग होते हैं, वे इसी जन्म, इसी वर्त्तमान
समय में परमेश्वर की प्राप्तिरूप पद को प्राप्त होते हैं। उनका
संन्यासप्रकरणम् २७५
संन्यास लेना सफल और धन्यवाद के योग्य है ॥ १९ ॥
जब संन्यासी सब पदार्थों में अपनेपन के भाव से निःस्पृह
होता है, तभी इस लोक, इस जन्म और मरण पाकर परलोक
और मुक्ति में परमात्मा को प्राप्त होके निरन्तर* सुख को प्राप्त
होता है॥२०॥
इस विधि से धीरे-धीरे सब संग से हुए दोषों को छोड़के
सब हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से विशेषकर निर्मुक्त होके विद्वान्
संन्यासी ब्रह्म ही में स्थिर होता है ॥ २१ ॥
और जो विविदिषा, अर्थात् जानने की इच्छा करके गौण
संन्यास लेवे वह भी विद्या का अभ्यास, सत्पुरुषों का संग,
योगाभ्यास और ओंकार का जप और उसके अर्थ=परमेश्वर
का विचार भी किया करे। यही अज्ञानियों का शरण, अर्थात्
गौण संन्यासियों और यही विद्वान् संन्यासियों का और यही सुख
का खोज करनेवाले और यही अनन्त** सुख की इच्छा करनेवाले
मनुष्यों का आश्रय है ॥ २२ ॥
इस क्रमानुसार संन्यासयोग से जो द्विज, अर्थात् ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य संन्यास ग्रहण करता है वह इस संसार और शरीर
में सब पापों को छोड़-छुड़ाके परब्रह्म को प्राप्त होता है ॥ २३ ॥
विधि—जो पुरुष संन्यास लेना चाहे वह जिस दिन सर्वथा
प्रसन्नता हो उसी दिन से नियम और व्रत, अर्थात् तीन दिन
तक दुग्धपान करके उपवास और भूमि में शयन और
प्राणायाम, ध्यान तथा एकान्तदेश में ओंकार का जप किया
करे और पृष्ठ २२-२४ में लिखे प्रमाणे सभामण्डप, वेदी, समिधा,
- निरन्तर शब्द का इतना ही अर्थ है कि मुक्ति के नियत समय
के मध्य में दुःख आकर विघ्न नहीं कर सकता।
** अनन्त इतना ही है कि मुक्तिसुख के समय में अन्त अर्थात् जिसका
नाश न होवे।
२७६ संस्कारविधिः
घृतादि शाकल्य, सामग्री एक दिन पूर्व कर रखनी। पश्चात्
जिस दिन संन्यास लेना हो, प्रहर रात्रि से उठकर शौच, स्नानादि
आवश्यक कर्म करके, प्राणायाम, ध्यान और प्रणव का जप
करता रहे। सूर्योदय के समय उत्तम गृहस्थ धार्मिक विद्वानों
का पृष्ठ २९ में लिखे प्रमाणे वरण कर, पृ० १३-२१ में लिखे
प्रमाणे स्वस्तिवाचन-शान्तिकरण का पाठ कर, पृष्ठ ३० से पृष्ठ
३१ में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान, घृतप्रतपन और
स्थालीपाक करके पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे वेदी के चारों ओर
जलप्रोक्षण, आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति
चार, तथा—
ओं भुवनपतये स्वाहा॥
ओं भूतानां पतये स्वाहा॥
ओं प्रजापतये स्वाहा॥
इनमें से एक-एक मन्त्र से एक-एक करके ग्यारह
आज्याहुति देके जो विधिपूर्वक भात बनाया हो उसमें घृत सेचन
करके, यजमान जोकि संन्यास का लेनेवाला है और दो ऋत्विज्
निम्नलिखित स्वाहान्त मन्त्रों से भात का होम और शेष दो
ऋत्विज् भी साथ-साथ घृताहुति करते जावें—
ओं ब्रह्म॒ होता॒ ब्रह्म॑ य॒ज्ञो ब्रह्म॑णा॒ स्वर॑वो मि॒ताः।
अ॒ध्व॒र्युर्ब्रह्म॑णो जा॒तो ब्रह्म॑णो॒ऽन्तर्हितं॑ ह॒विः स्वाहा॑॥ १ ॥
ब्रह्म॒ स्रुचो॑ घृ॒तवती॑र्ब्रह्म॑णा॒ वेदि॒रुद्धि॑ता। ब्रह्म॑ य॒ज्ञश्च॑
स॒त्रं च॒ ऋत्विजो॒ ये ह॑वि॒ष्कृत॑:। श॒मिताय॒ स्वाहा॑॥ २ ॥
अं॒हो॒मुचे॒ प्र भरे मनी॒षामा सु॒त्राम्णै॑ सु॒म॒तिमा॑वृणा॒नः।
इ॒दमि॑न्द्र॒ प्रति॑ ह॒व्यं गृ॑भाय स॒त्याः स॑न्तु॒ यज॑मानस्य॒
कामाः॒ स्वाहा॑॥ ३ ॥
संन्यासप्रकरणम्
२७७
अं॒हो॒मुचे॒ वृष॑भं य॒ज्ञिया॑नां वि॒राज॑न्तं प्रथ॒मम॑ध्व॒राणा॑म् । अ॒पां
नपा॑तमश्विना हुवे धि॒येन्द्रेण॑ म इन्द्रि॒यं द॑त्त॒मोज॒: स्वाहा॑ ॥ ४ ॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । अ॒ग्निर्मा॒ तत्र॑
नयत्व॒ग्निर्मेधां द॑धातु मे । अ॒ग्नये॒ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये—इदन्र
मम ॥ ५ ॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । वा॒युर्मा॒ तत्र॑ नयतु
वा॒युः प्रा॒णान् द॑धातु मे । वा॒यवे॒ स्वाहा॑ ॥ इदं वायवे—इदन्र
मम ॥ ६ ॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । सूर्यो॑ मा॒ तत्र॑ नयतु
चक्षुः॒ सूर्यो॑ दधातु मे । सूर्या॑य॒ स्वाहा॑ ॥ इदं सूर्याय—इदन्र
मम ॥ ७ ॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । च॒न्द्रो मा॒ तत्र॑ नयतु
मन॑श्च॒न्द्रो द॑धातु मे । च॒न्द्राय॒ स्वाहा॑ ॥ इदं चन्द्राय—इदन्र
मम ॥ ८ ॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । सोमो॑ मा॒ तत्र॑ नयतु
पयः॒ सोमो॑ दधातु मे । सोमा॑य॒ स्वाहा॑ ॥ इदं सोमाय—इदन्र
मम ॥ ९ ॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । इन्द्रो॑ मा॒ तत्र॑ नयतु
बल॒मिन्द्रो॑ दधातु मे । इन्द्रा॑य स्वाहा॑ ॥ इदमिन्द्राय—इदन्र
मम ॥ १० ॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । आपो॑ मा॒ तत्र॑
नयन्त्व॒मृतं॒ मोप॑ तिष्ठतु । अ॒द्भ्यः स्वाहा॑ ॥ इदमद्भ्यः—इदन्र
मम ॥ ११ ॥
२७८ संस्कारविधिः
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो यान्ति॑ दी॒क्षया तप॑सा स॒ह। ब्रह्मा मा॒ तत्र॑
नयतु॒ ब्रह्मा॒ ब्रह्म॑ दधातु मे। ब्रह्म॑णे॒ स्वाहा॑ ॥ इदं ब्रह्मणे—
इदन्न मम ॥ १२ ॥ —अथर्व० कां० १९। सू० ४२-४३ ॥
ओं प्राणापानव्यानोदानसमाना मे शुध्यन्ताम्।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ १ ॥
वाङ् मनश्चक्षुःश्रोत्रजिह्वाघ्राणरेतोबुद्ध्याकूतिसंकल्पा
मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ
स्वाहा ॥ २ ॥
शिरःपाणिपादपार्श्वपृष्ठोरूदरजङ्घ्न शिश्नोपस्थपायवो
मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ
स्वाहा ॥ ३ ॥
त्वक्चर्ममाꣳसरुधिरमेदोमज्जास्नावयोऽस्थीनि मे
शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विर॒जा विपाप्मा भूयासथ्ँ
स्वाहा ॥ ४ ॥
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं
विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ ५ ॥
पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशा मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं
विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ ६ ॥
अन्नमयप्राणमयमनोमयविज्ञानमयानन्दमया मे
शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ
स्वाहा ॥ ७ ॥
विविष्टयै स्वाहा ॥ ८ ॥
कषोत्काय स्वाहा ॥ ९ ॥
उत्तिष्ठ पुरुष हरित लोहित पिङ्गलाक्षि। देहि देहि
ददापयिता मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा
भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ १० ॥
संन्यासप्रकरणम् २७९
ओं स्वाहा मनोवाक्कायकर्माणि मे शुध्यन्ताम्।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथँ स्वाहा ॥ ११ ॥
अव्यक्तभावैरहङ्कारैर्ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा
भूयासथँ स्वाहा ॥ १२ ॥
आत्मा मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा
भूयासथँ स्वाहा ॥ १३ ॥
अन्तरात्मा मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा
भूयासथँ स्वाहा ॥ १४ ॥
परमात्मा मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा
भूयासथँ स्वाहा* ॥ १५ ॥
इन १५ मन्त्रों में से एक-एक करके भात की आहुति
देनी। पश्चात् निम्नलिखित मन्त्रों से ३५ घृताहुति देवें—
ओमग्नये स्वाहा ॥ १६ ॥
ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ॥ १७ ॥
ओं ध्रुवाय भूमाय स्वाहा ॥ १८ ॥
ओं ध्रुवक्षितये स्वाहा ॥ १९ ॥
ओमच्युतक्षितये स्वाहा ॥ २० ॥
ओमग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ॥ २१ ॥
ओं धर्माय स्वाहा ॥ २२ ॥
ओमधर्माय स्वाहा ॥ २३ ॥
- (प्राणापान) इत्यादि से लेके (परमात्मा मे शुध्यताम्) इत्यन्त मन्त्रों
से संन्यासी के लिए उपदेश है, अर्थात् जो संन्यासाश्रम ग्रहण करे
वह धर्माचरण, सत्योपदेश, योगाभ्यास, शम, दम, शान्ति, सुशीलतादि,
विद्या-विज्ञानादि शुभ, गुण, कर्म, स्वभावों से सहित होकर,
परमात्मा को अपना सहायक मानकर, अत्यन्त पुरुषार्थ से शरीर
प्राण, मन, इन्द्रियादि को अशुद्ध व्यवहार से हटा शुद्ध व्यवहार
में चलाके, पक्षपात कपट अधर्म व्यवहारों को छोड़, अन्य के दोष
पढ़ाने और उपदेश से छुड़ाकर, स्वयं आनन्दित होके, सब मनुष्यों
को आनन्द पहुँचाता रहे।
२८० संस्कारविधिः
ओमद्भ्यः स्वाहा ॥ २४ ॥
ओमोषधिवनस्पतिभ्यः स्वाहा ॥ २५ ॥
ओं रक्षोदेवजनेभ्यः स्वाहा ॥ २६ ॥
ओं गृह्याभ्यः स्वाहा ॥ २७ ॥
ओमवसानेभ्यः स्वाहा ॥ २८ ॥
ओमवसानपतिभ्यः स्वाहा ॥ २९ ॥
ओं सर्वभूतेभ्यः स्वाहा ॥ ३० ॥
ओं कामाय स्वाहा ॥ ३१ ॥
ओमन्तरिक्षाय स्वाहा ॥ ३२ ॥
ओं पृथिव्यै स्वाहा ॥ ३३ ॥
ओं दिवे स्वाहा ॥ ३४ ॥
ओं सूर्याय स्वाहा ॥ ३५ ॥
ओं चन्द्रमसे स्वाहा ॥ ३६ ॥
ओं नक्षत्रेभ्यः स्वाहा ॥ ३७ ॥
ओमिन्द्राय स्वाहा ॥ ३८ ॥
ओं बृहस्पतये स्वाहा ॥ ३९ ॥
ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ ४० ॥ ओं ब्रह्मणे स्वाहा ॥ ४१ ॥
ओं देवेभ्यः स्वाहा ॥ ४२ ॥ ओं परमेष्ठिने स्वाहा ॥ ४३ ॥
ओं तद् ब्रह्म ॥ ४४ ॥ ओं तद्वायुः ॥ ४५ ॥
ओं तदात्मा ॥ ४६ ॥ ओं तत्सत्यम् ॥ ४७ ॥
ओं तत्सर्वम् ॥ ४८ ॥ ओं तत्पुरोर्नमः ॥ ४९ ॥
अन्तश्चरति भूतेषु गुहायां विश्वमूर्तिषु। त्वं यज्ञस्त्वं
वषट्कारस्त्वमिन्द्रस्त्वं रुद्रस्त्वग्ं विष्णुस्त्वं ब्रह्म त्वं प्रजापतिः।
त्वं तदाप आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः सुवरों
स्वाहा* ॥ ५० ॥
- ये सब प्राणापानव्यान० आदि मन्त्र तैत्तिरीय आरण्यक दशम प्रपाठक
अनुवाक ५१।५२।५३।५४।५५।५६।५७।५८।५९।६०।
६६।६७।६८ के हैं।
संन्यासप्रकरणम् २८१
इन ५० मन्त्रों से आज्याहुति देके तदनन्तर जो संन्यास
लेनेवाला है, वह पाँच वा छह केशों को छोड़कर पृष्ठ ८६-
८७ में लिखे प्रमाणे दाढ़ी, मूँछ, केश, लोमों का छेदन, अर्थात्
क्षौर कराके यथावत् स्नान करे। तदनन्तर संन्यास लेनेवाला पुरुष
अपने शिर पर पुरुषसूक्त के मन्त्रों से १०८ बार अभिषेक करे।
पुनः पृष्ठ २१७-२१८ में लिखे प्रमाणे आचमन और प्राणायाम
करके, हाथ जोड़, वेदी के सामने नेत्रोन्मीलन कर मन से—
ओं ब्रह्मणे नमः ॥ ओ३मिन्द्राय नमः ॥
ओं सूर्याय नमः ॥ ओं सोमाय नमः ॥
ओमात्मने नमः ॥ ओमन्तरात्मने नमः ॥
इन छह मन्त्रों को जपके—
ओमात्मने स्वाहा ॥ ओमन्तरात्मने स्वाहा ॥
ओं परमात्मने स्वाहा ॥ ओं प्रजापतये स्वाहा ॥
इन चार मन्त्रों से चार आज्याहुति देकर, कार्यकर्त्ता—संन्यास
ग्रहण करनेवाला पुरुष पृष्ठ १५२-१५३ में लिखे प्रमाणे मधुपर्क
की क्रिया करे। तदनन्तर प्राणायाम करके—
ओं भूः सावित्रीं प्रविशामि तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥
ओं भुवः सावित्रीं प्रविशामि भर्गो देवस्य धीमहि ॥
ओं स्वः सावित्रीं प्रविशामि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
ओं भूर्भुवः स्वः सावित्रीं प्रविशामि तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
इन मन्त्रो को मन से जपे। पुनः—
ओम् अग्नये स्वाहा ॥
ओं भूः प्रजापंतये स्वाहा ॥
ओम् इन्द्राय स्वाहा ॥
ओं प्रजापतये स्वाहा ॥
ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ॥
२८२ संस्कारविधिः
ओं ब्रह्मणे स्वाहा ॥
ओं प्राणाय स्वाहा ॥
ओमपानाय स्वाहा ॥
ओं व्यानाय स्वाहा ॥
ओमुदानाय स्वाहा ॥
ओं समानाय स्वाहा ॥
इन मन्त्रों से वेदी में आज्याहुति देके—
ओं भूः स्वाहा ॥
इन मन्त्र से पूर्णाहुति करके—
पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्चोत्थायाथ
भिक्षाचर्यं चरन्ति* ॥ —श० कां० १४
पुत्रैषणा वित्तैषणा लोकैषणा मया परित्यक्ता, मत्तः
सर्वभूतेभ्योऽभयमस्तु स्वाहा* ॥
इस वाक्य को बोलके सबके सामने जल को भूमि में
छोड़ देवे। पीछे नाभिमात्र जल में पूर्वाभिमुख खड़ा रहकर—
ओं भूः सावित्रीं प्रविशामि तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥
ओं भुवः सावित्रीं प्रविशामि भर्गो देवस्य धीमहि ॥
ओं स्वः सावित्रीं प्रविशामि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
ओं भूर्भुवः स्वः सावित्रीं प्रविशामि परो रजसेऽसावदोम् ॥
इसका मनसे जप करके प्रणवार्थ परमात्मा का ध्यान करके
- पुत्रादि के मोह, वित्तादि पदार्थों के मोह और लोकस्थ प्रतिष्ठा की
इच्छा से मन को हटाकर परमात्मा में आत्मा को दृढ़ करके जो
भिक्षाचरण करते हैं वे ही सबको सत्योपदेश से अभयदान देते
हैं, अर्थात् दाहिने हाथ में जल लेके मैंने आज से पुत्रादि का तथा
वित्त का मोह और लोक में प्रतिष्ठा की इच्छा करने का त्याग
कर दिया, और मुझसे सब भूत=प्राणिमात्र को अभय प्राप्त होवे,
यह मेरी सत्य वाणी है।
संन्यासप्रकरणम् २८३
पूर्वोक्त (पुत्रैषणायाश्च०) इस समग्र कण्डिका को बोलके प्रैष्य
मन्त्रोच्चारण करे।
ओं भूः संन्यस्तं मया। ओं भुवः संन्यस्तं मया।
ओं स्वः संन्यस्तं मया॥
इस मन्त्र का मन से उच्चारण करे। तत्पश्चात् जल से
अञ्जलि भर पूर्वाभिमुख होकर संन्यास लेनेवाला—
ओम् अभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः स्वाहा॥
इस मन्त्र से दोनों हाथ की अञ्जलि को पूर्व दिशा में
छोड़ देवे।
येना॑ स॒हस्रं॒ वह॑सि॒ येना॑ग्ने सर्ववे॒दस॑म्।
तेने॒मं य॒ज्ञं नो॑ वह॒ स्वर्द्देवेषु॒ गन्त॑वे* ॥
—अथर्व० कां० ९। सू० ५। मं० १७॥
और इसी पर स्मृति है—
प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम्।
आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात्॥
इस श्लोक का अर्थ पहले लिख दिया है।
इसके पश्चात् मौन करके शिखा के लिए जो पाँच वा
सात केश रक्खे थे उनको एक-एक उखाड़ और यज्ञोपवीत
उतारकर हाथ में ले-जल की अञ्जलि भर—
ओमापो वै सर्वा देवताः स्वाहा॥ ओम् भूः स्वाहा॥
* हे (अग्ने) विद्वन्! (येन) जिससे (सहस्रम्) सब संसार को अग्नि
धारण करता है, और (येन) जिससे तू (सर्ववेदसम्) गृहाश्रमस्थ
पदार्थमोह, यज्ञोपवीत और शिखा आदि को (वहसि) धारण करता
है, उनको छोड़। (तेन) उस त्याग से (नः) हमको (इमम्) यह
संन्यासरूप (स्वाहा) सुख देनेहारे (यज्ञम्) प्राप्त होने योग्य यज्ञ
को .(देवेषु) विद्वानों में (गन्तवे) जाने को (वह) प्राप्त हो।
२८४ संस्कारविधिः
इन मन्त्रों से शिखा के बाल और यज्ञोपवीतसहित जलाञ्जलि
को जल में होम कर देवे।
उसके पश्चात् आचार्य शिष्य को जल से निकालके काषाय
वस्त्र की कोपीन, कंटिवस्त्र, उपवस्त्र, अङ्गोछा प्रीतिपूर्वक देवे
और शिष्य पृष्ठ १०४ में लिखे प्रमाणे (यो मे दण्डः०) इस
मन्त्र से दण्ड धारण करके आत्मा में आहवनीयादि अग्नियों
का आरोपण करे।
यो वि॒द्याद्ब्रह्म॑ प्र॒त्यक्षं॒ परूं॑षि॒ यस्य॑ सं॒भारा॒ ऋचो॒ यस्या॑नू॒क्य॑म्¹ ॥ १ ॥
सामा॑नि॒ यस्य॒ लोमा॑नि॒ यजु॒र्हृद॑यमु॒च्यते॑ परिस्तर॑ण॒मिद्ब॒र्हिः² ॥ २ ॥
यद्वा अ॑ति॑थिप॒तिर॑ति॒थीन् प्रति॒ पश्य॑ति दे॒वयज॑नं॒ प्रेक्ष॑ते³ ॥ ३ ॥
१. (यः) जो पुरुष (प्रत्यक्षम्) साक्षात्कारता से (ब्रह्म) परमात्मा
को (विद्यात्) जाने, (यस्य) जिसके (परूंषि) कठोर स्वभाव
आदि (संभाराः) होम करने के साकल्य और (यस्य) जिसके
(ऋचः) यथार्थ सत्यभाषण, सत्योपदेश और ऋग्वेद ही (अनूक्यम्)
अनुकूलता से कहने योग्य वचन हैं, वही संन्यास ग्रहण करे ॥ १ ॥
२. (यस्य) जिसके (सामानि) सामवेद (लोमानि) लोम के समान,
(यजुः) यजुर्वेद जिसके (हृदयम्) हृदय के समान (उच्यते) कहा
जाता है, (परिस्तरणम्) जो सब ओर से शस्त्र आसन आदि सामग्री
(हविरित्) होम करने योग्य के समान हैं, वह संन्यास ग्रहण करने
में योग्य होता है ॥ २ ॥
३. (वा) वा (यत्) जो (अतिथिपतिः) अतिथियों का पालन
करनेहारा (अतिथीन्) अतिथियों के प्रति (प्रतिपश्यति) देखता
है, वही विद्वान् संन्यासियों में (देवयजनम्) विद्वानों के यजन करने
के समान (प्रेक्षते) ज्ञानदृष्टि से देखता और संन्यास लेने का
अधिकारी होता है ॥ ३ ॥
संन्यासप्रकरणम् २८५
यद॒भि॒वद॑ति दी॒क्षामुपै॑ति॒ यदु॑द॒कं याच॑न्त्य॒पः प्र ण॑यति१ ॥४॥
या ए॒व य॒ज्ञ आप॑: प्र॒णी॒यन्ते॒ ता ए॒व ताः२ ॥५॥
यदा॑व॒स॒थान् क॒ल्पय॑न्ति॒ सदो॑ह॒विर्धाना॒न्येव तत्क॑ल्पयन्ति३ ॥६॥
यदुप॑स्तृ॒णन्ति॑ ब॒र्हिरे॒व तत्४ ॥७॥
तेषा॒मास॑न्नाना॒मति॑थिरा॒त्मन् जु॑होति५ ॥८॥
१. और (यत्) जो संन्यासी (अभिवादति) दूसरे के साथ संवाद वा
दूसरे को अभिवादन करता है, वह जानो (दीक्षाम्) दीक्षा को
(उपैति) प्राप्त होता है, (यत्) जो (उदकम्) जल की (याचति)
याचना करता है, वह जानो (अपः) प्रणीता आदि में जल को
(प्रणयति) डालता है॥४॥
२. (यज्ञे) यज्ञ में (याः एव) जिन्हीं (आपः) जलों का (प्रणीयन्ते)
प्रयोग किया जाता है (ता एव) वे ही (ताः) पात्र में रखे जल
संन्यासी की यज्ञस्थ जलक्रिया हैं॥५॥
३. संन्यासी (यत्) जो (आवसथान्) निवास का स्थान (कल्पयन्ति)
कल्पना करते हैं, वे (सदः) यज्ञशाला (हविर्धानान्येव) हविष्
के स्थापन करने के ही पात्र (तत्) वे (कल्पयन्ति) समर्थित
करते हैं॥६॥
४. और (यत्) जो संन्यासी लोग (उपस्तृणन्ति) बिछौने आदि करते
हैं (बर्हिरेव तत्) वह कुशपिञ्जूली के समान है॥७॥
५. और जो (तेषाम्) उन (आसन्नानाम्) समीप बैठनेहारों के निकट
बैठा हुआ, (अतिथिः) जिसकी कोई नियत तिथि न हो, वह
भोजनादि करता है, वह (आत्मन्) जानो वेदीस्थ अग्नि में होम
करने के समान आत्मा में (जुहोति) आहुतियाँ देता है॥८॥
२८६ संस्कारविधिः
स्रु॒चा हस्ते॑न प्रा॒णे यू॒पे स्रुङ्का॒रेण॑ वषट्का॒रेण॑१ ॥ ९ ॥
ए॒ते वै प्रि॒याश्चाप्रि॑याश्च॒र्त्विज॑: स्व॒र्गं लो॒कं ग॑मयन्ति॒ यदति॑थयः२ ॥१० ॥
प्रा॒जा॒पत्यो वा ए॒तस्य॑ य॒ज्ञो वित॑तो॒ य उप॑हरति३ ॥ ११ ॥
प्र॒जाप॑ते॒र्वा ए॒ष वि॑क्र॒मान॑नुवि॒क्रम॑ते॒ य उप॑हरति४ ॥ १२ ॥
१. और जो संन्यासी (हस्तेन) हाथ से खाता है वह जानो (स्रुचा)
चमसा आदि से वेदी में आहुति देता है, जैसे (यूपे) स्तम्भे में
अनेक प्रकार के पशु आदि को बाँधते हैं वैसे वह संन्यासी
(स्रुक्कारेण) स्रुचा के समान (वषट्कारेण) होमक्रिया के तुल्य
(प्राणे) प्राण में मन और इन्द्रियों को बाँधता है॥९॥
२. (एते वै) ये ही (ऋत्विजः) समय-समय में प्राप्त होनेवाले (प्रियाः
च अप्रियाः च) प्रिय और अप्रिय भी संन्यासी जन (यत्) जिस
कारण (अतिथयः) अतिथिरूप हैं, इससे गृहस्थ को (स्वर्गं
लोकम्) दर्शनीय अत्यन्त सुख को (गमयन्ति) प्राप्त कराते
हैं॥१०॥
३. (एतस्य) इस संन्यासी का (प्राजापत्यः) प्रजापति परमात्मा को
जानने का आश्रमधर्मानुष्ठान रूप (यज्ञः) अच्छे प्रकार करने योग्य
यतिधर्म (विततः) व्यापक है, अर्थात् (यः) जो इसको सर्वोपरि
(उपहरति) स्वीकार करता है (वै) वही संन्यासी होता है॥११॥
४. (यः) जो (एषः) यह संन्यासी (प्रजापतेः) परमेश्वर के जानने
रूप संन्यासाश्रम के (विक्रमान्) सत्याचारों की (अनुविक्रमते)
अनुकूलता से क्रिया करता है, (वै) वही सब शुभगुणों को
(उपहरति) स्वीकार करता है॥१२॥
संन्यासप्रकरणम् २८७
योऽति॒थीनां॒ स आ॑हव॒नीयो॒ यो वेश्म॑नि॒ स गार्ह॑पत्यो॒ यस्मि॒न्
पच॑न्ति॒ स दक्षि॑णा॒ग्निः १ ॥ १३ ॥
इ॒ष्टं च॒ वा ए॒ष पू॒र्तं च॑ गृ॒हाणा॑मश्नाति॒ यः पूर्वो॒ऽतिथे॑र॒श्नाति॑ २ ॥ १४ ॥
—अथर्व० का० ९ । सू० ६ ॥
*तस्यैवं विदुषो यज्ञस्यात्मा यजमानः श्रद्धा पत्नी
शरीरमिध्ममुरो वेदिर्लोमानि बर्हिर्वेदः शिखा हृदयं यूपः काम
१. (यः) जो (अतिथीनाम्) अतिथि अर्थात् उत्तम संन्यासियों का
सङ्ग है (सः) वह संन्यासी के लिए (आहवनीयः) आहवनीय
अग्नि, अर्थात् जिसमें ब्रह्मचर्याश्रम में ब्रह्मचारी होम करता है, और
(यः) जो संन्यासी का (वेश्मनि) घर में अर्थात् स्थान में निवास
है (सः) वह उसके लिए (गार्हपत्यः) गृहस्थ सम्बन्धी अग्नि है,
और संन्यासी (यस्मिन्) जिस जाठराग्नि में अन्नादि को (पचन्ति)
पकाते हैं (सः) वह (दक्षिणाग्निः) वानप्रस्थ सम्बन्धी अग्नि है,
इस प्रकार आत्मा में सब अग्नियों का आरोपण करे ॥ १३ ॥
२. (यः) जो गृहस्थ (अतिथेः) संन्यासी से (पूर्वः) प्रथम (अश्नाति)
भोजन करता है (एषः) वह जानो (गृहाणाम्) गृहस्थों के (इष्टम्)
इष्ट सुख (च) और उसकी सामग्री (पूर्तम्) तथा जो ऐश्वर्यादि
की पूर्णता (च) और उसके साधनों का (वै) निश्चय करके
(अश्नाति) भक्षण अर्थात् नाश करता है। इसलिए जिस गृहस्थ
के समीप अतिथि उपस्थित होवे उसको पूर्व जिमाकर पश्चात्
भोजन करना अत्युचित है ॥ १४ ॥
- इसके आगे तैत्तिरीय आरण्यक का अर्थ करते हैं—(एवम्) इस
प्रकार संन्यास ग्रहण किये हुए (तस्य) उस (विदुषः) विद्वान्
संन्यासी के संन्यासाश्रमरूप (यज्ञस्य) अच्छे प्रकार अनुष्ठान करने
योग्य यज्ञ का (यजमानः) पति (आत्मा) स्वस्वरूप है, और
जो ईश्वर, वेद और सत्यधर्माचरण, परोपकार में (श्रद्धा) सत्य
२८८ संस्कारविधिः
आज्यं मन्युः पशुस्तपोऽग्निर्दमः शमयिता दक्षिणा वाग्घोता
प्राण उद्गाता चक्षुरध्वर्युर्मनो ब्रह्मा श्रोत्रमग्नीत्। यावद्
ध्रियते सा दीक्षा यदश्नाति तद्धविर्यत्पिबति तदस्य
सोमपानम्। यद्रमते तदुपसदो यत्सञ्चरत्युपविशत्युत्तिष्ठते च
स प्रवर्ग्यो यन्मुखम् तदाहवनीयो या व्याहृतिराहुतिर्यदस्य
विज्ञानं तज्जुहोति यत्सायं प्रातरत्ति तत्समिधं यत्प्रातर्मध्यन्दिनꣲ
का धारणरूप दृढ़ प्रीति है वह उसकी (पत्नी) स्त्री है, और जो
संन्यासी का (शरीरम्) शरीर है वह (इध्मम्) यज्ञ के लिए इन्धन
है, और जो उसका (उरः) वक्षःस्थल है वह (वेदिः) कुण्ड,
और जो उसके शरीर पर (लोमानि) रोम हैं वे (बर्हिः) कुशा
हैं, और जो (वेदः) वेद और उनका शब्दार्थसम्बन्ध जानकर
आचरण करना है वह संन्यासी की (शिखा) चोटी है, और जो
संन्यासी का (हृदयम्) हृदय है वह (यूपः) यज्ञ का स्तम्भ है,
और जो इसके शरीर में (कामः) काम है वह (आज्यम्) ज्ञान-
अग्नि में होम करने का पदार्थ है, और जो (मन्युः) संन्यासी में
क्रोध है वह (पशुः) निवृत्त करने अर्थात् शरीर के मलवत् छोड़ने
के योग्य है, और जो संन्यासी (तपः) सत्यधर्मानुष्ठान प्राणायामादि
योगाभ्यास करता है वह (अग्निः) जानो वेदी का अग्नि है, जो
संन्यासी (दमः) अधर्माचरण से इन्द्रियों को रोकके धर्माचरण में
स्थिर रखके चलाता है वह (शमयिता) जानो दुष्टों को दण्ड देनेवाला
सभ्य है, और जो संन्यासी की (वाक्) सत्योपदेश करने के लिए
वाणी है वह जानो सब मनुष्यों को (दक्षिणा) अभयदान देना
है। जो संन्यासी के शरीर में (प्राणः) प्राण है वह (होता) होता
के समान, जो (चक्षुः) चक्षु है वह (उद्गाता) उद्गाता के तुल्य,
जो (मनः) मन है वह (अध्वर्युः) अध्वर्यु के समान जो (श्रोत्रम्)
श्रोत्र है वह (ब्रह्मा) ब्रह्मा और (अग्नीत्) अग्नि लानेवाले के
तुल्य, (यावत् ध्रियते) जितना कुछ संन्यासी धारण करता है (सा)
संन्यासप्रकरणम् २८९
सायं च तानि सवनानि। ये अहोरात्रे ते दर्शपूर्णमासौ
येऽर्द्धमासाश्च सामाश्च ते चातुर्मास्यानि य ऋतवस्ते पशुबन्धा
ये संवत्सराश्च परिवत्सराश्च तेऽहर्गणाः सर्ववेदसं वा एतत्सतं
यन्मरणं तदवभृथः। एतद्वै जरामर्यमग्निहोत्रᳲ सत्त्रं य एवं
वह (दीक्षा) दीक्षाग्रहण, और (यत्) जो संन्यासी (अश्नाति)
खाता है (तद्धविः) वह घृतादि साकल्य के समान, (यत् पिबति)
और जो वह जल, दुग्धादि पीता है (तदस्य सोमपानम्) वह इसका
सोमपान है, और (यद्रमते) वह जो इधर-उधर भ्रमण करता है
(तदुपसदः) वह उपसद उपसामग्री, (यत्संचरत्युपविशत्युत्तिष्ठते
च) जो वह गमन करता, बैठता और उठता है (स प्रवर्ग्यः) वह
इसका प्रवर्ग्य है, (यन्मुखम्) जो इसका मुख है (तदाहवनीयः)
वह संन्यासी को आहवनीय अग्नि के समान, (या व्याहृतिराहुतिर्यदस्य
विज्ञानम्) जो संन्यासी का व्याहृति का उच्चारण करना वा जो
इसका विज्ञान आहुतिरूप है (तज्जुहोति) वह जानो होम कर रहा
है, (यत्सायं प्रातरत्ति) संन्यासी जो सायं और प्रातःकाल भोजन
करता है (तत्समिधम्) वे समिधा हैं, (यत्प्रातर्मध्यन्दिनᳲ सायं
च) जो संन्यासी प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल में कर्म करता है
(तानि सवनानि) वे तीन सवन, (ये अहोरात्रे) जो दिन और रात्रि
हैं (ते दर्शपूर्णमासौ) वे संन्यासी के पौर्णमासेष्टि और अमावास्येष्टि
हैं, (येऽर्धमासाश्च, मासाश्च) जो कृष्ण शुक्लपक्ष और महीने
हैं (ते चातुर्मास्यानि) वे संन्यासी के चातुर्मास्य याग हैं, (ये ऋतवः)
जो वसन्तादि ऋतु हैं (ये पशुबन्धाः) वे जानो संन्यासी के पशुबन्ध
अर्थात् ६ पशुओं का बाँधे रखना है, (ये संवत्सराश्च परिवत्सराश्च)
जो संवत्सर और परिवत्सर अर्थात् वर्ष-वर्षान्तर हैं (तेऽहर्गणाः)
वे संन्यासी के अहर्गण—दो रात्रि वा तीन रात्रि आदि के व्रत हैं,
जो (सर्ववेदसं वै) सर्वस्व दक्षिणा अर्थात् शिखा-सूत्र यज्ञोपवीत
आदि पूर्वाश्रमचिह्नों का त्याग करना है (एतत्सत्रम्) वह सबसे
२९० संस्कारविधिः
विद्वानुदगयने प्रमीयते देवानामेव महिमानं गत्वादित्यस्य
सायुज्यं गच्छत्यथ यो दक्षिणे प्रमीयते पितॄणामेव महिमानं
गत्वा चन्द्रमसः सायुज्यं सलोकतामाप्नोत्येतौ वै सूर्या-
चन्द्रमसोर्महिमानौ ब्राह्मणो विद्वानभिजयति तस्माद् ब्रह्मणो
महिमानमाप्नोति तस्माद् ब्रह्मणो महिमानमित्युपनिषत् ॥
—तैत्ति० आ० प्रपा १० । अनु० ६४ ॥
अथ संन्यासे पुनः प्रमाणानि—
*न्यास इत्याहुर्मनीषिणो ब्रह्माणम्। ब्रह्मा विश्वः कतमः
बड़ा यज्ञ है, (यन्मरणम्) जो संन्यासी का मृत्यु है (तदवभृथः)
वह यज्ञान्तस्नान है, (एतद्वै जरामर्यमग्निहोत्रꣳ सत्रम्) यही जरावस्था
और मृत्युपर्यन्त अर्थात् यावत् जीवन है तावत् सत्योपदेश योगाभ्यासादि
संन्यास के धर्म का अनुष्ठान अग्निहोत्ररूप बड़ा दीर्घ यज्ञ है। (य
एवं विद्वानुदगयने०) जो इस प्रकार विद्वान् संन्यास लेकर विज्ञान,
योगाभ्यास करके शरीर छोड़ता है वह विद्वानों ही के महिमा को
प्राप्त होकर स्वप्रकाशस्वरूप परमात्मा के सङ्ग को प्राप्त होता है,
और जो योग-विज्ञान से रहित है सो सांसारिक दक्षिणायनरूप
व्यवहार में मृत्यु को प्राप्त होता है। वह पुनः पुनः माता-पिताओं
ही के महिमा को प्राप्त होकर चन्द्रलोक के समान वृद्धि-क्षय को
प्राप्त होता है और जो इन दोनों के महिमाओं को विद्वान् ब्राह्मण
अर्थात् संन्यासी जीत लेता है वह उससे परे परमात्मा के महिमा
को प्राप्त होकर मुक्ति के समय-पर्यन्त मोक्ष-सुख को भोगता है।
- (न्यास इत्याहुर्मनीषिणः०) इस अनुवाक का अर्थ सुगम है इसलिए
भावार्थ कहते हैं। न्यास अर्थात् जो संन्यास शब्द का अर्थ पूर्व
कह आये, उस रीति से जो संन्यासी होता है वह परमात्मा का
उपासक है। यह परमेश्वर सूर्यादि लोकों में व्याप्त और पूर्ण है
कि जिसके प्रताप से सूर्य तपता है। उस तपने से वर्षा, वर्षा से
ओषधी-वनस्पति की उत्पत्ति, उनसे अन्न, अन्न से प्राण, प्राण से
संन्यासप्रकरणम् २९१
स्वयम्भूः प्रजापतिः संवत्सर इति। संवत्सरोऽसावादित्यो
यऽएष आदित्ये पुरुषः स परमेष्ठी ब्रह्मात्मा। याभिरादित्यस्
तपति रश्मिभिस्ताभिः पर्जन्यो वर्षति पर्जन्येनौषधि-
वनस्पतयः प्रजायन्त ओषधिवनस्पतिभिरन्नं भवत्यन्नेन
प्राणाः प्राणैर्बलं बलेन तपस्तपसा श्रद्धा श्रद्धया मेधा
मेधया मनीषा मनीषया मनो मनसा शान्तिः शान्त्या चित्तं
चित्तेन स्मृतिः स्मृत्या स्मारः स्मारेण विज्ञानं विज्ञानेनात्मानं
वेदयति, तस्मादन्नं ददन्सर्वाण्येतानि ददात्यन्नात्प्राणा
बल, बल से तप अर्थात् प्राणायाम योगाभ्यास, उससे श्रद्धा—
सत्यधारण में प्रीति, उससे बुद्धि, बुद्धि से विचारशक्ति, उससे ज्ञान,
ज्ञान से शान्ति, शान्ति से चेतनता, चित्त से स्मृति, स्मृति से पूर्वापर
का ज्ञान, उससे विज्ञान और विज्ञान से आत्मा को संन्यासी, जानता
और जनाता है। इसलिए अन्नदान श्रेष्ठ जिससे प्राण, बल, विज्ञानादि
होते हैं। जो प्राणों का आत्मा, जिससे यह सर्वजगत् ओतप्रोत व्याप्त
हो रहा है। वह सब जगत् का कर्त्ता, वही पूर्वकल्प और उत्तरकल्प
में भी जगत् को बनाता है। उसके जानने की इच्छा से उसको
जानकर हे संन्यासिन् ! तू पुनः-पुनः मृत्यु को प्राप्त मत हो, किन्तु
मुक्ति के पूर्ण सुख को प्राप्त हो। इसीलिए सब तपों का तप, सबसे
पृथक् उत्तम संन्यास को कहते हैं। हे परमेश्वर ! जो तू सबमें वास
करता हुआ विभु है, तू प्राण का प्राण, सबका सन्धान करनेहारा,
विश्व का स्रष्टा, धर्त्ता, सूर्यादि को तेजदाता है। तू ही अग्नि से
तेजस्वी, तू ही विद्यादाता, तू ही सूर्य का कर्त्ता, तू ही चन्द्रमा
के प्रकाश का प्रकाशक है। वह सबसे बड़ा पूजनीय देव है। (ओम्)
इस मन्त्र का मन से उच्चारण करके परमात्मा में आत्मा को युक्त
करे। जो इस विद्वानों की ग्राह्य महोत्तम विद्या को उक्त प्रकार
से जानता है, वह संन्यासी परमात्मा के महिमा को प्राप्त होकर
आनन्द में रहता है।
२९२ संस्कारविधिः
भवन्ति भूतानाम्। प्राणैर्मनो मनसश्च विज्ञानं विज्ञाना-
दानन्दो ब्रह्मयोनिः। स वा एष पुरुषः पञ्चधा पञ्चात्मा येन
सर्वमिदं प्रोतं पृथिवी चान्तरिक्षं च द्यौश्च दिशश्चावान्तर-
दिशश्च स वै सर्वमिदं जगत् स भूतः स भव्यं जिज्ञासक्लृप्त
ऋतजा रयिष्ठाः श्रद्धा सत्यो महस्वांस्तमसो वरिष्ठात्।
ज्ञात्वा तमेवं मनसा हृदा च भूयो मृत्युमुपयाहि विद्वान्।
तस्मात् न्यासमेषां तपसामतिरिक्तमाहुः। वसुरण्वो विभूरसि
प्राणे त्वमसि संधाता ब्रह्मंस्त्वमसि विश्वसृत् तेजोदास्त्व-
मस्यग्नेरसि वर्चोदास्त्वमसि सूर्यस्य द्युम्नोदास्त्वमसि
चन्द्रमस उपयामगृहीतोसि ब्रह्मणे त्वा महसे। ओमित्यात्मानं
युञ्जीत। एतद्वै महोपनिषदं देवानां गुह्यम्। य एवं वेद
ब्रह्मणो महिमानमाप्नोति तस्माद् ब्रह्मणो महिमा-
नमित्युपनिषत्॥ —तैत्ति० आ० प्रपा० १०। अनु० ६३॥
संन्यासी का कर्त्तव्याऽकर्त्तव्य
दृ॒ते दृꣳह॑ मा मि॒त्रस्य॑ मा॒ चक्षु॑षा॒ सर्वा॑णि भू॒तानि॒ समी॑क्षन्ताम्।
मि॒त्रस्या॒हं चक्षु॑षा॒ सर्वा॑णि भू॒तानि॒ समी॑क्षे। मि॒त्रस्य॒ चक्षु॑षा
समी॑क्षामहे॥ १॥ —यजुः० अ० ३६। मं० १८॥
अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒येऽअ॒स्मान्विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान्।
यु॒यो॒ध्य॒स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठान्ते॒ नम॑ऽउक्तिं विधेम॥
यस्तु॒ सर्वा॑णि भू॒तान्या॒त्मन्ने॒वानु॒पश्य॑ति।
स॒र्व॒भू॒तेषु॑ चा॒त्मानं॒ ततो॒ न वि चि॑कित्सति॥ ३॥
यस्मि॒न्त्सर्वा॑णि भू॒तान्या॒त्मैवाभू॑द्विजान॒तः।
तत्र॒ को मोहः॒ कः शोक॑ऽ एक॒त्वम॑नु॒पश्य॑तः॥ ४॥
—यजुः० अ० ४०। मं० १६, ६, ७॥
संन्यासप्रकरणम् २९३
परी॒त्य भू॒तानि॑ परी॒त्य लो॒कान् परी॒त्य॒ सर्वाः॑ प्र॒दिशो॒
दिश॑श्च। उ॒पस्थाय॑ प्रथम॒जामृत॒स्यात्मना॒त्मान॑म॒भि सं
वि॑वेश ॥५॥ —यजुः० अ० ३२। मं० ११॥
ऋचो॒ अ॒क्षरे॑ पर॒मे व्यो॑म॒न् यस्मि॑न् दे॒वा अधि॒ विश्वे॑
निषे॒दुः। यस्तन्न वेद॒ किमृ॒चा क॑रिष्यति॒ य इत्तद्विदुस्त इ॒मे
समा॑सते ॥६॥ —ऋ० म० १। सूक्त १६४। मं० ३९॥
समाधिनिर्धूतमलस्य चेतसो
निवेशितस्यात्मनि यत् सुखं भवेत्।
न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा
स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते ॥७॥
—कठवल्ली ॥
अर्थ—हे (दृते) सर्वदुःखविदारक परमात्मन् ! तू (मा)
मुझे संन्यासमार्ग में (दृंह) बढ़ा। हे सर्वमित्र ! तू (मित्रस्य)
सर्वसुहृद् आप्त पुरुष की (चक्षुषा) दृष्टि से (मा) मुझे सबका
मित्र बना। जिससे (सर्वाणि) सब (भूतानि) प्राणिमात्र मुझे
मित्र की दृष्टि से (समीक्षन्ताम्) देखें और (अहम्) मैं (मित्रस्य)
मित्र की (चक्षुषा) दृष्टि से (सर्वाणि भूतानि) सब जीवों को
(समीक्षे) देखूँ। इस प्रकार आपकी कृपा और अपने पुरुषार्थ
से हम लोग एक-दूसरे को (मित्रस्य चक्षुषा) सुहृद्भाव की
दृष्टि से (समीक्षामहे) देखते रहें ॥ १ ॥
हे (अग्ने) स्वप्रकाशस्वरूप, सब दुःखों के दाहक, (देव)
सब सुखों के दाता परमेश्वर ! (विद्वान्) आप (राये) योग-
विज्ञानरूप धन की प्राप्ति के लिए (सुपथा) वेदोक्त धर्ममार्ग
से (अस्मान्) हमें (विश्वानि) सम्पूर्ण (वयुनानि) प्रज्ञान और
उत्तम कर्मों को (नय) अपनी कृपा से प्राप्त कीजिए और