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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

२७४ संस्कारविधिः
वैसे नाममात्र आश्रम से कुछ भी नहीं होता, किन्तु अपने-अपने
आश्रम के धर्मयुक्त कर्म करने ही से आश्रमधारण सफल होता
है, अन्यथा नहीं ॥ १३ ॥
इस पवित्र आश्रम को सफल करने के लिए संन्यासी पुरुष
विधिवत् योगशास्त्र की रीति से सात व्याहृतियों के पूर्व सात
प्रणव लगाके, जैसाकि पृष्ठ २१८ में प्राणायाम का मन्त्र लिखा
है, उसे मन से जपता हुआ तीन भी प्राणायाम करे तो जानो
अत्युत्कृष्ट तप करता है॥१४॥
जैसे अग्नि में तपाने से धातुओं के मल छूट जाते हैं, वैसे
ही प्राण के निग्रह से इन्द्रियों के दोष नष्ट हो जाते हैं॥१५॥
इसलिए संन्यासी लोग प्राणायामों से दोषों को धारणाओं
से अन्तःकरण के मैल को, प्रत्याहार से सङ्ग से हुए दोषों और
ध्यान से अविद्या, पक्षपात आदि अनीश्वरता के दोषों को छुड़ाके,
पक्षपातरहित आदि ईश्वर के गुणों को धारण कर, सब दोषों
को भस्म कर देवे ॥१६॥
बड़े-छोटे प्राणी और अप्राणियों में जो अशुद्धात्माओं से
देखने के योग्य नहीं है, उस अन्तर्यामी परमात्मा की गति, अर्थात्
प्राप्ति को ध्यानयोग से ही संन्यासी देखा करे॥१७॥
जो संन्यासी यथार्थ ज्ञान वा षड्दर्शनों से युक्त है, वह
दुष्ट कर्मों से बद्ध नहीं होता और जो ज्ञान, विद्या, योगाभ्यास,
सत्सङ्ग, धर्मानुष्ठान वा षड्दर्शनों से रहित विज्ञानहीन होकर
संन्यास लेता है, वह संन्यास पदवी और मोक्ष को प्राप्त न होकर
जन्म-मरणरूप संसार को प्राप्त होता है और ऐसे मूर्ख, अधर्मी
को संन्यास का लेना व्यर्थ और धिक्कार देने के योग्य है॥१८॥
और जो निर्वैर, इन्द्रियों के विषयों के बन्धन से पृथक्,
वैदिक कर्माचरणों और प्राणायाम, सत्यभाषणादि उत्तम, उग्र
कर्मों से सहित संन्यासी लोग होते हैं, वे इसी जन्म, इसी वर्त्तमान
समय में परमेश्वर की प्राप्तिरूप पद को प्राप्त होते हैं। उनका