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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 282

२७८ संस्कारविधिः
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो यान्ति॑ दी॒क्षया तप॑सा स॒ह। ब्रह्मा मा॒ तत्र॑
नयतु॒ ब्रह्मा॒ ब्रह्म॑ दधातु मे। ब्रह्म॑णे॒ स्वाहा॑ ॥ इदं ब्रह्मणे—
इदन्न मम ॥ १२ ॥ —अथर्व० कां० १९। सू० ४२-४३ ॥
ओं प्राणापानव्यानोदानसमाना मे शुध्यन्ताम्।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ १ ॥
वाङ् मनश्चक्षुःश्रोत्रजिह्वाघ्राणरेतोबुद्ध्याकूतिसंकल्पा
मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ
स्वाहा ॥ २ ॥
शिरःपाणिपादपार्श्वपृष्ठोरूदरजङ्घ्न शिश्नोपस्थपायवो
मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ
स्वाहा ॥ ३ ॥
त्वक्चर्ममाꣳसरुधिरमेदोमज्जास्नावयोऽस्थीनि मे
शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विर॒जा विपाप्मा भूयासथ्ँ
स्वाहा ॥ ४ ॥
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं
विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ ५ ॥
पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशा मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं
विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ ६ ॥
अन्नमयप्राणमयमनोमयविज्ञानमयानन्दमया मे
शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ
स्वाहा ॥ ७ ॥
विविष्टयै स्वाहा ॥ ८ ॥
कषोत्काय स्वाहा ॥ ९ ॥
उत्तिष्ठ पुरुष हरित लोहित पिङ्गलाक्षि। देहि देहि
ददापयिता मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा
भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ १० ॥