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सर्वकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 287

संन्यासप्रकरणम् २८३
पूर्वोक्त (पुत्रैषणायाश्च०) इस समग्र कण्डिका को बोलके प्रैष्य
मन्त्रोच्चारण करे।
ओं भूः संन्यस्तं मया। ओं भुवः संन्यस्तं मया।
ओं स्वः संन्यस्तं मया॥
इस मन्त्र का मन से उच्चारण करे। तत्पश्चात् जल से
अञ्जलि भर पूर्वाभिमुख होकर संन्यास लेनेवाला—
ओम् अभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः स्वाहा॥
इस मन्त्र से दोनों हाथ की अञ्जलि को पूर्व दिशा में
छोड़ देवे।
येना॑ स॒हस्रं॒ वह॑सि॒ येना॑ग्ने सर्ववे॒दस॑म्।
तेने॒मं य॒ज्ञं नो॑ वह॒ स्वर्द्देवेषु॒ गन्त॑वे* ॥
—अथर्व० कां० ९। सू० ५। मं० १७॥
और इसी पर स्मृति है—
प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम्।
आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात्॥
इस श्लोक का अर्थ पहले लिख दिया है।
इसके पश्चात् मौन करके शिखा के लिए जो पाँच वा
सात केश रक्खे थे उनको एक-एक उखाड़ और यज्ञोपवीत
उतारकर हाथ में ले-जल की अञ्जलि भर—
ओमापो वै सर्वा देवताः स्वाहा॥ ओम् भूः स्वाहा॥
* हे (अग्ने) विद्वन्! (येन) जिससे (सहस्रम्) सब संसार को अग्नि
धारण करता है, और (येन) जिससे तू (सर्ववेदसम्) गृहाश्रमस्थ
पदार्थमोह, यज्ञोपवीत और शिखा आदि को (वहसि) धारण करता
है, उनको छोड़। (तेन) उस त्याग से (नः) हमको (इमम्) यह
संन्यासरूप (स्वाहा) सुख देनेहारे (यज्ञम्) प्राप्त होने योग्य यज्ञ
को .(देवेषु) विद्वानों में (गन्तवे) जाने को (वह) प्राप्त हो।