संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्यासप्रकरणम् २९३
परी॒त्य भू॒तानि॑ परी॒त्य लो॒कान् परी॒त्य॒ सर्वाः॑ प्र॒दिशो॒
दिश॑श्च। उ॒पस्थाय॑ प्रथम॒जामृत॒स्यात्मना॒त्मान॑म॒भि सं
वि॑वेश ॥५॥ —यजुः० अ० ३२। मं० ११॥
ऋचो॒ अ॒क्षरे॑ पर॒मे व्यो॑म॒न् यस्मि॑न् दे॒वा अधि॒ विश्वे॑
निषे॒दुः। यस्तन्न वेद॒ किमृ॒चा क॑रिष्यति॒ य इत्तद्विदुस्त इ॒मे
समा॑सते ॥६॥ —ऋ० म० १। सूक्त १६४। मं० ३९॥
समाधिनिर्धूतमलस्य चेतसो
निवेशितस्यात्मनि यत् सुखं भवेत्।
न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा
स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते ॥७॥
—कठवल्ली ॥
अर्थ—हे (दृते) सर्वदुःखविदारक परमात्मन् ! तू (मा)
मुझे संन्यासमार्ग में (दृंह) बढ़ा। हे सर्वमित्र ! तू (मित्रस्य)
सर्वसुहृद् आप्त पुरुष की (चक्षुषा) दृष्टि से (मा) मुझे सबका
मित्र बना। जिससे (सर्वाणि) सब (भूतानि) प्राणिमात्र मुझे
मित्र की दृष्टि से (समीक्षन्ताम्) देखें और (अहम्) मैं (मित्रस्य)
मित्र की (चक्षुषा) दृष्टि से (सर्वाणि भूतानि) सब जीवों को
(समीक्षे) देखूँ। इस प्रकार आपकी कृपा और अपने पुरुषार्थ
से हम लोग एक-दूसरे को (मित्रस्य चक्षुषा) सुहृद्भाव की
दृष्टि से (समीक्षामहे) देखते रहें ॥ १ ॥
हे (अग्ने) स्वप्रकाशस्वरूप, सब दुःखों के दाहक, (देव)
सब सुखों के दाता परमेश्वर ! (विद्वान्) आप (राये) योग-
विज्ञानरूप धन की प्राप्ति के लिए (सुपथा) वेदोक्त धर्ममार्ग
से (अस्मान्) हमें (विश्वानि) सम्पूर्ण (वयुनानि) प्रज्ञान और
उत्तम कर्मों को (नय) अपनी कृपा से प्राप्त कीजिए और