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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

विवाहप्रकरणम् १८५
ओम् अ॒घोर॑चक्षुरप॑तिघ्न्येधि शि॒वा प॒शुभ्यः॑ सु॒मनाः॑
सु॒वर्चाः॑। वी॒रसू॒र्देवृ॑कामा स्यो॒ना शं नौ॑ भव द्वि॒पदे॒ शं
चतु॑ष्पदे॒ स्वाहा॑*॥ इदं सूर्यायै सावित्र्यै-इदन्न मम॥ २॥
ओम् इ॒मां त्वमि॑न्द्र मीढ्वः सु॒पु॒त्रां सु॒भगां॑ कृणु।
दशा॑स्यां पु॒त्राना धे॑हि पति॑मेकाद॒शं कृ॑धि स्वाहा॑**॥
इदं सूर्यायै सावित्र्यै-इदन्न मम॥ ३॥

  • इस मन्त्र का अर्थ पृष्ठ १५७ में लिखे प्रमाणे जानना॥ २॥
    ** ईश्वर पुरुष और स्त्री को आज्ञा देता है कि हे (मीढ्वः) वीर्यसेचन
    करनेहारे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त इस वधू के स्वामिन्! (त्वम्) तू
    (इमाम्) इस वधू को (सुपुत्राम्) उत्तम पुत्रयुक्त (सुभगाम्) सुन्दर
    सौभाग्य भोगवाली (कृणु) कर। (अस्याम्) इस वधू में (दश)
    दश (पुत्रान्) पुत्रों को (आ धेहि) उत्पन्न कर, अधिक नहीं। और
    हे स्त्री! तू भी अधिक कामना मत कर, किन्तु दश पुत्र और
    (एकादशम्) ग्यारहवें (पतिम्) पति को प्राप्त होकर सन्तोष
    (कृधि) कर। यदि इससे आगे सन्तानोत्पत्ति का लोभ करोगे तो
    तुम्हारे दुष्ट, अल्पायु, निर्बुद्धि सन्तान होंगे, और तुम भी अल्पायु,
    रोगग्रस्त हो जाओगे, इसलिए अधिक सन्तानोत्पत्ति न करना।
    तथा (पतिमेकादशं कृधि) इस पद का अर्थ नियोग में दूसरा होगा,
    अर्थात् जैसे पुरुष को विवाहित स्त्री में दश पुत्र उत्पन्न करने की
    आज्ञा परमात्मा ने की है, वैसी ही आज्ञा स्त्री को भी है कि दश
    पुत्र तक चाहे विवाहित पति से अथवा विधवा हुए पश्चात् नियोग
    से करे-करावे। वैसे ही एक स्त्री के लिए एक पति से एक बार
    विवाह और पुरुष के लिए भी एक स्त्री से एक ही बार विवाह
    करने की आज्ञा है। जैसे विधवा हुए पश्चात् स्त्री नियोग से
    सन्तानोत्पत्ति करके पुत्रवती होवे, वैसे पुरुष भी विगतस्त्री होवे
    तो नियोग से पुत्रवान् होवे॥ ३॥

१८६ संस्कारविधिः
ओं स॒म्राज्ञी॒ श्वशु॑रे भव॒ सम्रा॑ज्ञी॒ श्व॒श्र्वां भव॑। नना॑न्दरि
स॒म्राज्ञी॑ भव॒ सम्राज्ञी॒ अधि॑ दे॒वृषु॒ स्वाहा॑*॥ इदं सूर्यायै
सावित्र्यै—इदन्न मम॥४॥
इन चार मन्त्रों से एक-एक से एक-एक करके चार
आज्याहुति देके, पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे स्विष्टकृत् होमाहुति
एक, व्याहृति आज्याहुति चार और प्राजापत्याहुति एक, ये सब
मिलके छह आज्याहुति देकर—
सम॑ञ्जन्तु विश्वे॑ दे॒वाः समापो॒ हृद॑यानि नौ।
सं मा॑त॒रिश्व॒ सं धा॒ता समु॑ दे॒ष्ट्री द॑धातु नौ**॥
इस मन्त्र को बोलके दोनों दधिप्राशन करें।
तत्पश्चात्—
अहं भो अभिवादयामि ¶ ॥

  • हे वरानने! तू (श्वशुरे) मेरे पिता जोकि तेरा श्वशुर है, उसमें
    प्रीति करके (सम्राज्ञी) सम्यक् प्रकाशमान, चक्रवर्ती राजा की राणी
    के समान पक्षपात छोड़के प्रवृत्त (भव) हो। (श्वश्र्वाम्) मेरी माता
    जोकि तेरी सासु है, उसमें प्रेमयुक्त होके उसी की आज्ञा में (सम्राज्ञी)
    सम्यक् प्रकाशमान (भव) रहा कर। (ननान्दरि) जो मेरी बहिन
    और तेरी ननन्द है, उसमें भी (सम्राज्ञी) प्रीति से प्रकाशमान (अधि
    भव) अधिकारयुक्त हो, अर्थात् सबसे अविरोधपूर्वक प्रीति से बर्त्ता
    कर॥४॥
    ** इस मन्त्र का अर्थ पृष्ठ १५६ में लिखित समझ लेना।
    ∂ इससे उत्तम 'नमस्ते' यह वेदोक्त वाक्य अभिवादन के लिए
    नित्यप्रति स्त्री-पुरुष, पिता-पुत्र अथवा गुरु-शिष्य आदि के लिए
    है। प्रातः-सायं अपूर्व समागम में जब-जब मिलें तब-तब इसी
    वाक्य से परस्पर वन्दन करें।

गृहाश्रमप्रकरणम् १८७
इस वाक्य को बोलके दोनों वधू-वर, वर की माता-पिता
आदि वृद्धों को प्रीतिपूर्वक नमस्कार करें।
पश्चात् सुभूषित होकर शुभासन पर बैठके पृष्ठ ३६-३७
में लिखे प्रमाणे वामदेव्यगान करके, उसी समय पृष्ठ ९-१२
में लिखे प्रमाणे ईश्वरोपासना करनी। उस समय कार्यार्थ आये·
हुए सब स्त्री-पुरुष ध्यानावस्थित होकर परमेश्वरं का ध्यान
करें।
तथा वधू-वर .पिता, आचार्य और पुरोहित आदि को कहें
कि—
ओं स्वस्ति भवन्तो ब्रुवन्तु॥
आप लोग स्वस्तिवाचन करें।
तत्पश्चात् पिता, आचार्य, पुरोहित जो विद्वान् हों, अथवा
उनके अभाव में यदि वधू-वर विद्वान्, वेदवित् हों, तो वे ही
दोनों पृ० १३-१७ में लिखे प्रमाणे स्वस्तिवाचन का पाठ बड़े
प्रेम से करें।
पाठ हुए पश्चात् कार्यार्थ आये हुए स्त्री-पुरुष सब—
ओं स्वस्ति ओं स्वस्ति ओं स्वस्ति॥
इस वाक्य को बोलें।
तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता, पिता, चाचा, भाई आदि पुरुषों को
तथा माता, चाची, भगिनी आदि स्त्रियों को यथावत् सत्कार
करके विदा करें।
तत्पश्चात् यदि किसी विशेष कारण से श्वशुरगृह में
गर्भाधान-संस्कार न हो सके, तो वधू-वर क्षार-आहार और
विषय-तृणारहित व्रतस्थ होके पृष्ठ ३८-५४ में लिखे प्रमाणे
विवाह के चौथे दिवस में गर्भाधान संस्कार करें। अथवा उस
दिन ऋतुकाल न हो, तो किसी दूसरे दिन गर्भस्थापन करें और
जो वर दूसरे देश से विवाह के लिए आया हो तो वह जहाँ

१८८ संस्कारविधिः
जिस स्थान में विवाह करने के लिए जाकर उतरा हो, उसी
स्थान में गर्भाधान करे।
पुनः अपने घर आके पति, सासु, श्वशुर, ननन्द, देवर,
देवराणी, ज्येष्ठ-जेठाणी आदि कुटुम्ब के मनुष्य वधू की पूजा,
अर्थात् सत्कार करें। सदा प्रीतिपूर्वक परस्पर वर्तें और मधुरवाणी,
वस्त्र, आभूषण आदि से सदा प्रसन्न और सन्तुष्ट वधू को रक्खें
तथा वधू भी सबको प्रसन्न रक्खे और वर उस वधू के साथ
पत्नीव्रतादि सद्धर्म से वर्तें तथा पत्नी भी पति के साथ पतिव्रतादि
सद्धर्म, चाल-चलन से सदा पति की आज्ञा में तत्पर और उत्सुक
रहे तथा वर भी स्त्री की सेवा-प्रसन्नता में तत्पर रहे॥
॥ इति विवाहसंस्कारविधिः समाप्तः ॥

अथ गृहाश्रमसंस्कारविधिं वक्ष्यामः
'गृहाश्रम-संस्कार' उसे कहते हैं कि जो ऐहिक और
पारलौकिक सुख-प्राप्ति के लिए विवाह करके अपने सामर्थ्य
के अनुसार परोपकार करना और नियत काल में यथाविधि
ईश्वर-उपासना एवं गृहकृत्य करना और सत्य धर्म में ही अपना
तन-मन-धन लगाना तथा धर्मानुसार सन्तानों की उत्पत्ति करना।
अत्र प्रमाणानि
सोमो॑ वधू॒युर॑भवद॒श्विना॑स्तामु॒भा व॒रा।
सूर्या॒ यत्पत्ये॒ शंस॑न्तीं मन॑सा सवि॒ताद॑दात्॥ १॥
इ॒हैव स्तं॒ मा वि यौ॑ष्टं॒ विश्व॒मायु॒र्व्य॑श्नुतम्।
क्रीड॑न्तौ पु॒त्रैर्नप्तृ॑भि॒र्मोद॑मानौ स्व॒स्त्यौ॑॥ २॥
अर्थ—(सोमः) सुकुमार, शुभगुणयुक्त, (वधूयुः) वधू की
कामना करनेवाला पति तथा पति की कामना करनेवाली वधू
(अश्विना) दोनों ब्रह्मचर्य से विद्या को प्राप्त (अभवत्) होवें
और (उभा) दोनों (वरा) श्रेष्ठ, तुल्य गुण-कर्म-स्वभाववाले
(आस्ताम्) होवें। ऐसी (यत्) जो (सूर्याम्) सूर्य की किरणवत्,
सौन्दर्य गुणयुक्त, (पत्ये) पति के लिए (मनसा) मन से
(शंसन्तीम्) गुण-कीर्त्तन करनेवाली वधू है, उसको पुरुष और
इसी प्रकार के पुरुष को स्त्री (सविता) सकल जगत् का
उत्पादक परमात्मा (ददात्) देता है, अर्थात् बड़े भाग्य से दोनों
स्त्री-पुरुषों का, जोकि तुल्य गुण-कर्म-स्वभाव हों, जोड़ा
मिलता है॥ १॥
हे स्त्री और पुरुष ! मैं परमेश्वर आज्ञा देता हूँ कि तुम्हारे
लिए विवाह में जो पूर्व प्रतिज्ञा हो चुकी है, जिसे तुम दोनों

१९० संस्कारविधिः
ने स्वीकार किया है, (इहैव) इसी में (स्तम्) तत्पर रहो, (मा
वियौष्टम्) इस प्रतिज्ञा से वियुक्त मत होओ। (विश्वमायुर्व्यश्नुतम्)
ऋतुगामी होके वीर्य का अधिक नाश न करके सम्पूर्ण आयु,
जो सौ वर्षों से कम नहीं है, उसे प्राप्त होओ और पूर्वोक्त धर्मरीति
से (पुत्रैः) पुत्रों और (नप्तृभिः) नातियों के साथ (क्रीडन्तौ)
क्रीड़ा करते हुए (स्वस्तकौ) उत्तम गृहवाले (मोदमानौ)
आनन्दित होकर गृहाश्रम में प्रीतिपूर्वक वास करो ॥ २ ॥
सुम॒ङ्गली प्र॒तर॑णी गृ॒हाणां॑ सु॒शेवा॒ पत्ये॑ श्वशु॑राय॒ शंभूः॑ ।
स्यो॒ना श्व॒श्र्वै प्र गृ॒हान् वि॒शेमान् ॥ ३ ॥
स्यो॒ना भ॑व॒ श्वशु॑रेभ्यः स्यो॒ना पत्ये॑ गृ॒हेभ्यः॑ ।
स्यो॒नास्यै सर्व॑स्यै वि॒शे स्यो॒ना पु॒ष्टायै॑षां भव ॥ ४ ॥
या दु॒र्हार्दो॑ यु॒वत॑यो याश्चे॒ह ज॒रती॑रपि॑ ।
वर्चो॒ न्व१॑स्यै सं द॒त्ताथास्तं॑ वि॒परै॑तन ॥ ५ ॥
आ रो॑ह॒ तल्पं॑ सुम॒न॒स्यमा॑ने॒ह प्र॒जां ज॑नय॒ पत्ये॑ अ॒स्मै ।
इ॒न्द्रा॒णीव॑ सु॒बुधा॒ बुध्य॑माना॒ ज्योति॑रग्रा उ॒षसः॒ प्रति॑
जागरासि ॥ ६ ॥
अर्थ—हे वरानने ! तू (सुमङ्गली) अच्छे मङ्गलाचरण करने
तथा (प्रतरणी) दोष और शोकादि से पृथक् रहनेवाली, (गृहाणाम्)
गृह-कार्यों में चतुर और तत्पर रहकर (सुशेवा) उत्तम सुखयुक्त
होके (पत्ये) पति (श्वशुराय) श्वशुर और (श्वश्र्वै) सासु के
लिए (शम्भूः) सुखकर्त्री और (स्योना) स्वयं प्रसन्न हुई
(इमान्) इन (गृहान्) घरों में सुकपूर्वक (प्रविश) प्रवेश
कर ॥ ३ ॥
हे वधू ! तू (श्वशुरेभ्यः) श्वशुरादि के लिए (स्योना)
सुखदाता, (पत्ये) पति के लिए (स्योना) सुखदाता, (गृहेभ्यः)

गृहाश्रमप्रकरणम् १९१
गृहस्थ सम्बन्धियों के लिए (स्योना) सुखदायक (भव) हो
और (अस्यै) इस (सर्वस्यै) सब (विशे) प्रजा के अर्थ
(स्योना) सुखप्रद और (एषाम्) इनके (पुष्टाय) पोषण के अर्थ
तत्पर (भव) हो॥४॥
(याः) जो (दुर्हर्दः) दुष्ट हृदयवाली, अर्थात् दुष्टात्मा
(युवतयः) जवान स्त्रियाँ, (च) और (याः) जो (इह) इस
स्थान में (जरतीः) बुड्डी = वृद्ध स्त्रियाँ हों, वे (अपि) भी (अस्यै)
इस वधू को (नू) शीघ्र (वर्चः) तेज (सं दत्त) देवें। (अथ)
इसके पश्चात् (अस्तम्) अपने-अपने घर को (विपरेतन) चली
जावें और फिर इसके पास कभी न आवें॥५॥
हे वरानने ! तू (सुमनस्यमाना) प्रसन्नचित होकर (तल्पम्)
पर्यङ्क पर (आरोह) चढ़के शयन कर और (इह) इस गृहाश्रम
में स्थिर रहकर (अस्मै) इस (पत्ये) पति के लिए (प्रजां जनय)
प्रजा को उत्पन्न कर। (सुबुधा) सुन्दर ज्ञानी (बुध्यमाना) उत्तम
शिक्षा को प्राप्त (इन्द्राणीव) सूर्य की कान्ति के समान तू
(उषसः) उषःकाल से (अग्रा) पहली (ज्योतिः) ज्योति के
तुल्य (प्रति जागरासि) प्रत्यक्ष सब कामों में जागती रह॥६॥
दे॒वा अग्रे॒ न्य॑पिद्यन्त॒ पत्नीः॒ सम॑स्पृशन्त त॒न्व॑स्त॒नूभिः॑।
सूर्यै॑व नारि वि॒श्वरू॑पा महि॒त्वा प्र॒जाव॑ती॒ पत्या॒ सं भ॑वेह॥७॥
सं पि॑तरावृ॒त्विये॑ सृजेथां मा॒ता पि॒ता च॒ रेत॑सो भवाथः।
मर्य॑ इव यो॒षामधि॑ रोहयैनां प्र॒जां कृ॑ण्वाथामि॒ह पु॑ष्यतं॒ रयिम्॥८॥
तां पू॑षञ्छि॒वत॑मा॒मेर॑यस्व॒ यस्यां॑ बी॒जं मनु॒ष्या॑३ वप॑न्ति।
या न॑ ऊ॒रू उ॑श॒ती वि॒श्रया॑ति॒ यस्या॑मुश॒न्तः प्र॒हरे॑म॒ शेपः॑॥९॥
अर्थ—हे सौभाग्यप्रदे (नारि) नारी ! तू जैसे (इह) इस

४. समावर्तन (स्नातक दीक्षांत समारोह) एवं विवाह संस्कार विधान

१९२ संस्कारविधिः
गृहाश्रम में (अग्रे) प्रथम (देवाः) विद्वान् लोग (पत्नीः) उत्तम
स्त्रियों को (न्यपद्यन्त) प्राप्त होते हैं और (तनूभिः) शरीरों से
(तन्वः) शरीरों को (समस्पृशन्त) स्पर्श करते हैं, वैसे (विश्वरूपा)
विविध सुन्दररूप को धारण करनेहारी, (महित्वा) सत्कार को
प्राप्त होके (सूर्येव) सूर्य की कान्ति के समान (पत्या) अपने
स्वामी के साथ मिलके (प्रजावती) प्रजा को प्राप्त होनेवाली
(सम्भव) अच्छे प्रकार हो ॥ ७ ॥
हे स्त्री-पुरुषो ! तुम (पितरौ) बालकों के जनक (ऋत्विये)
ऋतुसमय में सन्तानों को (संसृजेथाम्) अच्छे प्रकार उत्पन्न करो।
(माता) जननी (च) और (पिता) जनक दोनों (रेतः) वीर्य
को मिलाकर गर्भाधान करनेवाले (भवाथः) होओ। हे पुरुष !
(एनाम्) इस (योषाम्) अपनी स्त्री को (मर्यः इव) प्राप्त
होनेवाले पति के समान (अधि रोहय) सन्तानों से बढ़ा और
दोनों (इह) इस गृहाश्रम में मिलके (प्रजाम्) प्रजा को
(कृण्वाथाम्) उत्पन्न करो, (पुष्यतम्) पालन-पोषण करो और
पुरुषार्थ से (रयिम्) धन को प्राप्त होओ ॥ ८ ॥
हे (पूषन्) वृद्धिकारक पुरुष ! (यस्याम्) जिसमें (मनुष्याः)
मनुष्य लोग (बीजम्) वीर्य को (वपन्ति) बोते हैं, (या) जो
(नः) हमारी (उशती) कामना करती हुई (ऊरू) ऊरू को
सुन्दरता से (विश्रयाति) विशेषकर आश्रय करती है, (यस्याम्)
जिमें (उशन्तः) सन्तानों की कामना करते हुए हम (शेपः)
उपस्थेन्द्रिय का (प्रहरेम) प्रहरण करते हैं, (ताम्) उस
(शिवतमाम्) अतिशय कल्याण करनेवाली स्त्री को सन्तानोत्पत्ति
के लिए (एरयस्व) प्रेम से प्रेरणा कर ॥ ९ ॥
स्यो॒नाद् योने॒रधि॑ बु॒ध्यमा॑नौ ह॒सामु॒दौ मह॑सा॒ मोद॑मानौ ।
सु॒गू सु॑पु॒त्रौ सु॑गृ॒हौ तराथो॒ जीवावु॒षसो॑ विभा॒तीः ॥ १० ॥

गृहाश्रमप्रकरणम् १९३
इ॒हेमावि॑न्द्र॒ सं नु॑द च॒क्रवा॒केव॑ दम्प॑ती ।
प्र॒जयै॑नौ स्वस्तुकौ विश्व॒मायु॒र्व्य॑श्नुताम् ॥ ११ ॥
ज॒नियन्ति॑ ना॒व॑ग्रवः पु॒त्रियन्ति॑ सु॒दान॑वः ।
अरि॑ष्टा॒सू सचेवहि बृ॒हते वाज॑सातये ॥ १२ ॥
अर्थ—हे स्त्री और पुरुष ! जैसे सूर्य (विभातीः) सुन्दर
प्रकाशयुक्त (उषसः) प्रभातवेला को प्राप्त होता है, वैसे
(स्योनात्) सुख से (योनेः) घर के मध्य में (अधि बुध्यमानौ)
सन्तानोत्पत्ति आदि की क्रिया को अच्छे प्रकार जाननेवाले,
सदा (हसामुदौ) हास्य और आनन्दयुक्त, (महसा) बड़े प्रेम
से (मोदमानौ) अत्यन्त प्रसन्न हुए, (सुगू) उत्तम चाल चलने
से धर्मयुक्त व्यवहार में अच्छे प्रकार चलनेवाले, (सुपुत्रौ) उत्तम
पुत्रवाले, (सुगृहौ) श्रेष्ठ गृहादि सामग्रीयुक्त (जीवौ) उत्तम
प्रकार जीवों को धारण करते हुए (तराथः) गृहाश्रम के
व्यवहारों के पार होओ ॥ १० ॥
हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त विद्वान् राजन् ! आप (इह) इस
संसार में (इमौ) इन स्त्री-पुरुषों को समय पर विवाह करने
की आज्ञा और ऐसी व्यवस्था दीजिए कि जिससे कोई स्त्री-
पुरुष पृष्ठ ११२-१२६ में लिखे प्रमाण से पूर्व वा अन्यथा विवाह
न कर सकें, वैसे (सं नुद) सबको प्रसिद्धि से प्रेरणा कीजिए,
जिससे ब्रह्मचर्यपूर्वक शिक्षा को पाके (दम्पती) जाया और पति
(चक्रवाकेव) चकवा-चकवी के समान एक-दूसरे से प्रेमबद्ध
रहें और गर्भाधानसंस्कारोक्तविधि से (प्रजया) उत्पन्न हुई प्रजा
से (एनौ) ये दोनों (स्वस्तकौ) सुखयुक्त होके (विश्वम्)
सम्पूर्ण—सौ वर्षपर्यन्त (आयुः) आयु को (व्यश्नुताम्) प्राप्त
होवें ॥ ११ ॥
हे मनुष्यो ! जैसे (सुदानवः) विद्यादि उत्तम गुणों के दान
करनेवाले (अग्रवः) उत्तम स्त्री-पुरुष (जनियन्ति) पुत्रोत्पत्ति

१९४ संस्कारविधिः
करते और (पुत्रियन्ति) पुत्र की कामना करते हैं, वैसे (नौ)
हमारे भी सन्तान उत्तम होवें तथा (अरिष्टासू) बल, प्राण का
नाश न करनेवाले होकर (बृहते) बड़े (वाजसातये) परोपकार
के अर्थ विज्ञान और अन्न आदि के दान के लिए (सचेवहि)
कटिबद्ध सदा रहें, जिससे हमारे सन्तान भी उत्तम होवें ॥ १२ ॥
प्र बु॒ध्यस्व सु॒बुधा॒ बुध्य॑माना दी॒र्घायु॒त्वाय॑ श॒तशा॑रदाय । गृ॒हान्
ग॑च्छ गृ॒हप॑त्नी यथासौ दी॒र्घं त॒ आयु॑: स॒वि॒ता कृ॒णोतु॑ ॥ १३ ॥
स॒हृद॑यं सांम॑न॒स्यम॑विद्वे॒षं कृ॒णोमि॑ वः ।
अ॒न्यो अ॒न्यम॒भि ह॑र्यत व॒त्सं जा॒तमि॑वा॒घ्न्या ॥ १४ ॥
अर्थ—हे पत्नि ! तू (शतशारदाय) शतवर्षपर्यन्त
(दीर्घायुत्वाय) दीर्घकाल जीने के लिए (सुबुधा) उत्तम बुद्धियुक्त,
(बुध्यमाना) संज्ञान होकर (गृहान्) मेरे घरों को (गच्छ) प्राप्त
हो और (गृहपत्नी) मुझ घर के स्वामी की स्त्री (यथा) जैसे
(ते) तेरा (दीर्घम्) दीर्घकाल-पर्यन्त (आयुः) जीवन (आसः)
होवे, वैसे (प्रबुध्यस्व) प्रकृष्ट ज्ञान और उत्तम व्यवहार को
यथावत् जान । इस अपनी आशा को (सविता) सब जगत् की
उत्पत्ति और सम्पूर्ण ऐश्वर्य को देनेवाला परमात्मा (कृणोतु)
अपनी कृपा से सदा सिद्ध करे । जिससे तू और मैं सदा उन्नतिशील
होकर आनन्द में रहें ॥ १३ ॥
हे गृहस्थो ! मैं ईश्वर तुमको जैसी आज्ञा देता हूँ, वैसा
ही वर्त्तमान करो, जिससे तुम्हें अक्षय सुख हो, अर्थात् (वः)
तुम्हारा (सहृदयम्) जैसी अपने लिए सुख की इच्छा करते और
दुःख नहीं चाहते हो, वैसे माता-पिता, सन्तान, स्त्री-पुरुष, भृत्य,
मित्र, पड़ोसी और अन्य सबसे समान हृदय रहो । (सांमनस्यम्)
मन से सम्यक् प्रसन्नता और (अविद्वेषम्) वैर-विरोधादिरहित
व्यवहार को तुम्हारे लिए (कृणोमि) स्थिर करता हूँ। तुम

गृहआश्रमप्रकरणम् १९५
(अघ्न्या) हनन न करने योग्य गाय (वत्सं जातमिव) उत्पन्न
हुए बछड़े पर वात्सल्यभाव से जैसे वर्तती है, वैसे (अन्यो
अन्यम्) एक-दूसरे से (अभिहर्यत) प्रेमपूर्वक कामना से वर्त्ता
करो ॥ १४ ॥
अनु॑व्रतः पि॒तुः पु॒त्रो मा॒त्रा भ॑वतु संम॑नाः।
जा॒या पत्ये॒ मधु॑मतीं वाचं॑ वदतु शन्ति॒वाम् ॥ १५ ॥
मा भ्राता॒ भ्रातरं॑ द्विक्ष॒न्मा स्वसा॑रमु॒त स्वसा॑।
स॒म्यञ्चः॒ सव्र॑ता भू॒त्वा वाचं॑ वदत भ॒द्रया॑ ॥ १६ ॥
अर्थ—हे गृहस्थो! जैसे तुम्हारा (पुत्रः) पुत्र (मात्रा) माता
के साथ (संमनाः) प्रीतियुक्त मनवाला, (अनुव्रतः) अनुकूल
आचरणयुक्त, (पितुः) और पिता के सम्बन्ध में भी इसी प्रकार
का प्रेमवाला (भवतु) होवे, वैसे तुम भी पुत्रों के साथ सदा
वर्त्ता करो। जैसे (जाया) स्त्री (पत्ये) पति की प्रसन्नता के
लिए (मधुमतीम्) माधुर्यगुणयुक्त (वाचम्) वाणी को (वदतु)
कहे, वैसे पति भी (शन्तिवान्) शान्त होकर अपनी पत्नी से
सदा मधुर भाषण किया करे ॥ १५ ॥
हे गृहस्थो! तुम्हारे में (भ्राता) भाई (भ्रातरम्) भाई के
साथ (मा द्विक्षत्) द्वेष कभी न करे। (उत) और (स्वसा)
बहिन (स्वसारम्) बहिन से द्वेष कभी (मा) न करे तथा बहिन-
भाई भी परस्पर द्वेष मत करो, किन्तु (सम्यञ्चः) सम्यक् प्रेमादि
गुणों से युक्त (सव्रताः) समान गुण-कर्म-स्वभाववाले (भूत्वा)
होकर (भद्रया) मङ्गलकारक रीति से एक-दूसरे के साथ
(वाचम्) सुखदायक वाणी को (वदत) बोला करो ॥ १६ ॥
येन॑ दे॒वा न वि॒यन्ति॒ नो च॑ वि॒द्विष॒ते मि॒थः ।
तत्कृ॑ण्मो॒ ब्रह्म॑ वो गृ॒हे सं॒ज्ञानं॒ पुरु॑षेभ्यः ॥ १७ ॥
अर्थ—हे गृहस्थो! मैं ईश्वर (येन) जिस प्रकार के व्यवहार

१९६ संस्कारविधिः
से (देवाः) विद्वान् लोग (मिथः) परस्पर (न वियन्ति) पृथक्
भाववाले नहीं होते, (च) और (नो विद्विषते) परस्पर में द्वेष
कभी नहीं करते, (तत्) वही कर्म (वः) तुम्हारे (गृहे) घर
में (कृण्मः) निश्चित करता हूँ। (पुरुषेभ्यः) पुरुषों को (संज्ञानम्)
अच्छे प्रकार चिताता हूँ कि तुम लोग परस्पर प्रीति से वर्त्तकर
बड़े (ब्रह्म) धनैश्वर्य को प्राप्त होओ॥ १७॥
ज्याय॑स्वन्तश्चित्तिनो॒ मा वि यौ॑ष्ट॒ संरा॑धयन्तः॒
सधुरा॑श्चरन्तः॑। अ॒न्यो अ॒न्यस्मै॑ व॒ल्गु वद॑न्त॒ एतं॑
स॒ध्रीची॑नान्त्वः संम॑नसस्कृणोमि॥ १८॥
अर्थ—हे गृहस्थादि मनुष्यो! तुम (ज्यायस्वन्तः) उत्तम
विद्यादिगुणयुक्त, (चित्तिनः) विद्वान्, संज्ञान, (सधुराः) धुरन्धर
होकर (चरन्तः) विचरते और (संराधयन्तः) परस्पर मिलके
धन-धान्य, राज्यसमृद्धि को प्राप्त होते हुए (मा वियौष्ट) विरोधी
वा पृथक्-पृथक् भाव मत करो। (अन्यः) एक (अन्यस्मै)
दूसरे के लिए (वल्गु) सत्य, मधुर भाषण (वदन्तः) कहते
हुए एक-दूसरे को (एत) प्राप्त होओ। इसीलिए (सध्रीचीनान्)
समान लाभाऽलाभ से एक-दूसरे के सहायक, (संमनसः)
एकमत्यवाले (वः) तुमको (कृणोमि) करता हूँ, अर्थात् मैं
ईश्वर तुमको जो आज्ञा देता हूँ, इसको आलस्य छोड़कर किया
करो॥ १८॥
समा॒नी प्र॒पा स॒ह वो॑ऽन्नभा॒गः स॑मा॒ने योक्त्रे॑ स॒ह वो॑ युनज्मि।
स॒म्यञ्चो॒ऽग्निं स॑प॒र्यता॑रा॒ नाभि॑मि॒वाभि॑तः॥ १९॥
स॒ध्रीची॑नान्त्वः संम॑नसस्कृणोम्ये॑क॑श्रुष्टीन्त्संव॑नने॒न सर्वा॑न्।
दे॒वाइ॑वा॒मृतं॒ रक्ष॑माणाः सा॒यं प्रा॒तः सौम॑नसो वो॑ अस्तु॥ २०॥
—अथर्व० कां० ३। सू० ३०। मन्त्र १–७॥

गृहाश्रमप्रकरणम् १९७
अर्थ—हे गृहस्थादि मनुष्यो ! मुझ ईश्वर की आज्ञा से
तुम्हारा (प्रपा) जलपान, स्नानादि का स्थान आदि व्यवहार
(समानी) एक-सा हो। (वः) तुम्हारा (अन्नभागः) खान-पान
(सह) साथ हुआ करे। (वः) तुम्हारे (समाने) एक-से
(योक्त्रे) अश्वादि यान के जोते (सह) संगी हों और तुमको
मैं धर्मादि व्यवहार में भी एकीभूत करके (युनज्मि) नियुक्त
करता हूँ। जैसे (अराः) चक्र के आरे (अभितः) चारों ओर
से (नाभिमिव) बीच के नालरूप काष्ठ में लगे रहते हैं, अथवा
जैसे ऋत्विज् लोग और यजमान यज्ञ में मिलके (अग्निम्) अग्नि
आदि के सेवन से जगत् का उपकार करते हैं, वैसे (सम्यञ्चः)
सम्यक् प्राप्तिवाले तुम मिलके धर्मयुक्त कर्मों को और (सपर्यत)
एक-दूसरे का हित सिद्ध किया करो॥ १९॥
हे गृहस्थादि मनुष्यो ! मैं ईश्वर (वः) तुमको (सध्रीचीनान्)
सह वर्त्तमान, (संमनसः) परस्पर के लिए हितैषी, (एकश्रुष्टीन्)
एक ही धर्मकृत्य में शीघ्र प्रवृत्त होनेवाले (सर्वान्) सबको
(संवननेन) धर्मकृत्य के सेवन के साथ एक-दूसरे के उपकार
में नियुक्त (कृणोमि) करता हूँ। तुम (देवाइव) विद्वानों के समान
(अमृतम्) व्यावहारिक वा पारमार्थिक सुख की (रक्षमाणाः)
रक्षा करते हुए (सायंप्रातः) सन्ध्या और प्रातःकाल, अर्थात् सब
समय में एक-दूसरे से प्रेमपूर्वक मिला करो। ऐसे करते हुए
(वः) तुम्हारा (सौमनसः) मन का आनन्दयुक्त शुद्धभाव
(अस्तु) सदा बना रहे॥ २०॥
श्रमेण॒ तप॑सा सृष्टा ब्रह्म॑णा वित्त ऋ॒ते श्रि॒ताः॥ २१॥
स॒त्येनावृ॑ताः श्रिया॒ प्रावृ॑ता यश॑सा परी॑वृताः॥ २२॥
स्व॒धया॒ परि॑हिताः श्र॒द्धया॒ पर्यू॑ढा दी॒क्षया॑ गु॒प्ता य॒ज्ञे
प्रति॑ष्ठिता लो॒को नि॒धन॑म्॥ २३॥

१९८ संस्कारविधिः
अर्थ— हे स्त्री-पुरुषो! मैं ईश्वर तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि
तुम सब गृहस्थ मनुष्य (श्रमेण) परिश्रम तथा (तपसा)
प्राणायाम से (सृष्टाः) संयुक्त, (ब्रह्मणा) वेदविद्या, परमात्मा
और धनादि से (वित्ते) भोगने योग्य धनादि के प्रयत्न में और
(ऋते) यथार्थ पक्षपातरहित न्यायरूप धर्म में (श्रिताः) चलनेवाले
सदा बने रहो ॥ २१ ॥
(सत्येन) सत्यभाषणादि कर्मों से (आवृताः) चारों ओर
से युक्त, (श्रिया) शोभा तथा लक्ष्मी से (प्रावृताः) युक्त,
(यशसा) कीर्ति और धन से (परीवृताः) सब ओर से संयुक्त
रहा करो ॥ २२ ॥
(स्वधया) अपने ही अन्नादि पदार्थ के धारण से (परिहिताः)
सबके हितकारी, (श्रद्धया) सत्य धारण में श्रद्धा से (पर्युढाः)
सब ओर से सबको सत्याचरण प्राप्त करानेवाले, (दीक्षया) नाना
प्रकार के ब्रह्मचर्य, सत्यभाषणादि व्रत धारण से (गुप्ताः)
सुरक्षित, (यज्ञे) विद्वानों के सत्कार, शिल्पविद्या और शुभ गुणों
के दान में (प्रतिष्ठिताः) प्रतिष्ठा को प्राप्त हुआ करो और इन्हीं
कर्मों से (निधनम् लोकः) इस मनुष्यलोक को प्राप्त होके
मृत्युपर्यन्त सदा आनन्द में रहो ॥ २३ ॥
ओज॑श्च॒ तेज॑श्च॒ सह॑श्च॒ बलं॑ च॒ वाक् चेन्द्रि॒यं च॒
श्रीश्च॒ धर्म॑श्च ॥ २४ ॥
अर्थ— हे मनुष्यो ! तुम जो (ओजः) पराक्रम (च) और
इसकी सामग्री, (तेजः) तेजस्वीपन (च) और इसकी सामग्री,
(सहः) स्तुति-निन्दा, हानि-लाभ तथा शोकादि का सहन (च)
और इसके साधन, (बलं च) बल और इसके साधन, (वाक्
च) सत्य, प्रिय वाणी और इसके अनुकूल व्यवहार, (इन्द्रियं
च) शान्त, धर्मयुक्त अन्तःकरण और शुद्धात्मा तथा जितेन्द्रियता,
(श्रीश्च) लक्ष्मी, सम्पत्ति और इसकी प्राप्ति का धर्मयुक्त उद्योग,

गृहाश्रमप्रकरणम् १९९
(धर्मश्च) पक्षपातरहित न्यायाचरण, वेदोक्त धर्म और जो इसके
साधन वा लक्षण हैं, उन्हें प्राप्त होके इन्हीं में सदा वर्त्ता
करो॥ २४॥
ब्रह्म॑ च क्ष॒त्रं च॒ राष्ट्रं च॒ विश॑श्च॒ त्विषि॑श्च॒ यश॑श्च॒
वर्च॑श्च॒ द्रवि॑णं च॥ २५॥
आयु॑श्च रू॒पं च॒ नाम॑ च॒ कीर्ति॑श्च॒ प्रा॒णश्चा॑पा॒नश्च॒
चक्षु॑श्च॒ श्रोत्रं॑ च॥ २६॥
पय॑श्च॒ रस॑श्चान्नं॒ चान्नाद्यं॑ च ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चे॒ष्टं च॑ पू॒र्तं
च॑ प्र॒जा च॑ प॒शव॑श्च॥ २७॥
—अथर्व० कां० १२। अ० ५। वर्ग १-२॥
अर्थ—हे गृहस्थादि मनुष्यो! तुमको योग्य है कि (ब्रह्म
च) पूर्ण विद्यादि शुभ गुणयुक्त मनुष्य और सबके उपकारक
शम-दमादि गुणयुक्त ब्रह्मकुल, (क्षत्रं च) विद्यादि उत्तम
गुणयुक्त तथा विनय और शौर्यादि गुणों से युक्त क्षत्रियकुल
(राष्ट्रं च) राज्य और उसका न्याय से पालन, (विशश्च) उत्तमे
प्रजा और उनकी उन्नति, (त्विषिश्च) सद्विद्यादि से तेज,
आरोग्य, शरीर और आत्मा के बल से प्रकाशमान और इसकी
उन्नति से (यशश्च) कीर्तियुक्त तथा इसके साधनों को प्राप्त
हुआ करो। (वर्चश्च) पढ़ी हुई विद्या का विचार और उसका
नित्य पढ़ना, (द्रविणं च) द्रव्योपार्जन, उसकी रक्षा और
धर्मयुक्त परोपकार में व्यय करने आदि कर्मों को सदा किया
करो॥ २५॥
हे स्त्री-पुरुषो! तुम अपना (आयुः) जीवन बढ़ाओ, (च)
और सब जीवन में धर्मयुक्त उत्तम कर्म ही किया करो। (रूपं
च) विषयासक्ति, कुपथ्य, रोग और अधर्माचरण को छोड़के
अपने स्वरूप को अच्छा रक्खो और वस्त्राभूषण भी धारण किया

२०० संस्कारविधिः
करो, (नाम च) नामकरण के पृष्ठ ७३-७६ में लिखे प्रमाणे
शास्त्रोक्त संज्ञाधारण और उसके नियमों को भी (कीर्तिश्च)
सत्याचरण से प्रशंसा का धारण और गुणों में दोषारोपणरूप
निन्दा को छोड़ दो। (प्राणश्च) चिरकालपर्यन्त जीवन का धारण
और उसके युक्ताहार-विहारादि साधन, (अपानश्च) सब दुःख
दूर करने का उपाय और उसकी सामग्री, (चक्षुश्च) प्रत्यक्ष
और अनुमान, उपमान, (श्रोत्रं च) शब्दप्रमाण और उसकी
सामग्री को धारण किया करो ॥ २६ ॥
हे गृहस्थ लोगो ! (पयश्च) उत्तम जल, दूध और इसका
शोधन और युक्ति से सेवन, (रसश्च) घृत, दूध, मधु आदि
और इसका युक्ति से आहार-विहार, (अन्नं च) उत्तम चावल
आदि अन्न और उसके उत्तम संस्कार किये (अन्नाद्यं च) खाने
के योग्य पदार्थ और उसके साथ उत्तम दाल, शाक, कढ़ी आदि,
(ऋतं च) सत्य मानना और सत्य मनवाना, (सत्यं च) सत्य
बोलना और बुलवाना (इष्टं च) यज्ञ करना और कराना, (पूर्त्तं
च) यज्ञ की सामग्री पूरी करना तथा जलाशय और आराम-
वाटिका आदि का बनाना और बनवाना, (प्रजा च) प्रजा की
उत्पत्ति, पालन और उन्नति सदा करनी तथा करानी, (पशवश्च)
गाय आदि पशुओं का पालन और उन्नति सदा करनी तथा करानी
चाहिए ॥ २७ ॥
कु॒र्वन्ने॒वेह कर्मा॑णि जिजीवि॒षेच्छ॒तँ समा॑:।
ए॒वं त्वयि॒ नान्यथेतो॑ऽस्ति॒ न कर्म॑ लिप्यते॒ नरे॑ ॥ १ ॥
—य० अ० ४० । मन्त्र २ ॥
अर्थ—मैं परमात्मा सब मनुष्यों के लिए आज्ञा देता हूँ
कि सब मनुष्य (इह) इस संसार में शरीर से समर्थ होके
(कर्माणि) सत्कर्मों को (कुर्वन्नेव) करता-ही-करता (शतं
समा:) सौ वर्षपर्यन्त (जिजीविषेत्) जीने की इच्छा करे,
आलसी और प्रमादी कभी न होवे। (एवम्) इसी प्रकार उत्तम

गृहाश्रमप्रकरणम् २०१
कर्म करते हुए (त्वयि) तुझ (नरे) मनुष्य में (इतः) इस हेतु
से (अन्यथा) उलटा पापरूप (कर्म) दुःखद कर्म (न लिप्यते)
लिप्यमान कभी नहीं होता और तुम पापरूप कर्म में लिप्त कभी
मत होओ। इस उत्तम कर्म से कुछ भी दुःख (नास्ति) नहीं
होता, इसलिए तुम स्त्री-पुरुष सदा पुरुषार्थी होकर उत्तम कर्मों
से अपनी और दूसरों की सदा उन्नति किया करो ॥१॥
पुनः स्त्री-पुरुष सदा निम्नलिखित मन्त्रों के अनुकूल इच्छा
और आचरण किया करें। वे मन्त्र ये हैं—
भूर्भुव॒: स्वः॑ सु॒प्रजाः॑ प्र॒जाभि॑: स्याथ्ꣳ सु॒वीरो॑ वी॒रैः
सु॒पोषः॑ पोषैः॑। नर्य॑ प्र॒जां मे॑ पाहि शꣳस्य॑ प॒शून् मे॑
पा॒ह्यथ॑र्य पि॒तुं मे॑ पाहि॥२॥
गृहा॒ मा बि॑भीत॒ मा वे॑पध्व॒मूर्जं॒ बिभ्र॑त॒ऽएम॑सि।
ऊर्जं॒ बिभ्र॑द्वः सु॒मनाः॑ सु॒मेधा गृ॒हानैमि॒ मन॑सा मोद॑मानः ॥ ३ ॥
—यजु० अ० ३। मन्त्र ३७, ४१ ॥
अर्थ—हे स्त्री वा पुरुष ! मैं तेरे वा अपने के सम्बन्ध से
(भूर्भुवः स्वः) शारीरिक, वाचिक और मानस, अर्थात् त्रिविध
सुख से युक्त होके (प्रजाभिः) मनुष्यादि उत्तम प्रजाओं के
साथ (सुप्रजाः) उत्तम प्रजायुक्त (स्याम्) होऊँ। (वीरैः) उत्तम
पुत्र, बन्धु, सम्बन्धी और भृत्यों से सह वर्त्तमान (सुवीरः)
उत्तम वीरों से सहित होऊँ। (पोषैः) उत्तम पुष्टिकारक व्यवहारों
से (सुपोषः) उत्तम पुष्टियुक्त होऊँ। हे (नर्य) मनुष्यों में सज्जन
वीर स्वामिन्! (मे) मेरी (प्रजाम्) प्रजा की (पाहि) रक्षा
कीजिए। हे (शंस्य) प्रशंसा करने योग्य स्वामिन्! आप (मे)
मेरे (पशून्) पशुओं की (पाहि) रक्षा कीजिए। हे (अथर्य)
अहिंसक, दयालो स्वामिन्! (मे) मेरे (पितुम्) अन्न आदि
की (पाहि) रक्षा कीजिए। वैसे हे नारी! प्रशंसनीय गुणयुक्त
तू मेरी प्रजा, मेरे पशु और मेरे अन्न की सदा रक्षा किया कर ॥२॥

२०२ संस्कारविधिः
हे (गृहाः) गृहस्थ लोगो ! तुम विधिपूर्वक गृहाश्रम में प्रवेश
करने से (मा बिभीत) मत डरो, (मा वेपध्वम्) मत कंपायमान
होओ। (ऊर्ज्जम्) अन्न, पराक्रम तथा विद्यादि शुभगुण से युक्त
होकर गृहाश्रम को (बिभ्रतः) धारण करते हुए तुम लोगों को
हम सत्योपदेशक विद्वान् लोग (एमसि) प्राप्त होते और सत्योपदेश
करते हैं और अन्न-पानाच्छादन, स्थान से तुम्हीं हमारा निर्वाह
करते हो, इसलिए तुम्हारा गृहाश्रम व्यवहार में निवास सर्वोत्कृष्ट
है। हे वरानने! जैसे मैं तेरा पति (मनसा) अन्तःकरण से
(मोदमानः) आनन्दित (सुमनाः) प्रसन्न मन (सुमेधाः) उत्तम
बुद्धि से युक्त तुझे और हे मेरे पूजनीयतम पिता आदि लोगो !
(वः) तुम्हारे लिए (ऊर्ज्जम्) पराक्रम तथा अन्नादि ऐश्वर्य को
(बिभ्रत्) धारण करता हुआ तुम (गृहान्) गृहस्थों को (आ
एमि) सब प्रकार से प्राप्त होता हूँ, उसी प्रकार तुम लोग भी
मुझसे प्रसन्न होके वर्त्त करो ॥ ३ ॥
येषा॑म॒ध्येति॑ प्र॒वस॒न् येषु॑ सौमन॒सो ब॒हुः ।
गृ॒हानुप॑ह्वयामहे ते नौ॑ जानन्तु जान॒तः ॥ ४ ॥
उप॑हूताऽ इ॒ह गाव॒ऽ उप॑हूता अ॒जाव॑यः ।
अथो॒ऽअन्न॑स्य की॒लाल॒ऽ उप॑हूतो गृ॒हेषु॑ नः।
क्षेमा॑य वः शान्त्यै॒ प्रप॑द्ये शि॒वः॒ शग्मः॒ शंयोः॒ शंयोः ॥ ५ ॥
—यजुः० अध्याय ३ । मं० ४२, ४३॥
अर्थ—हे गृहस्थो ! (प्रवसन्) परदेश को गया हुआ मनुष्य
(येषाम्) जिनका (अध्येति) स्मरण करता है, (येषु) जिन
गृहस्थों में (बहुः) बहुत (सौमनसः) प्रीति होती है, उन (गृहान्)
गृहस्थों की हम विद्वान् लोग (उपह्वयामहे) प्रशंसा करते और
उनको प्रीति से समीपस्थ बुलाते हैं। (ते) वे गृहस्थ लोग
(जानतः) उन्हें जाननेवाले (नः) हम लोगों को (जानन्तु) सुहृद्

गृहाश्रमप्रकरणम् २०३
जानें। वैसे तुम गृहस्थ और हम संन्यासी लोग आपस में मिलके
पुरुषार्थ से व्यवहार और परमार्थ की उन्नति सदा किया करें ॥४॥
हे गृहस्थो ! (नः) अपने (गृहेषु) घरों में जिस प्रकार
(गावः) गौ आदि उत्तम पशु (उपहूताः) समीपस्थ हों तथा
(अजावयः) बकरी, भेड़ आदि दूध देनेवाले पशु (उपहूताः)
समीपस्थ हों, (अथो) इसके अनन्तर (अन्नस्य) अन्नादि पदार्थों
के मध्य में उत्तम (कीलालः) अन्नादि पदार्थ (उपहूतः) प्राप्त
होवे, हम लोग वैसा प्रयत्न किया करें। हे गृहस्थो ! मैं उपदेशक
वा राजा (इह) इस गृहाश्रम में (वः) तुम्हारे (क्षेमाय) रक्षण
तथा (शान्त्यै) निरुपद्रवता करने के लिए (प्रपद्ये) प्राप्त होता
हूँ। मैं और आप लोग प्रीति से मिलके (शिवम्) कल्याण
(शग्मम्) व्यावहारिक सुख और (शंयोः शंयोः) पारमार्थिक
सुख को प्राप्त होके अन्य सब लोगों को सदा सुख दिया करें ॥५॥
सन्तुष्टो भार्यया भर्त्ता भर्त्रा भार्या तथैव च।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥ १ ॥
यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत्।
अप्रमोदात् पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्त्तते ॥ २ ॥
—मनु० ॥
अर्थ—हे गृहस्थो ! जिस कुल में भार्या से पति प्रसन्न और
पति से भार्या सदा प्रसन्न रहती है, उसी कुल में निश्चित कल्याण
होता है और दोनों परस्पर अप्रसन्न रहें तो उस कुल में नित्य
कलह वास करता है ॥ १ ॥
यदि स्त्री-पुरुष पर रुचि न रक्खे वा पुरुष को प्रहर्षित
न करे तो अप्रसन्नता से पुरुष के शरीर में कामोत्पत्ति कभी
न होके सन्तान नहीं होते और यदि होते हैं तो दुष्ट होते हैं ॥ २ ॥
स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद् रोचते कुलम्।
तस्यां त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते ॥ ३ ॥
—मनु० ॥

२०४ संस्कारविधिः
अर्थ—यदि पुरुष स्त्री को प्रसन्न नहीं करता, तो उस स्त्री
के अप्रसन्न रहने से सब कुलभर अप्रसन्न=शोकातुर रहता है
और जब पुरुष से स्त्री प्रसन्न रहती है, तब सब कुल आनन्दरूप
दीखता है॥३॥
पितृभिर्भ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवैस्तथा।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः ॥४॥
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥५॥
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्द्धते तद्धि सर्वदा ॥६॥
जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः।
तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ॥७॥
—मनु०॥
अर्थ—पिता, भ्राता, पति और देवर को योग्य है कि अपनी
कन्या, बहिन, स्त्री और भौजाई आदि स्त्रियों की सदा पूजा
करें, अर्थात् यथायोग्य मधुर भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण
आदि से उन्हें प्रसन्न रखें, जिन्हें कल्याण की इच्छा हो वे
स्त्रियों को क्लेश कभी न देवें ॥४॥
जिस कुल में नारियों की पूजा, अर्थात् सत्कार होता है,
उस कुल में दिव्य गुण, दिव्य भोग और उत्तम सन्तान होते
हैं और जिस कुल में स्त्रियों की पूजा नहीं होती, वहाँ जानों
उनकी सब क्रिया निष्फल हैं॥५॥
जिस कुल में स्त्रियाँ अपने-अपने पुरुषों के वेश्यागमन
वा व्यभिचारादि दोषों से शोकातुर रहती हैं, वह कुल शीघ्र नाश
को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल में स्त्रियाँ पुरुषों के
उत्तमाचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता
है॥६॥
जिन कुल और घरों में अपूजित, अर्थात् सत्कार को न