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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 318 में से

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पृष्ठ 202

१९८ संस्कारविधिः
अर्थ— हे स्त्री-पुरुषो! मैं ईश्वर तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि
तुम सब गृहस्थ मनुष्य (श्रमेण) परिश्रम तथा (तपसा)
प्राणायाम से (सृष्टाः) संयुक्त, (ब्रह्मणा) वेदविद्या, परमात्मा
और धनादि से (वित्ते) भोगने योग्य धनादि के प्रयत्न में और
(ऋते) यथार्थ पक्षपातरहित न्यायरूप धर्म में (श्रिताः) चलनेवाले
सदा बने रहो ॥ २१ ॥
(सत्येन) सत्यभाषणादि कर्मों से (आवृताः) चारों ओर
से युक्त, (श्रिया) शोभा तथा लक्ष्मी से (प्रावृताः) युक्त,
(यशसा) कीर्ति और धन से (परीवृताः) सब ओर से संयुक्त
रहा करो ॥ २२ ॥
(स्वधया) अपने ही अन्नादि पदार्थ के धारण से (परिहिताः)
सबके हितकारी, (श्रद्धया) सत्य धारण में श्रद्धा से (पर्युढाः)
सब ओर से सबको सत्याचरण प्राप्त करानेवाले, (दीक्षया) नाना
प्रकार के ब्रह्मचर्य, सत्यभाषणादि व्रत धारण से (गुप्ताः)
सुरक्षित, (यज्ञे) विद्वानों के सत्कार, शिल्पविद्या और शुभ गुणों
के दान में (प्रतिष्ठिताः) प्रतिष्ठा को प्राप्त हुआ करो और इन्हीं
कर्मों से (निधनम् लोकः) इस मनुष्यलोक को प्राप्त होके
मृत्युपर्यन्त सदा आनन्द में रहो ॥ २३ ॥
ओज॑श्च॒ तेज॑श्च॒ सह॑श्च॒ बलं॑ च॒ वाक् चेन्द्रि॒यं च॒
श्रीश्च॒ धर्म॑श्च ॥ २४ ॥
अर्थ— हे मनुष्यो ! तुम जो (ओजः) पराक्रम (च) और
इसकी सामग्री, (तेजः) तेजस्वीपन (च) और इसकी सामग्री,
(सहः) स्तुति-निन्दा, हानि-लाभ तथा शोकादि का सहन (च)
और इसके साधन, (बलं च) बल और इसके साधन, (वाक्
च) सत्य, प्रिय वाणी और इसके अनुकूल व्यवहार, (इन्द्रियं
च) शान्त, धर्मयुक्त अन्तःकरण और शुद्धात्मा तथा जितेन्द्रियता,
(श्रीश्च) लक्ष्मी, सम्पत्ति और इसकी प्राप्ति का धर्मयुक्त उद्योग,