संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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हे (गृहाः) गृहस्थ लोगो ! तुम विधिपूर्वक गृहाश्रम में प्रवेश
करने से (मा बिभीत) मत डरो, (मा वेपध्वम्) मत कंपायमान
होओ। (ऊर्ज्जम्) अन्न, पराक्रम तथा विद्यादि शुभगुण से युक्त
होकर गृहाश्रम को (बिभ्रतः) धारण करते हुए तुम लोगों को
हम सत्योपदेशक विद्वान् लोग (एमसि) प्राप्त होते और सत्योपदेश
करते हैं और अन्न-पानाच्छादन, स्थान से तुम्हीं हमारा निर्वाह
करते हो, इसलिए तुम्हारा गृहाश्रम व्यवहार में निवास सर्वोत्कृष्ट
है। हे वरानने! जैसे मैं तेरा पति (मनसा) अन्तःकरण से
(मोदमानः) आनन्दित (सुमनाः) प्रसन्न मन (सुमेधाः) उत्तम
बुद्धि से युक्त तुझे और हे मेरे पूजनीयतम पिता आदि लोगो !
(वः) तुम्हारे लिए (ऊर्ज्जम्) पराक्रम तथा अन्नादि ऐश्वर्य को
(बिभ्रत्) धारण करता हुआ तुम (गृहान्) गृहस्थों को (आ
एमि) सब प्रकार से प्राप्त होता हूँ, उसी प्रकार तुम लोग भी
मुझसे प्रसन्न होके वर्त्त करो ॥ ३ ॥
येषा॑म॒ध्येति॑ प्र॒वस॒न् येषु॑ सौमन॒सो ब॒हुः ।
गृ॒हानुप॑ह्वयामहे ते नौ॑ जानन्तु जान॒तः ॥ ४ ॥
उप॑हूताऽ इ॒ह गाव॒ऽ उप॑हूता अ॒जाव॑यः ।
अथो॒ऽअन्न॑स्य की॒लाल॒ऽ उप॑हूतो गृ॒हेषु॑ नः।
क्षेमा॑य वः शान्त्यै॒ प्रप॑द्ये शि॒वः॒ शग्मः॒ शंयोः॒ शंयोः ॥ ५ ॥
—यजुः० अध्याय ३ । मं० ४२, ४३॥
अर्थ—हे गृहस्थो ! (प्रवसन्) परदेश को गया हुआ मनुष्य
(येषाम्) जिनका (अध्येति) स्मरण करता है, (येषु) जिन
गृहस्थों में (बहुः) बहुत (सौमनसः) प्रीति होती है, उन (गृहान्)
गृहस्थों की हम विद्वान् लोग (उपह्वयामहे) प्रशंसा करते और
उनको प्रीति से समीपस्थ बुलाते हैं। (ते) वे गृहस्थ लोग
(जानतः) उन्हें जाननेवाले (नः) हम लोगों को (जानन्तु) सुहृद्