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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 318 में से

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पृष्ठ 189

विवाहप्रकरणम् १८५
ओम् अ॒घोर॑चक्षुरप॑तिघ्न्येधि शि॒वा प॒शुभ्यः॑ सु॒मनाः॑
सु॒वर्चाः॑। वी॒रसू॒र्देवृ॑कामा स्यो॒ना शं नौ॑ भव द्वि॒पदे॒ शं
चतु॑ष्पदे॒ स्वाहा॑*॥ इदं सूर्यायै सावित्र्यै-इदन्न मम॥ २॥
ओम् इ॒मां त्वमि॑न्द्र मीढ्वः सु॒पु॒त्रां सु॒भगां॑ कृणु।
दशा॑स्यां पु॒त्राना धे॑हि पति॑मेकाद॒शं कृ॑धि स्वाहा॑**॥
इदं सूर्यायै सावित्र्यै-इदन्न मम॥ ३॥

  • इस मन्त्र का अर्थ पृष्ठ १५७ में लिखे प्रमाणे जानना॥ २॥
    ** ईश्वर पुरुष और स्त्री को आज्ञा देता है कि हे (मीढ्वः) वीर्यसेचन
    करनेहारे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त इस वधू के स्वामिन्! (त्वम्) तू
    (इमाम्) इस वधू को (सुपुत्राम्) उत्तम पुत्रयुक्त (सुभगाम्) सुन्दर
    सौभाग्य भोगवाली (कृणु) कर। (अस्याम्) इस वधू में (दश)
    दश (पुत्रान्) पुत्रों को (आ धेहि) उत्पन्न कर, अधिक नहीं। और
    हे स्त्री! तू भी अधिक कामना मत कर, किन्तु दश पुत्र और
    (एकादशम्) ग्यारहवें (पतिम्) पति को प्राप्त होकर सन्तोष
    (कृधि) कर। यदि इससे आगे सन्तानोत्पत्ति का लोभ करोगे तो
    तुम्हारे दुष्ट, अल्पायु, निर्बुद्धि सन्तान होंगे, और तुम भी अल्पायु,
    रोगग्रस्त हो जाओगे, इसलिए अधिक सन्तानोत्पत्ति न करना।
    तथा (पतिमेकादशं कृधि) इस पद का अर्थ नियोग में दूसरा होगा,
    अर्थात् जैसे पुरुष को विवाहित स्त्री में दश पुत्र उत्पन्न करने की
    आज्ञा परमात्मा ने की है, वैसी ही आज्ञा स्त्री को भी है कि दश
    पुत्र तक चाहे विवाहित पति से अथवा विधवा हुए पश्चात् नियोग
    से करे-करावे। वैसे ही एक स्त्री के लिए एक पति से एक बार
    विवाह और पुरुष के लिए भी एक स्त्री से एक ही बार विवाह
    करने की आज्ञा है। जैसे विधवा हुए पश्चात् स्त्री नियोग से
    सन्तानोत्पत्ति करके पुत्रवती होवे, वैसे पुरुष भी विगतस्त्री होवे
    तो नियोग से पुत्रवान् होवे॥ ३॥