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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 191

गृहाश्रमप्रकरणम् १८७
इस वाक्य को बोलके दोनों वधू-वर, वर की माता-पिता
आदि वृद्धों को प्रीतिपूर्वक नमस्कार करें।
पश्चात् सुभूषित होकर शुभासन पर बैठके पृष्ठ ३६-३७
में लिखे प्रमाणे वामदेव्यगान करके, उसी समय पृष्ठ ९-१२
में लिखे प्रमाणे ईश्वरोपासना करनी। उस समय कार्यार्थ आये·
हुए सब स्त्री-पुरुष ध्यानावस्थित होकर परमेश्वरं का ध्यान
करें।
तथा वधू-वर .पिता, आचार्य और पुरोहित आदि को कहें
कि—
ओं स्वस्ति भवन्तो ब्रुवन्तु॥
आप लोग स्वस्तिवाचन करें।
तत्पश्चात् पिता, आचार्य, पुरोहित जो विद्वान् हों, अथवा
उनके अभाव में यदि वधू-वर विद्वान्, वेदवित् हों, तो वे ही
दोनों पृ० १३-१७ में लिखे प्रमाणे स्वस्तिवाचन का पाठ बड़े
प्रेम से करें।
पाठ हुए पश्चात् कार्यार्थ आये हुए स्त्री-पुरुष सब—
ओं स्वस्ति ओं स्वस्ति ओं स्वस्ति॥
इस वाक्य को बोलें।
तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता, पिता, चाचा, भाई आदि पुरुषों को
तथा माता, चाची, भगिनी आदि स्त्रियों को यथावत् सत्कार
करके विदा करें।
तत्पश्चात् यदि किसी विशेष कारण से श्वशुरगृह में
गर्भाधान-संस्कार न हो सके, तो वधू-वर क्षार-आहार और
विषय-तृणारहित व्रतस्थ होके पृष्ठ ३८-५४ में लिखे प्रमाणे
विवाह के चौथे दिवस में गर्भाधान संस्कार करें। अथवा उस
दिन ऋतुकाल न हो, तो किसी दूसरे दिन गर्भस्थापन करें और
जो वर दूसरे देश से विवाह के लिए आया हो तो वह जहाँ