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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 318 में से

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पृष्ठ 195

गृहाश्रमप्रकरणम् १९१
गृहस्थ सम्बन्धियों के लिए (स्योना) सुखदायक (भव) हो
और (अस्यै) इस (सर्वस्यै) सब (विशे) प्रजा के अर्थ
(स्योना) सुखप्रद और (एषाम्) इनके (पुष्टाय) पोषण के अर्थ
तत्पर (भव) हो॥४॥
(याः) जो (दुर्हर्दः) दुष्ट हृदयवाली, अर्थात् दुष्टात्मा
(युवतयः) जवान स्त्रियाँ, (च) और (याः) जो (इह) इस
स्थान में (जरतीः) बुड्डी = वृद्ध स्त्रियाँ हों, वे (अपि) भी (अस्यै)
इस वधू को (नू) शीघ्र (वर्चः) तेज (सं दत्त) देवें। (अथ)
इसके पश्चात् (अस्तम्) अपने-अपने घर को (विपरेतन) चली
जावें और फिर इसके पास कभी न आवें॥५॥
हे वरानने ! तू (सुमनस्यमाना) प्रसन्नचित होकर (तल्पम्)
पर्यङ्क पर (आरोह) चढ़के शयन कर और (इह) इस गृहाश्रम
में स्थिर रहकर (अस्मै) इस (पत्ये) पति के लिए (प्रजां जनय)
प्रजा को उत्पन्न कर। (सुबुधा) सुन्दर ज्ञानी (बुध्यमाना) उत्तम
शिक्षा को प्राप्त (इन्द्राणीव) सूर्य की कान्ति के समान तू
(उषसः) उषःकाल से (अग्रा) पहली (ज्योतिः) ज्योति के
तुल्य (प्रति जागरासि) प्रत्यक्ष सब कामों में जागती रह॥६॥
दे॒वा अग्रे॒ न्य॑पिद्यन्त॒ पत्नीः॒ सम॑स्पृशन्त त॒न्व॑स्त॒नूभिः॑।
सूर्यै॑व नारि वि॒श्वरू॑पा महि॒त्वा प्र॒जाव॑ती॒ पत्या॒ सं भ॑वेह॥७॥
सं पि॑तरावृ॒त्विये॑ सृजेथां मा॒ता पि॒ता च॒ रेत॑सो भवाथः।
मर्य॑ इव यो॒षामधि॑ रोहयैनां प्र॒जां कृ॑ण्वाथामि॒ह पु॑ष्यतं॒ रयिम्॥८॥
तां पू॑षञ्छि॒वत॑मा॒मेर॑यस्व॒ यस्यां॑ बी॒जं मनु॒ष्या॑३ वप॑न्ति।
या न॑ ऊ॒रू उ॑श॒ती वि॒श्रया॑ति॒ यस्या॑मुश॒न्तः प्र॒हरे॑म॒ शेपः॑॥९॥
अर्थ—हे सौभाग्यप्रदे (नारि) नारी ! तू जैसे (इह) इस