समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
अध्याय - ३
कर्मबन्ध के चार कारण -
अण्णाणस्स दु उदओ जा जीवाणं अतच्चउवलद्धी।
मिच्छत्तस्स दु उदओ जीवस्स असद्दहाणत्तं॥ (3-64-132)
उदओ असंजमस्स दु जं जीवाणं हवेदि अविरमणं।
जो दु कलुसोवओगो जीवाणं सो कसायउदओ॥ (3-65-133)
तं जाण जोगउदयं जो जीवाणं तु चिट्ठउच्छाहो।
सोहणमसोहणं वा कादव्वो विरदिभावो वा॥ (3-66-134)
जीवों के जो विपरीत ज्ञान (वस्तु-स्वरूप का अयथार्थ ज्ञान) है, वह तो अज्ञान का
उदय है; तथा जीव के जो तत्त्व का अश्रद्धान है, वह मिथ्यात्व का उदय है; और
जीवों के जो अत्यागभाव (विषयों से विरत न होना) है, वह असंयम का उदय है;
और जीवों के जो मलिन उपयोग (क्रोधादि कषाय रूप उपयोग) है, वह कषाय का
उदय है; तथा जीवों के जो शुभरूप या अशुभरूप, प्रवृत्तीरूप अथवा निवृत्तीरूप
मन, वचन, काय के व्यापार में उत्साह है, उसे योग का उदय जानो।
Know that erroneous knowledge (of the nature of substances) in
the Self is the rise of nescience (ajñāna); flawed conviction (in
soul and non-soul substances) is the rise of wrong belief
(mithyātva), tendency not to abstain from sensual pleasures is
the rise of non-restraint (asaṃyama), indulgence in perverted
passions (like anger etc.) is the rise of passions (kaṣāya), and
threefold activities (of the body, the organ of speech and the
mind), whether meritorious or wicked, involved or uninvolved,
is the rise of yoga.
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अध्याय - 3
द्रव्यकर्म और भावकर्म का निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध -
एदेसु हेतुभूदेसु कम्मइयवग्गणागदं जं तु।
परिणमदे अट्ठविहं णाणावरणादि-भावेहिं॥ (3-67-135)
तं खलु जीवणिबद्धं कम्मइयवग्गणागदं जइया।
तइया दु होदि हेदू जीवो परिणामभावाणं॥ (3-68-136)
इन मिथ्यात्व आदि उदयों के हेतुभूत होने पर कार्मण वर्गणाओं के रूप में आया हुआ
जो पुद्गल द्रव्य है, वह ज्ञानावरण आदि द्रव्य कर्म के रूप में आठ प्रकार परिणमन
करता है। वह कार्मणवर्गणागत पुद्गल द्रव्य जब वास्तव में जीव के साथ बँधता है,
उस काल में जीव अपने अज्ञानमय परिणामरूप भावों का कारण होता है।
As a consequence of the rise of wrong belief (mithyātva) etc., the
material substance that comes in the form of primary karmic
matter gets modified into eight kinds of karmic matter like the
knowledge-obscuring karma. The time when this primary
karmic matter gets attached to the soul, during that period, the
Self is the causal agent of his own ignorant dispositions.
जीव का परिणाम पुद्गल द्रव्य से भिन्न है -
जीवस्स दु कम्मेण य सह परिणामा दु होंति रागादी।
एवं जीवो कम्मं च दो वि रागादिमावण्णा॥ (3-69-137)
एक्कस्स दु परिणामो जायदि जीवस्स रागमादीहिं।
ता कम्मोदयहेदूहि विणा जीवस्स परिणामो॥ (3-70-138)
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अध्याय - 3
यदि जीव के पुद्गल कर्म के साथ ही रागादि परिणाम होते हैं, ऐसा मानें तो जीव
और कर्म दोनों ही रागादि भाव को प्राप्त हो जाएँ; किन्तु रागादि अज्ञान परिणाम एक
जीव के ही होता है, इसलिए कर्म के उदयरूप निमित्तकारण से पृथक् ही जीव का
परिणाम है।
पुद्गल द्रव्य का परिणाम जीव से भिन्न है -
जदि जीवेण सहच्चिय पोग्गलदव्वस्स कम्मपरिणामो।
एवं पोग्गलजीवा हु दो वि कम्मत्तमावण्णा॥ (3-71-139)
एक्कस्स दु परिणामो पोग्गलदव्वस्स कम्मभावेण।
ता जीवभावहेदूहि विणा कम्मस्स परिणामो॥ (3-72-140)
यदि जीव के साथ ही पुद्गल द्रव्य का कर्मरूप परिणाम होता है, इस प्रकार माना
जाए तो पुद्गल और जीव दोनों ही कर्मत्व को प्राप्त हो जाएँगे; किन्तु कर्मभाव से
परिणाम एक पुद्गल द्रव्य का ही होता है; इसलिए जीव के रागादि अज्ञान
परिणामरूप निमित्त कारण से पृथक ही पुद्गल द्रव्य कर्म का परिणाम है।
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अध्याय - 3
to assume the status of karma. But only the physical matter
assumes modification as a result of karmic disposition and,
therefore, this modification in physical matter is distinct from
the psychic modes, like attachment and nescience, of the
connecting agent, the Self.
जीव के साथ कर्मों का सम्बन्ध -
जीवे कम्मं बद्धं पुट्ठं चेदि ववहारणयभणिदं।
सुद्धणयस्स दु जीवे अबद्धपुट्ठं हवदि कम्मं॥ (3-73-141)
जीव में कर्म (उसके प्रदेशों के साथ) बँधा हुआ है और उसे स्पर्श करता है, यह
व्यवहार नय का कथन है और जीव में कर्म अबद्ध और अस्पृष्ट है, यह निश्चयनय
का कथन है।
The statement that the space-points of karmic molecules
pervade the space-points of the soul, or that they touch the soul,
has been made from the empirical point of view (vyavahāra
naya). From the transcendental point of view (niścaya naya),
the soul neither gets bonded with nor touched by the karmic
matter.
समयसार नयपक्षों से रहित है -
कम्मं बद्धमबद्धं जीवे एदं तु जाण णयपक्खं।
णयपक्खातिक्कंतो भण्णदि जो सो समयसारो॥ (3-74-142)
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अध्याय - 3
जीव में कर्म बँधा है अथवा नहीं बँधा है, यह तो नयपक्ष जानो (इस प्रकार का कोई
भी विकल्प नयपक्ष है, ऐसा जानो) और जो नयपक्ष से अतिक्रान्त (किसी भी
नयपक्ष के विकल्प से रहित) कहलाता है, वह समय-सार (निर्विकल्प शुद्ध
आत्मतत्त्व) है।
Thus, assertions that the soul gets bonded with the karmic
matter, or that it does not get bonded with the karmic matter, are
made from different points of view. But that which is
independent of various points of view is the ultimate truth, the
samayasāra, pure and absolute consciousness.
पक्षातिक्रान्त का स्वरूप -
दोण्ह वि णयाण भणिदं जाणदि णवरिं तु समयपडिबद्धो।
ण दु णयपक्खं गिण्हदि किंचि वि णयपक्खपरिहीणो॥
(3-75-143)
(श्रुतज्ञानी आत्मा) दोनों ही नयों के कथन को केवलमात्र जानता है। वह (सहज
परमानन्दैक स्वभाव) आत्मा का अनुभव करता हुआ और समस्त नयपक्ष के
विकल्पों से रहित हुआ किसी भी नयपक्ष को किंचिन्मात्र भी ग्रहण नहीं करता
(आत्मानुभाव के समय नयों के विकल्प दूर हो जाते हैं)।
The Self who knows the scriptures, only apprehends the states
depicted by both the viewpoints. Experiencing the innate
supreme bliss of the Self, and abjuring all viewpoints, he does not
absorb even an iota of any viewpoint (Self-realization is free
from all expressions of viewpoints).
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अध्याय - 3
समयसार ज्ञानदर्शन स्वरूप है -
सम्मद्दंसणणाणं एसो लहदि त्ति णवरि ववदेसं।
सव्वणयपक्खरहिदो भणिदो जो सो समयसारो॥
(3-76-144)
जो समस्त नयपक्ष से रहित कहा है, वह समयसार है। यह समयसार ही केवल
सम्यग्दर्शनज्ञान इस नाम को पाता है। (समयसार ही सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान है।)
That which is free from all viewpoints is the samayasāra. Only
this samayasāra is characterized by right faith and right
knowledge (samayasāra itself is right faith and right
knowledge).
इदि त्तिदियो कत्तिकम्माधियारो समत्तो
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अध्याय - 4
चउत्थो पुण्णपावाधियारो
MERIT AND DEMERIT
शुभ कर्म भी संसार का कारण है -
कम्ममसुहं कुसीलं सुहकम्मं चावि जाणह सुसीलं।
किह तं होदि सुसीलं जं संसारं पवेसेदि॥ (4-1-145)
अशुभ कर्म कुशील (बुरा) है और शुभ कर्म सुशील (अच्छा) है, ऐसा तुम जानते
हो; किन्तु जो कर्म जीव को संसार में प्रवेश कराता है, वह किस प्रकार सुशील
(अच्छा) हो सकता है?
You know that wicked karma is undesirable, and virtuous karma
is desirable. But how can the karma, which leads the jīva into the
cycle of births and deaths (saṃsāra), be considered desirable?
शुभाशुभ कर्मबन्ध के कारण हैं -
सोवण्णियं पि णियलं बंधदि कालायसं पि जह पुरिसं।
बंधदि एवं जीवं सुहमसुहं वा कदं कम्मं॥ (4-2-146)
जैसे सोने की बेड़ी भी पुरुष को बाँधती है और लोहे की बेड़ी भी बाँधती है। इसी
प्रकार शुभ या अशुभ किया हुआ कर्म जीव को बाँधता है (दोनों ही बन्धनरूप हैं)।
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अध्याय - 4
शुभाशुभ दोनों त्याज्य हैं -
तम्हा दु कुसीलेहि य रागं मा काहि मा व संसग्गिं।
साधीणो हि विणासो कुसील-संसग्गि-रागेण।। (4-3-147)
इसलिए शुभ और अशुभ इन दोनों कुशीलों के साथ राग मत करो तथा संसर्ग भी मत
करो, क्योंकि कुशील के साथ संसर्ग और राग करने से स्वाधीन सुख का विनाश
होता है।
पूर्वोक्त का स्पष्टीकरण -
जह णाम को वि पुरिसो कुच्छियसीलं जणं वियाणित्ता।
वज्जेदि तेण समयं संसग्गिं रागकरणं च॥ (4-4-148)
एमेव कम्मपयडी सीलसहावं हि कुच्छिदं णादुं।
वज्जंति परिहरंति य तं संसग्गिं सहावरदा॥ (4-5-149)
अध्याय - 4
जैसे कोई पुरुष कुत्सित स्वभाव वाले पुरुष को जानकर उसके साथ संसर्ग और राग
करना छोड़ देता है, इसी प्रकार स्वभाव में रत ज्ञानी जीव कर्म-प्रकृति के
शील-स्वभाव को कुत्सित जानकर निश्चय ही उसके साथ संसर्ग को छोड़ देते हैं
और (राग को) छोड़ देते हैं।
Just like a man, on becoming aware of the evil nature of
someone, severs any association with or attachment for him, in
the same way, a knowledgeable person, engaged in the innate
nature of the Self, severs any association with or attachment for
even the virtuous karmas, as he knows these to be of evil nature.
हे भव्य! तू कर्मों में राग मत कर -
रत्तो बंधदि कम्मं मुंचदि जीवो विरागसंपण्णो।
एसो जिणोवदेसो तम्हा कम्मेसु मा रज्ज॥ (4-6-150)
रागी जीव कर्मों को बाँधता है और विरागी जीव कर्मों से छूटता है, यह जिनेन्द्र
भगवान का उपदेश है, इसलिए (हे भव्य जीव!) तू कर्मों में राग मत कर!
The Self with the attribute of attachment suffers bondage of
karmas, and the one with the attribute of non-attachment
(detachment) sheds his karmas. This has been declared by the
Omniscient Lord and, therefore, (O bhavya - potential aspirant
to liberation!) do not have any attachment for the karmas.
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४. पुण्य-पाप अधिकार (द्वैत मुक्ति निरूपण)
अध्याय - 4
ज्ञान निर्वाण का कारण है -
परमट्ठो खलु समओ सुद्धो जो केवली मुणी णाणी।
तम्हि ट्ठिदा सहावे मुणिणो पावंति णिव्वाणं॥ (4-7-151)
निश्चय से जो परमार्थ (आत्मा) है, वह समय (शुद्ध गुण-पर्यायों में परिणमन करने
वाला) है, शुद्ध (समस्त नयपक्षों से रहित एक ज्ञानस्वरूप होने से शुद्ध) है, केवली
(केवल चिन्मात्र वस्तुस्वरूप होने से केवली) है, मुनि (केवल मननमात्र भावस्वरूप
होने से मुनि) है, ज्ञानी (स्वयं ही ज्ञानस्वरूप होने से ज्ञानी) है। उस परमात्मस्वभाव
में स्थित मुनिजन निर्वाण को प्राप्त करते हैं।
Undoubtedly, the divine state of the soul is absolute
consciousness (samaya), pure (free from all viewpoints, only
knowledge consciousness), omniscient (having attained its
innate attributes), ascetic (absorbed only in the Self), and the
knower (being knowledge by itself). The ascetics who position
themselves in this divine state of the soul attain liberation
(nirvāṇa).
अज्ञानी का व्रत, तप निष्फल है -
परमट्ठम्मि दु अट्ठिदो जो कुणदि तवं वदं च धारयदि।
तं सव्वं बालतवं बालवदं विंति सव्वण्हू॥ (4-8-152)
जो परमार्थ में तो स्थित नहीं है, किन्तु तप करता है और व्रत धारण करता है, उसके
उस समस्त तप और व्रत को सर्वज्ञदेव बालतप और बालव्रत कहते हैं।
Anyone who has not positioned himself in the divine state of the
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अध्याय - 4
अज्ञानी को निर्वाण नहीं है -
वदणियमाणि धरंता सीलाणि तहा तवं च कुव्वंता।
परमट्ठबाहिरा जे णिव्वाणं ते ण विंदंति॥ (4-9-153)
व्रत और नियमों को धारण करते हुए तथा शील और तप करते हुए भी जो परमार्थ से
बाह्य हैं (जिन्हें परमार्थभूत ज्ञानस्वरूप आत्मा की अनुभूति नहीं है), वे निर्वाण को
प्राप्त नहीं करते।
पुण्य संसार का कारण है -
परमट्ठबाहिरा जे ते अण्णाणेण पुण्णमिच्छंति।
संसारगमणहेदुं वि मॉक्खहेदु अयाणंता॥ (4-10-154)
जो परमार्थ से बाह्य हैं (शुद्ध आत्मस्वरूप का जिन्हें अनुभव नहीं है), वे मोक्ष के
हेतु को न जानते हुए अज्ञान से संसार-गमन के भी कारण पुण्य को चाहते हैं।
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अध्याय - 4
Those who are not anchored to the divine state of the soul (not
living through pure consciousness), since they are not aware of
the path to liberation, out of ignorance, they desire virtue
(puṇya) which is the cause of the cycle of births and deaths
(saṁsāra).
मोक्षमार्ग -
जीवादीसद्दहणं सम्मत्तं तेसिमधिगमो णाणं।
रागादीपरिहरणं चरणं एसो दु मॉक्खपहो॥ (4-11-155)
जीवादिक नौ पदार्थों का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है। उन्हीं पदार्थों का संशय,
विमोह और विभ्रम से रहित ज्ञान सम्यग्ज्ञान है। रागादिक का परित्याग सम्यक्चारित्र
है। यही मोक्ष का मार्ग है।
Belief in the nine substances as they are is right faith
(samyagdarṣana). Knowledge of these substances without
doubt, delusion or misapprehension, is right knowledge
(samyagjñāna). Being free from attachment etc. is right conduct
(samyakchāritra). These three, together, constitute the path to
liberation.
यति कर्मों का क्षय करता है -
मॉत्तूण णिच्छयट्ठं ववहारेण विदुसा पवट्टंति।
परमट्ठमस्सिदाण दु जदीण कम्मक्खओ होदि॥ (4-12-156)
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अध्याय - 4
निश्चयनय के विषय को छोड़कर विद्वान व्यवहार के द्वारा प्रवृत्ति करते हैं; किन्तु
निज शुद्धात्मभूत परमार्थ के आश्रित यतियों के ही कर्मों का क्षय होता है।
Leaving aside the ultimate point of view, wise ones take on the
empirical way, but the destruction of karmas takes place only to
those ascetics who embrace the pure, ultimate nature of the Real
Self.
रत्नत्रय की मलिनता के कारण -
वत्थस्स सेदभावो जह णासदि मलविमेलणोच्छण्णो।
मिच्छत्तमलोच्छण्णं तह सम्मत्तं खु णादव्वं॥ (4-13-157)
वत्थस्स सेदभावो जह णासदि मलविमेलणोच्छण्णो।
अण्णाणमलोच्छण्णं तह णाणं होदि णादव्वं॥ (4-14-158)
वत्थस्स सेदभावो जह णासदि मलविमेलणोच्छण्णो।
कस्सायमलोच्छण्णं तह चारित्तं पि णादव्वं॥ (4-15-159)
जैसे मैल से व्याप्त हुआ वस्त्र का श्वेतभाव नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार
मिथ्यात्वरूपी मैल से व्याप्त सम्यक्त्व निश्चय ही तिरोहित हो जाता है; ऐसा जानना
चाहिये।
जिस प्रकार मैल से व्याप्त हुआ वस्त्र का श्वेतभाव नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार
अज्ञानरूपी मैल से व्याप्त ज्ञान तिरोहित हो जाता है; ऐसा जानना चाहिये।
जिस प्रकार मैल से व्याप्त हुआ वस्त्र का श्वेतभाव नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार
कषाय से व्याप्त हुआ चारित्र तिरोहित हो जाता है; ऐसा जानना चाहिये।
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अध्याय - 4
Just as whiteness of linen gets destroyed when it is soiled with
dirt, know that, in the same way, right faith gets destroyed when
soiled with wrong belief.
Just as whiteness of linen gets destroyed when it is soiled with
dirt, know that, in the same way, right knowledge gets destroyed
when soiled with nescience.
Just as whiteness of linen gets destroyed when it is soiled with
dirt, know that, in the same way, right conduct gets destroyed
when soiled with passions.
कर्म स्वयं ही बन्धस्वरूप है -
सो सव्वणाणदरिसी कम्मरयेण णिेएणावच्छण्णो।
संसारसमावण्णो ण विजाणदि सव्वदो सव्वं॥ (4-16-160)
वह आत्मा (स्वभाव से) सर्वज्ञ और सर्वदर्शी है। (फिर भी वह) अपने कर्मरूपी
रज से आच्छादित है (अतः वह) संसार को प्राप्त हुआ है। वह समस्त पदार्थों को
सब प्रकार से नहीं जानता।
The Self, by his own nature, is all-knowing and all-perceiving.
Still, being covered with the dirt of karmas, he is in the worldly
state of births and deaths (saṃsāra) and does not know all the
substances and their various modes.
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अध्याय - 4
रत्नत्रय के प्रतिबन्धक कारण -
सम्मत्तपडिणिबद्धं मिच्छत्तं जिणवरेहिं परिकहिदं।
तस्सोदयेण जीवो मिच्छादिट्ठि त्ति णादव्वो॥ (4-17-161)
णाणस्स पडिणिबद्धं अण्णाणं जिणवरेहिं परिकहिदं।
तस्सोदयेण जीवो अण्णाणी होदि णादव्वो॥ (4-18-162)
चारित्तपडिणिबद्धं कसायमिदि जिणवरेहिं परिकहिदं।
तस्सोदयेण जीवो अचरित्तो होदि णादव्वो॥ (4-19-163)
सम्यक्त्व का प्रतिबन्धक (रोकने वाला) मिथ्यात्व है, यह जिनेन्द्रदेव ने कहा है।
उसके उदय से जीव मिथ्यादृष्टि होता है, ऐसा जानना चाहिये।
ज्ञान का प्रतिबन्धक (रोकने वाला) अज्ञान है, यह जिनेन्द्रदेव ने कहा है। उसके
उदय से जीव अज्ञानी होता है, ऐसा जानना चाहिये।
चारित्र का प्रतिबन्धक (रोकने वाला) कषाय है, ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा है। उसके
उदय से जीव चारित्ररहित होता है, ऐसा जानना चाहिये।
इदि चउत्थो पुण्णपावाधियारो समत्तो
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अध्याय - 5
पंचमो आसवाधियारो
INFLUX OF KARMAS
दो प्रकार के आस्रव -
मिच्छत्तं अविरमणं कसायजोगा सण्णसण्णा दु।
बहुविहभेदा जीवे तस्सेव अणण्णपरिणामा॥ (5-1-164)
णाणावरणादीयस्स ते दु कम्मस्स कारणं होंति।
तेसिं पि होदि जीवो रागद्दोसादिभावकरो॥ (5-2-165)
मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग (भावप्रत्यय और द्रव्यप्रत्यय के रूप में) चेतन
और अचेतन दो प्रकार के होते हैं। (जो चेतन के विकार हैं वे) जीव में अनेक प्रकार
के भेद वाले हैं और वे जीव के ही अनन्य परिणाम हैं। जो मिथ्यात्व आदि पुद्गल के
विकार हैं, वे ज्ञानावरण आदि कर्मों के निमित्त हैं। उन मिथ्यात्व आदि अचेतन
विकारों का निमित्त राग-द्वेष आदि भावों का कर्त्ता जीव होता है।
Wrong belief (mithyātva), non-abstinence (avirati), passions
(kaṣāya), and actions of the body, the organ of speech and the
mind (yoga) are of two kinds – psychical (chetana) and material
(achetana). Psychical modifications are of various kinds and
they are modes exclusively of the Self. Material modifications,
like wrong belief, lead to karmas, like knowledge-obscuring
karma. The cause of material modifications, like wrong belief, is
the Self when he gets involved in psychic states like attachment
and aversion.
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अध्याय - 5
सम्यग्दृष्टि के आस्रवों का अभाव है -
णत्थि दु आसवबंधो सम्मादिट्ठिस्स आसवणिरोहो।
संते पुव्वणिबद्धे जाणदि सो ते अबंधंतो॥ (5-3-166)
सम्यग्दृष्टि के आस्रवनिमित्तक बन्ध नहीं है; किन्तु आस्रव का निरोध है। नवीन
कर्मों को न बाँधता हुआ वह सत्ता में विद्यमान पूर्व में बाँधे हुए कर्मों को जानता है।
The right believer has no bondage due to influx of karmas; the
influx is blocked. While free from bondage of new karmas, he is
aware of the still existing, past bondage of karmas.
रागद्वेष ही आस्रव है -
भावो रागादिजुदो जीवेण कदो दु बंधगो होदि।
रागादि-विप्पमुक्को अबंधगो जाणगो णवरि॥ (5-4-167)
जीव के द्वारा किया हुआ रागादियुक्त भाव तो नवीन कर्मों का बन्ध करने वाला होता
है और रागादि से रहित भाव बन्ध नहीं करता। वह मात्र ज्ञायक है।
Psychic modes, like attachment etc., of the Self result into
bondage of fresh karmas. However, the Self devoid of such
psychic modes is free from bondage; he is of the nature of the
knower.
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अध्याय - 5
निर्जरित कर्म का पुनः बन्ध नहीं -
पक्के फलम्मि पडिदे जह ण फलं बज्झदे पुणो विंटे।
जीवस्स कम्मभावे पडिदे ण पुणोदयमुवेदि॥ (5-5-168)
जैसे पके हुए फल के (वृक्ष से) गिरने पर वह फल पुनः डंठल में नहीं जुड़ता, उसी
प्रकार जीव के पुद्गल कर्मों की निर्जरा होने पर पुनः वे उदय को प्राप्त नहीं होते
(पुनः वे जीव के साथ नहीं बँधते)।
As the ripened fruit, once fallen (from tree), does not get re-
attached to the stalk, similarly, karmas (karmic matter), once
dissociated from the Self, do not come to fruition again (do not
again get bonded with the Self).
ज्ञानी के द्रव्यास्त्रव का अभाव है -
पुढवीपिंडसमाणा पुव्वणिबद्धा दु पच्चया तस्स।
कम्मसरीरेण दु ते बद्धा सव्वे वि णाणिस्स॥ (5-6-169)
उस ज्ञानी के पहले (अज्ञान अवस्था में) बँधे हुए सभी (मिथ्यात्वादि द्रव्य) प्रत्यय
तो पृथ्वी के ढेले के समान हैं (अकिंचित्कर हैं); और वे (अपने पुद्गलस्वभाव से)
कार्मण शरीर के साथ बँधे हुए हैं।
In the Self with right knowledge, all previously bonded karmas
(wrong belief etc., which got bonded when the Self was in the
state of nescience), are like a lump of earth (i.e., practically
inconsequential) and these (due to their physical nature),
remain incorporated with the karmic body (kārmaṇa śarīra).
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अध्याय - 5
ज्ञानगुण से कर्म-बन्ध -
चहुविह अणेयभेयं बंधंते णाणदंसणगुणेहिं।
समये समये जम्हा तेण अबंधो त्ति णाणी दु॥ (5-7-170)
क्योंकि (मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग) ये चार प्रकार के द्रव्यास्त्रव
ज्ञान-दर्शन गुणों के द्वारा प्रतिसमय अनेक प्रकार के कर्मों को बाँधते हैं, अतः ज्ञानी
तो अबन्ध ही है।
ज्ञानगुण कर्म-बन्ध का कारण क्यों है -
जम्हा दु जहण्णादो णाणगुणादो पुणो वि परिणमदि।
अण्णत्तं णाणगुणो तेण दु सो बंधगो भणिदो॥ (5-8-171)
क्योंकि ज्ञानगुण ज्ञानगुण के जघन्य भाव (क्षायोपशमिक ज्ञान) के कारण पुनः
अन्तर्मुहूर्त के पश्चात् अन्य रूप से परिणमन करता है, इसी कारण वह (ज्ञानगुण का
जघन्य भाव - यथाख्यात चारित्र की प्राप्ति से पूर्व तक) कर्म का बन्ध कराने वाला
कहा गया है।
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अध्याय - 5
one muhūrta*, in alternative modes, therefore, this cognitive
quality (from the level of destruction-cum-subsidence to the
level just before perfect conduct) has been said to be the cause of
bondage of karmas.
रत्नत्रय का जघन्य भाव कर्म-बन्ध का कारण है -
दंसणणाणचरित्तं जं परिणमदे जहण्णभावेण।
णाणी तेण दु बज्झदि पोग्गलकम्मेण विविहेण॥ (5-9-172)
दर्शन, ज्ञान और चारित्र जघन्य भाव से जो परिणमन करते हैं, उसके कारण ज्ञानी
जीव अनेक प्रकार के पुद्गल कर्मों से बन्ध को प्राप्त होता है।
The knowledgeable jīva, due to the modifications of knowledge,
faith, and conduct, in their lowest stage of disposition
(destruction-cum-subsidence), gets bondages of various kinds of
karmic matter.
सम्यग्दृष्टि के कर्मबन्ध नहीं होता -
सव्वे पुव्वणिबद्धा दु पच्चया संति सम्मदिट्ठिस्स।
उवओगप्पाओगं बंधंते कम्मभावेण॥ (5-10-173)
* muhūrta is a measure of time equal to 48 minutes.
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