समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
पृष्ठ 98, कुल 226 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - 5
निर्जरित कर्म का पुनः बन्ध नहीं -
पक्के फलम्मि पडिदे जह ण फलं बज्झदे पुणो विंटे।
जीवस्स कम्मभावे पडिदे ण पुणोदयमुवेदि॥ (5-5-168)
जैसे पके हुए फल के (वृक्ष से) गिरने पर वह फल पुनः डंठल में नहीं जुड़ता, उसी
प्रकार जीव के पुद्गल कर्मों की निर्जरा होने पर पुनः वे उदय को प्राप्त नहीं होते
(पुनः वे जीव के साथ नहीं बँधते)।
As the ripened fruit, once fallen (from tree), does not get re-
attached to the stalk, similarly, karmas (karmic matter), once
dissociated from the Self, do not come to fruition again (do not
again get bonded with the Self).
ज्ञानी के द्रव्यास्त्रव का अभाव है -
पुढवीपिंडसमाणा पुव्वणिबद्धा दु पच्चया तस्स।
कम्मसरीरेण दु ते बद्धा सव्वे वि णाणिस्स॥ (5-6-169)
उस ज्ञानी के पहले (अज्ञान अवस्था में) बँधे हुए सभी (मिथ्यात्वादि द्रव्य) प्रत्यय
तो पृथ्वी के ढेले के समान हैं (अकिंचित्कर हैं); और वे (अपने पुद्गलस्वभाव से)
कार्मण शरीर के साथ बँधे हुए हैं।
In the Self with right knowledge, all previously bonded karmas
(wrong belief etc., which got bonded when the Self was in the
state of nescience), are like a lump of earth (i.e., practically
inconsequential) and these (due to their physical nature),
remain incorporated with the karmic body (kārmaṇa śarīra).
81