समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - 4
ज्ञान निर्वाण का कारण है -
परमट्ठो खलु समओ सुद्धो जो केवली मुणी णाणी।
तम्हि ट्ठिदा सहावे मुणिणो पावंति णिव्वाणं॥ (4-7-151)
निश्चय से जो परमार्थ (आत्मा) है, वह समय (शुद्ध गुण-पर्यायों में परिणमन करने
वाला) है, शुद्ध (समस्त नयपक्षों से रहित एक ज्ञानस्वरूप होने से शुद्ध) है, केवली
(केवल चिन्मात्र वस्तुस्वरूप होने से केवली) है, मुनि (केवल मननमात्र भावस्वरूप
होने से मुनि) है, ज्ञानी (स्वयं ही ज्ञानस्वरूप होने से ज्ञानी) है। उस परमात्मस्वभाव
में स्थित मुनिजन निर्वाण को प्राप्त करते हैं।
Undoubtedly, the divine state of the soul is absolute
consciousness (samaya), pure (free from all viewpoints, only
knowledge consciousness), omniscient (having attained its
innate attributes), ascetic (absorbed only in the Self), and the
knower (being knowledge by itself). The ascetics who position
themselves in this divine state of the soul attain liberation
(nirvāṇa).
अज्ञानी का व्रत, तप निष्फल है -
परमट्ठम्मि दु अट्ठिदो जो कुणदि तवं वदं च धारयदि।
तं सव्वं बालतवं बालवदं विंति सव्वण्हू॥ (4-8-152)
जो परमार्थ में तो स्थित नहीं है, किन्तु तप करता है और व्रत धारण करता है, उसके
उस समस्त तप और व्रत को सर्वज्ञदेव बालतप और बालव्रत कहते हैं।
Anyone who has not positioned himself in the divine state of the
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