समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - 3
यदि जीव के पुद्गल कर्म के साथ ही रागादि परिणाम होते हैं, ऐसा मानें तो जीव
और कर्म दोनों ही रागादि भाव को प्राप्त हो जाएँ; किन्तु रागादि अज्ञान परिणाम एक
जीव के ही होता है, इसलिए कर्म के उदयरूप निमित्तकारण से पृथक् ही जीव का
परिणाम है।
पुद्गल द्रव्य का परिणाम जीव से भिन्न है -
जदि जीवेण सहच्चिय पोग्गलदव्वस्स कम्मपरिणामो।
एवं पोग्गलजीवा हु दो वि कम्मत्तमावण्णा॥ (3-71-139)
एक्कस्स दु परिणामो पोग्गलदव्वस्स कम्मभावेण।
ता जीवभावहेदूहि विणा कम्मस्स परिणामो॥ (3-72-140)
यदि जीव के साथ ही पुद्गल द्रव्य का कर्मरूप परिणाम होता है, इस प्रकार माना
जाए तो पुद्गल और जीव दोनों ही कर्मत्व को प्राप्त हो जाएँगे; किन्तु कर्मभाव से
परिणाम एक पुद्गल द्रव्य का ही होता है; इसलिए जीव के रागादि अज्ञान
परिणामरूप निमित्त कारण से पृथक ही पुद्गल द्रव्य कर्म का परिणाम है।
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