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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

अध्याय - 2
हैं, इस प्रकार केवली जिनेन्द्र भगवान ने कहा है। वे जीव हैं, ऐसा किस प्रकार कहा
जा सकता है।
The above mentioned affective states are all result of the
manifestation of karmic matter, so says the Omniscient Lord.
How can these be called the jīva or Pure Self?
आठों कर्म पुद्गलमय हैं -
अट्ठविहं पि य कम्मं सव्वं पोग्गलमयं जिणा विंति।
जस्स फलं तं वुच्चदि दुक्खं ति विपच्चमाणस्स॥ (2-7-45)
आठों प्रकार के समस्त कर्म पुद्गलमय हैं, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। पक कर उदय
में आने वाले जिस कर्म का फल प्रसिद्ध दुःख है, ऐसा कहा है।
As pronounced by the Omniscient Lord, all the eight kinds of
karmas are subtle material particles, and that the fruition of
these karmas results into suffering that everyone recognizes.
व्यवहार नय से रागादि भाव जीव हैं -
ववहारस्स दरीसणमुवदेसो वण्णिदो जिणवरेहिं।
जीवा एदे सव्वे अज्झवसाणादओ भावा॥ (2-8-46)
ये समस्त अध्यवसानादिक भाव जीव हैं ऐसा जिनेन्द्रदेवों ने जो उपदेश दिया है, वह
व्यवहार नय का कथन है।
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२. अजीव अधिकार (पुद्गल व जड़ द्रव्य भेद)

अध्याय - 2
It is only from the empirical point of view (vyavahāra naya) that
the Omniscient Lord has declared all these affective states to be
of the nature of the Self.
व्यवहार और निश्चय से जीव का कथन-
राया खु णिग्गदो त्ति य एसो बलसमुदयस्स आदेसो।
ववहारेण दु वुच्चदि तत्थैक्को णिग्गदो राया॥ (2-9-47)
एमेव य ववहारो अज्झवसाणादि अण्णभावाणं।
जीवो त्ति कदो सुत्ते तत्थैक्को णिच्छिदो जीवो॥ (2-10-48)
सेना के समूह को (निकलते देखकर) 'राजा ही निकला है' इस प्रकार का जो कथन
है, वह व्यवहार नय से किया जाता है। वास्तव में तो वहाँ एक ही राजा निकला है।
इसी प्रकार जीव से भिन्न अध्यवसानादि भाव जीव हैं, परमागम में यह व्यवहार किया
गया है (व्यवहार नय से कहा गया है), किन्तु निश्चय नय से उन रागादि परिणामों
में जीव तो एक ही है।
On seeing the royal entourage, if one says, “The king has come
out,” this statement is made from the empirical point of view
(vyavahāra naya). In reality, only one person in the whole
entourage is the king. In the same way, scriptures declare, from
the empirical point of view (vyavahāra naya), that these
affective states pertain to the Self, although they truly are
different from the Self. From the transcendental point of view
(niścaya naya), the Self is one, different from these passions
(attachment etc.).
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अध्याय - 2
परमार्थ जीव का स्वरूप -
अरसमरूवमगंधं अव्वत्तं चेदणागुणमसद्दं।
जाण अलिंगग्गहणं जीवमणिद्दिट्ठसंठाणं॥ (2-11-49)
जो रसरहित है, रूपरहित है, गंधरहित है, इन्द्रियों के अगोचर है, चेतना गुण से युक्त
है, शब्दरहित है, किसी चिह्न या इन्द्रिय द्वारा ग्रहण नहीं होता और जिसका आकार
बताया नहीं जा सकता, उसे जीव जानो।
वर्णादि भाव जीव के परिणाम नहीं हैं -
जीवस्स णत्थि वण्णो ण वि गंधो ण वि रसो ण वि य फासो।
ण वि रूवं ण सरीरं ण वि संठाणं ण संहणणं॥ (2-12-50)
जीवस्स णत्थि रागो ण वि दोसो णेव विज्जदे मोहो।
णो पच्चया ण कम्मं णोकम्मं चावि से णत्थि॥ (2-13-51)
जीवस्स णत्थि वग्गो ण वग्गणा णेव फड्डया केई।
णो अज्झप्पट्ठाणा णेव य अणुभागठाणा वा॥ (2-14-52)
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अध्याय - 2
जीवस्स णत्थि केई जोगट्ठाणा ण बंधठाणा वा।
णोव य उदयट्ठाणा ण मग्गणट्ठाणया केई॥ (2-15-53)
णो ठिदिबंधट्ठाणा जीवस्स ण संकिलेसठाणा वा।
णोव विसोहिट्ठाणा णो संजमलद्धिट्ठाणा वा॥ (2-16-54)
णोव य जीवट्ठाणा ण गुणट्ठाणा य अत्थि जीवस्स।
जेण दु एदे सव्वे पोग्गलदव्वस्स परिणामा॥ (2-17-55)
जीव के वर्ण नहीं है, गंध भी नहीं है, रस भी नहीं है, स्पर्श भी नहीं है, रूप भी नहीं
है, शरीर भी नहीं है, संस्थान (आकार) भी नहीं है, संहनन भी नहीं है। जीव के राग
नहीं है, द्वेष भी नहीं है, मोह भी नहीं हैं, आस्रव भी नहीं है, कर्म भी नहीं है, उसके
नोकर्म भी नहीं है। जीव के वर्ग नहीं है, वर्गणा नहीं है, कोई स्पर्धक भी नहीं है,
अध्यात्मस्थान भी नहीं है और अनुभागस्थान भी नहीं है। जीव के कोई योगस्थान
नहीं है, बंधस्थान भी नहीं है और उदयस्थान भी नहीं है, कोई मार्गणास्थान भी नहीं
है। जीव के स्थितिबंधस्थान भी नहीं है, संक्लेशस्थान भी नहीं है, विशुद्धिस्थान भी
नहीं है, संयमलब्धिस्थान भी नहीं है और जीवस्थान भी नहीं है और जीव के
गुणस्थान नहीं है, क्योंकि ये सब पुद्गल के परिणमन हैं।

अध्याय - 2
जीव का नयसापेक्ष स्वरूप -
ववहारेण दु एदे जीवस्स हवंति वण्णमादीया।
गुणठाणंता भावा ण दु केई णिच्छयणयस्स॥ (2-18-56)
ये वर्ण से लेकर गुणस्थानपर्यन्त भाव व्यवहार नय से जीव के होते हैं, परन्तु निश्चय
नय के मत में उनमें से कोई भी जीव के नहीं हैं।

अध्याय - 2
जीव का पुद्गल के साथ सम्बन्ध -
एदेहि य संबंधो जहेव खीरोदयं मुणेदव्वो।
ण य होंति तस्स ताणि दु उवओगगुणाधिगो जम्हा॥
(2-19-57)
इन वर्णादिक भावों के साथ जीव का सम्बन्ध दूध और जल के समान
(संयोग-सम्बन्ध) मननपूर्वक जानना चाहिये; और वे वर्णादिक भाव जीव के नहीं
हैं क्योंकि जीव उपयोगगुण से परिपूर्ण है।
The association of the soul with these attributes, like colour etc.,
must be understood as the mixing of milk with water. These
attributes are not part of the soul as the soul's characteristic is
consciousness.
जीव में वर्णादि का कथन व्यवहार नय से है -
पंथे मुस्संतं पस्सिदूण लोगा भणंति ववहारी।
मुस्सदि एसो पंथो ण य पंथो मुस्सदे कोई॥ (2-20-58)
तह जीवे कम्माणं णोकम्माणं च पस्सिदुं वण्णं।
जीवस्स एस वण्णो जिणेहि ववहारदो उत्तो॥ (2-21-59)
गंधरसफासरूवा देहो संठाणमाइया जे य।
सव्वे ववहारस्स य णिच्छयदण्हू ववदिसंति॥ (2-22-60)
मार्ग में किसी को लुटता हुआ देखकर व्यवहारी जन कहते हैं कि यह मार्ग लुटता है,
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अध्याय - 2
किन्तु कोई मार्ग नहीं लुटता (वस्तुतः पथिक लुटते हैं), इसी प्रकार जीव में कर्मों
और नोकर्मों का वर्ण देखकर जीव का यह वर्ण है, ऐसा जिनेन्द्रदेव ने व्यवहार से
कहा है। इसी प्रकार गंध, रस, स्पर्श, रूप, शरीर और जो संस्थान आदि जीव के हैं,
वे सब व्यवहार से निश्चयदर्शी कहते हैं।
संसारी जीवों के वर्णादि का सम्बन्ध -
तत्थ भवे जीवाणं संसारत्थाण होंति वण्णादी।
संसारपमुक्काणं णत्थि दु वण्णादओ केई॥ (2-23-61)
संसार अवस्था में संसारी जीवों के वर्णादि भाव होते हैं। संसार से मुक्त जीवों के तो
कोई वर्णादि नहीं हैं।
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अध्याय - 2
जीव और वर्णादि का तादात्म्य मानने में दोष -
जीवो चेव हि एदे सव्वे भाव त्ति मण्णसे जदि हि।
जीवस्साजीवस्स य णत्थि विसेसो दु दे कोई॥ (2-24-62)
जीव का वर्णादि से तादात्म्य सम्बन्ध मानने वालों को समझाते हुए कहते हैं- यदि तू
ऐसा मानता है कि ये समस्त भाव वास्तव में जीव ही हैं तो तेरे मत में जीव और
अजीव के मध्य कोई भेद नहीं रहता।
(Refuting those who assume that the soul and its colour etc. are
but the same, the Āchārya says –) If you maintain that all these
attributes really pertain to the soul itself, then, in your opinion,
there would be no difference, whatsoever, between the soul and
the non-soul.
पूर्वोक्त कथन का और स्पष्टीकरण -
अह संसारत्थाणं जीवाणं तुज्झ होंति वण्णादी।
तम्हा संसारत्था जीवा रूवित्तमावण्णा॥ (2-25-63)
एवं पोग्गलदव्वं जीवो तहलक्खणेण मूढमदी।
णिव्वाणमुवगदो वि य जीवत्तं पोग्गलो पत्तो॥ (2-26-64)
अथवा यदि तेरे मत में संसार में स्थित जीवों के वर्णादिक (तादात्म्य रूप से) होते हैं
तो इस कारण संसार में स्थित जीव रूपीपने को प्राप्त हो गये। इस प्रकार हे मूढ़मते!
रूपित्व लक्षण पुद्गल द्रव्य का होने से पुद्गल द्रव्य ही जीव कहलाया और (संसार
दशा में ही नहीं) निर्वाण प्राप्त होने पर भी पुद्गल ही जीवत्व को प्राप्त हो गया।
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अध्याय - 2
Or else, if you maintain that the colour etc. of worldly beings are
indistinguishable from the attributes of the souls, then these
souls will be assumed to be endowed with physical form. In this
way, O deluded person, a soul endowed with physical form will be
made up of physical matter and then, not only in its worldly
existence but also in its emancipated state, physical matter will
acquire the status of ajīva.
जीवस्थान जीव नहीं है -
ऍक्कं च दोण्णि तिण्णि य चत्तारि य पंचइंदिया जीवा।
बादरपज्जत्तिदरा पयडीओ णामकम्मस्स॥ (2-27-65)
एदाहि य णिव्वत्ता जीवट्ठाणा दु करणभूदाहिं।
पयडीहिं पोग्गलमइहि ताहि किह भण्णदे जीवो॥ (2-28-66)
एकेन्द्रिय, दोइन्द्रिय, तीनइन्द्रिय, चारइन्द्रिय, पंचेन्द्रिय, बादर, पर्याप्त और इनसे इतर
सूक्ष्म और अपर्याप्त जीव ये नामकर्म की प्रकृतियाँ हैं। इन करणभूत प्रकृतियों से, जो
पौद्गलिक हैं उनमें तो जीवस्थान रचे गये हैं। तब वे जीव किस प्रकार कहे जा सकते
हैं?
Living beings with one, two, three, four, and five senses, gross
and fully developed, and their opposite, subtle and undeveloped,
are classes based on their physique-making karma (nāma
karma). The classes of living beings (jīvasthāna) are the result of
physique-making karma (nāma karma) and since the causal
conditions are physical in nature, how can these be identified
with the nature of the soul?
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अध्याय - 2
देह की जीव संज्ञा व्यवहार से है -
पज्जत्तापज्जत्ता जे सुहुमा बादरा य जे जीवा।
देहस्स जीवसण्णा सुत्ते ववहारदो उत्ता॥ (2-29-67)
जो पर्याप्त तथा अपर्याप्त और जो सूक्ष्म तथा वादर जीव कहे गये हैं, वे देह की
अपेक्षा जीव संज्ञाएँ हैं। वे सब परमागम में व्यवहार नय से कही गई हैं।
गुणस्थान जीव नहीं हैं -
मोहणकम्मस्सुदया दु वण्णिदा जे इमे गुणट्ठाणा।
ते किह हवंति जीवा जे णिच्चमचेदणा उत्ता॥ (2-30-68)
जो ये गुणस्थान हैं, वे मोहनीय कर्म के उदय से बतलाये गये हैं। जो नित्य अचेतन
कहे गये हैं, वे जीव किस प्रकार हो सकते हैं?
इदि दुदियो जीवाजीवाधियारो समत्तो
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अध्याय - 3
तिदियो कत्तिकम्माधियारो
THE DOER AND THE KARMA
जीव के कर्म-बन्ध कैसे होता है -
जाव ण वेदि विसेसंतरं तु आदासवाण दोण्हं पि।
अण्णाणी ताव दु सो कोहादिसु वट्टदे जीवो॥ (3-1-69)
कोहादिसु वट्टंतस्स तस्स कम्मस्स संचओ होदि।
जीवस्सेवं बंधो भणिदो खलु सव्वदरिसीहिं॥ (3-2-70)
जीव जब तक आत्मा और आस्रव दोनों के ही (भिन्न-भिन्न) लक्षण और भेद को
नहीं जानता है, तब तक वह अज्ञानी क्रोधादिक आस्रवों में प्रवृत्त रहता है। क्रोधादिक
आस्रवों में वर्तते हुए उसके कर्मों का संचय होता है। वास्तव में जीव के इस प्रकार
कर्मों का बन्ध सर्वज्ञदेवों ने बताया है।
So long as the soul (jīva) does not recognize the differences in the
attributes of the Self and the influx of karmas, it remains
ignorant, and indulges in baser emotions like anger. The
Omniscients declare that while indulging in anger etc., the soul
accumulates karmic matter and, in this manner, bondage takes
place.
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अध्याय - 3
ज्ञान से बन्ध का निरोध -
जइया इमेण जीवेण अप्पणो आसवाण य तहेव।
णादं होदि विसेसंतरं तु तइया ण बंधो से॥ (3-3-71)
जब यह जीव आत्मा का और आस्रवों का (भिन्न-भिन्न) लक्षण और भेद जान लेता
है, तब उसके कर्मबन्ध नहीं होता।
When the soul (jīva) is able to recognize the differences in the
attributes of the Self and the influx of karmas, then fresh
bondage does not take place.
भेदज्ञान से आस्रव-निवृत्ति -
णादूण आसवाणं, असुचित्तं च विवरीदभावं च।
दुक्खस्स कारणं त्ति य, तदो णियत्तिं कुणदि जीवो॥
(3-4-72)
आस्रवों का अशुचिपना, इनका विपरीत भाव और वे दुःख के कारण हैं, यह जानकर
जीव उनसे निवृत्ति करता है।
After knowing that karmic influxes are impure, of nature
contrary to the Self, and the cause of misery, the Self abstains
from them.
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अध्याय - 3
आत्म स्वभाव में स्थिति से आस्रवों का क्षय -
अहमिक्को खलु सुद्धो य णिम्ममो णाणदंसणसमग्गो।
तम्हि ठिदो तच्चित्तो सव्वे एदे खयं णेमि॥ (3-5-73)
(ज्ञानी विचार करता है कि-) मैं निश्चय ही एक हूँ, शुद्ध हूँ, ममत्वरहित हूँ और
ज्ञान-दर्शन से परिपूर्ण हूँ। (उक्त लक्षण वाले) शुद्धात्मस्वरूप में स्थित और
सहजानन्द स्वरूप में तन्मय हुआ मैं इन सब (क्रोधादिक आस्रवों) को नष्ट करता
हूँ।
(The well-informed asserts that –) I am really one, pure, free
from possessive desires, and replete with knowledge and
perception. Resting on pure consciousness (with the above-
mentioned attributes), and self-contented, I lead all the karmic
influxes (like anger) to destruction.
ज्ञानी आस्रवों से निवृत्त होता है -
जीवणिबद्धा एदे अधुव अणिच्चा तहा असरणा य।
दुक्खा दुक्खफला त्ति य णादूण णिवत्तदे तेहिं॥ (3-6-74)
ये क्रोधादि आस्रव जीव के साथ निबद्ध हैं, अध्रुव हैं, अनित्य हैं तथा अशरण हैं
(रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं) और ये दुःखरूप हैं और दुःखरूप फल देने वाले हैं।
यह जानकर (ज्ञानी) उन आस्रवों से निवृत्त होता है।
These influxes like anger are associated with the soul,
destructible, evanescent, incapable of providing refuge, misery
themselves, and result into misery. Knowing this, the well-
informed abandons them.
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३. कर्तृ-कर्म अधिकार (आत्मा व कर्म का सम्बन्ध)

अध्याय - 3
ज्ञानी की पहिचान -
कम्मस्स य परिणामं णोकम्मस्स य तहेव परिणामं।
ण करेदि एदमादा जो जाणदि सो हवदि णाणी॥ (3-7-75)
जो आत्मा इस कर्म के परिणाम को, इसी प्रकार नोकर्म के परिणाम को नहीं करता
है, अपितु जो जानता है, वह ज्ञानी है।
The Self who does not get involved in the adoption of the karmic
matter, and, in the same way, the quasi-karmic matter
(nokarma), but is aware of these, is knowledgeable.
ज्ञानी परद्रव्य की पर्यायों में परिणमन नहीं करता -
ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए।
णाणी जाणंतो वि हु पोग्गलकम्मं अणेयविहं॥ (3-8-76)
ज्ञानी अनेक प्रकार के पौद्गलिक कर्मों को जानता हुआ भी निश्चय से परद्रव्य की
पर्यायों में न उन स्वरूप परिणमन करता है, न उन्हें ग्रहण करता है, न उन रूप
उत्पन्न होता है।
The knower, while knowing the various kinds of karmic matter,
surely does not manifest himself in the modifications of alien
substances, or assimilate them, or transmute in their form.
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अध्याय - 3
ज्ञानी अपने परिणामों को जानता है -
ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए।
णाणी जाणंतो वि हु सगपरिणामं अणेयविहं॥ (3-9-77)
ज्ञानी अनेक प्रकार के अपने परिणामों का जानता हुआ भी निश्चय से परद्रव्य की
पर्यायों में न तो परिणमन करता है, न उन्हें ग्रहण करता है, न उन रूप उत्पन्न ही
होता है।
The knower, while knowing the various modes of his own
thought-dispositions, surely does not manifest himself in the
modifications of alien substances, or assimilate them, or
transmute in their form.
ज्ञानी कर्म-फल को जानता है -
ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए।
णाणी जाणंतो वि हु पॉग्गलकम्मफलं अणंतं॥ (3-10-78)
ज्ञानी पौद्गलिक कर्मों के अनन्त फल का जानता हुआ भी निश्चय से परद्रव्यों के
पर्यायों में न तो परिणमन करता है, न उन्हें ग्रहण करता है, न उन रूप उत्पन्न होता
है।
The knower, while knowing the various fruits of karmic matter,
surely does not manifest himself in the modifications of alien
substances, or assimilate them, or transmute in their form.
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अध्याय - 3
पुद्गल द्रव्य पररूप परिणमन नहीं करता -
ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए।
पोग्गलदव्वं पि तहा परिणमदि सगेहि भावेहिं॥ (3-11-79)
पुद्गल द्रव्य भी परद्रव्य की पर्यायों में उस रूप न तो परिणमन करता है, न उन्हें
ग्रहण करता है, न उन रूप उत्पन्न होता है, क्योंकि वह तो अपने ही भावों से
परिणमन करता है।
The physical matter too does not manifest itself in the modes of
any foreign substance, or assimilate them, or transmute in their
form, because it manifests in its own state or form.
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जीव और पुद्गल के परिणामों में निमित्त-नैमित्तिक भाव है -
जीव परिणामहेदुं कम्मत्तं पोग्गला परिणमंति।
पोग्गलकम्मणिमित्तं तहेव जीवो वि परिणमदि॥ (3-12-80)
ण वि कुव्वदि कम्मगुणे जीवो कम्मं तहेव जीवगुणे।
अण्णोण्णणिमित्तेण दु परिणामं जाण दोण्हं पि॥ (3-13-81)
एदेण कारणेण दु कत्ता आदा सगेण भावेण।
पोग्गलकम्मकदाणं ण दु कत्ता सव्वभावाणं॥ (3-14-82)
पुद्गल जीव के (रागादि) परिणाम के निमित्त से कर्म रूप से परिणमित होते हैं।
इसी प्रकार जीव भी (मोहनीय आदि) पुद्गलकर्म निमित्त से (रागादि भाव रूप से)
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अध्याय - 3
परिणमन करता है। जीव कर्म के गुणों को नहीं करता है। इसी प्रकार कर्म जीव के
गुणों को नहीं करता है; परन्तु एक-दुसरे के निमित्त से इन दोनों के परिणाम जानो।
इस कारण से आत्मा अपने ही भावों से कर्ता है, परन्तु पुद्गल कर्म के द्वारा किये गये
समस्त भावों का कर्ता नहीं है।
निश्चयनय से आत्मा अपना ही कर्ता और भोक्ता है -
णिच्छयणयस्स एवं आदा अप्पाणमेव हि करेदि।
वेदयदि पुणो तं चेव जाण अत्ता दु अत्ताणं।। (3-15-83)
(निश्चयनय का इस प्रकार मत है कि) आत्मा अपने को ही करता है और फिर
आत्मा अपने को ही भोगता है, ऐसा तू जान।

अध्याय - 3
व्यवहार से आत्मा पुद्गल कर्मों का कर्ता और भोक्ता है -
ववहारस्स दु आदा पोग्गलकम्मं करेदि णेयविहं।
तं चेव य वेदयदे पोग्गलकम्मं अणेयविहं॥ (3-16-84)
व्यवहार नय का मत है कि आत्मा अनेक प्रकार के पुद्गल कर्मों को करता है और
उन्हीं अनेक प्रकार के पुद्गल कर्मों को भोगता है।
It is only from the empirical point of view (vyavahāra naya) that
the Self is the creator of various kinds of karmic matter, and then
enjoys the fruits thereof.
व्यवहार की मान्यता में दोष -
जदि पोग्गलकम्ममिणं कुव्वदि तं चेव वेदयदि आदा।
दोकिरियावादिरित्तो पसज्जदे सो जिणावमदं॥ (3-17-85)
यदि आत्मा इस पुद्गल कर्म को करता है और उसी को भोगता है तो दो क्रियाओं से
अभिन्न होने का प्रसंग आता है। ऐसा मानना जिनेन्द्रदेव के मत के विपरीत है।
विशेष - क्रिया वस्तुतः परिणाम है और परिणाम क्रिया के कर्ता परिणामी से
अभिन्न होता है। जीव जिस प्रकार अपने परिणाम को करता है और उसी को भोगता
है उसी प्रकार यदि वह पुद्गलकर्म को करे और उसी को भोगे तो जीव अपनी और
पुद्गल की - दोनों की - क्रियाओं से अभिन्न हो जाएगा। दो द्रव्यों की क्रिया एक
द्रव्य करता है, ऐसा मानना जिनेन्द्रदेव के सिद्धान्त के विरुद्ध है।
If the Self creates the karmic matter and then enjoys the
consequences thereof, it will lead to the hypothesis of a single
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अध्याय - 3
cause producing two different effects. This is in conflict with the
Jaina doctrine.
Note: Action (kriyā) actually leads to mode (paryāya) and the
mode of a substance cannot be altogether different from the
substance itself. As the Self produces his own modes, and, again,
enjoys results thereof, and if he also creates the karmic matter
and then enjoys the consequences thereof, then the Self will be
no different from the two actions – of self and of karmic matter.
To hypothesize that a single substance produces kriyā in two
substances is against the doctrine of the Omniscient Lord.
दो किरियावादी मिथ्यादृष्टि हैं -
जम्हा दु अत्तभावं पोग्गलभावं च दो वि कुव्वंति।
तेण दु मिच्छादिट्ठी दो-किरियावादिणो होंति॥ (3-18-86)
क्योंकि आत्मा, आत्मा के भाव को और पुद्गल के भाव (परिणाम) को - दोनों को

  • करता है। ऐसा मानने के कारण दो-किरियावादी (एक द्रव्य द्वारा दो द्रव्यों के
    परिणाम किये जाते हैं, ऐसा मानने वाले) मिथ्यादृष्टि होते हैं।
    Those who believe that the jīva or the Self is the producer of
    modifications in both – his own self, and in the physical matter,
    i.e., one single substance producing modifications in two
    substances, are of erroneous faith.
    43

अध्याय - 3
मिथ्यात्वादि भाव दो प्रकार के हैं -
मिच्छत्तं पुण दुविहं जीवमजीवं तहेव अण्णाणं।
अविरदि जोगो मोहो कोहादीया इमे भावा॥ (3-19-87)
पुनः मिथ्यात्व दो प्रकार का है - जीवमिथ्यात्व और अजीवमिथ्यात्व। इसी प्रकार
अज्ञान, अविरति, योग, मोह और क्रोध आदि कषाय - ये सभी भाव (जीव-अजीव
के भेद से) दो-दो प्रकार के हैं।
Again, erroneous faith is of two kinds – one pertaining to the jīva
or soul, and the other pertaining to ajīva or non-soul. Similarly,
nescience (ajñāna), non-abstinence (avirati), actions of the body,
the organ of speech and the mind (yoga), delusion (moha), and
passions (kaṣāya) like anger, are of two kinds (in respect of being
jīva or ajīva) each.
अजीव और जीव मिथ्यात्वादि भाव -
पोग्गलकम्मं मिच्छं जोगो अविरदि-अणाणमज्जीवं।
उवओगो अण्णाणं अविरदि मिच्छं च जीवो दु॥ (3-20-88)
जो मिथ्यात्व, योग, अविरति और अज्ञान अजीव हैं, वे पुद्गल कर्म हैं और जो
अज्ञान, अविरति और मिथ्यात्व जीव हैं, वे उपयोगरूप हैं।
Erroneous faith, actions of the body, the organ of speech and the
mind, non-abstinence, and nescience, which are of the nature of
ajīva, are karmic matter. And nescience, non-abstinence, and
erroneous faith, which are of the nature of jīva, are modes of
consciousness (upayogarūpa).
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