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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 226 में से

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पृष्ठ 45

अध्याय - 2
जीवस्स णत्थि केई जोगट्ठाणा ण बंधठाणा वा।
णोव य उदयट्ठाणा ण मग्गणट्ठाणया केई॥ (2-15-53)
णो ठिदिबंधट्ठाणा जीवस्स ण संकिलेसठाणा वा।
णोव विसोहिट्ठाणा णो संजमलद्धिट्ठाणा वा॥ (2-16-54)
णोव य जीवट्ठाणा ण गुणट्ठाणा य अत्थि जीवस्स।
जेण दु एदे सव्वे पोग्गलदव्वस्स परिणामा॥ (2-17-55)
जीव के वर्ण नहीं है, गंध भी नहीं है, रस भी नहीं है, स्पर्श भी नहीं है, रूप भी नहीं
है, शरीर भी नहीं है, संस्थान (आकार) भी नहीं है, संहनन भी नहीं है। जीव के राग
नहीं है, द्वेष भी नहीं है, मोह भी नहीं हैं, आस्रव भी नहीं है, कर्म भी नहीं है, उसके
नोकर्म भी नहीं है। जीव के वर्ग नहीं है, वर्गणा नहीं है, कोई स्पर्धक भी नहीं है,
अध्यात्मस्थान भी नहीं है और अनुभागस्थान भी नहीं है। जीव के कोई योगस्थान
नहीं है, बंधस्थान भी नहीं है और उदयस्थान भी नहीं है, कोई मार्गणास्थान भी नहीं
है। जीव के स्थितिबंधस्थान भी नहीं है, संक्लेशस्थान भी नहीं है, विशुद्धिस्थान भी
नहीं है, संयमलब्धिस्थान भी नहीं है और जीवस्थान भी नहीं है और जीव के
गुणस्थान नहीं है, क्योंकि ये सब पुद्गल के परिणमन हैं।