सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
मिश्रित ५६
अमर भये जिन जिन यह खाई, भव नगरी नहिं आये ।
जो पछ करै सँभल दृढ़ राखै, सतगुरु बैद बताये ॥ २ ॥
सतसंगत को भवन बनावै, पड़दा लाज लगावै ।
जगत बासना पवन चलत है, सो आवन नहिं पावै ॥ ३ ॥
सूभ करम लै टेक टहलुवा, दीपक ज्ञान जलावै ।
नित्य अनित्य बिचार सार गहु, हो आसार बगावै ॥ ४ ॥
जीव रूप के रोग भगैं यों, ब्रह्म रूप ह्वै जावै ।
सहजो बाई सुन हुलसाव, चरनदास बतलावै ॥ ५ ॥
( २ )
तेरी लीला अधिक सोहावनी ।
देखि देखि मन हुलसत है, संतन के मन भावनी ॥ १ ॥
तत गुन करि ब्रह्मांड बनायौ, अधर धर्यो अचरज भयौ ।
जाके मध्य यही संसारा, भाँति भाँति रँग रँग ठयौ ॥ २ ॥
सात दीप नौ खंड रचे हैं, सुरग मिरत पाताल हीं ।
इच्छा करत सबै बनि आयौ, होइ गयौ ततकाल हीं ॥ ३ ॥
माया अगम अपार तुम्हारी, बरन सकै कहा बेद है ।
तीन गुननि तक बुध पहुँचत है, परे तुम्हारो भेद है ॥ ४ ॥
छिन में उतपति परलै छिन में, जो चाहौ सब कुछ बनै ।
चरनदास गुरु दृष्ट देइ जब, गुनाबाद सहजो भनै ॥ ५ ॥
( ३ )
परो मन हरि गुन गावत बान ।
बिन गोपाल और जो भाखै, तौ तोहि गुर की आन ॥ १ ॥
बेद माहिं ब्रह्मा गुन गावै, संकर सींगी माहि ।
सेस सहस मुख निस दिन गावै, समौ विचारत नाहिं ॥ २ ॥
बीन लिये नारद मुनि गावैं, गावैं ब्यास उचार ।
गनपति सारद गान करत हैं, गंधर्व सभी पुकार ॥ ३ ॥
गुनाबाद गावत प्रभु परसन, बड़े भक्त को भाव ।
६० सहजो बाई
सुकदेव गाव चरन हीं दासा, सहजो कूँ भी चाव ॥ ४ ॥
॥ राग पुरबी ॥
( १ )
हरि कौ कोइ न जानत भेद ।
सब के बड़े सोई पचि हारे, नेत नेत कहि बेद ॥ १ ॥
नाल माहिं ब्रह्मा नहिं आयो, थाकि फिरत केहि कीन ।
जोग ध्यान करि संकर हारे, थाह लेत भये लीन ॥ २ ॥
भेद न पायो सेस सारदा, सुरपति और गनेस ।
बामदेव और सनकादिक, निरे भक्त के भेस ॥ ३ ॥
ज्ञानी गुनी मुनी रिषि तेते, जेते जोगेसुर साध ।
चरनदास कह सहजो बाई, पंडित पोथी लाद ॥ ४ ॥
( २ )
मन तोहि कब उपजैगी स्यान ।
इंद्रिन के रस सूँ छुटि निर्मल, पारब्रह्म गलतान ॥ १ ॥
जग सूँ पीठ कहो कब दैहौ, सनमुख हरि की ओर ।
साधों की संगत कब करिहौ, कुल कुटुँब को छोड़ ॥ २ ॥
जप करिबे को कब तुम लगिहौ, चरन कमल के ध्यान ।
निस दिन आयु घटै तन छीजै, मनुष जनम की हान ॥ ३ ॥
तुम जो कहो मैं काल्ह करूँगी, काल्ह काल के हाथ ।
जा कारन ऐसी मति उपजै, सो झूठा है साथ ॥ ४ ॥
चरनदास गुरु मोहिं बतायो, सहजो हिरदे राख ।
भजनहिं एक सार वस्तु है, सब मिलि बेद पुरानन भाख ॥ ५ ॥
॥ राग बिलावल ॥
गुबिंद गुन क्यों नहिं गावो ।
ममता नींद कहा मन सूतो, जाग जाग हरि सों चित लावो ॥१॥
गुन गावत बहु पतित ऊधरे, ऊँची पदवी दीन्ही ।
जाति बरन सूँ ऊपर कीन्ही, आध ब्याध बिपता हरि लीन्ही ॥२॥
भौजल पार भये थिर हुए, आवागवन नसायो ।
वैसीही तुम्हरी गति होगी, करिजै औसर नीको पायो ॥३॥
आधी रात औ तरुन अवस्था, उठि करि ध्यान लगावै ।
ता की अस्तुति सेस करत है, सिव ब्रह्मादिक सीस नवावै ॥४॥
चरनहिं दास बनो पद सेवै, गुरु उपदेस सँभारौ ।
सहजो नवधा भक्ति करीजै, आप तिरौ औरन कूँ तारौ ॥५॥
॥ राग जैजैवंती ॥
( १ )
दसौ दिसा देख तो कूँ और कोई नाहीं ।
नख सिख राज रह्यो, वेदन के मद्ध कह्यो ।
सूत रह्यो की माला भयो, ऐसे ही सब माहीं ॥ १ ॥
सिंध हूँ की लहरैं जानौ, ता में सब पानी मानौ ।
ऐसे नहिं दूजा ठानौ, साईं साईं साईं ॥ २ ॥
ईसुर को रूप ह्वौ, ब्रह्मंड सब होइ रह्यो ।
नान्हे ही सरूप ह्वौ, तेरी गति पाई ॥ ३ ॥
चरनदास गुरु दई, आतम बिचार लई ।
सहजो बाई नाहिं रही, जैसे जल झाई ॥ ४ ॥
( २ )
मेरे इक सिर गोपाल और नहीं को भाई ॥टेक॥
आइ बैस हिये माहिं, और दूजा ध्यान नाहिं ।
मेरे तो सर्बस उन, औ हिताई वोई ॥ १ ॥
जाति हूँ की कान तजी, लोक हूँ की लाज भजी ।
दोनों कुल माहिं बजी, कहा करै सोई ॥ २ ॥
उघरी है प्रीत मेरी, निहचै हुई वा की चेरी ।
पहिरि हिये प्रेम बेरी, टूटै नहीं जोई ॥ ३ ॥
मैं जो चरनदास भई, गति मति सब खोइ दई ।
सहजो बाई नहीं रही, उठि गई दोई ॥ ४ ॥
६२ सहजो बाई
॥ राग परज ॥
( १ )
तेरी गति किनहुँ न जानी हो ।
ब्रह्मा सेस महेसुर थाके, बारो बानी हो ॥ १ ॥
बाद करंते सब मत थाके, बुद्धि थकानी हो ।
बिद्या पढ़ि पढ़ि पंडित थाके, अरु ब्रह्मज्ञानी हो ॥ २ ॥
सब के परे जु अनभय हारी, थाह न आनी हो ।
छान बीन करि बहुतक थाकी, हुई खिसानी हो ॥ ३ ॥
सुर नर मुनि जन गनपति थाके, बड़े बिनानी हो ।
चरनदास थकी सहजो बाई, भई सिरानी हो ॥ ४ ॥
( २ )
तेरी गति सब में जानी हो ॥ १ ॥
बिधि निषेध करि देखा तो कूँ, लिया पिछानी हो ॥ २ ॥
तत पद त्वं पद असि पद तूंहीं, यह न लुकानी हो ॥ ३ ॥
तो बिन दूजा नेक न क्यों ही, यह मन आनी हो ॥ ४ ॥
चरनदास नहिं सहजो बाई, दुबिधा मानी हो ॥ ५ ॥
॥ राग कड़खा ॥
करो मोहिंदास जो आपनी जानि कै, राखियो दृष्टि तुम सदा नोकी ।
और कोइ आसरो धरूँ ना जगत में, मानियो साच मैं कहूँ ठोकी ॥
तुही मात औ पिता बंधू तुही, तुही कुल नात है गोत मेरा ।
तुही धन धाम औ जीव इस देह का, तो बिना और दूजा न हेरा ॥
जाप तेरा करूँ ध्यान हिरदे धरूँ, समुझि कै ज्ञान तो कूँ पिछानूँ ।
सरन तेरी लई टेक ऐसी गही, तुम बिना आन कूँ नाहि जानूँ ॥
गही जब बाँह विख्यात जग में भई, सकल लज्जा तुम्हें है गोसांई ।
कलू १ के काल २ में महा भयमान हूँ, चरनहूँ कवल की राखि छाई ॥
कहत सहजो दोऊ हाथ को जोरि कै, सीस नीचा किये दीन धारे ।
चरनदास गुरु अरज सुनि लीजिये, तुही है इष्ट आसा हमारे ॥
॥ इति सहज प्रकाश की पोथी संपूर्ण ॥
(१) कलजुग । (२) समय ।
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