सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 68 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 66

६२ सहजो बाई
॥ राग परज ॥
( १ )
तेरी गति किनहुँ न जानी हो ।
ब्रह्मा सेस महेसुर थाके, बारो बानी हो ॥ १ ॥
बाद करंते सब मत थाके, बुद्धि थकानी हो ।
बिद्या पढ़ि पढ़ि पंडित थाके, अरु ब्रह्मज्ञानी हो ॥ २ ॥
सब के परे जु अनभय हारी, थाह न आनी हो ।
छान बीन करि बहुतक थाकी, हुई खिसानी हो ॥ ३ ॥
सुर नर मुनि जन गनपति थाके, बड़े बिनानी हो ।
चरनदास थकी सहजो बाई, भई सिरानी हो ॥ ४ ॥
( २ )
तेरी गति सब में जानी हो ॥ १ ॥
बिधि निषेध करि देखा तो कूँ, लिया पिछानी हो ॥ २ ॥
तत पद त्वं पद असि पद तूंहीं, यह न लुकानी हो ॥ ३ ॥
तो बिन दूजा नेक न क्यों ही, यह मन आनी हो ॥ ४ ॥
चरनदास नहिं सहजो बाई, दुबिधा मानी हो ॥ ५ ॥
॥ राग कड़खा ॥
करो मोहिंदास जो आपनी जानि कै, राखियो दृष्टि तुम सदा नोकी ।
और कोइ आसरो धरूँ ना जगत में, मानियो साच मैं कहूँ ठोकी ॥
तुही मात औ पिता बंधू तुही, तुही कुल नात है गोत मेरा ।
तुही धन धाम औ जीव इस देह का, तो बिना और दूजा न हेरा ॥
जाप तेरा करूँ ध्यान हिरदे धरूँ, समुझि कै ज्ञान तो कूँ पिछानूँ ।
सरन तेरी लई टेक ऐसी गही, तुम बिना आन कूँ नाहि जानूँ ॥
गही जब बाँह विख्यात जग में भई, सकल लज्जा तुम्हें है गोसांई ।
कलू १ के काल २ में महा भयमान हूँ, चरनहूँ कवल की राखि छाई ॥
कहत सहजो दोऊ हाथ को जोरि कै, सीस नीचा किये दीन धारे ।
चरनदास गुरु अरज सुनि लीजिये, तुही है इष्ट आसा हमारे ॥
॥ इति सहज प्रकाश की पोथी संपूर्ण ॥
(१) कलजुग । (२) समय ।