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रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

हिन्दीटीकासहितम् ९
इस मंत्रको पहिले हजार वार पढ़कर फिर औषधियोंकी वटी बनाकर
जिसका नाम ले तिलक करे तो वह राजा वश होय॥३२॥३३॥
घृतं दुग्धं शर्करां च दधिमधुकमेव च ॥
कमलपुष्पपत्राणि शतानि च विशेषतः ॥
रात्रौ च हवनं कुर्याच्चक्रवर्तीवशो भवेत् ॥ ३४ ॥
घृत दुग्ध शक्कर दही सहत कमलपुष्पके पत्र १०० रात्रिको हवन करे
तो चक्रवर्ती वश होय ॥३४॥
गोभीं मयूरशिखां च मुखे वा शिरसि क्षिपेत् ॥
वादे चैव तथा वेदे जयमाप्नोति मानवः ॥ ३५ ॥
गोभी मयूरशिखा मुखमें वा शिरमें रखे तो वादमें वा वेदमें जय पावे
॥३५॥
मार्गशीर्षस्य पूर्णायां मूलमुद्धृत्ययत्नतः ॥
मयूरपिच्छस्य बध्नीयाद्धस्ते वा मस्तके तथा ॥
तदा वादेषु सर्वेषु जयमाप्नोति नित्यशः ॥ ३६ ॥
अगहनीपूनौको मोरशिखाकी जड़ यत्नसे उखाड़ हाथमें वा मस्तकमें
बांधे तो सबवादोंमें जय पावे ॥३६॥
मंत्रः । ॐ नमः कनर्कापगे रौद्रकृपातरु-
ष्टास्त्रधरनी तिष्ठ सरासरसत्वानं मोहये
भगवतीसिधिधुजो इति मीठमहामाये स्वाहा ॥
अष्टोत्तरशतं जप्त्वा तदा सिद्ध्यतिमंत्रराट् ॥ ३७ ॥
यह मंत्र एक सौ आठ वार जपे तो मंत्र सिद्ध होय ॥३७॥
२

सूत्रेण बंधयेद्धस्ते तदा वादे जयो भवेत् ॥ ३८ ॥

१० रुद्रयामलतन्त्रम्
कात्तिकस्य चतुर्दश्यां कृष्णपक्षे समानयेत् ।।
नीलवृक्षस्य मूलं च स्मशानाच्च विशेषतः ।।
सूत्रेण बंधयेद्धस्ते तदा वादे जयो भवेत् ॥ ३८ ॥
कार्तिककृष्णपक्षकी चतुर्दशीकोलीलकी जड़ स्मशानसे लाकर सूतमें
कसके हाथमें बांधो तो सब वादोंमें जय पावे ।।३८।।
श्वेतगुंजकमूलं च मुखे निक्षिप्य यत्नतः ।।
तदाशत्रोर्मुखं चैवनिरुंध्यान्नात्र संशयः ।। ३९ ।।
सपेद गुंजाकी जड़ लेकर मुखमें रखे और मंत्र पढ़े तो शत्रु का मुख रुक
जाय इसमें सन्देह नहीं है ।।३९।।
मंत्रः । ॐ ह्रीं रक्तचामुंडे कुरु कुरु स्वाहा ।
हस्तर्क्षे छछूदरं च चूर्णं कृत्वा विधानतः ।।
अंगेषु मर्दयेच्चैव तदा भग्नाश्च हस्तिपाः ।। ४० ।।
मंत्र पढ़ हस्तनक्षत्रमे छछूंदर पकड़कर चूर्ण कर विधानसे अंगोंमें मर्दन
करे तौ हाथीवाले भाग जांय ।।४०।।
तिलपुष्पं चूर्णसमं कृत्वा तिलकमुत्तमम् ।।
हस्तिपाश्च पलायंते सिंहत्रस्ता वने यथा ॥ ४१ ॥
तिलके फूल और छछूंदरका चूर्ण बराबर ले तिलक करे तौ हाथीवाले
भाग जांय ।।४१।।
हस्तर्क्षे च निगृह्णाति मूलं कीकवचस्य च ।।
हस्ते बध्नाति तां चापि शिरसि च विशेषतः ।।
तदा युद्धे भयं नैव न चापि शस्त्रघातनम् ॥ ४२ ॥

हिन्दीटीकासहितम् ११
हस्तनक्षत्रमें कीकवचकी जड़ ले हाथमें वा शिरमें बांधे तौ युद्धमें डर
न लगे और शस्त्र न लगे ॥४२॥
श्वेतकंटकिमूलं च हस्ते गृह्य च बंधयेत् ॥
संदर्शनात्पलायंते व्याघ्राः सर्वे दशो दिशः ॥ ४३ ॥
सपेद कटइयाकी जड ले हस्तनक्षत्रमें हाथमें बांधे तौ व्याघ्र देखके
दशों दिशाको भाग जाय ॥४३॥
मंत्रः । गौरीकांतै महादेवकेन जाई अहो
बांधिजै हमारा कुत्ता हा आइ यह भूमि हमें
छोडि दीजै तुरिय वर घर कीजै मेरे पास
आवौ तौ हनुमतकी आन ॥
इस व्याघ्र बांधनेवाले मंत्रको पढ़े ।
पुनर्वशीकरणम् ।
पुष्ये धत्तूरपुष्पं च मूले मूलं च गृह्यते ॥
गोरोचनं च कर्पूरं समभागं समानयेत् ॥ ४४ ॥
पुष्य नक्षत्रमें धतूरेका पुष्प ले तथा मूल नक्षत्रमें जड़ ले और गोरोचन
कपूर समभागले ॥४४॥
तिलकं कृत्य च भवेत्स्त्रीनामकथनेन च ॥
वशीभूता तदा याता महादेवप्रसादतः ॥ ४५ ॥
तिलक कर जिस स्त्रीका नाम ले वह महादेवके प्रसादके वश्य होय ॥४५॥
रात्रौ स्ववीर्यमादाय हस्ते कृत्वा तु यत्नतः ॥
वामांगुलिनाच यस्यायः स्त्रियांगुष्ठे निवेशयेत् ॥ ४६ ॥

१२ रुद्रयामलतन्त्रम्
रात्रिको अपना वीर्य हाथमें रखे और वाम अंगुलीसे स्त्रीके अंगुठेमे
लगा दे तो सो वश्य होय ॥४६॥
इज्यर्क्षे च गृहीत्वैव कृष्णतूमरकीलकम् ॥
रविवारे स्पृशेदयां वै सा वशीभूता न संशयः ॥
वंध्या स्त्री सप्तरात्रेण वश्यं याता न संशयः ॥ ४७ ॥
पुष्यनक्षत्रमें कृष्ण धतूरेकी कील रविवारको जिसको छुवा दे सो वश्य
होय । वंध्या स्त्री भी सात रात्रिमें वश होती है ॥४७॥
मंत्रः । ॐ चिमिचिमि स्वाहा ॥
उत्थाय प्रातरेव सुमुखं संमार्जयेच्च ॥
सप्त सप्त च चुलुकां मंत्रितां च पिबेदपः ॥
यस्या नाम ब्रुवेच्चैव वशीभूता न संशयः ॥ ४८ ॥
यह मंत्रपढ़ प्रातःकाल उठ अपना मुख धोवे और सात चुल्लू पानी अभि-
मंत्रित करके जिसका नाम लेके पीवे वह वश्य होय ॥१८॥
ॐ नमः छिप्राकामिनी अमुर्की मे वशमानय स्वाहा ॥ॐ
नागकेशरकं चैव कमलपुष्पं तथैव च ॥
तगरं केशरं चैव जटामासीं वचं तथा ॥ ४९ ॥
यह मंत्र पढ़कर नागकेशर कमलफल तगर केशर जटामासी वच ॥४९॥
समभागे चूर्णयित्वा धूपयेदंगमुत्तमम् ॥
मनसा वा स्मरेद्यां वै सापि वश्या न संशयः ॥५० ॥
बराबर ले चूर्ण कर अपने अंगमें धूप दे मनमें जिस स्त्रीका स्मरण करे
सो वश होय इसमें संशय नहीं ॥५०॥

हिन्दीटीकासहितम् १३
मंत्रः । अमुली महामुली छठछसर्वसंक्षेत्रजेनोपद्रवेभ्यः स्वाहा।
मंत्रेदं मासमेकं च यस्या नाम समन्वितम् ।।
सापि वश्या भवेच्चैव सिद्धियोगो निगद्यते ।। ५१ ।।
इस मंत्रका महीने भर जिसका नाम लेकर जप करे सो वश्य होंय । यह
सिद्धियोग है ।।५१।।
गर्दभस्य शिरस्थीनि स्थापयेन्नरमस्तके ।
घमराप्रभवार्केण रंगयेद्वर्तिकैककाम् ।। ५२ ।।
गदहेके शिरके हाड मनुष्यके कपालमें धर घमराके अर्कमें एक एक बत्ती
रंगे ।।५२।।
स्नेहयुक्तां कपाले च प्रज्वाल्य कृतकज्जलम् ।।
शनौ नेत्रे प्रदातव्यं दर्शनाद्याति वश्यताम् ।। ५३ ।।
और तेल धरकपालमेंदीपबारकज्जलकर शनैश्चरको नेत्रोंमें लगाके
जिसकी ओर देखे सो वश्य होय ।।५३।।
श्वेतगौदरिलेपेन लिंगे चैव विधानतः ।।
ध्रुवेण वश्यतां याति स्त्री च मानवत्यपि सा ।। ५४ ।।
सफेद गौदरिका लेप लिंगमें करे तो निश्चयपूर्वक मानवतीभी वश
होय ।।५४।।
कर्पूरं कृष्णधत्तूरं मूलं पत्रं तथैव च ।।
लिंगलेपनमात्रेण द्रवं याति तदाबला ।। ५५ ।।
कपूर कृष्ण धतूरेके पत्र और जड़का लिंगमें लेपन करे तो स्त्री द्रवे ।।५५।।
कर्पूरं मंदारपुष्पं समभांग च चूर्णयेत् ।।
लिंगलेपनमात्रेण वशीभूता तदाबला ।। ५६ ।।

१४ रुद्रयामलतन्त्रम्
कपूर मदारके फूलका बराबर चूर्णकर लिंगमें लेपन कियेसे स्त्री वश
होय ॥५६॥
स्त्रीद्रावणम् ।
गौर्दारं वारिणा पिष्ट्वा हस्तस्योपरि लेपयेत् ॥
पुरुषस्पर्शमात्रेण स्त्री द्रवति विशेषतः ॥ ५७ ॥
गौदरिको पानीमें पीस हाथके ऊपर लेपन करे तो पुरुषके छूनेसे स्त्री
द्रवे ॥५७॥
मंत्रः । ॐ नमो भगवती उगदामरेशुराह-
द्रवै द्रवै स्त्रीणां पातय स्वाहा ठः ठः ॥
यह मंत्र पढे ॥
यह मंत्र पढ़े ॥
पतिवशीकरणम् ।
कौंडिल्यपक्षिविट् चैव मांसं घृतमलं तथा ॥
योनिलेपनमात्रेण पुरुषो याति वश्यताम् ॥५८ ॥
यह मंत्र पढ़े और कौडिल्लाकी विष्ठा मांसघृतके मैलका योनिमें लेपन
करै तो पुरुष वश होय ॥५७॥
मंत्रः । ॐ काममालिनो ठः ठः स्वाहा ।
सप्तवारं पठेन्मंत्रं गोरोचनसमन्वितम् ॥
मत्स्यपित्तेन संयुक्तं तिलकं च करोति या ॥
वामांगुलिना तर्जयेत्पुरुषो याति वश्यताम् ॥५९ ॥
यह मंत्र सात वार पढ़ गोरोचनमत्स्यपित्तमें मिलाकर स्त्री तिलक करे तो
पुरुष वश्य होय और वाई अंगुरी पुरुषके ओर करे तो भी पुरुष वश्य होय ॥५९॥

हिन्दीटीकासहितम् १५
रजस्वला स्वरुधिरं गोरोचनसमन्वितम् ।।
तिलकं कृत्वा दर्शनात्पुरुषो याति वश्यताम् ।। ६० ।।
रजस्वलास्त्री अपने रुधिरमें गोरोचन मिलाकर तिलक कर जिसकी
ओर चितवे सो पुरुष वश होय ।।६०।।
मंत्रः ।। चामुंडे तरुततु अमुकाय कर्षय आकर्षय स्वाहा
मंत्रेदं दिनसप्तं च त्रिगुणं प्रत्यहं तथा ।। ६१ ।।
जपेत्सहस्रं पुरुषो स्त्रीनामग्रहणात्तथा ।।
मनसा च समाधाय ध्रुवेण याति वै गृहे ।। ६२ ।।
यह मंत्र आकर्षणका इक्कीस रोज हजार हजार जपे और दिनदिन
पुरुष स्त्रीका नाम लेकर मनमें ध्यान करे तो निश्चय स्त्री वश होय ।।६१।।६२।।
रक्तवस्त्रे लिखेद्यंत्रं रक्तचंदनलाक्षया ।।
उत्तराभिमुखो भूत्वा पूजयेत्सुसमाहितः ।। ६३ ।।
रक्तचंदन वा लाखसे उत्तरमुख होकर रक्तवस्त्रमें यंत्र लिखे और
पूजे ।।६३।।
निखनेत्तं पृथिव्यां वै दितानि चैकविंशतिम् ।।
तस्योपरि च सिंचयेत्तंडुलोदकवारिणा ।।
तदायाति मानिनी च वैरिणी चापि दूरतः ।। ६४ ।।
और पृथिवीमें गाड़ इक्कीस दिनतक चावलके धोवनके जलसे सींचे तो
मानवती वैरिणीभी दूरसे आ जाय ।।६४।।
कौहावृक्षस्य वांदां च गृहीत्वाहिरभे विशेषतः ।। ६५ ।।
अजामूत्रेण संपिष्ट्वा यस्याः शिरसि निक्षिपेत् ।।
पुरुषस्य स्त्रियो चापि वश्यतां याति क्षेपणात् ।। ६६ ।।

१६ रुद्रयामलतन्त्रम्
कौहा (अर्जुन) वृक्षका बांदा आश्लेषा नक्षत्रमें ले छेरीके मूत्रमें पीस-
कर क्षेपण करे तो पुरुषके स्त्री और स्त्रीके पुरुष वश होय ।।६५।६६।।
कृष्णसर्पस्य च फणां छित्त्वा चूर्ण समानयेत् ।।
तं चापि धूपयेदंगे नाम गृह्णाति चेति तम् ।। ६७ ।।
कृष्णसर्पकी फणा काटकर चूर्ण कर अंगमें धूप दे जिस स्त्रीका नाम ले
सो उस पुरुषके समीप आवे ।।६७।।
संध्यायां तु समादाय यस्याः पादतलाइ्रजः ।।
वामानाम् समुच्चार्य लक्षमंत्रचतुष्टयम् ।। ६८ ।।
संध्यामें स्त्रीके पादकी धूलि उठाकर वामानाम् ले चार लाख मंत्र जपे
।।६८।।
मंत्रः । ह्रीं हूं अमुकी आकर्षय ।।
जपे मंत्रे समायाति गृहं प्रति न संशयः ।।
घुंघुरनाममंत्रं च जपित्वा पुष्पमाहरेत् ।। ६९ ।।
चेटगस्य फलं चैव पूजयेच्च तदा निशि ।। ७० ।।
यह मंत्र पूर्ण भये पर वह स्त्री गृहको चली आवे इसमें संदेह नहीं और
घुंघुरनाम मंत्र जप कर चेटग वृक्षके फूल फल तोडे और रात्रिमें पूजन करे
।।६९।।७०।।
मंत्रः । अरं घुघुराकृष्टकर्मकर्त्ता अमुकं करोवश्यं ।
भ्रामरौ स्थितौ चैकत्र वियोजयेद्विधानतः ।।
पृथक्पृथक्समानीय चिताकाष्ठेन निर्दहेत् ।। ७१ ।।
यह मंत्र पढ़ भ्रमर भ्रमरी जब इकट्ठे होंय तो उनको न्यारे कर
चिताकी लकड़ीमें जलावे ।।७१।।

सूत्रसे लपेटे और स्त्रीके मूडमें बांधे तो वह किसीके संग न बोले ॥७३॥

हिन्दीटीकासहितम् १७
भस्म समानीय तदा समीपे प्रेरणात्तथा ॥
प्रक्षेपयेन्मंत्रयुतं वश्यं याति विशेषतः ॥ ७२ ॥
भस्म ले मंत्र पढ़ नाम ले और मंत्रसमेत भस्म शिरपर छोड़ दे तो विशेष-
तासे वश्य होय ॥७२॥
स्तंभनम् ।
हरिद्रा हरतालं च जलेन समन्वितम् ।
भूर्जपत्रे लिखेद्यंत्रं हरित्सूत्रेणवेष्टयेत् ॥
बंधयेत्स्त्रीमूर्ध्नि तं वै न वदेत्सह केन सा ॥ ७३ ॥
हरदी हलताळको जलमें पीसकर भोजपत्रपर यंत्र लिखे और हरे
सूत्रसे लपेटे और स्त्रीके मूडमें बांधे तो वह किसीके संग न बोले ॥७३॥
उष्ट्रस्यास्थि समादाय खनित्वा भू निधापयेत् ॥
अतिशीघ्रचला चापि स्थिरीभूता न संशयः ॥ ७४ ? ॥
ऊंटके हाड़ले खोदके भूमिमें जिसका नाम लेकर गाड़े वह अतिशीघ्र
चलनेवाली भी स्थिर होय ॥७४॥
घामरं ह्यंधझारं च सहदेवीं च सर्षपम् ॥ ७५ ॥
समभागं च तां कृत्वा तैलं निःसारयेत्तदा ॥
पातालयंत्रं तिलकं शत्रुबुद्धिं च नाशयेत् ॥ ७६ ॥
घामरा, अन्धझार, सहदेई, सरसों बराबर लेकर पातालयंत्रसे तेल
काढ़ तिलक करे तो शत्रु की बुद्धि नष्ट होय ॥७५॥७६॥
मंत्रः । ॐ नमो भगवते विश्वामित्राय नमःस-
र्वमुखीभ्यां विश्वामित्राज्ञामति आगच्छस्वाहा ।
३

१८ रुद्रयामलतन्त्रम्
मंत्रेणानेन तर्पयेदष्टोत्तरशतं च तम् ।
नामोच्चारणमात्रेण बुद्धिनाशो भवेद्रिपोः ॥ ७७ ॥
इस मंत्रसे शत्रु का नाम लेकर एक सौ आठ वार तर्पण करे तो रिपुकी
बुद्धि नष्ट होय ॥७७॥
मंत्रः । ॐ नमो ब्रह्मवासिनी रछ रंछ ठः ठः स्वाहा ।
मंत्रेदं च पठित्वा तु सप्त केशान्समाहरेत् ॥
करे बध्नाति त्रयं च द्वौ द्वौ हस्ते समानयेत् ॥
चौरकार्ये तदा यातः न वदंति च केचन ॥ ७८ ॥
मंत्र पढ़कर सात बाल उखाड़े तीन हाथमें बांधे, दो दो बाल हाथमें रखे
और चोरीको जाय तो कोई न बोले ॥७८॥
अंकोललक्ष्मणामूलं शरपुंखकमेवच ॥ ७९ ॥
मयूरपिच्छस्य मूलं छिर्हंटामूलमेवच ॥
बृहद्दद्रुघ्नमूलं च पुष्यार्के तु समानयेत् ॥ ८० ॥
अंकोलकी जड़, लक्ष्मणाकी जड़, सरफोकाकी जड़, मयूरशिखाकी
जड़, छिर्हंटाकी जड़ और कसौंदीकी जड़ पुष्यार्कमें लेकर ॥७९॥८०॥
गृहे स्थितेऽपि न भयं राजतश्चोरतोऽपि च ॥
गृहीत्वा केतकीमूलं शिरसि धारयेच्च यः ॥ ८१ ॥
गृहमे रखे तो चोरादिकोंका भय नहीं होय तथा केतकीकी जड़ शिरमें
रखे तो भी भय नहीं होय ॥८१॥
तालवृक्षस्य मूलं च मूर्ध्नि धारणमात्रतः ॥
पादे खर्जूरमूलं च खङ्गो न छिद्यते तदा ॥ ८२ ॥

हिन्दीटीकासहितम् १९
ताल वृक्षकी जड़ मूंडमें और खजूरकी जड़ वाम पादमें होय तौ खङ्गसे न
कटे ॥८२॥
मूलत्रयं समादाय गोघृतेन समन्वितम् ।।
पिबेद्योपि नरो तं वै नास्त्राणि विव्यधेच्च तम् ।। ८३ ।।
तीनों जड़ें लेकर गोघृतमे मिलाकर पीबे तो अस्त्र न वेधे ॥८३॥
मंत्रः । अहो कुंभकरणमहाराक्षसवेषसांगीव
संभूतपरसैन्यभंजनं महाभगवानरुद्रोग्या-
ययांती स्वाहा । मंत्रमेतं जपेद्वारमष्टोत्तर-
शतं तथा ।। तदा सिद्धिर्हि जायेत महा-
देवप्रसादतः ॥ ८४ ॥
यह मंत्र अष्टोत्तर वार जपे तौ महादेवके प्रसादसे सिद्धि होय ॥८४॥
पुष्यार्के तु समादाय शिरीषस्य च मूलकम् ।।
जलेन तिलकं कृत्वा तप्तलोहे न दह्यते ॥ ८५ ।।
पुष्यार्कमें शिरसकी जड़ ले जलमें पीस तिलक करे तो ताते लोहेमें न
जले ॥८५॥
सर्पो यदा दशति च तिलकं कारयेत्तदा ।।
निर्विषश्च भवेच्छीघ्रं नात्र कार्याविचारणा ।। ८६ ।।
जो सांप काटे तो तिलक करे तो विष न चढ़े इसमें विचार नहीं करना
॥८६॥
श्वेतगुंजाश्वगंधयोश्च मूलं चोत्तरभाद्रके ।।
चोत्तराभिमुखो भूत्वा न दहेन्मूर्ध्नि धारणे ॥ ८७।।
श्वेत गुंजाकी जड़ और असगंधकी जड़ उत्तराभाद्रपदा नक्षत्रमें उत्तर
मुख कर मूंडपर धरे तो अग्निमें न जरे ॥८७॥

२० रुद्रयामलतन्त्रम्
पतजियाफलैकं च खादयेद्विषभोजिनम् ॥
विषं न स्पृशते तस्य देहे चैव सुखी भवेत् ॥ ८८ ॥
पतजियाका फल विषवालेको खवावे तो उसकी देहमें विष न व्यापे,
सुखी होय ॥८८॥
विजयामूलमादाय गोरोचनघृतं तथा ॥
हस्तलेपेन तिलकं कृत्वा न दह्यते तदा ॥ ८९ ॥
भांगकी जड़ गोरोचन और घृतका हाथमें लेप कर तिलक करे तो न
जरे ॥८९॥
मरिचं पिप्पली शुंठी चर्वयित्वा ग्रसेत् तान् ॥
अर्कतंडुलग्रासेन दिनाई च न स्पृशोत्तम् ॥ ९० ॥
मिर्च पीपल सोंठ इनको चवावे और अर्कके तंडुल चवावे तो दिनाइ न
लगे ॥९०॥
शुंठी वचं घृतं चैव शर्करा च समन्वितम् ॥
जलेन च पिबेद्योपि तप्ततैले न दह्यते ॥ ९१ ॥
सोंठ वच घृत शक्करको जलके संग पीवे तो ताते तेलमें न जरे ॥९१॥
मंत्रः । ॐ अग्निदहंतीकौ धरै समह वहै
कलाई तापिनी ताप चोरी इष्टि द्रव्यपते
अस्तंभइ स्वरतुम सखीये ते अस्तंभ श्री-
महादेवकी आग्या ॥ मंत्रेदं तु पठेद्योपि
तप्ततैले न दह्यते ॥ मंत्रः ॐ लोहाजलन-
प्रजलैकौभाव हो चरुवाके दारका लाहां

हिन्दीटीकासहितम् २१
परैतसारु ।। अग्निस्तंभनम् । ॐ ह्रौं महि
षवाहिनी जेभय मोहय छेदय अग्निस्तंभय
अग्नि अग्निस्तंभय ठः ठः श्रीमहादेवकी
आग्या हनुमानकी आग्या नारायण
सूर्यकी आग्या ।। मंत्रेदं दशसहस्रं जप्त्वा
सिद्धिमवाप्नुयात् ।। ९२ ।।
अग्नि रोकनेका मंत्र पढ़े तो तेलमें न जरे, दूसरा मंत्र दश हजार जपे तो
सिद्धि होय ॥९२॥
मंत्रः । ॐ तता तता अंगरी हेमपथक्रीकि-
वारी महिद्रसीशलं गोर महादेवकी आ-
ग्या । ॐ नमो कंबल कोषिलनिद्रुपति
काढ़ि जलेसलै पूर्वते कतारनु महादेवकी
पूजा खाय पाय तेलै । ॐ अग्नि ववरतिको
धरै मै धरौ गलहंथ्य वाम माया यौनकी-
जो सो कीन्हो हंथ्य जलय प्रजलपदमयं-
येय आवैजः महादेवकी पूजा पावै पाय-
डालै जः । ॐ अग्नि जलतीमें धरि जहा
हर दीन्हो हथ्यं वैमैस्वाद रथ भियौदै ना-
रायण साखीश्रीसूर्यकी आग्या अग्निकुं-
ड ब्रह्मांड जला ऊपर आनौ पानीरेला
आनि वैस्वादर नाचौ मेरी आदिनाथके
जभमरो जी महंमद । ॐ हंगुरुगतीसै लि-

२२ रुद्रयामलतन्त्रम्
खतिकाकमहय्यंईंद्रगस्त्रिहवोरीति । अग्नि-
मुक्तमंत्रेदं हि चाष्टोत्तरशतं जपेत् ।। तदा
सिद्धो भवेच्चैव महादेवप्रसादतः ।। ९३ ।।
यह अग्निमुक्त मंत्र एक सौ आठ वार जपे तो महादेवके प्रसादसे मंत्र
सिद्ध होय ॥९३॥
गोरसं रनिना सार्द्धं पिष्ट्वा लेपं च कारयेत् ।।
मनुष्यास्थौ तथा तं च वह्नौ तैले न निर्दहेत् ।। ९४ ।।
गोरस और रनि पीसकर मनुष्यके हाड़में लेप करे तौ तेलमें वा अग्निमें
न जरे ॥९४॥
मंत्रं जपेच्छनौ वारे बलिदानंसकुक्कुटम् ।।
आदित्यवारे दद्याच्च मद्ये तन्मांसमुत्क्षिपेत् ।। ९५ ।।
शनिवारको मंत्र जपे और कुक्कुटका बलिदान दे रविवारको उसका
मांस मदिरामें छोड़े ॥९५॥
तन्मांसं खरलं कृत्वा वारिणा तिलकं चरेत् ।।
अग्निममध्ये तदा गच्छेदग्निनैंव दहेच्च तम् ।। ९६ ।।
वह मांस जलमें खरल कर तिलक करे और अग्निमें जाय तो न जले
॥९६॥
इयं बाक्सर्वजलेषु सिद्धमस्ति न संशयः ।।
तुंबिलस्सोरयोर्बीजं पुष्पं वारिणि पिष्टयेत् ।। ९७ ।।
यह वाणी सब जलमें सिद्ध है। तोंबीके बीज और लहसोरेकी बीज और
फल जलमें पीस ॥९७॥

हिन्दीटीकासहितम २३
जले निक्षिप्य तं चैव रात्रौ स्तंभो भविष्यति ।।
लवणक्षेपणाच्चैव पुनर्वहति वै जलम् ।। ९८ ।।
रात्रीको जलमें छोड़े तो जल रुके और लोन छोड़े तो फिर बहे ।।९८।।
मंत्रः । ॐनमो भगवते रुद्राय ठः ठः ठः ठः ठः ठः ।
मगरशिवानौगहा एषां गृह्णाति वै शवम् ।।
सर्पस्य च फणं तैले पाचयेन्मध्यमाग्निना ।। ९९ ।।
यह मंत्र पढ़ मगर शिव और नौगहा इन जीवोंकी लाश लेकर और
साँपकी फणा ले तेलमें मध्यम अग्निसे पचावे ।।९९।।
स्वशिरसि नासिकायां कर्णयोरपि लेपयेत् ।।
तदा गच्छति जले वै यथा गच्छति सर्पराट् ।। १०० ।।
और अपने शिरमें नाशिकामे कानमें लगावे तो सांपके सरीखा जलमें
चला जाय ।।१००।।
दिक्सहस्रं जपेन्मंत्रमुपोष्य च चतुर्दिनम् ।।
शिवपूजां ततो कृत्वा सिद्धं यातं च मंत्रकम् ।। १०१ ॥
मंत्रका दश हजार जप करे, चार दिन व्रत करे और शिवकी पूजा करे
तो मंत्र सिद्ध होय ।।१०१।।
प्रथमं च वशीकर्णं ततः स्तंभनकारकम् ।।
मंत्रा उक्ताश्चौषधीश्च सर्वसिद्धिकरीस्तथा ।। १०२ ।।
इति श्रीअवस्थीप्रयागदत्तसुतरामचरणविरचिते
रुद्रयामलशाबरतंत्रे प्रथमः पटलः ।। १ ।।
इस पटलमें प्रथम वशीकरण फिर स्तंभन फिर मंत्र और फिर औषधी
कही है ।।१०२।।
इति भाषाटीकायां प्रथमः पटलः ।।१।।

२४ रुद्रयामलतन्त्रम्
भाषाग्रंथं च दृष्ट्वा हि संस्कृतं कृतवानहम् ॥
नंदरामस्य प्रेरणा चास्माकं प्रचोदयति ॥ १ ॥
भाषाग्रंथ हमने देखा सोही संस्कृत किया, नंदरामका कहना हमको
प्रेरित कर रहा है ॥१॥
अथातः संप्रवक्ष्यामि मोहनं च विशेषतः ॥
धत्तूरस्य च पंचांगं चूर्णयेत्सुसमाहितः ॥ २ ॥
महिषीसर्परुधिरे चार्च्यं तं चापि यत्नतः ॥
संध्यायां धूपयेद्देहभवलोकाच्च मोहति ॥
कृष्णवृश्चिकचूर्णं च धूपयेन्मोहनं भवेत् ॥ ३ ॥
अब इसके उपरांत मोहन कहते हैं । धतूरेका पंचांग चूर्ण कर महिषीका
रुधिर और सर्पका रुधिर उसमें मिलाकर संध्यामें अपने अंगमें धूप दे तो जो
देखे सो मोहित होय ॥२॥३॥
इंदोरंनि चितावारिं समानीय मनःसिलम् ॥
एषां धूपेन च भवेन्मोहनं नात्र संशयः ॥ ४ ॥
इंदोरनि चितावरि और मनःशिल इनका अंगमें धूप दे तो देखेसे मोहन
होय इसमें संदेह नहीं है ॥४॥
धत्तूरस्य च बीजानि हरतालं च गृह्य वै ॥ ५ ॥
खादयेच्चैव यं शत्रुं वातरोगी तदा भवेत् ॥
दुग्धशर्करपानेन वातरोगाद्विमुच्यते ॥ ६ ॥
धतूरेके बीज और हरताल जिस शत्रुको खवावे वह वातरोगी होय और
दुग्ध शक्कर पिलावे तो वात रोगसे छूटे ॥५॥६॥

हिन्दीटीकासहितम् २५
छछूंदरं कृष्णसर्पशिरं वृश्चिकटंककम् ॥
सायं प्रधूपयेदंगं मोहनं च भवेत्तदा ॥ ७ ॥
छछूंदर कृष्णसर्पकी फणा और विच्छूका टाकु ले संध्यामें अंगको धूपित
करे तो मोहन होय ॥७॥
उच्चाटनम् ।
मंत्रः । ॐ विस्वाय नाम गंधर्वलोचनी
नामी लौसतिकरनै तस्मै विश्वाय स्वाहा ।
मंत्रेदं च जपेच्चैव जले स्थित्वा सहस्रकम् ॥
दशांशं हवनं कार्यं मारणोच्चाटनं भवेत् ॥ ८ ॥
यह मंत्र उच्चाटनका है, इस मंत्रका प्रथम जलमें खड़े होकर १ हजार
जप करे और दशांश हवन करे तो मारण और उच्चाटन होय ॥८॥
चितावरस्य काष्ठं च चतुरंगुलमानकम् ॥
पुनर्वसौ च नक्षत्रे गृह्णीयात्सुसमाहितः ॥ ९ ॥
सप्तवारं च मंत्रेण मंत्रयित्वा विधानतः ॥
भूमौ निखनेच्चैव पलायेत्तु न संशयः ॥ १० ॥
चितावरका चार अंगुल काठ पुनर्वसु नक्षत्रमें ले सात वार मंत्र पढ़कर
विधानसे भूमिमें गाडे तो शत्रु भागे ॥९॥१०॥
मंत्रः । ॐ लोहितामुख स्वाहा ।
स्वात्यूक्षे च गृहीत्वा च वेदांगुलप्रमाणकम् ॥
उम्बरीवृक्षस्य काष्ठं यस्य गृहे च खानयेत् ॥
सोपि सद्यो पलायेच्च नात्र कार्या विचारणा ॥ ११ ॥

२६ रुद्रयामलतन्त्रम्
यह मंत्र पढ़कर स्वाति नक्षत्रमें उमरीकी लकड़ी ४ अंगुल ले जिसके
भमिमें गाड़े वह शत्रु शीघ्र भाग जाय इसमें विचार नहीं ॥११॥
मंत्रः । गिली स्वाहा ।
भरण्यां च गृहीत्वैव अरुवापाखमुत्तमम् ॥
सप्तवारं च मंत्रेण निचखान गृहे यदा ॥
तदा पलायेद्रिपुश्चनात्र कार्या विचारणा ॥ १२ ॥
भरणी नक्षत्रमें अरुवाकीपाख कीशौनाकी छिपोंका पाख आधा फार
ले सातवार मंत्र पढ़कर जिसके गृहमें गाड़ देय वह रिपु भाग जाय इसमें विचार
नहीं ॥१२॥
मंत्र । ॐ दहदहवन स्वाहा ।
अश्वन्यृक्षे गृहीत्वैव वाज्यस्थिचतुरंगुलम् ॥
सप्तवारं च मंत्रेण निखनेच्च रिपोर्गृहे ॥
सोपि यातो गृहाच्छीघ्रं पलायनपरो भवेत् ॥ १३ ॥
अश्विनी नक्षत्रमें बाजीका हाड़ ४ अंगुल ले सात वार मंत्र पढ़कर शत्रुके
घरमें गाड़ दे तो शत्रु भाग जाय ॥१३॥
मंत्रः ॐ घुंघूतिठःठः स्वाहा ।
अरुवावृक्षस्य पाषमष्टोत्तरशतं हुनेत् ॥
यस्य नाम गृहीत्वैव सोपि भग्नो भवेद्ध्रुवम् ॥ १४ ॥
शौनका एक पाश ले एक सो आठ वार मंत्र पढ़ जिसका नाम लेकर हवन
करे सो भाग जाय ॥१४॥

हिन्दीटीकासहितम् २७
मंत्रः । ॐ नभो भगवते रुद्राय दंष्ट्राकरां
लायकपिरूपाय अमुकपुत्रबांधवैः सह हन
हन दह दह चय चय शीघ्रमुच्चाटय फुंफट्
स्वाहा ठः ठः। मानुषास्थिसमादाय चतु
रंगुलकं शुभम् ॥ यस्यांगणे निचखने-
त्सोपि भाग्नो भवेद्गृहात् ॥ १५ ॥
यह मंत्र पढ़कर मनुष्यका हाड़ ४ अंगुल ले जिसके आंगनमें गाड़ देय तो
गृहसे भाग जाय ।।१५।।
भरण्यृक्षे समादाय स्मशानकाष्ठं त्र्यंगुलम् ॥
षट्सप्ततिवारांश्च जपित्वा मंत्रमेव च ।:
यस्य गृहे निचखनेत्तस्य नाशो भवेद्ध्रुवम् ॥ १६ ॥
भरणी नक्षत्रमें मसानकी लकड़ी तीन अंगुल ले छिहत्तर ७६ वार मंत्र
जप जिसके गृहमें गाडे उसका नाश होय ।।१६।।
मंत्र । ॐ निरिनिहिउठः ।
ॐ नमो भगवतेरुद्राय अमुकगृहनगृहनपचपचत्रासय
त्रोटयनाशयसुरतिराग्यायति ठः ठः।
अंगुलैकं मानुषस्य चास्थिकीलं समानयेत् ॥
काकपित्तेन संश्लिष्टं द्वारि खानात्पलायते ॥ १७ ॥
यह मंत्र पढ़ एक अंगुल मनुष्यके हाड़की कील काकके पित्तमें भिजोके
जिसके द्वारमें गाड़े सो भाग जाय ।।१७।।

२८ रुद्रयामलतन्त्रम्
मंत्रः ॐ ह्रीं दंडीनंहीनमहादंडिनमस्ते ठः ठः।
सप्तांगुलं मानुषास्थिकीलं निच खनेद्गृहे ॥
मंत्रेण च यस्य रिपोर्गृहं त्यक्त्वा पलायते ॥ १८ ॥
मंत्र पढ़कर सात अंगुल मनुष्यके हाड़की कील गृहमें गाडे तो शत्रु
भाग जाय ॥१८॥
अर्द्धझारस्य कीलं च चतुरंगुलकं तथा ॥
मघायां च जपेन्मंत्रं वशीभूतो न संशयः ॥ १९ ॥
आधेझारेकी चार अंगुलकी लकड़ी मघा नक्षत्रमें ले मंत्र जपकर उसकी
कील गाड़े तो वश्य होय ॥१९॥
पुष्यर्क्षे मानुषास्थिचतुरंगुलकीलकम् ॥
नामोच्चारणमात्रेण गृहे च निचखानयेत् ॥
सोपिमृत्युमवाप्नोतिब्रह्मणारक्षितो यदि ॥ २० ॥
पुष्यनक्षत्रमें मनुष्यके हाड़की कील ४ अंगुल लेकर मंत्र पढ़ नाम ले
गाड़ दे सो ब्रह्मातक रक्षा करे तोभी मर जाय ॥२०॥
मंत्रः । ॐ शुरशुरे स्वाहा ।
सर्पास्थिचांगुलं चैकमाश्लेषार्क्षे समानयेत् ॥
निखनेत्सप्तमंत्रेण तदा च मरणं भवेत् ॥ २१ ॥
मंत्र पढ़कर सर्पके हाड़की एक कील ले आश्लेषा नक्षत्रमें ले सात बार
मंत्र पढ़ गाड़े तौ मरण होय ॥२१॥
मंत्रः । ॐ शुक्ले स्वाहा ।
छूळ्दियाकीटमेकं वृश्चिकटंकमेव च ॥
तजं केवाक्षबीजं च चैकत्र सह मर्दयेत् ॥ २२ ॥