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सर्वकोश
रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 68 में से

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पृष्ठ 20

१८ रुद्रयामलतन्त्रम्
मंत्रेणानेन तर्पयेदष्टोत्तरशतं च तम् ।
नामोच्चारणमात्रेण बुद्धिनाशो भवेद्रिपोः ॥ ७७ ॥
इस मंत्रसे शत्रु का नाम लेकर एक सौ आठ वार तर्पण करे तो रिपुकी
बुद्धि नष्ट होय ॥७७॥
मंत्रः । ॐ नमो ब्रह्मवासिनी रछ रंछ ठः ठः स्वाहा ।
मंत्रेदं च पठित्वा तु सप्त केशान्समाहरेत् ॥
करे बध्नाति त्रयं च द्वौ द्वौ हस्ते समानयेत् ॥
चौरकार्ये तदा यातः न वदंति च केचन ॥ ७८ ॥
मंत्र पढ़कर सात बाल उखाड़े तीन हाथमें बांधे, दो दो बाल हाथमें रखे
और चोरीको जाय तो कोई न बोले ॥७८॥
अंकोललक्ष्मणामूलं शरपुंखकमेवच ॥ ७९ ॥
मयूरपिच्छस्य मूलं छिर्हंटामूलमेवच ॥
बृहद्दद्रुघ्नमूलं च पुष्यार्के तु समानयेत् ॥ ८० ॥
अंकोलकी जड़, लक्ष्मणाकी जड़, सरफोकाकी जड़, मयूरशिखाकी
जड़, छिर्हंटाकी जड़ और कसौंदीकी जड़ पुष्यार्कमें लेकर ॥७९॥८०॥
गृहे स्थितेऽपि न भयं राजतश्चोरतोऽपि च ॥
गृहीत्वा केतकीमूलं शिरसि धारयेच्च यः ॥ ८१ ॥
गृहमे रखे तो चोरादिकोंका भय नहीं होय तथा केतकीकी जड़ शिरमें
रखे तो भी भय नहीं होय ॥८१॥
तालवृक्षस्य मूलं च मूर्ध्नि धारणमात्रतः ॥
पादे खर्जूरमूलं च खङ्गो न छिद्यते तदा ॥ ८२ ॥