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सर्वकोश
रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 68 में से

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पृष्ठ 24

२२ रुद्रयामलतन्त्रम्
खतिकाकमहय्यंईंद्रगस्त्रिहवोरीति । अग्नि-
मुक्तमंत्रेदं हि चाष्टोत्तरशतं जपेत् ।। तदा
सिद्धो भवेच्चैव महादेवप्रसादतः ।। ९३ ।।
यह अग्निमुक्त मंत्र एक सौ आठ वार जपे तो महादेवके प्रसादसे मंत्र
सिद्ध होय ॥९३॥
गोरसं रनिना सार्द्धं पिष्ट्वा लेपं च कारयेत् ।।
मनुष्यास्थौ तथा तं च वह्नौ तैले न निर्दहेत् ।। ९४ ।।
गोरस और रनि पीसकर मनुष्यके हाड़में लेप करे तौ तेलमें वा अग्निमें
न जरे ॥९४॥
मंत्रं जपेच्छनौ वारे बलिदानंसकुक्कुटम् ।।
आदित्यवारे दद्याच्च मद्ये तन्मांसमुत्क्षिपेत् ।। ९५ ।।
शनिवारको मंत्र जपे और कुक्कुटका बलिदान दे रविवारको उसका
मांस मदिरामें छोड़े ॥९५॥
तन्मांसं खरलं कृत्वा वारिणा तिलकं चरेत् ।।
अग्निममध्ये तदा गच्छेदग्निनैंव दहेच्च तम् ।। ९६ ।।
वह मांस जलमें खरल कर तिलक करे और अग्निमें जाय तो न जले
॥९६॥
इयं बाक्सर्वजलेषु सिद्धमस्ति न संशयः ।।
तुंबिलस्सोरयोर्बीजं पुष्पं वारिणि पिष्टयेत् ।। ९७ ।।
यह वाणी सब जलमें सिद्ध है। तोंबीके बीज और लहसोरेकी बीज और
फल जलमें पीस ॥९७॥