रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२० रुद्रयामलतन्त्रम्
पतजियाफलैकं च खादयेद्विषभोजिनम् ॥
विषं न स्पृशते तस्य देहे चैव सुखी भवेत् ॥ ८८ ॥
पतजियाका फल विषवालेको खवावे तो उसकी देहमें विष न व्यापे,
सुखी होय ॥८८॥
विजयामूलमादाय गोरोचनघृतं तथा ॥
हस्तलेपेन तिलकं कृत्वा न दह्यते तदा ॥ ८९ ॥
भांगकी जड़ गोरोचन और घृतका हाथमें लेप कर तिलक करे तो न
जरे ॥८९॥
मरिचं पिप्पली शुंठी चर्वयित्वा ग्रसेत् तान् ॥
अर्कतंडुलग्रासेन दिनाई च न स्पृशोत्तम् ॥ ९० ॥
मिर्च पीपल सोंठ इनको चवावे और अर्कके तंडुल चवावे तो दिनाइ न
लगे ॥९०॥
शुंठी वचं घृतं चैव शर्करा च समन्वितम् ॥
जलेन च पिबेद्योपि तप्ततैले न दह्यते ॥ ९१ ॥
सोंठ वच घृत शक्करको जलके संग पीवे तो ताते तेलमें न जरे ॥९१॥
मंत्रः । ॐ अग्निदहंतीकौ धरै समह वहै
कलाई तापिनी ताप चोरी इष्टि द्रव्यपते
अस्तंभइ स्वरतुम सखीये ते अस्तंभ श्री-
महादेवकी आग्या ॥ मंत्रेदं तु पठेद्योपि
तप्ततैले न दह्यते ॥ मंत्रः ॐ लोहाजलन-
प्रजलैकौभाव हो चरुवाके दारका लाहां