रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
: ५ :
रसखान की भक्ति-पद्धति
'भक्ति' शब्द की उत्पत्ति 'भज्' धातु से हुई है जिसका अर्थ है भजन ।
इसलिए भक्ति का अर्थ हुआ भगवान् का भजन अथवा स्मरण । मनुष्य आनन्द
प्राप्त करने का अनादिकाल से ही इच्छुक रहा है और इसके लिए सदैव प्रयत्न-
शील रहा है । इन्द्रियो के सहयोग से भी आनन्द प्राप्त होता है, पर इसे
वास्तविक आनन्द नही कहा जा सकता, क्योकि यह सासारिक, क्षणिक और
दुःख-पर्यवसायी है । इसी सत्य को गीता मे इन शब्दो मे प्रतिपादित किया
गया है—
'ये हि संस्पर्शजाभोगा दुखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ।।'
इसीलिए बुद्धिमान लोग इन सासारिक सुखो की ओर आकर्षित नही
होते । महर्षि पतंजलि ने भी विवेकी के लिए संसार के समस्त भोगो को दुःख
का कारण बताया है—
'परिणामताप सस्कार दुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च सर्वमेवदुःख विवेकिन ।'
सभी आचार्यों ने इस मत को एक स्वर से स्वीकार किया है कि वास्तविक
आनन्द तो भगवत्सान्निध्य से ही प्राप्त हो सकता है । इसी सान्निध्य के
सान्निध्य का प्रयास भक्ति है । इस सान्निध्य को प्राप्त करने के लिए दो मार्ग
प्रमुख माने गये है—प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्तिमार्ग । प्रवृत्ति मार्ग का अर्थ है शरीर
की स्वाभाविक प्रवृत्तियो द्वारा परमेश्वर को प्राप्त करना, अर्थात् विषयो को
भगवदोन्मुख कर देना । इस मार्ग के दो भेद है—कर्ममार्ग और भक्तिमार्ग ।
निवृत्ति मार्ग का अर्थ है प्रतिकूल वृत्तियो की निवृत्ति करके विवेक द्वारा
अनात्म को त्यागते हुए भगवान् का साक्षात्कार । इस मार्ग के भी दो भेद है—
योगमार्ग और ज्ञानमार्ग । योगमार्ग का अर्थ है विषयो से चित्तवृत्तियो का निरोध
करके ईश्वर मे सगमन करना, और ज्ञानमार्ग का अर्थ है आत्म-अनात्म का भेद
समीक्षा भाग ६६
करता । निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भगवत्प्राप्ति के चार मार्ग है—कर्म-
मार्ग, भक्तिमार्ग, योगमार्ग और ज्ञानमार्ग । इन मार्गों मे भक्तिमार्ग को ही
सर्वश्रेष्ठ बताया गया है, क्योकि यह सहज साध्य है—
'अन्यस्मात् सौलभ्य भक्तौ ।'
आचार्यों द्वारा भक्ति की भिन्न-भिन्न परिभाषाएँ दी गई है । महर्षि नारद
के अनुसार भक्ति परमप्रेमरूपा और अमृतस्वरूपा है जिसे प्राप्त करके मनुष्य
सिद्ध, अमर तथा तृप्त हो जाता है—
'त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा अमृतरूपा च । यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति,
अमृतो भवति, तृप्तो भवति ।
भक्तराज शांडिल्य ने ईश्वर मे प्रगाढ अनुरक्ति को भक्ति कहा है—
'सापरानुरक्तिरीश्वरे ।'
भागवतकार के अनुसार सासारिक विषयो का ज्ञान देने वाली इन्द्रियो की
स्वाभाविक प्रवृत्ति निष्काम रूप से जब भगवदोन्मुख हो जाती है तो उसे भक्ति
कहते है—
'देवाना गुणलिंगानामनुश्रविक कर्मणा सत्व एवैक मनसो वृत्तिः स्वाभाविकी
तु याऽनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी ।'
रूपगोस्वामी के मत से श्रीकृष्ण का अनुकूल रूप मे अनुशीलन जिसमे अन्य
किसी प्रकार की अभिलाषा न हो और जिस पर ज्ञान, कर्म आदि का आवरण
न हो, भक्ति कहलाता है—
'अन्याभिलाषिता शून्य ज्ञान कर्माद्यनावृतम् ।
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलं भक्तिरुत्तमा ॥'
वल्लभाचार्य के अनुसार भगवान के महात्म्य का ज्ञान रखते हुए उनमे सबसे
अधिक दृढ स्नेह करना भक्ति है—
'महात्म्य ज्ञानपूर्वस्तु सुदृढः सर्वतोऽधिकः ।
स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तयामुक्तिर्न चान्यथा ॥'
इन सभी परिभाषाओ मे एक तत्त्व सर्वथा विद्यमान है । वह है ईश्वर के
प्रति अनुराग । प्राय. सभी भक्त-सम्प्रदायो ने अनुराग को भक्ति का अनिवार्य
अंग माना है । वल्लभीय सम्प्रदायी हरिराम अनुराग की महत्ता इन शब्दों मे
प्रतिष्ठित करते हैं—
७०
रसखान-ग्रन्थावली
'सो ठाकुर जी भक्त के स्नेहवश होय भक्त के पाछे-पाछे डोलते है । सो
जहाँ ताईं ऐसो स्नेह नही होय तहाँ ताईं महात्म्य रखनो......तासो महात्म्य
विचारै और अपराध सौं डरपै तो कृपा होय । जब सर्वोपरि स्नेह होयगो तब
आपही ते स्नेह एसो पदार्थ जो महात्म्य कूँ छुडाय देयगो ।'
भक्ति के अनेक भेद है । इसके विभाजन के मुख्यतया चार आधार माने
जाते है—
१. साधना का आधार ।
२. अधिकारी का आधार ।
३ प्रेरणा का आधार ।
४. विकास का आधार ।
साधना के आधार पर, भागवतकार ने भक्ति के नौ भेद किये है—श्रवण,
कीर्तन, स्मरण, पादसेवा, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन ।
अष्टछाप के प्रमुख कवि नन्ददास ने पहले छह भेदो को दो भागो के अन्तर्गत
सपांदित किया है—नादमार्ग और रसमार्ग । पहले तीन प्रकार अर्थात् श्रवण,
कीर्तन और स्मरण नादमार्ग के और पादसेवा, अर्चन तथा वन्दन रसमार्ग के
अन्तर्गत आते है ।
अधिकारी के आधार पर भक्ति के चार भेद माने गये है—सात्विकी,
राजसी, तामसी और निर्गुण । जो भक्त पापो के नाश के लिए अपने पाप-पुण्य
सब भगवदर्पित कर देता है और अनन्य भाव से ईश्वर मे आसक्ति रखता
है, उसकी भक्ति सात्विकी कहलाती है, राजसी भक्ति लौकिक विषय, यश,
ऐश्वर्य आदि को दृष्टि मे रखकर की जाती है । तामसी भक्ति मे हिंसा, दम्भ,
क्रोधादि के वशीभूत होकर इच्छाओ की पूर्ति के लिए भगवत-उपासना की
जाती है । निर्गुण भक्ति में परमेश्वर को सब मे सम भाव से व्याप्त जानते हुए
अपने समस्त कर्म परमेश्वर को अर्पित किये जाते है । इसमे निष्काम आसक्ति
रहती है ।
प्रेरणा के आधार पर भक्ति के अनेक भेद हो सकते है, क्योकि प्रेरणाओ
की कोई संख्या निर्धारित नही की जा सकती । गीता मे आर्त, जिज्ञासु,
अर्थार्थी और ज्ञानी ये चार प्रकार के भक्त बताये गये है—
'चतुर्विधा भजन्ते मा जना सुकृतिनोर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।'
इन्ही भक्तो के आधार पर भक्ति के भी चार भेद किये जा सकते है ।
आर्त भक्त की भक्ति तामसी, जिज्ञासु की सात्विकी, अर्थार्थी की राजसी और
ज्ञानी की निर्गुण कहलाती है ।
रूपगोस्वामी ने, विकास के आधार पर भक्ति के तीन भेद माने है-
साधनरूपा, भावरूपा और प्रेमरूपा । साधनरूपा भक्ति भक्त की प्रथम अवस्था
की द्योतिका है। इसमे भक्त का परमेश्वर से पूर्ण राग तो नही होता, किन्तु
अर्चना आदि कर्मों के द्वारा वह उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है । भाव-
रूपा भक्ति उसका साध्य होती है। भावरूपा भक्ति के दो भेद है- वैधी और
और रागानुग । जब परमेश्वर मे स्वतः राग नही होता, वरन् शास्त्रो के
शासन से अर्जित किया जाता है तो उसे वैधी भक्ति कहते है । वैधी भक्ति मे
शास्त्र-ज्ञान का महत्वपूर्ण स्थान होता है । रागानुसार भक्ति मे अनुराग का
प्राधान्य होता है । इसमे शास्त्रीय ज्ञान की अपेक्षा नही होती, वरन् भावना
का अतिरेक आवश्यक है । परमेश्वर की ह्लादिनी, संगिनी और संवित् नाम
की जो तीन शक्तियाँ है इनमे से पहली का जीवो मे प्रेम-रूप से प्रकट होने
वाला अंश शुद्ध तत्त्व कहलाता है । यही भाव है । इसी भाव की भक्ति को
भावरूपा भक्ति कहते है । हृदय जब भाव मे अत्यन्त द्रवीभूत और प्रगाढ ममता
से सयुक्त हो जाता है तो यही प्रगाढावस्था प्रेम कहलाती है । इस भाव की भक्ति
को प्रेमरूपा भक्ति कहते है । साधनारूपा भक्ति से प्रेमरूपा भक्ति तक आने
के लिए भक्त को भक्ति-विकास के अनेक सोपानो को पार करना पडता है ।
भक्ति के स्वरूप पर विहगम दृष्टिपात करने के पश्चात् अब उन कृष्ण-
भक्ति के समुदायो का संक्षिप्त परिचय जान लेना आवश्यक है जिन्होने भक्ति-
जगत् एव साहित्य को प्रचुरता से प्रभावित किया है । इन समुदायो मे से मुख्य
सम्प्रदाय ये है--
१ वल्लभ सम्प्रदाय !
२. गौडीय सम्प्रदाय ।
३. राधावल्लभीय सम्प्रदाय ।
७२ रसखान-ग्रन्थावली
४. सखी-सम्प्रदाय ।
५ निम्बार्क सम्प्रदाय ।
वल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक वल्लभाचार्य है। वल्लभाचार्य ने प्रेम-लक्षणा
भक्ति को महत्ता प्रदान की है और नवधा भक्ति का प्रतिपादन किया है। इस
सम्प्रदाय मे कृष्ण-भक्ति को प्रधानता दी गई है और राधा को उनकी (भगवान्
की) आल्हादिनी शक्ति अथवा रसशक्ति के रूप मे स्वीकार किया गया है।
कृष्ण-भक्त साहित्य मे इस सम्प्रदाय को सर्वाधिक मान्यता मिली है और
इसका प्रचार सबसे अधिक हुआ है।
गौडीय सम्प्रदाय के प्रवर्तक चैतन्य महाप्रभु है। इस सम्प्रदाय मे राधा और
कृष्ण के समान महत्त्व को स्वीकार किया गया है और दोनो की समान पूजा
का विधान माना गया है। इसमे सत्सग, नाम तथा लीला-कीर्तन, ब्रज-वृन्दावन,
कृष्ण-मूर्ति की सेवा पूजा आदि भक्ति के साधनो को विशेष महत्त्व दिया
गया है।
राधाबल्लभीय सम्प्रदाय के प्रवर्तक स्वामी हितहरिवंश है। इस सम्प्रदाय
मे राधा की पूजा को प्रधानता दी गई है, यद्यपि कृष्ण-पूजा की भी उपेक्षा
नही है। इसमे राधा-कृष्ण की कुंजलीला तथा शृंगारकेलि को प्रधानता देने
के कारण रति-क्रीडा का ही एक मात्र आलंबन ग्रहण किया गया है। इसमें
विप्रलंभ शृंगार का अभाव तो है, किन्तु सूक्ष्म विरह की अनोखी सृष्टि की
गई है।
सखी सम्प्रदाय का दूसरा नाम हरिदासी सम्प्रदाय भी है, क्योकि हरिदास
इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक है। इस सम्प्रदाय मे राधा-कृष्ण की युगल-उपासना
का विधान सखी-भाव से किया गया है।
निम्बार्क-सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य निम्बार्क है। वल्लभ और गौडीय
सम्प्रदायो की भाँति इस सम्प्रदाय मे भी मधुर भाव की उत्कृष्टता स्वीकार की
गई है। इस सम्प्रदाय मे कृष्ण को आराध्य माना गया है जो अपनी प्रेम और
माधुर्य की अधिष्ठात्री शक्ति राधा तथा अन्य आह्लादिनी गोपी-स्वरूपा शक्तियो
से घिरे रहते है। इस सम्प्रदाय मे कृष्णोपासना के साथ-साथ राधा की उपा-
सना का भी विशेष महत्त्व माना गया है।
समीक्षा भाग ७३
रसखान की भक्ति-पद्धति
रसखान बल्लभ सम्प्रदाय के अनुयायी है, अतः इनकी भक्ति-पद्धति वैष्णव-
भक्ति है। वैष्णव भक्ति-पद्धति मे नवधा भक्ति को पूर्ण महत्त्व दिया गया है।
नवधा भक्ति के नौ सोपान हैं—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पद-सेवा, अर्चन, वन्दन
दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। सूरदास ने इसमे मधुर भाव को जोडकर इसके
दस सोपान बना दिये है। श्रवण मे भक्त अपने आराध्य के गुणो को सुनता है,
कीर्तन के द्वारा उन्हे प्रकट करता है, । नाचकर तथा गाकर सुनाता है। पद-
सेवा का अर्थ है भगवान के चरणों की पूजा करना अथवा उनके चरणो की
महत्ता का वर्णन करना। अर्चन का अर्थ है पूजा करना, वन्दन का अर्थ है स्तुति
करना। दास्य मे भक्त दास-भाव से अपने आराध्य की सेवा करता है अथवा
उसका गुण-गान करता है और आत्मनिवेदन मे भक्त अपने भगवान के समक्ष
अपना हृदय खोलकर रख देता है। रसखान के काव्य मे ये सभी सोपान
प्राप्त नही होते। वस्तुत रसखान किसी बांधी हुई पद्धति पर चलनेवाले भक्त
नही है। ये प्रेमोमंग के भक्त है, अत इनके काव्य मे माधुर्य भक्ति ही अधिक
दिखाई पडती है।
माधुर्य भक्ति के तीन अंग प्रमुख है— रूप-वर्णन, विरह-वर्णन और पूर्णतया
आत्मसमर्पण। रसखान-काव्य मे ये तीनो अंग पाये जाते है। रूप-वर्णन के कुछ
उदाहरण देखिए —
१. 'मोतिन माल बनी नट के, लटकी लटवा लट घूँघरवारी।
अंग ही अंग जराव लसै ग्रह सीस लसै पगिया जरतारी।
पूरब पुन्यनि तें रसखानि सु मोहिनी मूरति आनि निहारी।
चार्यो दिसानि की लै छवि आनि कै झांके झरोखे मैं बाँकेबिहारी ॥'
२. 'गोरज विराजै भाल लहलही बनमाल,
आगे गैयाँ पाछै ग्वाल गावै मृदु तानि री।
तैसी धुनि बांसुरी की मधुर मधुर जैसी,
बक चितवनि मद मंद मुसकानि री।
७४ रसखान-ग्रन्थावली
कदंब विटप के निकट तटनी के तट,
अटा चढ़ि चाहि पीत-पट फहरानि री ।
रस वरसावै तन तपनि बुझावै नैन,
आननि रिझावै वह आवै रसखानि री ।
३ 'नैननि बक बिसाल के वाननि झेलि सकै अस कौन नवेली ।
लोलत है हिय तीछन कोर मुमार गिरी तिय कोटिक हेली ।
छोडै नहीं छिनहूं रसखानि सु लागी फिरै द्रुम मों जनु वेली ।
रौरि परि छवि की ब्रजमडल कुंडल गंड'न कुंतल केली ॥'
४ 'बांकी बडी अँखियाँ वडरारे कपोल'न बोलनि की कल वानी ।
सुन्दर हास सुधानिधि सो मुख मूरति रंग सुधारस-सानी ।
ऐसी नवेली ने देखे कहूँ ब्रजराज लला अति ही सुखदानी ।
डोलति है बन वीथिन में रसखानि मनोहर रूप लुभानी ॥'
५. 'लाल लसै पगिया सब के पट कोटि सुगंधनि भीने ।
अंगनि अंग सजे सब ही रसखानि अनेक जराउ नवीने ।
मुकता गल माल लसै सबके सब ग्वार कुमार सिंगार सो कीने ।
पै सिगरे ब्रज वेहरि ही हरि ही के हरै हियरा हरि लीने ॥'
६ 'साँझ समै जिहि देखती ही तिहि पेखन का कौ मन यों 'ललकै री ।
ऊँची अटान चढ़ी ब्रजबाल सु लाज मनेह दुरै उझकै री ।
गोधन धूरि की धूँधरी मैं तिनकी छवि यों रसखानि तकै री ।
पावक के गिरि ते बुझि मानो धुँवा-लपटी लपटै लपकै री ॥'
जिस प्रकार रसखान ने कृष्ण के रूप का, सौन्दर्य का वर्णन किया है,
उसी प्रकार राधा के सौन्दर्य का भी विस्तार से वर्णन किया है । कुछ
उदाहरण प्रस्तुत है—
१. 'प्यारी की चाह सिंगार तरंगनि जाय लगी रति की दुति कूलनि ।
जोबन जेब कहा कहिये उर पै छवि मजु अनेक दुकूलनि ।
समीक्षा भाग ७५
कंचुकी सेत मे जावक बिन्दु बिलोकि मरै मघवानि की सूलनि ।
पूजे है आजु मनो रसखान सुभूत के भूप बंधूक के फूलनि ॥'
२. 'बाँकी मरोर गही भृकुटीन लगी अँखियां तिरछानि निया की ।
टांक सी लॉक भई रसखानि सुदामिनि तें दुति दूनी हिमा की ।
सोहै तरंग अनंग की अगनि ओप उरोज उठी छतिया की ।
जोबन-जोति सु यो दमकै उसकाइ दई मनो बाती दिया की ॥'
३. 'बासर तूँ जु कहूँ निकरै रबि को रथ मांझ अकास अरै री ।
रैन यहै गति है रसखानि छपाकर आँगन ते न टरै री ।
ओस निस्वास चल्योई करै निसिद्योस की आसन पाय करै री ।
तेरो न जात कछू दिन राति विचारै बटोही की बाट परै री ॥'
४ 'प्रेम-कथानि की बात चलै चमकै चित चचलता चिनगारी ।
लोचन बंक विलोकनि लोलनि बोलनि मै बतिया रसकारी ।
सोहै तरंग अनग की अगनि कोमल यौ झमकै झनकारी ।
पूतरी खेतत ही पटकी रसखानि सु चौपर खेलत प्यारी ॥'
५ 'जाको लसै मुख चंद समान कमानी सी भौंह गुमान हरै ।
दीरघ नैन सरोजहुँ तै मृग खंजन मीन की पाँत दरै ।
रसखान उरोज निहारत ही मुनि कौन समाधिन जाहि टरै ।
जिहिं नीके नवै कटि हार के भार सो तासो कहै सब काम करै ॥'
इस प्रकार रसखान ने रूप का वर्णन काफी विस्तार से किया है। माधुर्य
भक्ति की सफल अभिव्यंजना के लिए यह विस्तार आवश्यक भी है।
माधुर्य भक्ति का दूसरा अंग है विरह-वर्णन। रसखान ने इस अंग का
भी काफी विस्तार से वर्णन किया है। सारे बागो मे फूल खिल गये है। बसन्त
के आगमन के कारण भौरे उन पर गूँज रहे है। कोयल की कू-कू सुनकर
सबके प्रिय विदेश से वापिस लौट चले है, लेकिन कृष्ण इतने कठोर हैं कि वे
इस मादक ऋतु की तनिक भी चिन्ता नहीं करते। जब कोयल बोलती है तो
कृष्ण की प्रियतमा के हृदय मे वह बरछी के समान लगती है—
७६ रसखान-ग्रन्थावली
'फूलत फूल सबै वन बागन बोलत भौर बसंत के आवत ।
कोयल की किलकार मुनै सब कंत बिदेसन ते सब आवत ।
ऐसे कठोर महा रसखान जू नेकहु मोरी ये पीर न पावत ।
हूक सी सालन है हिय मैं जब वैरिन कोयल कूक सुनावत ॥
वियोग के कारण विरहिणी के शरीर की द्युति मन्द पड गई है । उसका
कमल जैसा कोमल मुख भी मुरझा गया है । उसक हृदय की साँसे लपट बन-
कर जलने लगी हैं । ऐसे ही अवसर पर जब उसे यह सूचना मिलती है कि
उसका प्रियतम आ गया है तो उसकी क्षीण होती हुई शरीर द्युति इस प्रकार
दमक उठती है मानो दिये की बाती उकसा दी हो —
'रसखान सुनाह वियोग के ताप मलीन महा दुति देह तिया की ।
पंकज सी मुख गौ मुरझाय लगी लपटै वरै स्वास हिमा की ।
ऐसे मे आवत कान्ह सुने हुलसै सुतनी तरकी अँगिया की ।
यो जग जोति उठी तन की उकसाय दई मनो बाती दिया की ॥'
विरह वर्णन मे कही-कही रसखान परम्परा से इतने जडीभूत हो गये है कि
भावलोक की क्षति का ध्यान भी भूल गये है और परम्परा के अवाध प्रवाह मे
वह गये है । यथा—
'बिरहा की जु आँच लगी तन मे तब जाय परी जमुना जल मे ।
विरहानल तँ जल सूखि गयौ मछली वही छांड़ि गई तल मे ।
जब रेत फटी रु पताल गई तब शेष जर्यो धरती-तल मे ।
रसखान तबै इहि आँच मिटै जब आय कै स्याम लगे गल मे ॥'
अर्थात् जब विरहिणी के शरीर मे वियोग-दुख की अग्नि वढ गई तो वह
उसे शान्त करने के लिए यमुना के जल मे कूद गई । तब विरह की आग के
कारण यमुना का जल सूख गया और मछलियाँ जल के अभाव के कारण यमुना
के तल मे बैठ गई । उस आग के कारण जब यमुना का जल अत्यन्त गरम हो
गया तो उसकी गरमी से पाताल-लोक मे स्थित शेषनाग भी जलने लगा । रस-
खान कहते है कि यह ज्वाला तभी शात हो सकती है जब कृष्ण उसके गले से
आकर लगेगे ।
लेकिन सर्वत्र ऐसी ऊहात्मकता नही है । एक भावपूर्ण कवि के लिए यह
समीक्षा भाग ७७
संभव भी नही था । यथा —
'बाल गुलाब के नीर उसीर सो पीर न जाइ हिये जिन ढारौ ।
कंज की माल करौ जु बिछावन होत कहा पुनि चंदन गारौ ।
एते इलाज बिकाज करौ रसखान कों काहे को जारै पै जारौ ।
चाहति हौ जु जिबायौ पटू तो दिखावौ बडी बडी आँखिनवारौ ॥'
इस सवैया मे हृदय की सहज भावनाएँ मुखरित है । विरहिणी के विरह
का सच्चा इलाज यही है कि उसका प्रियतम उसे मिल जाये । अन्यथा अन्य
इतर उपचारो मे कोई लाभ नही है । इसलिए तो विरहिणी अपनी सखी से
कहती है कि मेरे हृदय पर गुलाबजल और खस छिड़कना बेकार है । कज-
माला का बिछावन करने मे तथा चंदन का लेप करने से भी कोई लाभ नही
है । ये सारे उपचार व्यर्थ है, वरन् ये तो मेरी पीडा को, जलन को, और भी
अधिक बढाते है । हे सखि ! यदि तुम मुझे जीवित रखना चाहती हो तो मुझे
विशाल नेत्र वाले कृष्ण का दर्शन करा दो । यही एकमात्र उपचार मेरे विरह-
रोग को ठीक कर सकता है ।
माधुर्य भक्ति का तीसरा प्रमुख अंग है पूर्णतया आत्मसमर्पण । जब तक
भक्त स्वयं को अपने अराध्य के प्रति पूर्णतया समर्पित नही कर देगा, तब तक
उसका उसके प्रति प्रेम और विश्वास अधूरा ही रहेगा । रसखान को अपने
अपराध्य पर पूर्ण विश्वास है । उसके सरक्षण मे ये सब प्रकार के दुखो से तथा
कष्टो से स्वय को सुरक्षित समझते है—
'कहा करै रसखानि को, कोऊ चुगुल लबार ।
जो पै राखनहार है, माखनचाखनहार ॥'
इसलिए इनका मन कृष्ण के लिए चातक बना हुआ है —
'विमल सरस रसखानि मिलि, भई सकल रसखानि ।
सोई नव रसखानि को, चित चातक रसखानि ॥'
अपने अराध्य के प्रति इनका इतना घनिष्ठ स्नेह है कि ये युग-युगान्त तक
उसका सान्निध्य प्राप्त करना चाहते है । इनकी इच्छा है कि यदि मुझे आगामी
जन्म मे मनुष्य-योनि मिले तो मैं व वही मनुष्य बनूं जिसे ब्रज और गोकुल के
ग्वालों के मध्य खेलने का अवसर मिले । यदि पशु-योनि मिले तो उस गाय का
७८ रसखान-ग्रन्थावली
जो नंद की गायो के साथ विचरण कर सके । यदि पाषाण-योनि मिले तो उसी
पर्वत की शिला वनूँ जिसे कृष्ण ने इन्द्र का गर्व खंडित करने के लिए अपने
हाथ से उठाया था और यदि पक्षी बनूँ तो मुझे यमुना-तट पर उगे हुए कदम्ब-
वृक्षो पर निवास करने का अवसर मिले -
'मानुष हों तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन ।
जो पसु हौं तौ कहा बस मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन ।
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर धारन ।
जो खग हौ तौ बसेरो करौं मिलि कालिन्दी कूल कदम्ब की डारन ।।'
इसी प्रकार ये अपने शरीरावयवो की सार्थकता इस बात मे मानते है कि
वे आराध्यदेव के काम आये -
'जो रसना रस ना बिलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन ।
मो कर नीकी करै करनी जु पै-कुँज कुटीरन देहु वुहारन ।
सिद्धि समृद्धि सबै रसखानि लहौं ब्रज-रेनुका-अंग-सवारन ।
खास निवास मिलै जु पै तो वही कालिन्दी-कूल कदंव की डारन ।।'
और—
वैन वही उनको गुन गाइ और कान वही उन वैन सो सानी ।
हाथ वही उन गात सरै अरु पाप वही जु वही अनुजानी ।
जान वही उन आन के सग औ मान वही जु करै मनमानी ।
त्यौं रसखानि वही रसखानि जु है रसखानि सो है रसखानी ।।
उस आराध्यदेव के समक्ष दुनिया का सारा वैभव तुच्छ और निस्सार है ।
कोई व्यक्ति चाहे जितना वैभव सचित कर ले, यदि उसकी कृष्ण मे भक्ति नहीं
है तो उसके सचित वैभव का कोई मूल्य नही, क्योकि कृष्ण की भक्ति ही
सर्वोच्च और सत्य वैभव है—
'संपति सौ सकुचाइ कुबेरहिं रूप सौ दीनी चिनौती अनंगहि ।
भोग कै कै ललचाइ पुरन्दर जोग कै गग लई घर मगहि ।
ऐसे भए तौ कहा रसखानि रसै रसना जौ जु मुक्ति-तरंगहि ।
पै चित ताके न रग रच्यौ जु रह्यौ रचि राधिका रानी के रंगहि ॥'
× × × ×
समीक्षा भाग ७६
'कंचन-मंदिर ऊँचे बनाइ कै मानिक लाय सदा झलकयैत ।
प्रात ही ते सगरी नगरी नग मोतिन ही की तुलानि तुलैयत ।
जद्यपि दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मघवा ललचैयत ।
ऐसे भए तौ कहा रसखानि जो साँवरे ग्वार सो नेह न लैयत ॥'
✕ ✕ ✕ ✕
'कहा रसखानि सुखसम्पत्ति सुमार कहा,
कहा तन जोगी ह्वै लगाए अंग छार को ।
कहा साधे पंचानल कहा सोए बीच जल,
कहा जीति लाए राज सिन्धु आर-पार को ।
जप बार बार तप सगम बयार व्रत,
तीरथ हजार अरे बूझत लवार को ।
कीन्हौ नही प्यार नही सैयौ दरबार चित,
चाह्यो न निहार्यो जो पै नन्द के कुमार को ॥'
✕ ✕ ✕ ✕
'कंचन के मंदिरनि दीठि ठहराति नाहिं,
सदा दीपमाल लाल मानिक उजारे सो ।
और प्रभुताई अब कहाँ लौ बखानौ, प्रति,
हारन की भीर भूप हटत न द्वारे सो ।
गंगाजी मैं न्हाइ मुक्ताहलहू लुटाइ, वेद,
बीस बार गाई ध्यान कीजत सबारे सो ।
ऐसे ही भए तौ नर कहा रसखानि जो पै,
चित्त दै न कीनी प्रीति पीतपटवारे सो ॥'
इन उद्धरणो से यह स्पष्ट हो जाता है कि रसखान के मन में अपने आराध्य
के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण, विश्वास एवं अनुराग है । किन्तु अन्य कृष्ण-भक्तो
की भाँति इनका हृदय सकीर्ण नही है । सूरदास कृष्ण को छोडकर अन्य देव
की उपासना इसी प्रकार हास्यास्पद समझते है जिस प्रकार कामधेनु को छोड-
कर छेरी का दूध निकालना । पर रसखान मे यह सकीर्णता नही है । ये यद्यपि
कृष्ण के प्रति अपनी पूर्ण आस्था प्रकट करते है, पर शिव और गंगा के प्रति
८० रसखान-ग्रन्थावली
भी इनके मन मे श्रद्धा भाव है । शिव की स्तुति करते हुए ये कहते
हैं—
'यह देखि धतूरे के पात चबात तौ गात सो धूलि लगावत हैं ।
चहुँ ओर जटा अटकै लटकै फनि सो कफनी फहरावत हैं ।
रसखानि जेई चितवै चित दै तिनके दुख-दुन्द भजावत हैं ।
गज-खाल कपाल की माल विसाल सो गाल बजावत आवत हैं ॥'
गंगा-महिमा से सम्बद्ध इनके दो सवैये उपलब्ध हैं । वे ये हैं—
१. 'इक ओर किरीट लसै दूसरी दिसि नागन के गन गाजत री ।
मुरली मधुरी धुनि अधिक ओठ पै अधिक नाद से बाजत री ।
रसखानि पीतम्बर एक कँधा पर एक बघम्बर राजत री ।
कोउ देखउ सगम लै बुड़की निकसे यहि भेख सो छाजत री ॥'
२. 'वेद की औषध खाई कछु न करै बहु सजम री मुनि मोसे ।
तो जल-पान कियो रसखानि सजीवनि जानि लियो रस तोसे ।
ऐ री सुधामई भागीरथी नित पथ्य अपथ्य बनै तोहि पोसे ।
आक धतूरो चबात फिरै विष खात फिरै शिव तेरे भरोसे ॥'
इस प्रकार हम देखते हैं कि यद्यपि रसखान वल्लभाचार्य की परम्परा में
आते हैं, पर ये इस परम्परा के भक्तो की भांति नियमो का कठोर पालन
करके नहीं चले हैं । नियमो की अपेक्षा इनकी भक्ति पद्धति भावो पर अधिक
आधृत है । यही कारण है कि इनके मन मे जितनी कृष्ण के प्रति आस्था है,
उतनी ही अन्य देवताओ के प्रति विशेषतः गंगा और शिव के प्रति । उदार मन
की यह उदारता रसखान के अतिरिक्त न तो अन्य कृष्ण-भक्तो मे मिलती है
और न स्वच्छन्दवादी कवियो मे ।
: ६ : -
रसखान की रस-योजना
रस काव्य की आत्मा है, अतः प्रत्येक सजीव काव्य के लिए रस-योजना
अनिवार्य है। भावपूर्ण कवियो के काव्य मे रस-योजना श्रमसाध्य नही होती,
वरन् स्वाभाविक होती है। विविध रसो की योजना रसखान का ध्येय नही है।
ये तो भक्त है और भक्ति के आवेश मे आकर ही इनकी वाणी फूटी है।
इनकी भक्ति माधुर्य भाव की है। अतः श्रृंगार रस की योजना ही इनके काव्य
मे पाई जाती है। भक्त होने के नाते इनकी इस श्रृंगारिक योजना को अलौ-
किक श्रृंगार के अन्तर्गत ही परिगणित किया जायेगा।
श्रृंगार रस के दो भेद होते है—सयोग श्रृंगार और वियोग श्रृंगार ।
इन्हे ही क्रमशः सम्भोग श्रृंगार और विप्रलम्भ श्रृंगार कहते है।
संयोग श्रृंगार
सयोग श्रृंगार के अन्तर्गत नायक और नायिका के मिलन की अवस्था एवं
तज्जन्य आनन्द का वर्णन होता है। यह मिलन-अवस्था एकदम नही आती,
बल्कि इसे प्राप्त करने के लिए दोनो को अनेक सोपान पार करन पड़ते है।
पहले वे अचानक मिलते हैं, एक-दूसरे को देखते है और पारस्परिक रूप का
लावण्य उन्हे सान्निध्य प्राप्त करने को प्रेरित करता है। तत्पश्चात् उन दोनो
की प्रेम-क्रीडाएँ चलती है। सयोग श्रृंगार के अन्तर्गत मुख्यतया तीन बातो का
वर्णन किया जाता है—
१ रूप-वणन ।
२ प्रेम-व्यापार का वर्णन ।
३ नायिका-भेद-वर्णन ।
१. रूप-वर्णन रूप अथवा सौन्दर्य के प्रति आकर्षण प्रेम का प्रथम सोपान
है। नायक नायिका के सौन्दर्य से और नायिका नायक के सौन्दर्य के कारण
ही दोनो एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। हिन्दी मे विशेषत. रीतिकालीन
८२ रसखान-ग्रन्थावली
साहित्य मे—केवल नायिका के सौन्दर्य का ही वर्णन किया गया है। यह वर्णन
एकागी है। रसखान ने नायक और नायिका—कृष्ण और राधा—दोनो के
सौन्दर्य का वर्णन किया है। कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए इन्होंने
बताया है कि उस नटवर कृष्ण के गले में मोतियों की माला पडी हुई है।
उनकी घूंघरवारी केश-राशि लटक रही है। अंग के प्रत्येक भाग मे जड़ाऊ
आभूषण और सिर पर जरी वाली पगडो सुशोभित है। ऐसे सौन्दर्य के दर्शन
पूर्ण पुण्यो के कारण ही हुआ करते हैं—
'मोतिन माल बनी नट के लटकी लटवा लट घूँघरवारी ।
अग ही अग जराव लसै अरु सीस लसै पगिया जरतारी ।
पूरब पुन्यनि तें रसखानि सु मोहिनी मूरति आनि निहारी ।
चार्यो दिसानि की लै छवि आनि कै झाँके झरोखे मैं बाँके विहारी ॥'
कृष्ण जब शाम को गाय चराकर अपने अन्य साथियो के साथ वन से
वापिस लौटते है तो उस समय उनका जो सौन्दर्य होता है, उसे देखकर ब्रज
की वनिताएँ अपने सारे दिन की थकान को भूल जाती है—
'आवत हैं वन तें मनमोहन गाइन संग लसै ब्रज-ग्वाला ।
वेनु बजावत गावत गीत अभीत इतैं करिगो कछु ख्याल ।
हेरत हेरि कहै चहू ओर तें झाँकि झरोखन तें ब्रज-बाला ।
देखि सु आनन को रसखानि तज्यो सब द्योस को ताप-कसाला ॥'
कृष्ण जितने सुन्दर है, उनकी वाणी में उतना ही माधुर्य है और कुंजो मे
घूमने फिरने की उतनी ही आकर्षणमयी आतुरता है। जो भी गोपी उनके
सौन्दर्य को तथा उनकी सुन्दर चेष्टाओ को देख लेती है, वह उनके सौन्दर्य-
सागर मे डूबे बिना नही रह पाती —
'अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार महामृदु बोलनि बोलत है ।
लखि नैन की कोर कटाछ चलाइ कै लाज की गांठन खोलत है ।
सुन री सजनी अजबेलो लला वह कुंजनि कु जनि डोलत है ।
रसखानि लखें मन वूड़ि गयौ मधि रूप के सिन्धु कलोलत है ॥'
जो भी गोपी कृष्ण के सौन्दर्य को देख लेतो है, वह दीवानी बन जाती है,
कृष्ण का सौन्दर्य उसके हृदय मे अटक जाता है—
समीक्षा भाग ८३
'तैं न लख्यो जब कुंजनि तें बनिर्क निकस्यौ भटक्यौ मटक्यौ री ।
सोहत कैसो हरा टटक्यौ उठ कैसो किरीट लसै लटक्यौ री ।
को रसखानि फिटै फटक्यौ हटक्यौ ब्रजलोग फिरै भटक्यौ री ।
रूप सबै हरि वा नट को हियरे अटक्यौ अटक्यौ अटक्यौ री ।।'
जितना मधुर कृष्ण का शरीरगत सौन्दर्य है, उतना ही आकर्षक उनका
चेष्टागत सौन्दर्य भी है । उनके वक्र नेत्रो की मार इतनी पैनी और प्रभावशाली
है कि जिस गोपी पर भी वह पड जाती है, वह अपनापन भूल जाती है और
क्षणभर को भी कृष्ण-स्मृति को नही छोड़ पाती—
'नैननि बक बिसाल के बाननि झेलि सकै अरु कौन नवेली ।
बेधत हैं हिम तीक्ष्न कोर सुमार गिरी तिय कोटिक हेली ।
छोडै नही छिनहूँ रसखानि सु लागी फिरै द्रुम सो जनु बेली ।
रोरि परी छबि की ब्रजमंडल कुंडल गंडनि कु तल केली ।।'
कृष्ण की वाणी और उनकी चंचल दृष्टि विलक्षण है । उनके कपोलो पर
कुंडलो की छवि हाथी के गडस्थल पर पड़ी हुई छवि की भाँति अद्वितीय है ।
जब वे वृक्ष की डाली पकड़कर त्रिभंगिमा से खडे होते हैं तो उस समय उनकी
जो शोभा होती है, उसका वर्णन नही किया जा सकता । उनकी सरस मुस्कान
तो वशीकरण मत्र है ही—
'अलबेली विलोकन बोलनि औ अलबेलियै लोल निहारन को ।
अलबेली सी डोलनि गडनि पै छवि सों मिलि कु डल बारन की ।
भटू ठाढौ लख्यो छवि कैसे कहौ रसखानि गहे द्रुम डारन को ।
हिय मैं जिय मैं मुसकानि रसी गति को सिखवै निरवारन की ।।'
उनके विशाल नेत्र सुख देने वाले हैं, उनके कपोल पुष्ट हैं, वाणी मे
माधुर्य है, हँसी मे आकर्षण है, मुख मे चन्द्रमा जैसी सुन्दरता ओर स्निग्धता है ।
इस सौन्दर्य-राशि को देखकर सभी गोपियाँ इसकी मनोहरता पर मोहित हो
जाती है—
'बाँकी बडी अँखियां बडरारे कपोलनि बोलनि की कल वानी ।
सुन्दर हास सुधानिधि सो मुख मूरति रंग सुधारस-सानी ।
ऐसी नवेली ने देखे कहूँ ब्रजराज लला अति ही सुखदानी ।
डोलति है बन बीथिन मे रसखानि मनोहर रूप लुभानी ।।'
८४ रसखान-ग्रन्थावली
रसखान ने जिस प्रकार कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन किया है, उसी प्रकार
राधा के सौन्दर्य के भी अनेक चित्र चित्रित किये है । राधा के नेत्रो मे वह
सुन्दरता तथा मादकता है, मानो ब्रह्मा ने ससार को प्यासा जानकर उसकी
तृप्ति के लिए उनके नेत्रो मे सुधा-सागर भर दिया है। मुख इतना सुन्दर है
जैसे अपने समस्त अमृत-सार को सजोकर चन्द्रमा स्वय उपस्थित हो गया हो ।
उसके शरीर का गठन ऐसा है जैसे सोने मे म णिमुक्ताओ को जड़ने के लिए
कुशल जड़िया यौवन ने रत्न जटने के लिए स्थान-स्थान पर सुन्दर स्थान निर्धा-
रित किये हुए हो। उसके अधरो की लाली काम-कामना के समान सुशोभित
है। उसकी नासिका का छिद्र उस भौरे के समान है जिसमे पड़कर ज्ञान की
नौका का गर्व नष्ट हो जाता है और उसकी मनोहर चिबुक पर तो सैकड़ो रति
और रम्भा की शोभा को न्योछावर किया जा सकता है—
'कैधो रसखान रस कोम दृग प्यास जानि,
आनि कै पियूप कूप कीन्हौ विधि चंद घर ।
कैधो मनि मानिक बैठारिबै को कंचन मै,
जड़िग्या जोवन जिन गढ़िया सुघर घर ।
कैधौ काम कामना के रंगत अधर चिन्ह,
कैधौ यह भौर ज्ञान वोहित गुमान हर ।
एरी मेरी प्यारी द्युति कोटि रति रम्भा की,
वारि डारौ तेरी चित्तचोरनि चिबुक पर ॥'
राधा का मुख इतना सुन्दर है कि उसकी सुन्दरता का किसी भी प्रकार
वर्णन नही किया जा सकता । उसका सौन्दर्य प्रकाशित करने वाला है । उसके
रूप का बोध वही व्यक्ति कर सकता है जिसने नक्षत्रों की अनुपम शोभा को
देखा है । उसके मस्तक पर लगा हुआ टीका इस प्रकार सुशोभित हो रहा है
मानो चन्द्रमा अपनी गोद मे मगल को लिये हुए हो —
'श्री मुख कौ न बखान सकै वृषभान सुता जू को रूप उजारो ।
हे रसखान तू ज्ञान सभार तरैनि निहार जु रीझनहारो ।
चारु सिन्दूर को लाल रसाल लसै ब्रज बाल को भाल टिकारो ।
गोद मे मानौं विराजत है घनश्याम के सारे की सारे को सारो ॥'
समीक्षा भाग ८५
राधा का यह स्वाभाविक सौन्दर्य सौन्दर्य-साधक उपकरणो से विभूषित
होता है तो उसकी शोभा द्विगुणित हो जानी है। उसका गहरे लाल गुलाल के
समान दुकूल गुलाब के लाल फूल की भाँति शोभायमान है। उसकी काली
केश-राशि भौगे के समान सुशोभित है। काले रेशम की डोरियों मे बँधे हुए गुंज
पलाश-पुष्प की भाँति शोभा-सम्पन्न हैं। उसके मोती कदम्ब और आम की मं-
रियो के समान शोभायमान है। उसकी वाणी मे इतना माधुर्य है कि उसके
वचनो को सुनकर कोयल भी लज्जित हो जाती है—
'अति लाल गुलाल दुकूल ते फूल अली । अलि कुंतल राजत है ।
मखतूल समान के गंज धरनि मै किसुक की छवि छाजत है ।
मुकता के कदम्ब ते अम्ब के मौर सुने सुर कोकिल लाजत है ।
यह श्रावनि प्यारी जु की रसखानि बसन्त-सी आज विराजत है ।"
जब राधा न अपने शरीर पर चन्दन का लेप कर लिया तो वह ऐसी प्रतीत
होने लगी मानो चन्द्रमा की पत्नियो तारिकाओ को लज्जित करने के लिए सब
प्रकार से अपनी सात्विक शोभा को बाहर निकालकर वह सुधा की मानसपुत्री
बैठी हो। उसके कुचो के बीच मे हार का चन्दा इस प्रकार सुशोभित हो रहा
था जैसे सौन्दर्य को ही उसके शरीर मे जड दिया गया हो, अथवा वह दृग-वाणों
का धाव दमक रहा हो, अथवा-श्वेत पर्वत के संधि-स्थान मे कोई जलाशय हो —
'तन चन्दन खोर के बैठी भटू रही आजु सुधा की सुता मनसी,
मनो इन्दुबधून लजावन कौ सब ज्ञानिन काढि धरी गन-सी ।
रसखानि विराजति चौकी कुचौ बिच उत्तमताहि जरी तन-सी ।
दमकै दृग-वान के घायन कौ गिरि सेत के संधि के जीवन-सी' ।
कही-कही राधा-सौन्दर्य का अत्युक्तिपूर्ण वर्णन श्री रसखान ने किया है—
'वासर तूँ जु कहूँ निकरै रवि को रथ माँझ अकास अरै री ।
रैन महै गति है रसखानि छुपाकर आँगन तै न टरै री।
द्यौस निस्वास चल्यौई करै निसि द्यौस की आसन पाय घरै री ।
तेरी न जात कछू दिन राति विचारे बटोही की बाट परै री ।'
हे राधा ! यदि तू दिन मे अपने घर से बाहर निकल जाती है तो तेरे
सौन्दर्य से सूर्य इतना चकित हो जाता है कि उसका रथ आकाश मे ही रुक
८६ रसखान-ग्रन्थावली
जाता है, अर्थात् सूर्य अपनी गति भूलकर एकटक तुझे ही देखता रह जाता है।
तेरा सौन्दर्य देखकर चन्द्रमा तेरे घर के आँगन मे ही ठहर जाता है और आगे
नही बढता । दिन मे तो पवन चलता ही रहता है, पर रात मे भी वह दिन की
आशा से तेरे पीछे लगा रहता है, अर्थात् तेरी सुगध का लोभी पवन रात-दिन
तेरे इर्द-गिर्द चलता रहता है। इस पवन के रात-दिन चलते रहने के कारण
तेरा तो कुछ नही बिगडता, पर बेचारे पथिक का रास्ता रुक गया है; अर्थात्
पवन-वेग के कारण वह अपने माग पर नही चल पाता ।
२. प्रेम-व्यापार का वर्णन - जिस प्रकार रसखान ने रूप का पर्याप्त विस्तार
से वर्णन किया है, उसी प्रकार प्रेम-व्यापार का भी किया है । यह व्यापार
कुंजलीला, रासलीला, दानलीला और फागलीला मे विशेष रूप से मुखरित
हुआ है।
कोई गोपी कृष्ण से मिलकर आई है । अपनी मिलन-दशा का वर्णन वह
अपनी सखी से करती है कि हे सखि । मैं आज प्रात काल जब कुंजगली से
निकली तो अचानक कृष्ण से भेट हो गई । कृष्ण के मुख की मुस्कान मे मेरा
मन इतना अधिक डूब गया कि वह उस मुस्कान की छवि पर से नही हटता,
हटाने पर भी नही हटता । उस मुस्कान ने मेरे नैनो को बांध लिया, चित को
चुरा लिया और प्रेम का गहरा फंदा डाल दिया । तुम्ही बताओ, अब मैं क्या
करू ? मेरे चित्त मे बसा हुआ कृष्ण कैस बाहर निकाला जा सकता है । उस
आनन्द-सागर कृष्ण के सौन्दर्य ने तो मेरे सारे शरीर को ही घेर लिया है—
'कु जगली मै अली निकसी तहाँ साँवरे ढोटा कियौ भटनेरो ।
माई री वा मुख की मुसकान गयौ मन बूडि फिरै नहि फेरो ।
डोरि लियौ दृग चोरि लियौ चित डार्यौ है प्रेम को फंद घनेरो ।
कैसी करौ अब क्यौ निकस्यो रसखानि पर्यौ तन रूप को घेरो ।'
रासलीला मे प्रेम-व्यापारो का कु जलीलाओ की अपेक्षा अधिक वर्णन है ।
रासलीला के समय नटखट कृष्ण अपनी बाँसुरी मे जिस गोपी का नाम ले देते हैं
वह तो अपना सर्वस्य भूलकर कृष्ण के ऊपर न्यौछावर ही हो जाती है—
अधर लगाइ रस प्याइ बांसुरी बजाइ,
मेरो नाम गाइ हाइ जादू कियौ मन मैं ।
समीक्षा भाग ८७
नटखट नवल सुघर नन्दनन्दन ने,
करिकै अचेत चेत हरिकै जतन मैं ।
झटपट डलट पुलट पट परिधान,
जान लागी लालन पै सबै बाम वन मैं ।
रस रास सरस रंगीलो रसखानि प्रानि,
जानि जोर जुगुति बिलास कियौ जन पै' ।
कोई गोपी अपनी सखी से रासलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि जब
कृष्ण ने अपनी बाँसुरी बजाई और मेरा नाम उसमे गाया तो मेरे मन पर वह
जादू कर गया । नटखट, युवक और सुन्दर कृष्ण ने मुझे अचेत करके यत्नपूर्वक
अपने ध्यान मे लगा लिया, अर्थात् मेरी वह अवस्था कर दी कि मै उसके बिना
नही रह सकती थी । बासुरी की ध्वनि को सुनकर सारे ब्रज की स्त्रियाँ जल्दी
से अपने वस्त्रो को उलटा-सीधा पहनकर बन मे पहुँच गईं । तब सुन्दर रास
रचने वाले सरस और रंगीले कृष्ण ने वहाँ आकर रास-लीला की तथा युवतियों
का समूह एकत्र करके उनके साथ आनन्द मनाया ।
'आज भटू मुरली-बट के तट नन्द के साँवरे रास रच्यौ री ।
नैननि सैननि वैननि सो नंहि कोऊ मनोहर भाव पच्यौ री ।
जद्यपि राखने कौ कुल-कानि सबै ब्रज-बालन आन बच्यौ री ।
तद्यपि वा रसखानि के हाथ बिकानी को अंत लख्यौ पै लख्यौ री ॥'
अर्थात् जब कृष्ण ने मुरली-बट के नीचे रास रचा तो उन्होने प्रेम की सभी
भंगिमाओ का प्रदर्शन किया, कोई भी भाव उनसे बचा न रह सका । उनकी
भगिमाओ को देखकर ब्रज-बनिताएँ इतनी भाव-विभोर हुईं कि प्रयत्न करने
पर भी वे अपनी कुल-मर्यादा को न बचा सकी, अर्थात् कृष्ण के वशीभूत
हो ही गईं ।
फागलीला मे प्रेम-व्यापारो का रूप और भी अधिक स्पष्ट है । इसी लीला
का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! कल
गोकुल का एक ग्वाला कृष्ण) चारो ओर की गोपियों को घेरकर, भाँवर रचा
कर, धूम मचा गया । वह बांकी बांसुरी की तान सुनाकर तथा हृदय को उल्ल-
सित करके सहज स्वभाव से सब गाँव वालो को ललचा गया है। वह अपनी