सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 89

७२ रसखान-ग्रन्थावली

४. सखी-सम्प्रदाय ।
५ निम्बार्क सम्प्रदाय ।
वल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक वल्लभाचार्य है। वल्लभाचार्य ने प्रेम-लक्षणा
भक्ति को महत्ता प्रदान की है और नवधा भक्ति का प्रतिपादन किया है। इस
सम्प्रदाय मे कृष्ण-भक्ति को प्रधानता दी गई है और राधा को उनकी (भगवान्
की) आल्हादिनी शक्ति अथवा रसशक्ति के रूप मे स्वीकार किया गया है।
कृष्ण-भक्त साहित्य मे इस सम्प्रदाय को सर्वाधिक मान्यता मिली है और
इसका प्रचार सबसे अधिक हुआ है।
गौडीय सम्प्रदाय के प्रवर्तक चैतन्य महाप्रभु है। इस सम्प्रदाय मे राधा और
कृष्ण के समान महत्त्व को स्वीकार किया गया है और दोनो की समान पूजा
का विधान माना गया है। इसमे सत्सग, नाम तथा लीला-कीर्तन, ब्रज-वृन्दावन,
कृष्ण-मूर्ति की सेवा पूजा आदि भक्ति के साधनो को विशेष महत्त्व दिया
गया है।
राधाबल्लभीय सम्प्रदाय के प्रवर्तक स्वामी हितहरिवंश है। इस सम्प्रदाय
मे राधा की पूजा को प्रधानता दी गई है, यद्यपि कृष्ण-पूजा की भी उपेक्षा
नही है। इसमे राधा-कृष्ण की कुंजलीला तथा शृंगारकेलि को प्रधानता देने
के कारण रति-क्रीडा का ही एक मात्र आलंबन ग्रहण किया गया है। इसमें
विप्रलंभ शृंगार का अभाव तो है, किन्तु सूक्ष्म विरह की अनोखी सृष्टि की
गई है।
सखी सम्प्रदाय का दूसरा नाम हरिदासी सम्प्रदाय भी है, क्योकि हरिदास
इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक है। इस सम्प्रदाय मे राधा-कृष्ण की युगल-उपासना
का विधान सखी-भाव से किया गया है।
निम्बार्क-सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य निम्बार्क है। वल्लभ और गौडीय
सम्प्रदायो की भाँति इस सम्प्रदाय मे भी मधुर भाव की उत्कृष्टता स्वीकार की
गई है। इस सम्प्रदाय मे कृष्ण को आराध्य माना गया है जो अपनी प्रेम और
माधुर्य की अधिष्ठात्री शक्ति राधा तथा अन्य आह्लादिनी गोपी-स्वरूपा शक्तियो
से घिरे रहते है। इस सम्प्रदाय मे कृष्णोपासना के साथ-साथ राधा की उपा-
सना का भी विशेष महत्त्व माना गया है।