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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 368 में से

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पृष्ठ 93

७६ रसखान-ग्रन्थावली
'फूलत फूल सबै वन बागन बोलत भौर बसंत के आवत ।
कोयल की किलकार मुनै सब कंत बिदेसन ते सब आवत ।
ऐसे कठोर महा रसखान जू नेकहु मोरी ये पीर न पावत ।
हूक सी सालन है हिय मैं जब वैरिन कोयल कूक सुनावत ॥
वियोग के कारण विरहिणी के शरीर की द्युति मन्द पड गई है । उसका
कमल जैसा कोमल मुख भी मुरझा गया है । उसक हृदय की साँसे लपट बन-
कर जलने लगी हैं । ऐसे ही अवसर पर जब उसे यह सूचना मिलती है कि
उसका प्रियतम आ गया है तो उसकी क्षीण होती हुई शरीर द्युति इस प्रकार
दमक उठती है मानो दिये की बाती उकसा दी हो —
'रसखान सुनाह वियोग के ताप मलीन महा दुति देह तिया की ।
पंकज सी मुख गौ मुरझाय लगी लपटै वरै स्वास हिमा की ।
ऐसे मे आवत कान्ह सुने हुलसै सुतनी तरकी अँगिया की ।
यो जग जोति उठी तन की उकसाय दई मनो बाती दिया की ॥'
विरह वर्णन मे कही-कही रसखान परम्परा से इतने जडीभूत हो गये है कि
भावलोक की क्षति का ध्यान भी भूल गये है और परम्परा के अवाध प्रवाह मे
वह गये है । यथा—
'बिरहा की जु आँच लगी तन मे तब जाय परी जमुना जल मे ।
विरहानल तँ जल सूखि गयौ मछली वही छांड़ि गई तल मे ।
जब रेत फटी रु पताल गई तब शेष जर्यो धरती-तल मे ।
रसखान तबै इहि आँच मिटै जब आय कै स्याम लगे गल मे ॥'
अर्थात् जब विरहिणी के शरीर मे वियोग-दुख की अग्नि वढ गई तो वह
उसे शान्त करने के लिए यमुना के जल मे कूद गई । तब विरह की आग के
कारण यमुना का जल सूख गया और मछलियाँ जल के अभाव के कारण यमुना
के तल मे बैठ गई । उस आग के कारण जब यमुना का जल अत्यन्त गरम हो
गया तो उसकी गरमी से पाताल-लोक मे स्थित शेषनाग भी जलने लगा । रस-
खान कहते है कि यह ज्वाला तभी शात हो सकती है जब कृष्ण उसके गले से
आकर लगेगे ।
लेकिन सर्वत्र ऐसी ऊहात्मकता नही है । एक भावपूर्ण कवि के लिए यह