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सर्वकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 368 में से

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समीक्षा भाग ७७

संभव भी नही था । यथा —
'बाल गुलाब के नीर उसीर सो पीर न जाइ हिये जिन ढारौ ।
कंज की माल करौ जु बिछावन होत कहा पुनि चंदन गारौ ।
एते इलाज बिकाज करौ रसखान कों काहे को जारै पै जारौ ।
चाहति हौ जु जिबायौ पटू तो दिखावौ बडी बडी आँखिनवारौ ॥'
इस सवैया मे हृदय की सहज भावनाएँ मुखरित है । विरहिणी के विरह
का सच्चा इलाज यही है कि उसका प्रियतम उसे मिल जाये । अन्यथा अन्य
इतर उपचारो मे कोई लाभ नही है । इसलिए तो विरहिणी अपनी सखी से
कहती है कि मेरे हृदय पर गुलाबजल और खस छिड़कना बेकार है । कज-
माला का बिछावन करने मे तथा चंदन का लेप करने से भी कोई लाभ नही
है । ये सारे उपचार व्यर्थ है, वरन् ये तो मेरी पीडा को, जलन को, और भी
अधिक बढाते है । हे सखि ! यदि तुम मुझे जीवित रखना चाहती हो तो मुझे
विशाल नेत्र वाले कृष्ण का दर्शन करा दो । यही एकमात्र उपचार मेरे विरह-
रोग को ठीक कर सकता है ।
माधुर्य भक्ति का तीसरा प्रमुख अंग है पूर्णतया आत्मसमर्पण । जब तक
भक्त स्वयं को अपने अराध्य के प्रति पूर्णतया समर्पित नही कर देगा, तब तक
उसका उसके प्रति प्रेम और विश्वास अधूरा ही रहेगा । रसखान को अपने
अपराध्य पर पूर्ण विश्वास है । उसके सरक्षण मे ये सब प्रकार के दुखो से तथा
कष्टो से स्वय को सुरक्षित समझते है—
'कहा करै रसखानि को, कोऊ चुगुल लबार ।
जो पै राखनहार है, माखनचाखनहार ॥'
इसलिए इनका मन कृष्ण के लिए चातक बना हुआ है —
'विमल सरस रसखानि मिलि, भई सकल रसखानि ।
सोई नव रसखानि को, चित चातक रसखानि ॥'
अपने अराध्य के प्रति इनका इतना घनिष्ठ स्नेह है कि ये युग-युगान्त तक
उसका सान्निध्य प्राप्त करना चाहते है । इनकी इच्छा है कि यदि मुझे आगामी
जन्म मे मनुष्य-योनि मिले तो मैं व वही मनुष्य बनूं जिसे ब्रज और गोकुल के
ग्वालों के मध्य खेलने का अवसर मिले । यदि पशु-योनि मिले तो उस गाय का