झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
२४ झाँसी की रानी
[ ३ ]
थोडी देर में घण्टा बजाता हुआ हाथी लौट आया । मनू दौड कर
बाहर आई । एक क्षण ठहरी और आह खींच कर भीतर चली गई ।
नाना और राव, दोनो बालक, अपनी जगह चले गये । वाजीराव ने नाना
को पुचकार कर पूछा, 'दर्द बढा तो नही ?'
'नही बढा' नाना ने उत्तर दिया, 'अच्छा लग रहा है। मनू कहाँ गई ?'
वाजीराव ने कहा, 'भीतर होगी ।'
रावसाहब—'उसे बुरा लगा होगा । नाना ने साथ नही लिया, मैने
तो कहा था ।'
नाना—'वह मुझको सवेरे से ही चिढा रही थी ।'
बाजीराव—'क्या ? कैसे ?'
नाना—'उसका स्वभाव है ।'
कुछ क्षण उपरात मनू वहा आ गई ।
नाना ने हँसते हुये कहा, 'छवीली, तुम क्या कोई ग्रंथ पढ रही थी ?'
मनू जल उठी । बोली, 'मुझमे छवीली मत कहा करो ।'
नाना ने और भी हँसकर कहा, 'क्यो नही कहा करू ँ ? यह तो
तुम्हारा छुटपन का नाम है ।'
मनू की आँख लाल हो गई । बोली, 'मुझको इस नाम से घृणा है ।'
नाना गभीर हो गया । बोला, 'मुझको तो यही नाम सुहावना लगता
है । छवीली, छवीली ।'
'इस नाम को कभी नही सुनूँगी ।' कहकर मनू वहाँ से जाने को
हुई । वाजीराव ने उसको पकड लिया । मनू ने भागना चाहा । न भाग
सकी । तब नाना ने भी पकड लिया ।
'क्या मनू बुरा मान गई ?' नाना ने स्नेह के साथ पूछा ।
मनू होठ सिकोडकर, रुखाई के साथ बोली, 'अवश्य । आगे इस
नाम से मेरा सम्वोधन कभी मत करना ।'
झाँसी की रानी २५
इसी समय पहरे वाले ने बाजीराव को सूचना दी, 'झाँसी से एक
सज्जन आये हैं । नाम तात्या दीक्षित बतलाते हैं ।'
नाना बोला, 'मनू एक से दो तात्या हुये ।'
मनू का क्षोभ घुला । बाजीराव ने प्रहरी से झासी के आगन्तुक को
बिठलाने के लिये कह दिया ।
मनू ने कहा, 'झासी वाला तात्या कुश्ती लडता होगा ?'
रावसाहब—'झाँसी में कोई वाला गुरू होगे तो कुश्ती का भी चलन
होगा । वह तो राज्य ठहरा ।'
नाना—'बडा राज्य है ?'
बाजीराव—'बडा तो नही है, पर खासा है । हमारे पुरखो का ़
प्रदान किया है, जानते होगे ।'
रावसाहब—'अपने को फिर नही मिल सकता है ?'
मनू—'दान किया हुआ फिर कैसे वापिस होगा ?'
बाजीराव—'हां वापिस नही हो सकता । झासी के राजा हमारे
सूबेदार थे । इस समय अपना बस होता तो झासी में हम लोगो का काफी
मान होता । परन्तु झासी तो बहुत दिनो से अङ्गरेजो की मातहती में है ।'
मनू—'ग्वालियर, इन्दोर, बरोदा, नागपुर, सतारा इत्यादि के होते
हुये भी थोडे से अङ्गरेज़ो ने आप सब को दाब लिया !'
बाजीराव—'यह मानना पडेगा कि वे लोग हमसे ज्यादा चालाक
हैं । हथियार उनके पास अधिक अच्छे हैं । शूरवीर भी हैं और भाग्य
उनके साथ है और आपसी फूट हमारे साथ · '
मनू—'दादा क्या भाग्य में शूरवीर होना लिखा रहता है ? यदि
ऐसा है तो अनेक सिंह स्यार होते होगे और अनेक स्यार सिंह ।'
बाजीराव—'जब स्यार पागल हो जाता है तब सिंह भी उससे डरने
लगता है ।'
२६ झांसी की रानी
मनू—'वह भाग्य से पागल होता है अथवा और किसी कारण से ?'
वाजीराव हँसने लगे ।
इसी समय मोरोपन्त ने आकर कहा, 'दादा साहब तात्या दीक्षित
झासी से आये हैं ।'
वाजीराव बोले, 'मैने उनको बिठला लिया है । यही ठहरने, भोजन
इत्यादि का प्रबन्ध कर दिया जावे ।'
मोरोपन्त ने कहा, 'तात्या मुझको एक बार काशी में मिले थे ।
यात्रा के लिये गये हुये थे । विद्या विदग्ध हैं, सज्जन हैं । राजा के यहा
उनका मान है ।'
मनू ने हँसकर पूछा, 'कुश्ती लडते हैं ? तलवार बन्दूक चलाते हैं ?
घोडे पर चढते हैं ?'
'दुर पगली', मोरोपन्त ने कहा, 'जो यह सब न जानता हो वह क्या
कुछ है ही नही ? दीक्षित जी पक्के ब्राह्मण हैं । शास्त्री, प्राचार्य ।'
नाना ने मनू की ओर देखते हुये कहा, 'और यदि ब्राह्मण हथियार
बाध उठे तो वह पक्के से कच्चा हो जायगा ? मनू ! तुम बतलाओ ।'
मनू हँसी । वाजीराव भी हँसे । मोरोपन्त ने मुस्करा कर कहा, 'इस
लडकी जैसी वाचाल तो शायद ही कोई हुई हो ।'
मनू ने होठो की समेट में मुस्कराहट को दवा कर गर्दन मोडी, फिर,
विशाल नेत्र सकुचित करके बोली, 'आप ही कहा करते हैं, ताराबाई
ऐसी थी, जीजाबाई ऐसी थी, अहिल्या ऐसी, मीरा ऐसी । मैं पूछती हू,
क्या ये सब मुह पर मुहर लगाये रहती थी ?'
लक्ष्मीबाई २७
[ ४ ]
भोजनोपरान्त तात्या दीक्षित से बाजीराव और मोरोपन्त मिले ।
तात्या दीक्षित ज्योतिष और तन्त्र के शास्त्री थे । काशी, नागपूर,
पूना इत्यादि घूमे हुये थे । महाराष्ट्र समाज से काफी परिचित थे । बिठूर
( ब्रह्मावर्त ) में बाजीराव के साथ दक्षिणी ब्राह्मणो का एक बडा परिवार
आ बसा था ।* उस काल में मलखंब और मल्लयुद्ध के आचार्य वाला गुरू
का अखाडा दक्षिणियो और हिन्दुस्तानियो से भरा रहता था और गुरू
बल, यौवन और स्वाभिमान को वितरित सा करते रहते थे । वह स्वय
इतने दृढ, बलिष्ठ और स्वाभिमानी थे कि उनको लेटने तक में चित होने
से नफरत थी । औंधे लेटा करते थे ।
मोरोपन्त ने अवसर निकाल कर तात्या दीक्षित से प्रार्थना की,
'दीक्षित जी, मुझे अपनी कन्या मनूबाई के विवाह की बडी चिंता लग
रही है । मैने बहुत खोज की है परन्तु कोई योग्य घर नही मिला । अब
भी खोज कर रहा हू । आपका ससार में बहुत परिचय है । आप
इस कन्या के लिये योग्य वर ढूंढ दीजिये । बडा अनुग्रह होगा ।'
बाजीराव ने भी कहा, 'कन्या बहुत सुन्दर है । बडी कुशाग्र बुद्धि और
होनहार । उसके लिये अच्छा वर ढूँढना ही चाहिये ।'
मोरोपन्त बोले, 'सब हथियार चलाना बहुत अच्छी तरह जानती है ।
घोडे की सवारी में पुरुषो के कान पकडती है । जब चार वर्ष की थी
इसकी माँ का देहान्त हो गया था । इसलिये मैंने स्वय उसकी दिन रात
देख भाल की है, लालन पालन किया है । मराठी, सस्कृत और हिन्दी
पढाई है । शास्त्रो में उसकी रुचि है ।'
*इनकी सख्या लगभग आठ सहस्त्र थी । बाजीराव की पेंशन का
एक बडा भाग लोगो पर खर्च होता था ।
२८ झाँसी की रानी
वाजीराव ने कहा, 'वालिका है, इसलिये इस आयु में जितना पढ
सकती थी उतना ही पढा है परन्तु तेज बहुत है। पूजा पाठ मन लगा
कर करती है।'
पूजापाठ सम्बन्धी रुचि पर वाजीराव ने ज्यादा जोर दिया। अश्वा-
रोहण इत्यादि पर बहुत कम।
तात्या दीक्षित ने जन्मपत्री मागी। मोरोपन्त ने ला दी। दीक्षित ने
उसकी परीक्षा करके कहा, 'ऐसी जन्मपत्री मैने कदाचित् ही पहले कभी
देखी हो। इसको कही की रानी होना चाहिये।'
मोरोपन्त फूल गये । वाजीराव को भी सन्तोष हुआ। वोले, 'जव
आप जावें साथ में जन्मपत्री लेते जावे। योग्य वर से मेल खाने पर हमको
सूचित करें।'
दीक्षित ने स्वीकार किया।
उसी समय रावसाहब के साथ वहाँ मनू आगई।
वाजीराव ने दीक्षित से कहा, 'यही वह कन्या है।'
दीक्षित ने मनूवाई के विशाल नेत्र, भोरे को लजाने वाले चमकीले
वाल, स्वर्णासा रंग और सम्पूर्ण चेहरे का अतीव सुन्दर वनाव देखकर
प्रसन्नता प्रकट की।
दीक्षित ने ममता प्रदर्शित करते हुये कहा, 'आ वेटी आ ! तूने
शास्त्र पढे हैं ? उच्च कुल की ब्राह्मण कन्या के लिए यह उपयुक्त ही है।'
मनू और रावसाहब वाजीराव के पास मसनद पर वैठ गये।
मनू विना किसी सकोच के वोली, 'मैने शास्त्र आँखों से देख भर लिये
हैं। मुझको तुलसीदास की रामायण वडी प्रिय लगती है परन्तु तलवार
चलाना, मलखंव भाजना घोडे की सवारी, ये उससे भी वढकर भाते हैं...।'
वाजीराव ने हँस कर टोका, 'और वात वनाना, चवड़-चवड करना
इन सव से बढ़ कर अच्छा लगता है।'
लक्ष्मीबाई २६
मोरोपन्त के मन में क्षणिक रोष आया। वह चाहते थे कि लडकी
तात्या दीक्षित के सामने ऐसी बर्ते कि शील-संकोच का अवतार
जान पडे।
'परन्तु', दीक्षित ने हँसकर कहा, 'बालिका है। अभी ससार का
उसने देखा ही क्या है।'
'बिलकुल अबोध हैं', मोरोपन्त बोले, 'सयानी होने पर अपने घर-द्वार
का खूब प्रबन्ध करेगी।'
तात्या दीक्षित ने उत्साहित होकर भविष्यवाणी सी की, 'यह किसी
राज्य की रानी होगी।'
रावसाहब अभी तक मनू के पीछे चुप बैंठा था। बोला, 'राज्य तो
सब अङ्गरेज़ो ने ले लिये हैं। नये राज्य कहाँ से बनेगे ?'
'राज्यो की और राज्य बनाने वालो की न कमी रही है और न
रहेगी।' तात्या दीक्षित ने हँसकर कहा।
मनूबाई मुस्कराकर बोली, 'पर कुछ लोग तो कहते हैं कि अङ्गरेजो
ने ऐसा ज़ोर बाँध लिया है कि कोई सिर ही नही उठा सकता।'
बाजीराव विषयान्तर करना चाहते थे। बोले, 'झाँसी में बाग-बगीचे
कितने हैं?'
तात्या दीक्षित—'बहुत हैं। राजा के बगीचे हैं। सरदारो और
सेठ-साहूकारो के हैं। नगर के भीतर ही अनेक हैं।'
मनू—'सेना बडी है ?'
दीक्षित—'खासी है।'
मनू—'घोडे अच्छे हे ?'
रावसाहब—'हाथी ?'
दीक्षित—'बहुत से हैं।'
मनू—'कितने ?'
इतने में वहाँ सुगठित शरीर का एक युवक आया।
३० झाँसी की रानी
वाजीराव ने पूछा, 'क्या है तात्या ?'
अपने नाम के एक और मनुष्य को सम्बोधित होते देखकर दीक्षित
चौंका ।
मनू ने बेधडक कहा, 'यह हमारे गुरू के अखाडे के प्रधान हैं। आपके
नामवारी ।'
तात्या दीक्षित ने मन में चाहा कि लडकी और अधिक बात न करे ।
युवक तात्या ने पेशवा से विनय की, 'महाराज, गुरूजी ने कहलवाया
हे कि झाँसी से जो आचार्य आये हैं वे हमारे अखाडे को देखने की
कृपा करे ।'
दीक्षित ने हामी भरी । तीसरे पहर सब लोग बाला गुरू के अखाडे
पर गये । मलखम्ब और मल्लयुद्ध का प्रदर्शन हुआ ।
लक्ष्मीबाई ३१
[ ५ ]
महाराष्ट्र में सतारा के निकट बाई नाम का एक गाव है। पेशवा के
राज्य काल में वहा के कृष्णराव ताम्बे को एक ऊँचा पद प्राप्त था।
कृष्णराव ताम्बे का पुत्र बलवन्तराव पराक्रमी था।
उसको पेशवा की सेना में उच्चपद मिला। बलवन्तराव के दो लड़के
हुये—एक मोरोपन्त और दूसरा सदाशिव। ये दोनो पूना दरबार के
कृपापात्र मे थे।
उस समय पेशवा बाजीराव द्वितीय पूना में रहते थे। सन् १८१८ में
अङ्गरेजो ने पेशवाई खत्म करके बाजीराव को आठ लाख रुपया वार्षिक
पेन्शन और बिठूर की जागीर दी। बाजीराव ब्रह्मावर्त (बिठूर) चले
आये। बाजीराव के निज भाई चिमाजी आपा साहव थे। वे बनारस चले
गये। मोरोपन्त ताम्बे पर चिमाजी की बडी कृपा थी। मोरोपन्त
चिमाजी के साथ पूना से काशी चले आये और उनका काम काज करते
रहे। इसके उपलक्ष में मोरोपन्त को पचास रुपया मासिक वेतन मिलता
था। यही मोरोपन्त मनूबाई के पिता थे।
मोरोपन्त की पत्नी का नाम भागीरथीबाई था। सुशील, चतुर,
रूपवती।
मनूबाई कार्तिक बदी १४ स० १८६१ (१६ नवम्बर सन् १८३५)
के दिन काशी में इन्ही से उत्पन्न हुई थी।
चिमाजी का शरीरात हो गया। मोरोपन्त को अपने कुटुम्ब के
पालन के लिए कोई सहारा काशी मे नही दिखलाई पड रहा था।
बाजीराव ने काशी से बिठूर बुला लिया। मोरोपन्त पर बाजीराव की
भी बहुत कृपा रही।
मनूबाई चार वर्ष की ही थी जब उसकी माता—भागीरथीबाई—
का देहान्त हो गया। मनू के पालन-पोषण और लाड़दुलार का सम्पूर्ण भार.
३२ झाँसी की रानी
मोरोपन्त पर आ पड़ा । मोरोपन्त ने मनू को बहुत प्यार के साथ
पाला । लडके से बढकर ।
मनू इतनी सुन्दर थी कि छुटपन में बाजीराव इत्यादि उसको
स्नेहवश 'छबीली' के नाम से पुकारते थे ।
बाजीराव के अपनी कोई सन्तान न थी । इसलिये उन्होने नाना
धोधूपन्त नाम के एक बालक को गोद लिया । नाना तीन भाई थे—
नाना, बाला और रावसाहब । बाला उस समय बिठूर में न था । छोटा
सहोदर रावसाहब था ।
मनू और ये दोनो लडके साथ खेलते-खाते और पढते थे । मलखंब
कुश्ती, तलवार-बन्दूक का चलाना, अश्वारोहण, पढना-लिखना इत्यादि
सब इन तीनो ने छुटपन से साथ साथ सीखा । मनू चपल, हठीली और
बहुत पैनी बुद्धि की थी । कम आयु की होने पर भी वह इन हुनरो में
उन दोनो बालको से बहुत आगे निकल गई । स्त्रियो की संगति कम प्राप्त
होने के कारण वह लाज संकोच की अतीत दबन और झिझक से दूर
हटती गई थी ।
नाना आठ लाख वार्षिक पेंशन अपने और अपने भाइयो की
परम्परा के -जीवन सुख के लिये काफी से अधिक समझता होगा ।
बाजीराव को पैंशन 'उसको और उसके कुटुम्ब के लिए दी गई थी ।'
बिना किसी प्रयत्न-प्रयास के आठ लाख वार्षिक मिलते जावे तो फिर किस
महत्त्वाकांक्षा की जोखिम के लिये और अधिक हाथ-पैर हिलाये जावें ?
मनूबाई ऐसा नही सोचती थी । छत्रपति शिवाजी इत्यादि के आधु-
निक और अर्जुन-भीम इत्यादि के पुरातन आख्यानो ने मनू की कल्पना
को एक अस्पष्ट और अदम्य गुदगुदी दे रक्खी थी ।
लक्ष्मीबाई ३३
[ ६ ]
तात्या दीक्षित आदर और भेट सहित बिठूर से झाँसी लौट आये ।
उन्हे मालूम था कि मनूबाई के लिये जितना अच्छा वर ढूँढ कर दूंगा ।
उतना ही अधिक बाजीराव सतुष्ट होगे । और उस सतोष का फल उनकी
जेब के लिये उतना ही महत्वपूर्ण होगा ।
दीक्षित ने मन में कई वर टटोले । जिसको स्थिर करते उसी के लिये
प्रश्न उठता । 'क्या पेशवा इसको पसन्द कर लेंगे ?' जो उचट जाता ।
सरदार श्रेणी के ब्राह्मणो में कुछ की टीपनाये लाकर मिलाई, पर मेल
न खाया ।
सोचा, 'श्रीमन्त सरकार गगाधरराव की जन्मपत्री मिलाकर
देखूं शायद टक्कर खा जाय ।' टीपना प्राप्त हो गई । मिल गई । परन्तु
एक असमजस हुआ, गङ्गाधरराव की पहली पत्नी का देहान्त काफी दिन
पहले हो चुका था । वह विधुर थे । विवाह करना चाहते थे । परन्तु अपने
कठोर स्वभाव के कारण बहुत बदनाम थे । भाँड-भगतियो, सखियो
इत्यादि के हंसी-मजाक, आमोद-प्रमोद में उनका काफी समय जाता था ।
नाटकशाला में तो रात का अधिकांश प्राय बीतता ही था । इसलिये
जितना वह करते थे, उससे कही अधिक की, उनकी बदनामी फैल
गई थी ।
नाटकशाला मे बहुत रुचि रखने के कारण खास तौर पर वेश्याओ,
गायिकाओ और नर्तकियो के नाटकशाला में नौकर रखते हुये भी स्त्रियो
की भूमिका में अभिनय करने की वजह से उनकी झूठी बदनामी बहुत
करदी गई थी । इस पर, फिर उनका कठोर बर्ताव । दीक्षित सोचते थे
कि विवाह सम्बन्ध स्थापित करने में सफल हो जाऊँ तो सदा याद किया
जाऊँगा । मोरोपन्त तो हमेशा कृतज्ञ रहेगे ही, बाजीराव भी मानते
रहेगे, झाँसी राज्य में कितना सम्मान होगा ? मनूबाई ? सुन्दर है,
रानी बनने योग्य सब गुण उसमे हैं । चपल चंचल और
उद्धत है । मुँहजोर है । किसी और घर में जायगी तो न खुद सुखी हो
३४ झाँसी की रानी
सकेगी और न अपने पति को सुखी बना सकेगी । गंगाधरराव की रानी
बनने पर चपलता न रह सकेगी । जीवन में सयम आ जावेगा । वह
१३-१४ साल की है और गंगाधरराव चालीस से कुछ ऊपर । परन्तु
उनका स्वास्थ्य अच्छा है । स्वभाव कठोर सही है, लेकिन ऐसी उग्र स्त्री
के लिये तो ऐसा ही पति चाहिये । घोडे की सवारी, तीर-तमचा, मल्लखभ
और क्या क्या यह सब झासी के राज्य ही में मिल सकेगा, और कही
असम्भव है । यह सब सोचकर दीक्षित ने झाँसी के राजा के साथ मनूबाई
का विवाह सम्बन्ध कराने में किसी प्रकार की भी कसर न लगाने का
निश्चय किया । गङ्गाधरराव के पास गये । एकांत पाकर बोले, 'महाराज
से निवेदन करने करने आया हू ।
राजा ने कहा, कहिये दीक्षित जी ।'
दीक्षित - 'रनवास को सूना हुये काफी समय हो गया है । अब...'
राजा—'मै क्या करूँ ? जन्मपत्री मे मेरे इतने तेजस्वी ग्रह हैं कि
मेल ही नही खाती । एकाध जगह मिली तो लडकी का भुखमरा पिता
चाहता था कि मै सब कामधाम छोड कर, बाप-बेटी की पूजा-अर्चा में
ही बाकी का जीवन बिताऊँ । इससे तो मेरी नाटकशाला ही अच्छी ।
अप्सराओ के सुन्दर अभिनय । सुखलाल के बनाये नये-नये पर्दे ।
सुरीला-गायन वादन और सुहावना नृत्य । आपने तो अनेक बार रंग-
शाला में अभिनय देखे हैं ।
दीक्षित—'श्रीमन्त सरकार, बन्श परम्परा बनाये रखने के लिये
शास्त्रो का विधान अनिवार्य है । प्रजा अपने राजा की बगल में अपना
राजकुमार देखने की लालसा रखती है । सरकार का आमोद-प्रमोद भी
चलता रह सकता है ।'
'हाँ ठीक है ।' कह कर गङ्गाधरराव सोचने लगे ।
कुछ क्षण बाद बोले, 'दीक्षित जी आप तो काव्यरसिक हैं । श्री हर्षदेव
रचित रत्नावली नाटिका कितनी कोमल, मधुर, मन्जु कल्पना है, और
मोतीबाई अब भी कितनी सुन्दर, कितना मनोहर अभिनय करती है ।'
लक्ष्मीबाई ३५
दीक्षित ने सोचा अब खतरे में पडे। मोतीबाई के प्रति राजा का
ऐसा उत्साह देखकर दीक्षित कुण्ठित हुये।
धीरज पकड कर दीक्षित कह गये, 'परन्तु सरकार, महल सूना है।
उसमें तो दिवाली कोई सजातीय कन्या ही जगमगा सकती है।'
गङ्गाधरराव की आँख बडी थी और डोरे लाल। दीक्षित ने डरते
डरते देखा। डोरे और कुछ रक्तिम हो गये।
राजा ने कहा, 'मैं क्या करूँ? सजातीय की कन्या को ज़बरदस्ती
पकड लूँ?'
दीक्षित ने तुरन्त उत्तर दिया, 'नही महाराज, मैने जन्मपत्रियो की
परीक्षा करली है, बिलकुल मिल गई हैं। कन्या भी देख आया हूँ। बहुत
सुन्दर और कुशाग्र बुद्धि है। उसमें रानी होने योग्य समस्त गुण हैं।'
'कहाँ पर?' राजा ने जरा मुस्कराकर पूछा।
दीक्षित का साहस बढा। उत्तर दिया, 'महाराज, वह इस समय
बिठूर में है। श्रीमन्त पन्त प्रधान पेशवा का काम-काज देखने पर उसका
पिता मोरोपन्त ताम्बे नियुक्त है। पढी लिखी है और समयोचित सभी
गुण उसमे हैं।'
राजा ने प्रश्न किया, 'ताम्बे कुलीन होते हैं, यह मै जानता हूँ
लेकिन मोरोपन्त भट्ट भिक्षुक तो नही है?'
दीक्षित ने जवाब दिया, 'श्रीमन्त पेशवा की यज्ञशाला पर एक
रामभट्ट गोडसे है। वह मोरोपन्त का मित्र है। उसने मोरोपन्त की पुत्री
को विद्याभ्यास भर कराया है। इसके सिवाय मोरोपन्त का रामभट्ट या
किसी भट्ट से और कोई सम्बन्ध नही है।'
गङ्गाधरराव ने जरा तीखेपन से कहा, 'मै पूछता हूँ मोरोपन्त
भिक्षुक है या नही?'
दीक्षित ने दृढता के साथ उत्तर दिया, 'कदापि नही, सरकार।'
गङ्गाधरराव ने दूसरा प्रश्न किया, 'पेशवा और मोरोपन्त में कैसा
सम्बन्ध है?'
३६ झाँसी की रानी
दीक्षित—'बहुत घनिष्ठ। मित्रो जैसा। कोई नही कह सकता कि
पेशवा मालिक हैं और मोरोपन्त नौकर। कन्या को पेशवा ने बिलकुल
अपनी पुत्री की तरह मान रक्खा है। मै स्वयं देख आया हू।'
राजा—'वे लोग सम्बन्ध को स्वीकार कर रहे हैं?'
दीक्षित—'कर लेंगे। मुझको विश्वास है।'
राजा—'तब सगाई मगनी इत्यादि के लिये आपको ही बिठूर जाना
पड़ेगा।'
हर्ष के मारे दीक्षित का दिमाग चक्कर खा गया। बोले, 'अवश्य
जाऊँगा, सरकार।' फिर गला भर आया। आँख मे एक आँसू।
'यह क्या दीक्षित जी?' राजा ने मिठास के साथ कहा।
दीक्षित गला सयत करके बोले, 'झांसी की जनता को यह समाचार
बहुत हर्ष देगा, श्रीमन्त।'
लक्ष्मीबाई ३७
[ ७ ]
राज्य के अन्य कर्मचारियो के साथ तात्या दीक्षित बिठूर गये।
मोरोपन्त और बाजीराव को सम्वाद सुनाया। उन्होने स्वीकार कर लिया।
गङ्गाधरराव की आयु का कोई लिहाज नही किया गया।
मनूबाई का शृंगार कराया गया। रंगीन रेशमी साड़ी, स्वर्ण के
आभूषण, मानिक मोती के हार। बाजीराव ने अपने वे सब आभरण
मनूबाई से फिर वापिस नही लिये।
मनूबाई के बडे बडे गोल नेत्र मणि मुक्ताओ को भी आभा दे रहे थे।
दुर्गा सी जान पड़ती थी।
सगाई वाग्दान की रीति होने के बाद मनूबाई नाना साहब और
रावसाहब एक ही कमरे में इकट्ठे हुये। वे दोनो लड़के भी रेशमी-वस्त्रो
और आभूषणो से लदे थे। सगाई का उत्सव बाजीराव ने धूम-धाम से
करवाया। बालको में बातचीत होने लगी।
नाना—'अब तो मनू तू झाँसी से हाथियो पर बैठकर ब्रह्मावर्त आया
करेगी।'
मनू—'एक हाथी पर या दस पर?'
नाना—'एक पर बैठेगी, बाकी पर मंत्री, सेनापति इत्यादि बैठे
आवेगे।'
मनू—'मुझको तो घोडे की सवारी पसन्द है।'
नाना—'झाँसी में बैठ पावेगी?'
मनू—'कौन रोक लेगा?'
नाना—'सुनता हू राजा बडा क्रोधी है।'
मनू—'तो क्या मुझे सूली मिलेगी?'
रावसाहब—'अरे नही। पर नवकर झुककर चलना पडेगा।'
मनू ने नवकर झुककर कमरे का एक चक्कर काटा। हँस कर बोली,
'ऐसे? ऐसे चलना पड़ेगा?'
३८ झांसी की रानी
वे दोनो लडके भी हँस दिये । मनू की कान्ति से वह घर झिलमिला
उठा । और जब वे बालक हँसे, उनके दातो की दीप्ति से वह घर दमक
उठा ।
रावसाहब—'मनू तुम्हारे चले जाने पर हम लोगो को सब तरफ सूना
सूना लगेगा ।'
मनू—'तो साथ चले चलना ।'
नाना—'काका एकाध महीने के लिये जाने दे सकते हैं अधिक समय
के लिये नही ।'
मनू—'अधिक समय तो यही रहना चाहिये ! बाला गुरू से तुमको
अभी बहुत सीखना है। आया ही क्या है ? मलखम्भ, कुश्ती इत्यादि
से शरीर को खूब कमाओ। अच्छी तरह से हथियार चलाना सीखो....'
नाना—'और फिर दिल्ली पर धावा बोल दो ।'
मनू—'दिल्ली मे क्या रक्खा है ! दादा, काका और अखाडे के सब
समझदार लोग चर्चा करते हैं कि दिल्ली के कटघरे में अब एक कठपुतली
भर रह गई है ।'
नाना—'अब तो सब तरफ अंगरेज़ो का चरचराटा है ।'
मनू हँस पडी ।
रावसाहव ने कहा, 'तो क्या अङ्गरेज़ हमको वैसे ही निगल जायेंगे ?'
मनू हँसते हँसते बोली, 'नाना साहव को कदाचित् विश्वास नही होता
कि अङ्गरेज़ भी हराये जा सकते हैं ।'
नाना जरा कुढ गया । कहने लगा, 'छबीली को सिवाय घमंड मारने
के और कुछ आता ही नही ।'
उन उज्वल विशाल नेत्रो को और भी विस्तार मिला । मनू बोली,
'फिर छबीली कहा ?'
नाना हँस पडा । 'आज तो तुमने अपने ही मुँह से छबीली कह
दिया ! ओह मात खाई !' नाना ने कहा ।
मनू भी हँसी । बोली, 'आगे कभी मत कहना ।'
लक्ष्मीबाई ३६
नाना ने गंभीर मुख मुद्रा कर के कहा, 'अब तो झांसी की रानी
कहा करूंगा।'
मनू मुसकराई।
उस मुस्कान में झांसी का कितना महान और कैसा अमर इतिहास
छिपा पड़ा था।
उसी समय वहा बाजीराव और मोरोपन्त आ गये। बाजीराव प्रसन्न
थे और मोरोपन्त आनन्द विभोर। उन बच्चो को सुखी देखकर वे लोग
उस कमरे के वातावरण में समा गये। बाजीराव के मुँह से निकल पडा,
'मनू तू ऐसी भाग्यवती हो कि भाग्यो को बाटती रहे।'
मोरोपन्त ने मनू को चिढाने के तात्पर्य से कहा, 'श्रीमन्त ने इसका
छुटपन में क्या नाम रक्खा था ? मै तो भूल ही गया।'
मनू ने गर्दन मोडकर ओठ सिकोडे। आखो में क्रोध लाने की चेष्ठा
की। 'ऊँ' निकला और मुस्करा दी।
बाजीराव बोले, 'क्या नाम था मनू ? तू ही बदलादे बेटी।'
बाजीराव के पेट पर अपना सिर रखकर मनू ने कहा, 'नही दादा।
छवीली नाम अच्छा नही लगता।'
खिलखिला कर हँस पडे।
उसी समय तात्या ने आकर कहा, सरकार ! लोग इकट्ठे हो गये
हैं। बातचीत होनी है।'
वे तीनो चले गये। बैठक में ब्रह्मावर्त निवासी महाराष्ट्र के प्रमुख
ब्राह्मण विवाह की शर्तों की चर्चा कर रहे थे।
मोरोपन्त के पास सोना चादी नही था, पर जो कुछ था वह उसे
विवाह में लगा देने को तैयार थे। बिठूर के इन प्रतिष्ठित ब्राह्मणो की
मध्यस्थता मे तै हुआ कि विवाह का व्यय झासी के राजा वहन करेंगे
और विवाह झासी में होकर होगा। यह भी तै हुआ कि मोरोपन्त झासी
में ही स्थायी तौर पर रहा करेगे और उनकी गणना झासी के सरदारो
में होगी।
४० झांसी की रानी
झासी के मिहमान मोरोपन्त को कन्या सहित अपने साथ लिवा ले
जाना चाहते थे । लेकिन यह ठीक न समझकर मोरोपन्त उन लोगो के
साथ नही गये । अपने सुभीते के लिये उन्होने कुछ समय उपरात झासी
आने का सकल्प प्रकट किया । विवाह का मुहूर्त निश्चित करके मिहमान
झासी चले गये । बाजीराव ने बाला गुरू के अखाडे वाले तात्या को
झासी में मोरोपन्त के लिये निवास-स्थान इत्यादि की उचित व्यवस्था के
लिये उन लोगो के साथ भेजा । यह ब्राह्मण था । आगे चलकर इतिहास
में यही युवा तात्या टोपे के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
लक्ष्मीबाई
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[ ८ ]
झाँसी में उस समय मन्त्रशास्त्री, तन्त्रशास्त्री, वैद्य, रणविद इत्यादि
अनेक प्रकार के विशेषज्ञ थे । शाक्त, शैव, वाम मार्गी, वैष्णव सभी
काफी तादाद में । अधिकांश वैष्णव और शैव । और ऐसे लोगो की तो
बहुतायत ही थी जो 'गृहे शाक्ता., वहिर शैवा , सभा मध्येच वैष्णवाः'
थे । इन सब के सघर्ष मे अनेक जातियाँ और उपजातियाँ जिनको शूद्र
समझा जाता था उन्नति की ओर अग्रसर हो रही थी । व्यक्तिगत चरित्र
का सुधार, घरेलू जीवन को अधिक शान्त और सुखी बनाना तथा
जातियो की श्रेणी मे ऊँचा स्थान पाना यह उस प्रगति की सहज आकाक्षा
थी । ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य जनेऊ पहिनते हैं—यह उनकी ऊँचाई की
निशानी है, जो न पहिनता हो वह नीचा । इसलिये उन जातियो के
कुछ लोगो ने, जिनके हाथ का छुआ पानी और पूडी मिष्ठान्न आम तौर
पर ऊँची जाति के हिन्दू ग्रहण कर सकते थे, जनेऊ पहिनने प्रारम्भ कर
दिये । उनके इस काम में कुछ बुन्देलखण्डी और महाराष्ट्र ब्राह्मणो का
समर्थन था । झाँसी नगर मे ब्राह्मण काफी सख्या में थे । अकेले महाराष्ट्र
ब्राह्मणो के ही तीन सौ घर थे । इन सब का बहुत बडा भाग इस
प्रगति के विरुद्ध था ।
आन्दोलन उठा । शूद्र जनेऊ के अधिकारी नही हैं, अधिकांश
पण्डित इस मत के थे । आन्दोलन के पक्ष में एक विद्वान तान्त्रिक
नारायण शास्त्री नाम का था । वह शृङ्गार शास्त्र का भी पारङ्गत
समझा जाता था । उसने शिवाजी के प्रसिद्ध अमात्य बालाजी आवजी
के पक्ष मे दी हुई महापण्डित विश्वेश्वर भट्ट* की व्यवस्था को जगह
जगह उद्धृत किया ।
यह वाद-विवाद कुछ दिनो अपनी साधारण गति से चलता रहा ।
*पूरा नाम—ब्रह्मदेव विश्वेश्वर भट्ट कलियुग के व्यास । महाराष्ट्र
में गङ्ग भट्ट के नाम से विख्यात ।
४२ झाँसी की रानी
गङ्गाधरराव के पास भी ख़बर पहुंची । वह तटस्थ से थे, और कट्टर-
पंथियो के नायको का उन्होने मजाक भी उडाया । पर इससे कट्टरपन्थ
की धार को जरा और तेजी मिली । घर-घर वाद-विवाद होने लगा ।
अमुक वर्ग शूद्र है, अमुक सवर्ण इस बात पर खूब ले-दे मची । घरो के
बाहर के चबूतरो पर, बैठको में, तम्बोलियो की दूकानो पर, मन्दिरो में, .
पाठशालाओ में, दावतो-जेवनारो में, बाजार-बाजार में, चर्चा का यही
प्रधान विषय । उस समय झाँसी में दो अच्छे कवि थे । एक हीरालाल
व्यास, दूसरे 'पजनेश' । हीरालाल ने अपना उपनाम 'हृदयेश' रक्खा था ।
हृदयेश वैसे उदार विचारो के थे, उस समय के लिहाज से राष्ट्रवादी ।
पजनेश शृङ्गार-रस के कवि थे । अन्य जाति की एक सुन्दरी रक्खे
हुये थे और नारायण शास्त्री के मित्र थे । दोनो रसिक । इसलिये कट्टर
पन्थियो के प्रतिकूल थे । पजनेश ने इस विषय पर कुछ छन्द भी बनाये
परन्तु समय की हवा के खिलाफ होने के कारण पजनेश के तर्क-वितर्क
वाले थोडे से छन्द बिलकुल पिछड़ गये और हृदयेश का कट्टरपन्थी
पक्षपात छन्दो की बाढ में बहने लगा ।
दुर्गा लावनी वाली एक वेश्या थी । अच्छी गायिका और विलक्षण
नर्तकी । उसने बहुमत का साथ दिया । हृदयेश के छन्द गाती और कभी
अपनी बनाई हुई लावनियो में उस पक्षपात को चमकाती । नारायण
शास्त्री दाँत पीसते और सिरतोड परिश्रम अपने पक्ष की पुष्टि के लिये
करते । पजनेश ने उस पक्ष के समर्थन में कविता करना बन्द कर दिया ।
हृदयेश को गली-कूचे, हाट-बाजार और मन्दिरो में इतना महत्व मिलते
उन्हे अच्छा नही लगा । खासतौर पर दुर्गा सरीखी प्रसिद्ध नर्तकी और
सुन्दरी द्वारा हृदयेश के बनाये हुये छन्दो का गायन । वह नारायण शास्त्री
के घर अब और अधिक आने-जाने लगे और अधिक समय तक
बैठने-उठने लगे । नारायण शास्त्री का शास्त्रोक्त समर्थन सीख-सीख कर
वाद-विवाद में पूरी मुँहजोरी के साथ उद्धृत करने लगे । एक दिन
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उनके एक क्षुब्ध विरोधी ने सब दलीलो का एक जवाब देते हुये तडाक से
कहा, 'नारायण शास्त्री जिसकी तुम बार बार दुहाई देते हो, ब्राह्मण ही
नही है ।'
पजनेश ने अधिकतर क्षुब्ध स्वर मे पूछा, 'क्यो नही है ?'
उत्तर मिला, 'वह एक भगिन को रखे हुये है ।'
यह अपवाद खुसफुस के रूप मे फैला । परन्तु धीरे धीरे । कुछ कट्टर
पंथियो ने इसको अपना लिया और कुछ ने असम्भव कह कर अस्वीकृत
कर दिया । पजनेश ने सोचा, 'मैं स्वयं निर्धार करूँगा ।' नारायण शास्त्री
ने भी अपनी बदनामी सुन ली ।