झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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भोजनोपरान्त तात्या दीक्षित से बाजीराव और मोरोपन्त मिले ।
तात्या दीक्षित ज्योतिष और तन्त्र के शास्त्री थे । काशी, नागपूर,
पूना इत्यादि घूमे हुये थे । महाराष्ट्र समाज से काफी परिचित थे । बिठूर
( ब्रह्मावर्त ) में बाजीराव के साथ दक्षिणी ब्राह्मणो का एक बडा परिवार
आ बसा था ।* उस काल में मलखंब और मल्लयुद्ध के आचार्य वाला गुरू
का अखाडा दक्षिणियो और हिन्दुस्तानियो से भरा रहता था और गुरू
बल, यौवन और स्वाभिमान को वितरित सा करते रहते थे । वह स्वय
इतने दृढ, बलिष्ठ और स्वाभिमानी थे कि उनको लेटने तक में चित होने
से नफरत थी । औंधे लेटा करते थे ।
मोरोपन्त ने अवसर निकाल कर तात्या दीक्षित से प्रार्थना की,
'दीक्षित जी, मुझे अपनी कन्या मनूबाई के विवाह की बडी चिंता लग
रही है । मैने बहुत खोज की है परन्तु कोई योग्य घर नही मिला । अब
भी खोज कर रहा हू । आपका ससार में बहुत परिचय है । आप
इस कन्या के लिये योग्य वर ढूंढ दीजिये । बडा अनुग्रह होगा ।'
बाजीराव ने भी कहा, 'कन्या बहुत सुन्दर है । बडी कुशाग्र बुद्धि और
होनहार । उसके लिये अच्छा वर ढूँढना ही चाहिये ।'
मोरोपन्त बोले, 'सब हथियार चलाना बहुत अच्छी तरह जानती है ।
घोडे की सवारी में पुरुषो के कान पकडती है । जब चार वर्ष की थी
इसकी माँ का देहान्त हो गया था । इसलिये मैंने स्वय उसकी दिन रात
देख भाल की है, लालन पालन किया है । मराठी, सस्कृत और हिन्दी
पढाई है । शास्त्रो में उसकी रुचि है ।'
*इनकी सख्या लगभग आठ सहस्त्र थी । बाजीराव की पेंशन का
एक बडा भाग लोगो पर खर्च होता था ।