सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 48

लक्ष्मीबाई ३७
[ ७ ]
राज्य के अन्य कर्मचारियो के साथ तात्या दीक्षित बिठूर गये।
मोरोपन्त और बाजीराव को सम्वाद सुनाया। उन्होने स्वीकार कर लिया।
गङ्गाधरराव की आयु का कोई लिहाज नही किया गया।
मनूबाई का शृंगार कराया गया। रंगीन रेशमी साड़ी, स्वर्ण के
आभूषण, मानिक मोती के हार। बाजीराव ने अपने वे सब आभरण
मनूबाई से फिर वापिस नही लिये।
मनूबाई के बडे बडे गोल नेत्र मणि मुक्ताओ को भी आभा दे रहे थे।
दुर्गा सी जान पड़ती थी।
सगाई वाग्दान की रीति होने के बाद मनूबाई नाना साहब और
रावसाहब एक ही कमरे में इकट्ठे हुये। वे दोनो लड़के भी रेशमी-वस्त्रो
और आभूषणो से लदे थे। सगाई का उत्सव बाजीराव ने धूम-धाम से
करवाया। बालको में बातचीत होने लगी।
नाना—'अब तो मनू तू झाँसी से हाथियो पर बैठकर ब्रह्मावर्त आया
करेगी।'
मनू—'एक हाथी पर या दस पर?'
नाना—'एक पर बैठेगी, बाकी पर मंत्री, सेनापति इत्यादि बैठे
आवेगे।'
मनू—'मुझको तो घोडे की सवारी पसन्द है।'
नाना—'झाँसी में बैठ पावेगी?'
मनू—'कौन रोक लेगा?'
नाना—'सुनता हू राजा बडा क्रोधी है।'
मनू—'तो क्या मुझे सूली मिलेगी?'
रावसाहब—'अरे नही। पर नवकर झुककर चलना पडेगा।'
मनू ने नवकर झुककर कमरे का एक चक्कर काटा। हँस कर बोली,
'ऐसे? ऐसे चलना पड़ेगा?'