झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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झाँसी में उस समय मन्त्रशास्त्री, तन्त्रशास्त्री, वैद्य, रणविद इत्यादि
अनेक प्रकार के विशेषज्ञ थे । शाक्त, शैव, वाम मार्गी, वैष्णव सभी
काफी तादाद में । अधिकांश वैष्णव और शैव । और ऐसे लोगो की तो
बहुतायत ही थी जो 'गृहे शाक्ता., वहिर शैवा , सभा मध्येच वैष्णवाः'
थे । इन सब के सघर्ष मे अनेक जातियाँ और उपजातियाँ जिनको शूद्र
समझा जाता था उन्नति की ओर अग्रसर हो रही थी । व्यक्तिगत चरित्र
का सुधार, घरेलू जीवन को अधिक शान्त और सुखी बनाना तथा
जातियो की श्रेणी मे ऊँचा स्थान पाना यह उस प्रगति की सहज आकाक्षा
थी । ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य जनेऊ पहिनते हैं—यह उनकी ऊँचाई की
निशानी है, जो न पहिनता हो वह नीचा । इसलिये उन जातियो के
कुछ लोगो ने, जिनके हाथ का छुआ पानी और पूडी मिष्ठान्न आम तौर
पर ऊँची जाति के हिन्दू ग्रहण कर सकते थे, जनेऊ पहिनने प्रारम्भ कर
दिये । उनके इस काम में कुछ बुन्देलखण्डी और महाराष्ट्र ब्राह्मणो का
समर्थन था । झाँसी नगर मे ब्राह्मण काफी सख्या में थे । अकेले महाराष्ट्र
ब्राह्मणो के ही तीन सौ घर थे । इन सब का बहुत बडा भाग इस
प्रगति के विरुद्ध था ।
आन्दोलन उठा । शूद्र जनेऊ के अधिकारी नही हैं, अधिकांश
पण्डित इस मत के थे । आन्दोलन के पक्ष में एक विद्वान तान्त्रिक
नारायण शास्त्री नाम का था । वह शृङ्गार शास्त्र का भी पारङ्गत
समझा जाता था । उसने शिवाजी के प्रसिद्ध अमात्य बालाजी आवजी
के पक्ष मे दी हुई महापण्डित विश्वेश्वर भट्ट* की व्यवस्था को जगह
जगह उद्धृत किया ।
यह वाद-विवाद कुछ दिनो अपनी साधारण गति से चलता रहा ।
*पूरा नाम—ब्रह्मदेव विश्वेश्वर भट्ट कलियुग के व्यास । महाराष्ट्र
में गङ्ग भट्ट के नाम से विख्यात ।