झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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सकेगी और न अपने पति को सुखी बना सकेगी । गंगाधरराव की रानी
बनने पर चपलता न रह सकेगी । जीवन में सयम आ जावेगा । वह
१३-१४ साल की है और गंगाधरराव चालीस से कुछ ऊपर । परन्तु
उनका स्वास्थ्य अच्छा है । स्वभाव कठोर सही है, लेकिन ऐसी उग्र स्त्री
के लिये तो ऐसा ही पति चाहिये । घोडे की सवारी, तीर-तमचा, मल्लखभ
और क्या क्या यह सब झासी के राज्य ही में मिल सकेगा, और कही
असम्भव है । यह सब सोचकर दीक्षित ने झाँसी के राजा के साथ मनूबाई
का विवाह सम्बन्ध कराने में किसी प्रकार की भी कसर न लगाने का
निश्चय किया । गङ्गाधरराव के पास गये । एकांत पाकर बोले, 'महाराज
से निवेदन करने करने आया हू ।
राजा ने कहा, कहिये दीक्षित जी ।'
दीक्षित - 'रनवास को सूना हुये काफी समय हो गया है । अब...'
राजा—'मै क्या करूँ ? जन्मपत्री मे मेरे इतने तेजस्वी ग्रह हैं कि
मेल ही नही खाती । एकाध जगह मिली तो लडकी का भुखमरा पिता
चाहता था कि मै सब कामधाम छोड कर, बाप-बेटी की पूजा-अर्चा में
ही बाकी का जीवन बिताऊँ । इससे तो मेरी नाटकशाला ही अच्छी ।
अप्सराओ के सुन्दर अभिनय । सुखलाल के बनाये नये-नये पर्दे ।
सुरीला-गायन वादन और सुहावना नृत्य । आपने तो अनेक बार रंग-
शाला में अभिनय देखे हैं ।
दीक्षित—'श्रीमन्त सरकार, बन्श परम्परा बनाये रखने के लिये
शास्त्रो का विधान अनिवार्य है । प्रजा अपने राजा की बगल में अपना
राजकुमार देखने की लालसा रखती है । सरकार का आमोद-प्रमोद भी
चलता रह सकता है ।'
'हाँ ठीक है ।' कह कर गङ्गाधरराव सोचने लगे ।
कुछ क्षण बाद बोले, 'दीक्षित जी आप तो काव्यरसिक हैं । श्री हर्षदेव
रचित रत्नावली नाटिका कितनी कोमल, मधुर, मन्जु कल्पना है, और
मोतीबाई अब भी कितनी सुन्दर, कितना मनोहर अभिनय करती है ।'