झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ झाँसी की रानी
मोरोपन्त पर आ पड़ा । मोरोपन्त ने मनू को बहुत प्यार के साथ
पाला । लडके से बढकर ।
मनू इतनी सुन्दर थी कि छुटपन में बाजीराव इत्यादि उसको
स्नेहवश 'छबीली' के नाम से पुकारते थे ।
बाजीराव के अपनी कोई सन्तान न थी । इसलिये उन्होने नाना
धोधूपन्त नाम के एक बालक को गोद लिया । नाना तीन भाई थे—
नाना, बाला और रावसाहब । बाला उस समय बिठूर में न था । छोटा
सहोदर रावसाहब था ।
मनू और ये दोनो लडके साथ खेलते-खाते और पढते थे । मलखंब
कुश्ती, तलवार-बन्दूक का चलाना, अश्वारोहण, पढना-लिखना इत्यादि
सब इन तीनो ने छुटपन से साथ साथ सीखा । मनू चपल, हठीली और
बहुत पैनी बुद्धि की थी । कम आयु की होने पर भी वह इन हुनरो में
उन दोनो बालको से बहुत आगे निकल गई । स्त्रियो की संगति कम प्राप्त
होने के कारण वह लाज संकोच की अतीत दबन और झिझक से दूर
हटती गई थी ।
नाना आठ लाख वार्षिक पेंशन अपने और अपने भाइयो की
परम्परा के -जीवन सुख के लिये काफी से अधिक समझता होगा ।
बाजीराव को पैंशन 'उसको और उसके कुटुम्ब के लिए दी गई थी ।'
बिना किसी प्रयत्न-प्रयास के आठ लाख वार्षिक मिलते जावे तो फिर किस
महत्त्वाकांक्षा की जोखिम के लिये और अधिक हाथ-पैर हिलाये जावें ?
मनूबाई ऐसा नही सोचती थी । छत्रपति शिवाजी इत्यादि के आधु-
निक और अर्जुन-भीम इत्यादि के पुरातन आख्यानो ने मनू की कल्पना
को एक अस्पष्ट और अदम्य गुदगुदी दे रक्खी थी ।