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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८७७
स्वस्ति श्रीजयाभ्युदये युधिष्ठिरशके प्लवङ्गाख्ये एकोननवतित्संवत्सरे सहस्य (पौष) मासे
अमावश्यायां सोम्यवासरे श्रीमन्महाराजाधिराजपरमेश्वरो वीरप्रतापशाली कुरुकुलोद्भवो वैयाघ्रपाद-
गोत्रजः श्रीजनमेजयभूपः किष्किन्धानगर्यां सिंहासनस्थः सकलवर्णाश्रमधर्मप्रतिपालकः पश्चिमदेशस्थ-
सीतापुरकेदारक्षेत्रे तत्रत्यमुनिवृन्दमठस्य गरुड़वाहनतीर्थश्रीमद्शिष्यकैकयनाथैराराधितसीतारामस्य
पूजार्थं कृतभूदानसाधनमस्मत्प्रपितामहयुधिष्ठिराधिष्ठितमुनिवृन्दक्षेत्रेऽस्मिन् चतुःसीमापरमितिक्रमः
पूर्वभागे उत्तरवाहिन्याः तुङ्गभद्रायाः पश्चिमे दक्षिणभागे अगस्त्याश्रमसंगमादुत्तरे पश्चिमे पाषाणनद्याः
पूर्वे उत्तरभागे भिन्ननद्या दक्षिणे एतन्मध्यस्थमुनिवृन्दक्षेत्रे भवच्छिष्यपरम्परया आचन्द्रार्कपर्यन्तं
निधिनिक्षेप-जल-पाषाण-अक्षिणी आगामिसिद्धसाध्यतेजःस्वाम्यसहितं स्वबुद्ध्यनुकूलेन अस्मन्मातापित्रोः
विष्णुलोकप्राप्त्यर्थं हरिहरसन्निधौ उपरागसमये सहिरण्येन तुङ्गभद्राजलधारापूर्वकं क्षेत्रं यतिहस्ते
दत्तवानस्मि। एतद्धर्मसाधनस्य साक्षिणः आदित्यचन्द्रावनिलानलौ च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च ।
अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ।। दानपालनयोर्मध्ये दानाच्छ्रेयोऽनुपालनम् ।
दानात्स्वर्गमवाप्नोति पालनादच्युतं पदम् । स्वदत्ताद् द्विगुणं पुण्यं परदत्तानुपालनम् । परदत्तापहारेण
स्वदत्तं निष्फलं भवेत् । स्वदत्ता पुत्रिका ज्ञेया पितृदत्ता सहोदरा । अन्यदत्ता तु जननी दत्तभूमि
परित्यजेत् । अन्येस्तु छर्दितं शूद्रैः श्वभिश्च छर्दितं ननु । ततः कष्टस्ततो नीचः स्वयं दत्तापहारकः ।
स्वदत्तां परदत्तां वा ब्रह्मवृत्ति हरेच्च यः । षष्टिवर्षसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः ।। इति ।।
उक्त ताम्रपत्र जनमेजय राजा का है। उसमें कृष्ण की वन्दना करके युधिष्ठिर शक प्लवङ्गम संवत्
में नवासी वर्ष में सहस्य मास (पौष मास) अमावस्या सौम्य वासर के दिन वैयाघ्रपादगोत्रज कुरुकुलोद्भव राजा
जनमेजय ने किष्किन्धा नगरी में सिंहासनस्थ होकर तुङ्गभद्रा अगस्त्याश्रम आदि अमुक अमुक तीर्थ सीमायुक्त
हिरण्यसहित भूक्षेत्र का दान किया आदि आदि । इसमें जनमेजय द्वारा सीताराम की पूजा के लिए भूक्षेत्र का दान
कहा गया है।
सुतरां सीताराम-पूजा ईसा से हजारों वर्ष पूर्व से प्रचलित सिद्ध होती है, अतः बुल्के का यह कहना
निराधार ही है कि ई० पू० पहली या दूसरी शती में राम की पूजा होने लगी थी। कुछ लोग कहते हैं प्लवङ्गम
संवत्सर सहित उक्त योग अब से पहले तेरहवीं शती में आया था, अतः वही महाभारत का समय है। परन्तु वाराणसेय
राजकीय संस्कृत महाविद्यालयीय गणिताध्यापक बापूदेव शास्त्री ने उस मत का निराकरण कर के ताम्रशासन का काल
ही निर्धारित किया है।
उपर्युक्त अनेक उद्धरणों, शिलालेखों एवं ताम्रलेखों से २०२९ वर्तमान विक्रमीय संवत्सर से ३०४४ वर्ष
पूर्व ५०७३ कलि संवत्सर युधिष्ठिर संवत् सिद्ध है। धृतराष्ट्र के मरणोपरान्त युधिष्ठिर के राज्यकाल में महाभारत
का निर्माण हो चुका था। गीता तो इससे भी पहले युद्धारम्भ के दिन ही प्रकट हुई थी। महाभारत तथा गीता में
चर्चित राम एवं उनके समय का ही रामायणग्रन्थ अति प्राचीन सिद्ध होते हैं। तथा च पाश्चात्यों की यह कल्पना
अत्यन्त असंगत है कि बुद्ध के पश्चात् ईसा से पूर्व तीसरी शती में रामायण का निर्माण हुआ है।
पुराणों के आधार पर भी रामायण एवं राम की अतिप्राचीनता सिद्ध होती है—
"द्वापरस्य कलेश्चैव सन्धौ पर्यवसानिके ।
प्रादुर्भावः कंसहेतोर्मथुरायां भविष्यति ।। (म० भा० शा० ३२९।८९)
द्वापर और कलि की सन्धि में कंसवधार्थ मथुरा में कृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ है। इस वचन से कृष्ण का
भी आविर्भाव काल वही सिद्ध होता है।

८७८ रामायणमीमांसा द्वाविंश
चालुक्यवंशीय महाराज पुलकेशिन द्वितीय के बीजापुर एहोल नामक पर्वतीय क्षेत्र में स्थित जैनमन्दिर में
उत्कीर्ण शिलालेख से भी महाभारत-संग्राम का यही समय सिद्ध होता है। शिलालेख के श्लोक निम्नोक्त हैं—
“त्रिंशत्सु त्रिसहस्रेषु भारतादाहवादितः ।
सप्ताब्दशतयुक्तेषु गतेष्वब्देषु पञ्चसु ॥
पञ्चाशत्सु कलौ काले षट्सु पञ्चशतीषु च ।
समासु समतीतासु शकानामपि भूभुजाम् ॥”
अर्थात् महाभारत युद्ध से ३७३५ वर्ष बीतने पर तथा कलि में शक राजाओं-के ५५६ वर्ष बीतने पर यह
शिलालेख उत्कीर्ण हुआ है। जो आज से १३५८ वर्ष पूर्वका हैं। ३७३५ में १३३८ मिला लेने पर ५०७३ वर्ष पूर्व
भारत-युद्ध का होना सिद्ध होता है। आश्चर्य है कि इस प्रकार समस्त प्राचीन भारतीय साहित्यकार, रामायण तथा
महाभारत को वाल्मीकि और व्यासकृत मानते हैं किन्तु कुछ पाश्चात्य तथा उनके अनुयायी अपना हठ नहीं छोड़ते ।
पुराणों की मान्यता
नवीं शताब्दी में मेधातिथि लिखते हैं 'पुराणानि व्यासादिप्रणीतानि' (३।२२२) । ६८७ के ऋग्भाष्यकार
स्कन्दस्वामी पुराणों का उद्धरण करते हैं—१।२०।७ पुराणेषु प्रसिद्धम्, (१।२५।१३), पौराणिकाः कक्षीवन्तमङ्गिरसं
स्मरन्ति (१।११६।७) । सांख्यकारिका २२ के भाष्य में गौडपादाचार्य पुराणों का उल्लेख करते हैं। दुर्गाचार्य
वसिष्ठोत्पत्ति की कथा देकर कहते हैं—इति पुराणे श्रूयते (निरुक्त ५।१४) । यह कथा मत्स्यपुराण (२०।२३-२९) में
मिलती है ।
विक्रम १ श० वररुचि 'निरुक्तसमुच्चय' में कहते हैं—'तथा चाहुः पौराणिकाः ।'
न्यायभाष्यकार वात्स्यायन पुरातन ब्राह्मण ग्रन्थ का वाक्य लिखते हैं और कहते हैं कि प्रमाणभूत ब्राह्मण
से इतिहास और पुराण का प्रामाण्य सिद्ध होता है। जो ऋषि मन्त्र तथा ब्राह्मणों के द्रष्टा और प्रवक्ता हैं वे ही
इतिहास-पुराण तथा धर्मशास्त्र के कर्त्ता हैं—
“प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेन इतिहासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते । ते वा खल्वेते अथर्वाङ्गिरस
एनदितिहासपुराणमभ्यवदन् 'इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः' इति । य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः
प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति ।”
पतञ्जलि पुरातन वाङ्‌मय का परिगणन करते हुए पुराण और इतिहास की भी चर्चा करते हैं:—
“वाकोवाक्यमितिहासः पुराणं वैद्यकमिति ।”
कौटिल्य भी इन पुराणों का उल्लेख करते हैं 'इतिहासपुराणाभ्यां बोधयेदर्थशास्त्रवित् ।' अ० ९६ ।
वह पौराणिक सूत और सारथि सूत में भेद भी करते हैं 'ब्राह्मण्यां क्षत्रियात् सूतः पौराणिकस्त्वन्यः सूतो
मागधश्च ब्रह्मक्षत्राद्विशेषतः ।' पौराणिक सूत अग्निकुण्ड से उत्पन्न होने से विशिष्ट है (अध्याय ६४) । याज्ञवल्क्य
उनसे भी प्राचीन हैं। वे भी पुराणों को जानते हैं—
“पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानाम् ।”( १।३ )
गौतमधर्मसूत्रभाष्यकार मस्करी सूत्र १।३९ में कण्वधर्मसूत्र का एक वचन देता है 'अथर्ववेदेतिहास-
पुराणानि ध्यायन्' इससे प्रतीत होता है—कण्वसूत्रकार को पुराण विदित थे । गौतमध० सू० ८।६ और ११।२१
में पुराणशब्द मिलता है ।

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८७९
आपस्तम्बधर्मसूत्र १।६।१९।१३।१४ पुराण के दो श्लोक उद्धृत हैं । यह कहा ही गया है कि सर्वप्राचीन
मनु ने भी इतिहास-पुराण को श्राद्ध में श्रवण करना कहा है । चरकसंहिता के शारीरस्थान ४।४४ में 'श्लोका-
ख्यायिकेतिहासपुराणेषु कुशलम्' उल्लेख है। यह बुद्ध से बहुत पहले का है। आरण्यकों और ब्राह्मणों में भी
पुराण शब्द है । 'ब्राह्मणानीतिहासान् पुराणानि कल्पान् नाराशंसीः' (तै० आ० २।९) । "तानुपदिशति
पुराणं वेदः सोऽयमिति सोऽयमिति किञ्चित् पुराणमाचक्षीत ।” ( श० ब्रा० ११।४।३।१३ ) ।
पराशरज्योतिषसंहिता में "वेदवेदाङ्गेतिहासपुराणशास्त्रावदातम् ।” पुराण इतिहास की चर्चा है ।
वा० रा० बालकाण्ड अ० २ "नरेन्द्र श्रूयतां तावत् पुराणे यन्मया श्रुतम्” ।।५।।
अथर्ववेद ( १५।३०१) में अनेक विद्याओं के साथ पुराणों का भी वर्णन है । तमितिहासं पुराणं च
ऋचः सामानिच्छन्दांसि । पुराणं यजुषा सह उच्छिष्टाज्जज्ञिरे तस्माद्दिवि देवाः ।।
प्रसिद्ध ऐतिहासिक अलवेरूनी सं० १०८७, १८ पुराणों की स्वल्पभेदवाली दो सूचियाँ देता है।
राजशेखर ९९७ काव्यमीमांसा अ० २ में कहता है 'तत्र वेदार्थानोपनिबन्धनप्रायं पुराण-
मष्टादशधा ।' बालभारत में “राजशेखर अष्टादशपुराणसारसंग्रहकारिन् ।” (पृ० ४)
गौतमधर्मसूत्रमस्करीभाष्य ( ८।६) 'पुराणं ब्रह्माण्डादि' । वाचस्पतिमिश्र ८०८ योगभाष्य टीका में
विष्णुपुराण २।३२—५२।५४ में और १।१९-२५, ४।१ में वायुपुराण की चर्चा करते हैं । आद्यशङ्कराचार्य
विष्णुसहस्रनामभाष्य में भविष्योत्तरपुराण, विष्णुपुराण, ब्रह्मपुराण तथा पद्मपुराण की चर्चा करते हैं ।
६३७ संवत् के बाणभट्ट ने हर्षचरित में लिखा है 'पवनप्रोक्तं पुराणं पपाठ । महाभारत के वनपर्व
( १९४।१९ ) में वायुप्रोक्त पुराण का उल्लेख है । महाभारत दा० पा० में पुराणविदों की दाशरथिरामविषयक गाथाएँ
उद्धृत हैं । ये गाथाएँ वायुपुराण ( ८८।१९६ ) में हैं ।
कुमारिल ने तन्त्रवार्तिक १।३ में पुराणप्रामाण्य कहा हैं । सांख्यकारिका माठरवृत्ति ( १२।० ) में पुराण-
वर्णित भविष्य, कलिक का उल्लेख है । योगभाष्य ( ३।२३ ) का एक वचन न्यायवार्तिक एवं न्यायभाष्य ( १।६ ) में
मिलता है—
“यस्मिन् परिणम्यमाने तत्त्वं न विहन्यते तन्नित्यम् ।”
महाभाष्यकार ने भी लिखा है--
“तदपि नित्यं यस्मिन् तत्त्वं न विहन्यते ।”
“स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात् स्वाध्यायमासते ।
स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्मा प्रकाशते ॥”
यहाँ वाचस्पतिमिश्र कहते हैं 'वैयासिकीं गाथामुदाहरति' यह वचन विष्णुपुराण ( ६।६।२) में मिलता है ।
बाण हर्षचरित में पुरूरवा के मरने की एक कथा लिखते हैं । सुबन्धु की वासवदत्ता, अश्वघोष का
बुद्धचरित तथा कौटिल्य भी इसका संकेत करते हैं । यह कथा वायुपुराण में मिलती है ।
“पुरूरवा ब्राह्मणधनतृष्णया विननाश ।” ( वायु० पु० ३।२०-२३ )
पाश्चात्यों ने अर्थशास्त्र को ई० ३री शती का माना है । वस्तुतः वे मौर्य सम्राट् चन्द्रगुप्त के महामात्य
थे । ई० सन् पूर्व के थे । दण्डी ने दशकुमारचरित में कहा है विष्णुगुप्त ने ६००० श्लोकों के परिमाण में
अर्थशास्त्र रचा—

“आचार्यविष्णुगुप्तेन मौर्यार्थे षड्भिः श्लोकसहस्रैः संक्षिप्ता।”
वात्स्यायन न्यायभाष्य में अर्थशास्त्र का वचन उद्धृत करते हैं—
“पदसमूहो वाक्यमर्थसमाप्तौ” (अ० शा० अध्या० २१) । न्यायभाष्य (२।१।५४) में लिखा है—
“पदसमूहो वाक्यमर्थसमाप्ताविति ।”
न्यायभाष्य १।१।१ में लिखा है—
“प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् ।
आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तितः ॥”
ठीक यही श्लोक अर्थशास्त्र के विद्यासमुद्देश प्रकरण में मिलता है । न्यायवार्तिक का काल वि० २य शती
से पहले का है । न्यायभाष्य विक्रम १ श० पूर्व का है । अर्थशास्त्र वि० पू० ३ श० का है ।
क्षमाकल्याण के दीपमालाकल्प में निर्वाण संवत् ५०९ कल्कि का होना लिखा है । नेमिचन्द्र अपने तिलो-
सार ग्रन्थ में निर्वाण संवत् १००० कल्कि को मानता है । इस भेद का कारण परम्पराविच्छेद ही है । महावीरजी
का निर्वाण बहुत पुराने काल की बात है । जैन भिक्षु उस काल को भूल गये । विक्रम सं० ४७० यह विवरण नागरी
प्रचारिणी पत्रिका भाग १० अंक ४ में मिलता है । यह विवरण मुनि कल्याणविजय का है ।
बौद्धपरम्परा
ह्वेनसांग, जो नालन्दा विश्वविद्यालय में वर्षों पढ़ता था, जिसने अनेक बौद्ध आचार्यों का साक्षात्कार
किया था, उसके काल से बौद्धनिर्वाणकाल १२००, १३००, १५०२ और ९०० से १००० वर्ष पूर्व तक का काल
भिन्न-भिन्न विद्वान् मानते हैं । हिन्दी अनुवाद पृष्ट ३०४ तथा शमनह्वोली कृत ह्वेनसांग का जीवनचरित, एसवील का
अंग्रेजी अनुवाद सन् १९१४ पृ० ९८ बुद्धनिर्वाण काल के विषय में सन् ४०१ से लेकर कई वर्ष तक भारत में भ्रमण
करनेवाले फाह्यान कहता हैं मूर्ति की स्थापना बुद्धदेव के परिनिर्वाणकाल से ३०० वर्ष पीछे हुई है । उस समय देश
में चाववंशी महाराजा पुङ्ग का राज्य था । (हिन्दी अनुवाद पृ० १६ अनुवादक की टिप्पणी यों है पुङ्ग का शासन
काल ७५०-७१९ तक ई० पू० था ।) अर्थात् बुद्धनिर्वाण ई० पू० ११वीं श० अधिक से अधिक ई० से १०९०
वर्ष पूर्व हुआ ।
सिंहल देश को उपलब्ध परम्परा के अनुसार बुद्धनिर्वाण की तिथि और ही है । तत्त्वसंग्रह की भूमिका
में पाश्चात्य लेखकों ने सब मतों को छोड़कर उसे ही प्रधानता दी है । जब बौद्ध सम्प्रदाय में अपने धर्मप्रवर्तक के
काल के विषय में इतने मत हैं, तब अन्य ऐतिहासिक विषयों में उनका प्रामाण्य कितना हो सकता है ? इसी
लिए तो दशरथजातक में सीता को राम की भगिनी कहा है । धम्मपद की टीका में वासवदत्ता को चन्द्रमहासेन की
भगिनी कहा है अर्थात् इन बौद्ध ग्रन्थों का सर्वथा प्रामाण्य कहना कठिन है ।
वेदों में रामायणसम्बन्धी व्यक्तियों का उल्लेख
“चत्वारिंशद्दशरथस्य शोणाः” ऋ० १।१२६।४ में दशरथ का उल्लेख है । अथर्ववेद १०।२।२८
“देवानां पूरयोध्या ।” में अयोध्या राजधानी का वर्णन है ।
“नीचीनवारं वरुणः कबन्धं प्र ससर्ज” ऋ० सं० ५।८५।३ में कबन्ध तथा “स इहासं तु वीरवं
प्रतिदंनपषडक्षं त्रिशीर्षाणम् ॥” ऋ० १०।९९।६ में त्रिशिरा का वर्णन है ।

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८८१
“ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्यः ।
स सोमं प्रथमः पपौ स चकार रसं विषम् ॥” ( अथ० सं० ४।६।१ )
में दसमुख रावण का वर्णन है—
“इन्द्रः सीतां निगृह्णातु” (ऋ०सं० ४।५७), “घृतेन सीता मधुना समक्ता” (अथ०सं० ३।१७।९)
में सीता का वर्णन है । “अघो रामो सवित्रिः” ( यजुःस० २९।५९ ) सवितृकुल के राम का वर्णन है । “भद्रो
भद्रया सचमान आगात्” ( ऋ० सं० १०।२।३ ) मे रामभद्र का उल्लेख है ।
वेदों में राम के पूर्वजों का संकेत निम्नोक्त प्रकार से मिलता है—
“मनुर्वे यत्किञ्चावदत् तद् भेषजमेवावदत् ।” ( का० सं० ११।५।४९ )
मनु की उक्ति को भेषज तुल्य कहा गया है ।
“यं त्वा वेद इक्ष्वाको” (अथ०सं० १९।३९।९) तथा “ईज इक्ष्वाको राज” (श० ब्रा० १३।५।४।
९५) में इक्ष्वाकु की चर्चा है ।
“सुद्युम्नो द्युम्नः यजमानाय धेहि” (मैत्रायणीसं० १।२।१९) में सुद्युम्न की चर्चा है ।
“विश्वामित्रो यदव हते सुदासम्” (ऋ० सं० ३।५३।९) में सुदास की चर्चा है।
“षष्टि सहस्रानवति च कोरम् ।” (अथ०सं० २०११२७।१) में सगर के साठ हजार पुत्रों का
संकेत है ।
“रघुः श्येनः पतयत् ।” (ऋ० सं० ५।४५।९) में रघु का संकेत है ।
“अथ किमेतैर्वाऽपरेऽन्ये महाधनुर्धराश्चक्रवर्तिनः केचित् सुद्युम्न-भूरिद्युम्नेन्द्रद्युम्नकुवलयाश्व-
यौवनाश्व-वध्यश्वाश्वपति-शशबिन्दुहरिश्चन्द्रऽम्बरीषो ननक्तुः शर्यातिर्ययातिरनरण्योऽश्वसेनादयोऽथ
मरुत्तभरतप्रभृतयो राजानो मिषतो बन्धुवर्गस्य महतीं श्रियं त्यक्त्वाऽस्माल्लोकादमुं लोकं प्रयाताः”
(मैत्रायणीयोपनिषद् अन्तिम आख्यायिका १।१४) में ।
“यो विद्याच्चतुरो वेदान् साङ्गोपनिषदो द्विजः ।
न चेत्पुराणं संविद्यान्नैव स स्याद्विचक्षणः ॥
इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ।
बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ॥” (वायुपु० १।२००, २०१)
“जातमात्रं च यं वेदः उपतस्थे ससंग्रहः ।” (वायुपु० १।४३)
“प्राजापत्या श्रुतिर्नित्या तद्विकल्पास्त्विमे स्मृताः ।
अनित्यभावाद् देवानां मन्त्रोत्पत्तिः पुनः पुनः ॥” (वायुपु० उपो० ६१।७५)
जो चारों साङ्गवेदों को जानकर भी पुराणों को नहीं जानता वह विचक्षण नहीं होता है । अल्पश्रुत से
वेद भयभीत होता है और यह समझता है कि यह अल्पश्रुत, अर्थ का अनर्थ कर, मुझपर प्रहार करेगा ।
भारतीय दृष्टिकोण से पैमाना—१८ निमेष की ( १ ) एक काष्ठा
३० काष्ठा की ( १ ) एक कला
३० कला का ( १ ) एक मुहूर्त
३० महर्त का ( १ ) एक अहोरात्र

८८२ रामायणमीमांसा द्वाविंश
पितरों का एक अहोरात्र = १ मास
देवताओं का एक अंहोरात्र = १ वर्ष
सत्ययुग काल—
४००० × ३६० = १४४०००० वर्ष
सन्धि— ४०० × ३६० = १४४००० वर्ष
सन्ध्यंश— ४०० × ३६० = १४४००० वर्ष
योग— = १७,२८००० वर्ष
त्रेता काल—
३००० × ३६० = १०८,०००० वर्ष
सन्धि— ३०० × ३६० = १०८,००० वर्ष
सन्ध्यंश— ३०० × ३६० = १०८,००० वर्ष
योग— = १२,९६००० वर्ष
द्वापर काल—
२००० × ३६० = ७२,०००० वर्ष
सन्धि— २०० × ३६० = ७२,००० वर्ष
सन्ध्यंश— २०० × ३६० = ७२,००० वर्ष
योग— = ८,६४००० वर्ष
कलियुग काल—
१००० × ३६० = ३६,०००० वर्ष
सन्धि— १०० × ३६० = ३६००० वर्ष
सन्ध्यंश— १०० × ३६० = ३६००० वर्ष
योग— = ४३२,००० वर्ष
चतुर्युग काल—
१७२८००० वर्ष
१२९६००० ,,
८६४००० ,,
४३२००० ,,
───────────
४३२०००० वर्ष
ब्राह्म दिन =
४३२०००० × १००० = ४३२,००००००० वर्ष
ब्राह्म अहोरात्र =
८६४,००००००० वर्ष

ब्राह्म वर्ष =
८६४,००००००० X ३६०
= ३११०४,०००००००० वर्ष
( ३१ खरब, १० अरब, ४० करोड़ वर्ष )
ब्रह्मा का प्रथम परार्ध =
६११०४,०००००००० x ५० = १५५५२०००००००००० वर्ष
( १५ नील, ५५ खरब, २० अरब वर्ष )
∵ १४ मनु = ४३२,०००००००
∴ १ ,, = $\frac{४३२०००००००}{१४}$ ३० करोड़, ८५ लाख, ७१ हजार, ४२८
वर्ष, २०५ दिन, २१ मुहूर्त, १२ कला, २५
काष्ठा, १२ ६/७ निमेष ।
ब्रह्मा का इस संवत् २०२९ विक्रम तक का काल =
१५ नील, ५५ खरब, २० अरब, १२ करोड़, ५ लाख, तेंतीस हजार ७३ वर्ष ब्रह्मायु का काल
विष्णु का एक घड़ी काल होता है। १२ लाख विष्णु का काल रुद्र का कलार्ध होता है। अर्बुदरुद्रों का अक्षर ब्रह्म
होता है—
“चतुर्युगसहस्रेण ब्रह्मणो दिनमुच्यते ।
पितामहसहस्रेण विष्णोश्च घटिका स्मृता ॥
विष्णोर्द्वादशलक्षाणि कलार्धं रौद्रमुच्यते ।
रुद्रस्यार्बुदसंख्यानां ततो ब्रह्माक्षरं भवेद् ॥”
विश्वामित्र ने समुद्र-मन्थन का वर्णन किया है। वह वाल्मीकिरामायण के अनुसार ११ करोड़ वर्ष पूर्व
हुआ था, क्योंकि क्षीरसमुद्र का मन्थन वैवस्वतमन्वन्तर के द्वितीय कृत युग के अन्त में हुआ था—
“प्रह्लादो निजितो युद्धे इन्द्रेणामृतमन्थने ।” ( मत्स्यपु० ४७।४५ ) । वेद में भी इसकी चर्चा है।
देवता और असुर लोगों ने जलों के रस क्षीरसमुद्र का मन्थन किया था—
देवाश्चासुराश्चापां रसममन्थत । तस्मान्मध्यमानादमृतमुदतिष्ठत । ततः सर्वतो रसमस्रवत् ।
स सोमः तत्सोमस्य सोमत्वम् ।” ( तै० सं० ), काठकब्राह्मण और वायुपुराण के अनुसार वर्तमान वैवस्वतमन्वन्तर
के १६वें कृत युग में शाकुन्तल भरत थे । उन्हीं के नाम से भारत देश प्रख्यात हुआ है । उन्होंने प्रजा का विशेषरूप
से भरण किया था ।
“षोडशतमे हि राजा दुष्यन्तश्च कृते युगे ।
शकुन्तलायां भरतस्तन्नाम्ना तु भारतम् ॥” ( वायु० पु० ९९।५५ )
“विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम् ।” ( ऋ० सं० ३।५३।१२ )
इस मन्त्र में भारतसम्बन्धी जन की रक्षा की बात कही गयी है । कुरु, पाञ्चाल आदि देश भारत नाम
से विख्यात थे ।

“शकुन्तलायां भरतनाम्ना तु भारतं कृते ।
षोडशतमे प्राप्ते प्रजानां भरणं कृतम् ॥” (वायु० पु० )
श्रीभागवत के पञ्चम स्कन्ध में कहा गया है कि अजनाभवर्ष नाम से प्रसिद्ध यह देश ऋषभपुत्र भरत के
नाम से भारत हुआ था । कल्पभेद से दोनों व्यवस्थाएँ प्रामाणिक समझनी चाहिये । एक अन्य दृष्टि से मनु का नाम
भी भरत है । उनके नाम से भी इस देश का भारतवर्ष नाम है—
“भरणाच्च प्रजानां वै मनुर्भरत उच्यते ।
निरुक्तवचनाच्चैव वर्षं तद् भारतं स्मृतम् ॥” (वायुपु० उपो० १०।४५।७६)
पुराणों में तारकामय संग्राम का वर्णन है । उसका समय विक्रम शती से १२ करोड़ वर्ष पूर्व है, क्योंकि
वृत्रवध के बाद कृतयुग में तारकामय संग्राम हुआ, यह हरिवंश में वर्णित है—
“वृत्ते वृत्रवधे तावद् वर्तमाने कृते युगे ।
आसीत् त्रैलोक्यविख्यातः संग्रामस्तारकामयः ॥” ( १।४२।१० )
उस संग्राम में आङ्गिरस बृहस्पति देवताओं के सहायक थे, अतः बृहस्पति को ई० शती २-४ के मध्य में
मानना अत्यन्त असंगत है । भाषाविज्ञान के अनुसार आयुर्वेद को ब्राह्मणकाल से अर्वाचीन मानना भी प्रामाणिक नहीं
है । संस्कृत प्रकृति, प्रत्यय, समास, तद्धित आदि अनादि ही हैं । मन्वन्तरसम्बन्धी विचारों के अनुसार मन्वन्तरों में
इन्द्र होते हैं । उनके गुरु बृहस्पति भी होते हैं । इसी प्रकार न्यायसूत्रकार गौतम एवं न्यायभाष्यकार वात्स्यायन भी
अर्वाचीन नहीं हैं । तभी आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व महाभारत शान्तिपर्व में गौतम का वर्णन है—
“न्यायतन्त्रं हि कात्स्न्र्येन गौतमो वेत्ति तत्त्वतः ।” ( म० भा० शान्ति० २१२।३४ ) ।
वैवस्वत मन्वन्तर की सन्धि में उत्पन्न बौधायन, आपस्तम्ब आदि भी प्राचीन ही हैं । दैत्यराज विरोचन
की कन्या वृत्रज्वाला कुम्भकर्ण की पत्नी थी ( वा० रा० ) । उसका भ्राता बलि वैवस्वत मन्वन्तर के द्वितीय त्रेता
में हुआ था । भृगु, पुलस्त्य, अङ्गिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठ ये सप्तर्षि एवं स्वायम्भुव मनु आदि त्रेतायुग
में उत्पन्न हुए थे । बुद्धि एवं प्रयत्न के बिना ही उन लोगों को नक्षत्रों के तुल्य वेदमन्त्रों का दर्शन हुआ था । यह
वायुपुराण के उपोद्घात से सिद्ध है—
“सप्तर्षीणां मनोश्चैव आद्ये त्रेतायुगस्य तु ।
अबुद्धिपूर्वकं तेषामक्रियापूर्वमेव च ॥
अभिव्यक्तास्तु ते मन्त्राः तारकाद्यैर्निदर्शनैः ।
ते मन्त्रा वै पुनस्तेषां प्रतिभासमुत्थिताः ॥”
ऋचो यजूंषि सामानि मन्त्रांश्चाथर्वणानि च ।” ( वा० पु० उ० ४३–४५ )
ब्रह्मा की प्रेरणा से मन्वादि ने उसी समय श्रौतस्मार्त धर्म का उपदेश किया ।
“आद्ये त्रेतायुगे पूर्वमासन् स्वायम्भुवोऽन्तरे ।” ( ब्रह्माण्ड पु० २।३६।९ )
“तत्र त्रेतायुगस्यादौ मनुः सप्तर्षयश्च ते ।
श्रौतस्मार्तंञ्च धर्मञ्च ब्रह्मणा च प्रचोदितम् ॥” ( प्राहुः )
“दाराग्निहोत्रसंयोगमृग्यजुःसामसंश्रितम्……।
परम्परागतं धर्मं स्मार्तंञ्चाचारलक्षणम् ॥
वर्णाश्रमाचारयुतं मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥” ( वायु० पु० १।४०, ४१ )

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८८५
अतः वर्तमान मनुस्मृति सर्वप्राचीन संविधान है । ब्रह्मर्षियों की सभा में सर्वसंमति से भृगु ने उसे लिखा
था । आधुनिक दृष्टि से भी विक्रमशती से ४०० वर्ष पूर्व यूनान में हेरोडोट्स् हुआ है । उसके एमिसिस ग्रन्थ के
अनुसार १७ सहस्रवर्ष पूर्व ८ या १२ देव हुए हैं। उनमें विष्णु एक थे । डायोनिसियस दानवों के और विष्णु के नेता
थे । भारतीय दृष्टि के अनुसार कश्यपपत्नी दाक्षायणी अदिति के इन्द्र आदि बारह पुत्र प्रसिद्ध हैं । उनमें
एक विष्णु हैं—
सेवेन्टीन थाउजेन्ड इयर्स बिफोर दी रिजिन आफ अमेसिस दी ट्वेल्व गाड्स् वेयर दे ए फेर्म
प्रोड्यूस्ड फ्रॉम दि एट ऑपरीजवेल्व हिक्यूलिस इज वन बुक ११ चेप्टर ४३ ईरानी और फारसी भाषा में
विवस्वत् के लिए विवहन्त का प्रयोग किया गया है । उसके चार मनु, श्राद्धदेव यम और अश्विद्वय हुए थे ।
प्रायः पुराणों के पुरुषों की संख्या के अनुसार कालनिर्धारण की गलती आधुनिक लोग करते हैं । परन्तु
यह वेद प्रमाण से सिद्ध है कि कई लोगों की आयु सामान्य मनुष्यों से बड़ी होती थी । जैसे दीर्घतमा महर्षि की आयु
दस पुरुषायु के बराबर थी—
“त उ दीर्घतमा दशपुरुषायुषाणि जिजीव ।” ( शाङ्ख्यायनारण्यक २।१७ ) । ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार
“मामतेयो भरतं दौष्यन्तिमाभिषिषेच” ( ८।२३ ) । कक्षीवान् वैवस्वत मन्वन्तर के तृतीय द्वापर में हुए थे जो कि
विक्रम सं० से १२ करोड़ वर्ष पूर्व का काल होता है । दीर्घतमा १६ वें कृत युग के थे । दौष्यन्ति भरत के सम-
कालिक थे । वह विक्रम से ५ करोड़ १८ लाख ८६ हजार १ सो ४४ वर्ष पूर्व का काल है । प्रथम त्रेता के अत्रिपुत्र
सोम हुए । उनके पुत्र बुध हुए । बुध के पुत्र पुरुरवा हुए ।
“पुरुरवस एवासीत् त्रयी त्रेतामुखे नृप ।” ( भाग० ९।१४।४९ )
त्रेता में परशुराम का आविर्भाव हुआ था—
“एकोनविंश्यां त्रेतायां सर्वक्षत्रान्तकोऽभवत् ।
जामदग्न्यस्तथा षष्ठो विश्वामित्रपुरःसरः ॥” ( वायुपु० १८।९१ )
त्रेताद्वापरयोः सन्धौ रामः शस्त्रभृतांवरः ।
असकृत् पार्थिवं क्षत्रं जघानामर्षचोदितः ॥” ( म० भा० ३।२।३ )
इसी प्रकार २४ वें त्रेता में वसिष्ठ पुरोधा के साथ दशरथपुत्र राम रावण के वधार्थ विष्णु का अवतार
होगा । ( विष्णुवचन है ) त्रेता द्वापर की सन्धि में २४ वें त्रेता में मैं विश्वामित्र पुरस्सर दाशरथि राम राजा हूँगा ।
“चतुर्विंशे युगे रामो वसिष्ठेन पुरोधसा ।
सप्तमो रावणस्यार्थे जज्ञे दशरथात्मजः ॥” ( वायुपु० १८।७२ )
“सन्ध्यंशे समनुप्राप्ते त्रेतायां द्वापरस्य च ।
अहं दाशरथी रामो भविष्यामि जगत्पतिः ॥” ( म० भा० १२।३३९ )
'चतुर्विंशयुगे चापि विश्वामित्रपुरःसरः ।
रामो दशरथस्याथ पुत्रः पद्मायतेक्षणः ॥”
( हरिवंश ४।४१, ब्रह्माण्डपुराण १०४।११ )
“अष्टाविंशतिमे तद्वत् द्वापरस्यांशसंक्षये ।
नष्टे धर्मे तदा जज्ञे विष्णुर्वृष्णिकुले प्रभुः ॥” ( वायुपु० ९८।९७ )

८८६ रामायणमीमांसा द्वाविंश
वैवस्वत मन्वन्तर के २८ वें द्वापर के अन्त में धर्म एवं यज्ञ के नष्टप्राय होने पर विष्णु वृष्णिकुल में
कृष्णरूप से उत्पन्न होंगे ।
गाधिकन्या सत्यवती में महर्षि ऋचीक से ज्येष्ठ पुत्र जमदग्नि हुए थे । अग्निवेश, वल्मीक आदि ९९ पुत्र
अन्य भी हुए थे । उन्हीं वल्मीक के पुत्र वाल्मीकि हुए थे । वे अग्नि वाल्मीकि भी कहे जाते थे । उन्होंने रामायण
का निर्माण किया था । उनके पुत्र अग्निवेश हुए थे जो कि आयुर्वेद और धनुर्वेद के आद्याचार्य थे । उन्होंने भरद्वाज
से आग्नेय अस्त्र आदि प्राप्त किये थे—
“अग्निवेशं महाभागं भरद्वाजः प्रतापवान् ।
प्रत्यपादयदाग्नेयमस्त्रं वेदविदांवरः ॥” ( म० भा० आदि पर्व २२१।१५ )
दीर्घजीवी अग्निवेश से द्रोण ने तथा द्रोण से अर्जुन ने आग्नेय आदि अस्त्र प्राप्त किये थे—
“अग्निवेश इति ख्यातस्तस्य शिष्योऽस्ति भारत ।
तपसा यन्मया प्राप्तममोघमशनिप्रभम् ॥
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम यद् दहेत् पृथिवीमपि ।
त्वया प्राप्तमिदं वीर दिव्यं नान्योज्हैति त्विदम् ॥” (म० भा० आदि पर्व १४१)
वाल्मीकिरामायण के अनुसार भी वाल्मीकि राम के समकालिक थे । उन्होंने राम के पुत्रों का संस्कार
कर उन्हें वेदादि शास्त्र पढ़ा कर वेद के उपबृंहणार्थ उन्हें रामायण महाकाव्य पढ़ाया था ( वा० रा० उ० )
इससे सुतरां रामायण की अतिप्राचीनता सिद्ध होती है । पूर्वोक्त पुराणवचन के अनुसार राम २४ वें
त्रेता में प्रकट हुए थे । उसी समय रामायण का निर्माण हुआ ।
पाश्चात्यों एवं तदनुयायी भारतीयों की दृष्टि में भारत के तीन संस्करण हुए हैं—पहला संस्करण व्यास-
कृत चौबीस हजार श्लोकों की चतुर्विंशतिसाहस्री भारतसंहिता, दूसरा संस्करण वैशम्पायन-जनमेजय-संवादरूप और
तीसरा संस्करण सौति-शौनकसंवादरूप । वही महाभारत है । अन्तिम दोनों व्यास की कृति नहीं हैं ।
इस तरह कुछ लोगों के अनुसार व्यास, वैशम्पायन एवं सौति इन तीनों कवियों ने महाभारत की रचना
की है। व्यासकृत ग्रन्थ का नाम जय था, वैशम्पायन विरचित भारत ग्रन्थ था एवं सौतिकृत ग्रन्थ महाभारत है ।
उसी में जय एवं भारत दोनों ग्रन्थ लीन हो गये ।
प्रमाण में कहा जा सकता है—
“वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् ।
सुमन्तुं जैमिनिं पैलं शुकं चैव स्वमात्मजम् ॥
प्रभुर्वरिष्ठो वरदो वैशम्पायनमेव च ।
संहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिताः ॥ (म० भा० १।१६३,८९,९०)
इससे मालूम होता है कि सुमन्तु आदि ने पृथक्-पृथक् भारतीय संहिताएँ प्रकाशित की हैं। इससे भी
भारत की कई संहिताएँ प्रतीत होती हैं । सुमन्तु-जैमिनि-वैशम्पायन-पैल-सूत्रभाष्य-भारत-महाभारतधर्माचार्याः इस
आश्वलायनसूत्र के अनुसार भारत और महाभारत का पृथक्-पृथक् उल्लेख है—
“अस्मिंस्तु मानुषे लोके वैशम्पायन उक्तवान् ।
एकं शतसहस्रं तु मयोक्तं वै निबोधत ॥”

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८८७
अनुक्रमणिका अध्याय में—
‘‘इदं शतसहस्राख्यं लोकानां पुण्यकर्मणाम् ।
उपाख्यानैः सह ज्ञेयं श्राव्यं भारतमुत्तमम् ॥
चतुर्विंशतिसाहस्रं चक्रे भारतसंहिताम् ।
उपाख्यानैर्विना तावद् भारतं प्रोच्यते बुधैः ॥
मन्वादि भारतं केचिद् आस्तीकादि तथापरे ।
तथोपरिचरादन्ये विप्रा सम्यगधीयते ॥’’ (म० भा० १।१।५२)
कोई प्रथम मन्त्र से, कोई आस्तीक की कथा से और कोई उपरिचर वसु की कथा से भारत कहते हैं ।
परन्तु उपर्युक्त वचनों पर भी विचार करने से महाभारत अनेक कवियों की कृति है, यह नहीं सिद्ध होता, क्योंकि—
‘‘संहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिताः ।’’
इस वचन से भारत की संहिताओं का प्रकाशन ही कहा गया है, निर्माण नहीं; अतः सुमन्तु आदि भारत
की पृथक्-पृथक् संहिताओं के प्रकाशक ही माने जा सकते हैं, प्रणेता नहीं ।
जो उक्त जय, भारत और महाभारत का भेद मानते हैं उन्हें यह भी बताना चाहिये कि उस स्थिति में तो
यही कहना चाहिये था कि व्यास ने सुमन्तु आदि को जयग्रन्थ पढ़ाया था, महाभारत नहीं । तथा च—
‘‘वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् ।’’
इस उक्ति का क्या अर्थ होगा ? इससे तो महाभारत को ही पञ्चम वेद और उसी का पढ़ाना कहा गया
है । व्यास से जिस महाभारत का सुमन्तु आदि ने अध्ययन किया वह व्यासनिर्मित है या अन्यनिर्मित ? सौतिनिर्मित
महाभारत को पञ्चम वेद मानकर व्यास ने पढ़ाया यह कहना निराधार है और उपहासास्पद भी है ।
भारतसंहिता का क्या अर्थ है ? यदि सुमन्तु आदि ने भारतसम्बन्धिनी संहिताओं का प्रकाशन किया तो
इससे यही निश्चित होता है कि भारत नहीं, किन्तु भारत से भिन्न संहिताओं का ही उन्होंने प्रकाशन किया ।
यहाँ यह भी प्रश्न होगा कि संहितासम्बन्धी भारत कौन है ? जिसे उन्होंने व्यास से पढ़ा था, वही था या
स्वविरचित भारत नाम का कोई और ही ग्रन्थ था ? यदि प्रथम पक्ष मान्य है । तब तो यह नहीं सिद्ध होता है कि
महाभारत अनेक कवियों की कृति है । पक्षान्तर भी असंगत है, क्योंकि स्वनिर्मित ग्रन्थान्तर के व्यास से अध्ययन का
कोई प्रयोजन नहीं सिद्ध होता । यदि भारतस्य संहिता इस वाक्य में अभेद अर्थ में ही षष्ठी मानें तब भी मूल भारत
ग्रन्थ ही संहिता है या व्याख्यानरूपा संहिता है ?
प्रथम पक्ष के अनुसार यह अर्थ होगा कि व्यासकृत मूल भारत ग्रन्थ का अध्ययन करके उनके शिष्यों ने
मूल ग्रन्थ का निर्माण किया, जो कि उपहासास्पद है । यदि व्याख्याग्रन्थरूप संहिता है तो इससे मूलभारत ग्रन्थ
अनेक कवियों की कृति है, यह नहीं सिद्ध होता । इस दृष्टि से तो व्यास ने सुमन्तु आदि को भारत पढ़ाया और उन्होंने
तत्सम्बन्धी व्याख्याभूत संहिताएँ बनायीं ।
यह भी प्रश्न है कि ‘‘वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान्’’ यह क्यों कहा गया है ? यदि कहा जाय कि
उनके द्वारा अधीत सब ग्रन्थों का निर्देश करना उद्देश्य है तो वह भी ठीक नहीं, क्योंकि अष्टादशपुराण और ब्रह्म-
सूत्रादि भी अधीत ग्रन्थ हैं ही । फिर उनका निर्देश न होने से न्यूनता दोष होगा ।
अतः वेदों के साथ पञ्चम वेद महाभारत का अध्ययन किया और संहिताएँ प्रकाशित कीं । इस तरह
अध्ययन और संहिताप्रकाशन में हेतु-हेतुमद्भाव करना चाहिये, पर वह भी संगत नहीं है ।

८८८ रामायणमीमांसा द्वाविंश
अतएव भारतभावदीपकार ने उस वाक्य का अर्थ किया है कि भारत की मूलभूत संहिताएँ मन्त्रब्राह्मणरूप
वेद ही हैं। उन्हें सुमन्तु आदि ने प्रकाशित किया है। भारत के इस अंश का मूल यह मन्त्र या ब्राह्मण है, यह स्पष्टी-
करण किया था। इससे यह दिखाया गया कि भारत प्रत्यक्ष मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदमूलक ही है। यही श्रीभागवत में कहा
गया है—
“भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च दर्शितः ।”
भारत के व्याज से भगवान् व्यास ने वेदार्थ ही प्रकाशित किया है। आश्वलायनसूत्र से भारत और महा-
भारतग्रन्थ का भेद वर्णन नहीं है, किन्तु आश्वलायनशाखियों के ब्रह्मयज्ञ में आचार्यतर्पण के प्रसङ्ग में वह सूत्र है।
'सुमन्तु-जैमिनि-वैशम्पायन-पैल-सूत्र-भाष्य-भारत-महाभारतधर्माचार्याः' इसके द्वारा भारत के अनेक कर्त्ता सिद्ध नहीं
होते, क्योंकि उक्त सूत्रधर्माचार्यों को ही बतलाता है । सुमन्तु सूत्राचार्य, जैमिनि भाष्याचार्य, वैशम्पायन भारताचार्य
और पैल महाभारताचार्य इस तरह क्रमिक अन्वय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आधुनिकों के मत में महाभारत के
कर्तारूप से सौति की प्रसिद्धि है। पैल की नहीं। इसके अतिरिक्त पूर्व में सुमन्तु आदि को महाभारत सहित वेदों का
अध्यापन कराना कहा गया है, फिर सूत्र में केवल वैशम्पायन को भारताचार्य और पैल को महाभारताचार्य क्यों कहा
गया है ? इसका भी कोई समाधान नहीं है।
वस्तुतः उक्त सूत्र के अनुसार सुमन्तु आदि के समान ही सूत्र, भाष्य, भारत और महाभारत भी धर्माचार्य
ही हैं। देवीभागवत में स्पष्टरूप से उपर्युक्त अर्थ का ही समर्थन मिलता है—
“सुमन्तुजैमिनी वैशम्पायनः पैलसूत्रयुक् ।
भाष्यभारतपूर्वेश्च महाभारत इत्यपि ॥
धर्माचार्या इमे सर्वे तृप्यन्त्विति च कीर्तयेत् ।” (देवीभाग० ११।२०)
तथा च सूत्र में सुमन्तु से लेकर भारताचार्यान्त ग्रन्थ के नाम न होकर आचार्यों के नाम ही हैं।
सुमन्त्वाचार्यः, जैमिन्याचार्यः, वैशम्पायनाचार्यः, सूत्राचार्य, भाष्याचार्यः, भारताचार्यः, महाभारताचार्य इतीमे आचार्याः
तृप्यन्तु, ये सब आचार्य तृप्त हों। अतः उक्त सूत्र से भारत अनेक पुरुषों की कृति है यह नहीं सिद्ध होता ।
इसी तरह 'अस्मिंस्तु मानुषे लोके वैशम्पायन उक्तवान् ।' इस वचन के आधार पर भी यह नहीं सिद्ध
होता है कि महाभारत के कर्त्ता वैशम्पायन हैं, क्योंकि—
“अब्रवीद् भारतं लोके मानुषेऽस्मिन् महानृषिः ।
जन्मेजयेन पृष्टः सन् ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ॥
शशास शिष्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके ।
स सदस्यैः सहासीनः श्रावयामास भारतम् ॥” (अनुक्र० अ० ९७, ९८)
इत्यादि अनुक्रमणिकाध्याय के वचनों से यही निश्चित होता है कि व्यास ने पहले महाभारत बनाकर
मानुष लोक में प्रकट किया। सर्पसत्र में जनमेजय के प्रश्न करने पर अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत सुनाने का
आदेश दिया और वैशम्पायन ने व्यास के मुख से सुनी हुई कथा जनमेजय को सुनायी और उसी को सौति ने शौनक
को सुनाया। यह सब बातें निम्नोक्त श्लोकों से स्पष्ट हैं—
“कृष्णद्वैपायनप्रोक्ताः सुपुण्या विविधाः कथाः ।
कथिताश्चापि विधिवद् याश्च द्वैपायनेन वै ॥
श्रुत्वाहं ता. विचित्रार्था महाभारतसंश्रिताः ।” (म० भा० १।१।११)

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८८९
"मन्वादि भारतं केचिदास्तीकादि तथापरे ।
तथोपरिचरादन्ये विप्राः सम्यगधीयते ॥"
इस वचन से भी महाभारत के तीन संस्करण या तीन कर्ता नहीं सिद्ध होते ।
इससे तो पाठारम्भ का सम्प्रदायभेद वर्णन है । महाभारत का ही कोई (नारायणं नमस्कृत्य) से पाठारम्भ
करके ग्रन्थ समाप्त करते हैं, कोई जरत्कारु पुत्र आस्तीक की कथा से प्रारम्भ करते हैं और कोई उपरिचरबसु की
कथा से आरम्भ करके ग्रन्थ पूरा करते हैं ।
नीलकण्ठ के अनुसार वर्णानुपूर्वी का भेद रहने पर भी प्रतिकल्प नाम, रूप और कर्मों की समानता रहती
है, अतः कल्पभेद से भारतारम्भ में भेद कहा गया है । मनु शब्द का अर्थ (नारायणं नमस्कृत्य) यह मन्त्र है । किसी
की दृष्टि में प्रणवपूर्वक "नमो भगवते वासुदेवाय" यह मन्त्र ही मनु है ।
आस्तिकों की दृष्टि में ।
"धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित् ॥" (म० भा० १।६२।५२)
जो महाभारत में है वही अन्यत्र है जो महाभारत में नहीं, वह कहीं भी नहीं है ।
परन्तु दुरभिसन्धि-वशात् या अज्ञानवशात् पाश्चात्योँ ने उसमें अनेक दुःशङ्काएँ उठायी हैं । मूलग्रन्थ का
सम्यग् विचार करने से उक्त शङ्काएँ निर्मूल सिद्ध होती हैं ।
निम्नोक्त वचनों पर विचार करना आवश्यक है ।
"इदं शतसहस्रं तु श्लोकानां पुण्यकर्मणाम् ।
उपाख्यानैः सह ज्ञेयमाद्यं भारतमुत्तमम् ॥
उपाख्यानैर्विना तावद् भारतं प्रोच्यते बुधैः ।
ततोऽध्यर्धशतं भूयः संक्षेपं कृतवानृषिः ॥
अनुक्रमणिकाध्यायं वृत्तान्तानां सपर्वणाम् ।
इदं द्वैपायनः पूर्वं पुत्रमध्यापयच्छुकम् ॥
ततोऽन्येभ्योऽनुरूपेभ्यः शिष्येभ्यः प्रददौ विभुः ।
षष्टिं शतसहस्राणि चकारान्यां स संहिताम् ॥
त्रिंशच्छतसाहस्रं देवलोके प्रतिष्ठितम् ।
पित्र्ये पञ्चदश प्रोक्तं गन्धर्वेषु चतुर्दश ॥
एकं शतसहस्रं तु मानुषेषु प्रतिष्ठितम् ।
नारदोऽश्रावयद् देवानसितो देवलः पितॄन् ॥
गन्धर्वयक्षरक्षांसि श्रावयामास वै शुकः ।
अस्मिंस्तु मानुषे लोके वैशम्पायन उक्तवान् ॥
शिष्यो व्यासस्य धर्मात्मा सर्ववेदविदां वरः ।
एकं शतसहस्रं तु मयोक्तं वै निबोधत ॥" (म० भा० १।१)
सौति कहते हैं पुण्य कर्मवाले लोगों के उपाख्यानों के सहित एक लाख श्लोकों का आदि भारत है उपा-
ख्यान से रहित वही भारत है । इसके बाद में पुनः संक्षेप करके डेढ़ सौ श्लोकों की पर्वों के साथ वृत्तान्तों की एक
अनुक्रमणिका रची ।
११२

८९० रामायणमीमांसा द्वाविंश
कृष्णद्वैपायन ने यह भारत पहले पुत्र शुक को पढ़ाया। उसके बाद समर्थ ऋषि ने अन्य योग्य शिष्यों को
प्रदान किया। पश्चात् महर्षि व्यास ने साठ लाख श्लोकों की एक दूसरी भारतसंहिता रची उसमें से तीस लाख श्लोक
देवलोक में प्रतिष्ठित हैं। नारदजी ने देवलोक में उन्हें सुनाया। असित देवल ने पितरों को १५ लाख श्लोक
सुनाये। शुकदेव ने उसमें से ही १४ लाख श्लोक गन्धर्वों और यक्षों को सुनाये। मनुष्यलोक में वैशम्पायन ने एक
लाख श्लोक सुनाये। उसी वैशम्पायनोक्त लक्ष श्लोकों को मैं कहता हूँ। आप लोग उसे धारण करें।
उपर्युक्त वाक्यों से स्पष्ट है कि श्रीव्यासजी ने केवल चौबीस हजार श्लोकों की भारतसंहिता ही नहीं
बनायी, किन्तु एक लाख श्लोकों की, चौबीस हजार श्लोकों की, डेढ़ सौ श्लोकों की और साठ लाख श्लोकों की पृथक्-
पृथक् चार संहिताएँ बनायीं। साठ लाख श्लोकोंवाली संहिता से ५९ लाख श्लोक देवादि लोकों में हैं। मर्त्यलोक
में एक लाख श्लोकवाली संहिता ही है। पहले का एक लाख भी साठ लाख श्लोकों में ही अन्तर्निहित समझना चाहिये।
अन्यथा एक लाख श्लोकोंवाली दो पृथक्-पृथक् भारतसंहिताएँ मिलनी चाहिये, परन्तु ऐसी कोई भिन्न
संहिता मिलती नहीं। २४ हजार श्लोकोंवाली भारतसंहिता भी कहीं नहीं मिलती है।
अतः यही समझना चाहिये कि जैसे बड़ा मकान बनाने या उपन्यास लिखने के पहले उसकी सामान्य रूप-
रेखा बनानी पड़ती है उसी तरह व्यास ने पहले उपाख्यान से रहित केवल भारतवंशीय लोगों के इतिहास के रूप में
ग्रन्थ तैयार किया था। पश्चात् उसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से सम्बन्धित उपाख्यान आदि को जोड़कर एक
लाख श्लोकों का महाभारत तैयार किया और उसी में चौबीस हजार श्लोकों का अन्तर्भाव हो गया। डेढ़ सौ श्लोकों
की अनुक्रमणिका भी अनुक्रमणिकाध्याय के रूप में इसमें सम्मिलित है।
वर्तमान काल में उपलभ्यमान लक्षश्लोकात्मक ग्रन्थ ही महाभारत है। वही भारत या महाभारत एवं वही
जय नाम का इतिहास भी है। जैसे रामायण के सीताचरित एवं पौलस्त्यवध भी नाम हैं—
“काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत्।
पौलस्त्यवध इत्येव चकार चरितव्रतः॥” (वा० रा० १।४।७)
“तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन् महाभारतमुच्यते।
महत्त्वे च गुरुत्वे च ध्रियमाणं यतोऽधिकम् ॥” (म० भा० १।१।२७३)
सत्य की तराजू पर तौलने से यह ग्रन्थ महत्त्व और गुरुत्व में वेदों से भी अधिक हुआ। इसी लिए यह
महाभारत कहा जाता है। व्यास ने ही लक्षश्लोकात्मक भारत बनाया, यह अन्य वचनों से भी स्पष्ट है—
“इदं शतसहस्रं तु श्लोकानां पुण्यकर्मणाम्।
सत्यवत्यात्मजेनेह व्याख्यातममितौजसा॥” (म० भा० १।६२।१४)
“मुच्यते सर्वपापेभ्यो राहुणा चन्द्रमा यथा।
जयो नामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीषुणा॥” (म० भा० १।६२।२०)
भरतों का महान् जन्मवृत्तान्त-वर्णन के कारण भी इसे महाभारत कहा है—
“भरतानां महज्जन्म महाभारतमुच्यते।” (म० भा० १।६२।३९)
आगम-प्रामाण्य
भारतीय संस्कृति में प्रत्यक्ष, अनुमान से अतिरिक्त एक स्वतन्त्र आगम प्रमाण भी मान्य है। आगम में
वेद अपौरुषेय एवं आर्ष इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्र पौरुषेय माने जाते हैं।

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९१
प्रत्यक्ष और अनुमान से अज्ञात धर्म, ब्रह्म आदि तत्त्वों का प्रतिपादन करनेवाला वेद अपौरुषेय आगम है।
वेद एवं वेदाविरुद्ध प्रत्यक्षानुमान तथा आर्षज्ञान ऋतम्भरा-प्रज्ञा आदि के आधार पर रचे हुए आगम पौरुषेय आगम
हैं। विशेष विवरण वेदप्रामाण्यप्रसङ्ग में देखें।
महाभारत
वेद के उपबृंहणार्थ आर्षविज्ञानसम्पन्न त्रिकालज्ञ परम वैदिक व्यास महर्षि के द्वारा महाभारत की रचना
हुई है। महाभारत तथा अन्य पुराणादि प्रमाणों के द्वारा यह सिद्ध है कि वे भगवान् विष्णु के अवतार थे—
“ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् ।
चक्रे वेदतरोः शाखा दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः ॥” (भाग० १।४।१६)
सत्रहवें अवतार में भगवान् विष्णु पराशर से सत्यवती में व्यासरूप में अवतीर्ण हुए और उन्होंने पुरुषों
को अल्पबुद्धि जानकर वेदरूपी तरु को अनेक शाखाओं के रूप में विभक्त किया।
महाभारत के अनुसार उत्पन्न होते ही इच्छानुसार उन्होंने देह बढ़ा ली। इतिहास सहित साङ्ग वेदों का
ज्ञान प्राप्त कर लिया।
पुनः वेदविदों में श्रेष्ठ, धर्म-ब्रह्मनिष्णात, सत्यव्रत, पवित्र एवं क्रान्तदर्शी ब्रह्मर्षि व्यास ने एक मिले-जुले
वेद को हौत्र, आध्वर्यव, औद्गात्र, ब्राह्म आदि कर्मों की सुविधा के लिए ऋक्, यजु, साम और अथर्व भेद से
चतुर्धा विभक्त किया—
“जातमात्रश्च यः सद्यः इष्ट्या देहमवीवृधत् ।
वेदांश्चाधिजगे साङ्गान् सेतिहासान् महायशाः ।।
विव्यासैकं चतुर्धा यो वेदं वेदविदां वरः ।
परावरज्ञो ब्रह्मर्षिः कविः सत्यव्रतः शुचिः ॥” (म० भा० १।५०।३,४)
अतीत और अनागत का वर्णन
सर्वज्ञकल्प भगवान् व्यास को वेद तथा आर्ष विज्ञान से भूत, भविष्य, वर्तमान, सन्निकृष्ट, विप्रकृष्ट, स्थूल
एवं सूक्ष्म धर्म-ब्रह्म-सम्बन्धी सब वस्तुएँ विज्ञात थीं। उनके वर के प्रभाव से युद्धव्यस्त सञ्जय को भी भारत-संग्राम
की सभी घटनाएँ हस्तामलकवत् प्रत्यक्ष थीं।
“व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद् गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् कथयतः स्वयम् ॥” (गीता १८।९५)
श्रीव्यास के वरप्रसाद से मैंने साक्षात् योग-निरूपण करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुख से इस योग को
सुना था। अतः सर्वज्ञकल्प व्यास को वैशम्पायन और जनमेजय सम्बन्धी प्रश्नोत्तर भी ज्ञात थे, अतः महाभारत के
एक लाख श्लोकों में ही उन सब प्रश्नोत्तरों का सङ्कलन होना पूर्णरूप से सम्भव था। इसी लिए वनपर्व में अनेक
भविष्य की बातों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बौद्धों के एडूक (गाडोवा) का भी उल्लेख किया है।
महाभारत की रचना का समय तथा द्वैपायन व्यास की काव्यशक्ति तथा श्रीगणेश के द्वारा लिखा जाना
भी यह सिद्ध करते हैं कि चतुर्विंशतिसाहस्री संहिता नहीं, किन्तु लक्षश्लोकात्मक ही भारत व्यासनिर्मित है—
“त्रिभिर्वर्षैः सदोत्थायी कृष्णद्वैपायनो मुनिः।
भारतमाख्यानं कृतवानिदमद्भुतम् ॥” (म० भा० १।६२।५२)

८९२ रामायणमीमांसा द्वाविंश
नित्य योगरत होकर कृष्णद्वैपायन मुनि ने तीन वर्षों में इस महाभारत आख्यान की रचना की ।
गणेशजी के द्वारा महाभारत का लिखा जाना भी लक्षश्लोकात्मक महाभारत का व्यासकृतत्व सिद्ध
करता है ।
तप से और ब्रह्मचर्य से वेदों का शाखाभेद से विस्तार करके सत्यवतीसुत व्यास ने महाभारत इतिहास
की रचना की । महाभारत को रचकर वे विचारने लगे कि इसे किसे पढ़ाया जाय ।
इसी बीच वहाँ ब्रह्माजी आये । उनका स्वागत और पूजन करके उनके आज्ञानुसार उनके समीप ही
व्यासजी बैठ गये और उन्होंने ब्रह्माजी को बताया कि वेदों का रहस्य, वेदाङ्ग, उपनिषद, वेदों का विस्तार तथा
अन्य जो कुछ वेद में है वह सब पुनः इतिहास पुराणरूप में भूत, भविष्य और वर्तमान की स्थिति, जरा, मृत्यु,
व्याधि के अस्तित्व तथा विनाश का निश्चय, धर्मों तथा आश्रमों के लक्षण, चारों वर्णों के धर्म, पुराणों का समग्र-
तात्पर्य, तप, ब्रह्मचर्य, पृथ्वी, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, तारा तथा युगों का प्रमाण, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, न्याय, शिक्षा,
चिकित्सा, दान, अन्तर्यामी का माहात्म्य, कर्मानुरूप दिव्य तथा मानुष जन्म, पवित्र तीर्थ, देश, नदियाँ, पर्वत, वन,
समुद्र, दिव्य नगर, नगरव्यूहरचना, विभिन्न कोटि के मनुष्यों की भाषणपद्धति, नीतिशास्त्र तथा सर्वव्यापक ब्रह्म
का मैंने निरूपण किया है । परन्तु मुझको कोई लेखक नहीं मिलता ।
ब्रह्माजी बोले तुम रहस्यज्ञान के निधि हो, जन्म से लेकर तुम्हारी वेदवादिनी सत्यवादिनी वाणी को मैं
जानता हूँ । तीनों आश्रम जैसे गृहस्थाश्रम से बढ़कर नहीं होते वैसे ही तुम्हारे काव्य से बढ़कर काव्य करने की
सामर्थ्य कवियों में नहीं होगी । तुम अपना काव्य लिखने के लिए गणपति का स्मरण करो ।
"उवाच च महातेजा ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् ।
कृतं मयेदं भगवन् काव्यं परमपूजितम् ॥
ब्रह्मन् वेदरहस्यं च यच्चान्यत् स्थापितं मया ।
साङ्गोपनिषदां चैव वेदानां विस्तरक्रिया ॥
इतिहासपुराणानामुन्मुखं निर्मितञ्च यत् ।
भूतं भव्यं भविष्यञ्च त्रिविधं कालसंज्ञितम् ॥
जरा-मृत्यु-भय-व्याधि-भावाभावविनिश्चयः ।
विविधस्य च धर्मस्य ह्याश्रमाणां च लक्षणम् ॥
चातुर्वर्ण्यविधानञ्च पुराणानां च कृत्स्नशः ।
तपसो ब्रह्मचर्यस्य पृथिव्याश्चन्द्रसूर्ययोः ॥
ग्रहनक्षत्राताराणां प्रमाणं च युगैः सह ।
न्यायशिक्षा चिकित्सा च दानं पाशुपतं तथा ॥
हेतुनैव समं जन्म दिव्यं मानुषसंज्ञितम् ।
तीर्थानाञ्चैव पुण्यानां देशानाञ्चैव कीर्तनम् ॥
नदीनां पर्वतानाञ्च वनानां सागरस्य च ।
पुराणाञ्चैव दिव्यानां कल्पानां युद्धकौशलम् ॥
वाक्यजातिविशेषाश्च लोकयात्राक्रमश्च यः ।
यच्चापि सर्वगं वस्तु तच्चापि प्रतिपादितम् ॥
परं न लेखकः कश्चिदेतस्य भुवि विद्यते ।" ( म० भा० १।१।६१-७० )

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९१
महाभारत में ही इन अनन्त ज्ञानों का भण्डार है। चतुर्विंशत्साहस्री संहिता में नहीं है। सौति ने कहा कि
इस प्रकार आदेश देकर ब्रह्माजी अपने स्थान को चले गये। सत्यवतीपुत्र व्यास ने गणपति का स्मरण किया।
भक्तमनोवाञ्छा पूर्ण करनेवाले गणपति वहाँ आ पहुँचे।
व्यासजी ने उनकी विधिवत् पूजा करके कहा मैं मन में तैयार इस महाभारत को स्वयं बोलता हूँ आप
लेखक बनें। गणपति ने कहा कि ठीक है, परन्तु लिखते लिखते मेरी लेखनी क्षण भर के लिए भी रुकनी नहीं
चाहिये। इस तरह लिख सको तो बोलो, मैं लिखने को तैयार हूँ। व्यास ने कहा आप समझे बिना कदापि न लिखें।
व्यास की बात स्वीकार करके गणपति भगवान् स्वयं लिखने लगे।
व्यासजी कुतूहलपूर्वक गूढ़ रचना करने लगे, भारत के आठ हजार आठ सौ आठ श्लोक बड़े ही गूढ़ कहे
जाते हैं। स्वयं व्यासजी की प्रतिज्ञा है कि उन्हें मैं स्वयं जानता हूँ एवं शुक जानते हैं, सञ्जय समझते हैं या नहीं,
इसमें संशय है—
“अहं वेद्मि शुको वेत्ति सञ्जयो वेत्ति वा न वा ।”
समर्थ गणपति भी इन श्लोकों का विचार करने के लिए क्षणभर रुक जाते थे। इस बीच व्यास बहुत से
श्लोकों का निर्माण कर लेते थे।
किसी छोटे लेख के लेखक के लिए गणपति को लेखक बनाने का प्रसङ्ग सङ्गत नहीं। इस दृष्टि से भी
लक्षश्लोकात्मक महाभारत व्यासदेव निर्मित और गणपति द्वारा लिखित है, यह मानना ही चाहिये।
इस प्रकार महाभारत में ही स्पष्ट उल्लेख होने पर तद्विपरीत कल्पना सर्वथा निराधार ही है। चतुर्विंश-
तिसाहस्री संहिता में आठ हजार आठ सौ आठ गूढ़ श्लोक नहीं हो सकते। उसके लिए तीन वर्ष का समय भी
अनावश्यक नहीं है।
“त्रिभिर्वर्षैरिदं पूर्णं कृष्णद्वैपायनः प्रभुः।
अखिलं भारतञ्चेदं चकार भगवान् मुनिः ।।
आकर्ण्य सततं भक्त्या जयाख्यं भारतं महत् ।
श्रीश्च कीर्तिस्तथा विद्या भवन्ति सहिताः सदा ।।”(म०भा०स्वर्गारोहण५।४८।४९)
“तेषु जातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम् ।
अब्रवीद् भारतं लोके मानुषेऽस्मिन् महानृषिः ।।
जनमेजयेन पृष्टः सन् ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ।
शशास शिष्यमासीनं श्रावयामास भारतम् ।।
कर्मान्तरेषु यज्ञस्य चोद्यमानः पुनः पुनः ।” (म० भा० १।१।९७,९८)
के अनुसार धृतराष्ट्र आदि के परम गति को प्राप्त होने के पश्चात् जनमेजय तथा सहस्रों ब्राह्मणों के प्रश्न
करने पर महान् ऋषि भगवान् व्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को आदेश दिया और वैशम्पायन ने यज्ञकर्म के बीच
बीच में बार बार प्रेरित होकर सदस्यों के साथ समासीन होकर भारत का श्रवण कराया। इससे भी स्पष्ट है कि
पहले व्यास ने अपने शिष्यों को भारत सुनाया था। उसी को सर्पसत्र में वैशम्पायन ने जनमेजय को सुनाया।
वैशम्पायन ने यही कहा भी था—
“शृणु राजन् पुरा सम्यग् मया द्वैपायनाच्छ्रुतम् ।”

इसी को सौति ने भी शौनक को सुनाया—
“कृष्णद्वैपायनप्रोक्ताः सुपुण्या विविधाः कथाः ।
कथिताश्चापि विधिवद् या वैशम्पायनेन वै ॥
श्रुत्वाहं ता विचित्रार्था महाभारतसंश्रिताः ।” (म० भा० १।१।११)
कृष्णद्वैपायन व्यास के द्वारा कही हुई अतिशय पुण्यजनक जो कथाएँ वैशम्पायन ने कही थीं । महाभारत-
संश्रित उन्हीं कथाओं को उनसे सुनकर मैं विविध तीर्थों और आयतनों में घूमता हुआ उस क्षेत्र में गया जहाँ युद्ध
हुआ था। वहाँ से आप लोगों की दर्शनेच्छा से यहाँ आया हूँ ।
ये सबकी सब शङ्काएं मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदों के सम्बन्ध में भी उठती हैं ।
“वाचाविरूपनित्यया”, “अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा ।”
के अनुसार मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद नित्य हैं, उनका सम्प्रदाय-प्रवर्तन ही विभिन्न कल्पों में होता है, निर्माण
नहीं। परन्तु यदि घटना के अनुसार ग्रन्थ का उल्लेख माना जाय तब तो उर्वशीपुरूरवा तथा यम-यमी या यज्ञवल्क्य-
मैत्रेयी के अनन्तर ही तत्संवादरूप ग्रन्थ का निर्माण मानना होगा।
परन्तु यह मानना पूर्वोक्त वचनों के विरुद्ध ही होगा। अतः वहाँ यही मानना पड़ता है कि वे आख्यायिकाएँ
घटना पर निर्भर नहीं हैं। वे तो सुखावबोधनार्था आख्यायिकाएँ नित्य ही हैं। कभी उन्हीं के अनुसार घटनाएं भी
घट जाती हैं। इसीलिए वेद में घटनापूर्विका आख्यायिका नहीं, किन्तु आख्यायिकापूर्विका घटनाएं होती हैं, यह
सिद्धान्त देवताधिकरण में स्पष्टरूप से देखा जा सकता है।
महाभारत व्यास द्वारा ही रचित है इस सम्बन्ध में बालव्यास पं० ब्रह्मश्री सुब्रह्मण्य शास्त्री ने विभिन्न
पुराणों के भी प्रमाण दिये हैं ।
विष्णुपुराणे अ० ३ एवं पाद्मे सृष्टिखण्डं १
“कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम् ।
को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षाद् महाभारतकृद् भवेत् ॥”
मार्कण्डेयपुराणे अध्याय १
“तपःस्वाध्यायनिरतं मार्कण्डेयं महामुनिम् ।
व्यासशिष्यो महातेजा जैमिनिः पर्यपृच्छत ॥
भगवन् भारताख्यानं व्यासेनोक्तं महात्मना ।
पूर्णमस्तमलैः शुभ्रैः नानाशास्त्रसमुच्चयैः ॥
जातिशुद्धसमायुक्तं साधुशब्दोपशोभितम् ।
पूर्वपक्षोक्तिसिद्धान्तपरिनिष्ठासमन्वितम् ॥”
ततः “त्रिदशानां यथा विष्णुः” इत्यादि = “आचारस्थितिसाधनम् । इत्यन्तं भारतस्य बहु
प्रशंसां कृत्वा पुनः—
“प्रोक्तमेतन्महाभाग वेदव्यासेन धीमता ।
तथा तात कृतं ह्येतद् व्यासेनोदारकर्मणा ॥
यथा व्यासं महाशास्त्रं विरोधैर्नाभिभूयते ।
व्यासवाक्यजलौघेन कृतकंतरुहारिणा ॥

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९५
वेदशैलावतीर्णेन नीरजस्का मही कृता ।
कलशब्दमहाहंसं महाख्यानपराम्वुजम् ॥
कथाविस्तीर्णसलिलं काष्णं वेदं महाह्रदम् ।
तदिदं भारताख्यानं बह्वर्थमिह विस्तरम् ॥
तत्त्वतो ज्ञातुकामोऽहं भगवंस्त्वामुपस्थितः ।"
इति एतेन उपाख्यानसहितस्य महाभारतस्य वेदव्यासैककर्तृकत्वं सिद्धयति । किञ्च विरोधा-
भावत्वं सकलशास्त्रसम्प्रदायसमन्वितत्वं च ।
सूतसंहितायां अ० १- “व्यस्तवेदतया व्यास इति लोके श्रुतो मुनिः ।
अयं साक्षान्महायोगी व्यासः सर्वज्ञ ईश्वरः ॥
महाभारतमाश्चर्यं निर्ममे भगवान् गुरुः ।” इति
“कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम् ।
को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षाद् महाभारतकृद् भवेत् ॥
देवीभागवते अ० १- “अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः ।
भारताख्यानमतुलं चक्रे तदुपबृंहितम् ॥”
श्रीमद्भागवते स्कन्ध १ अ० ५-
“स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा ।
इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥”
मत्स्यपु० अ० ५५- “अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः ।
भारताख्यानमखिलं चक्रे तदुपबृंहितम् ॥”
“प्रकाशो जनितो लोके महाभारतचन्द्रमाः ।” इति
स्कन्दपु० प्रभासखण्ड अ० २
‘सत्यवतीसुतः•••• •••• •••• •••• •••• •••• ।
भारताख्यानमकरोद् वेदार्थैरुपबृंहितम् ॥
लक्षेणैकेन तत् प्रोक्तं द्वापरान्ते महात्मना ।”
शौनकोक्तचरणव्यूहपरिशि० ९
“लक्षं तु चतुरो वेदा लक्षं भारतमेव च ॥”
गीताध्यायान्ते इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्याम् इत्यादि ।
आर्यासप्तशत्यां गोवर्द्धनाचार्यकृतायाम् (१०८०-११३० मध्ये)
“व्यासगिरां निर्यासं सारं विश्वस्य भारतं वन्दे ।
भूषणतयेव संज्ञां तदेकतां भारती वहति ॥”
एतानि सर्वाणि वचनानि महाभारतस्य लक्षग्रन्थात्मकतां व्यासैककर्तृकतां महाभारतभारत-
नामभ्यामेक एव ग्रन्थः इत्यादिकं ऐककण्ठ्येन निःसंशयेन च उद्घोषयन्ति ।
उपर्युक्त विविध पुराणवचनों में कहा गया है कि लक्ष श्लोकों का महाभारत व्यासकृत है । व्यास सर्वज्ञ
विष्णु के अवतार ही हैं । महाभारत सब वेदों का एवं शास्त्रों का समन्वित सार है ।

८९६ रामायणमीमांसा द्वार्बिंश
“जयो नामेतिहासोऽयम्”
यह भी लक्षश्लोकात्मक महाभारत के लिए ही कहा गया है।
विशेषरूप से उद्योगपर्व के अध्याय १३३ से १३६ तक कुन्ती द्वारा कथित विदुलोपाख्यान नाम से प्रसिद्ध
इतिहास जय नाम से कहा गया है।
“जयनामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीषुणा ।” (म० भा० ५।१३६।१८)
इसी जयोपाख्यानरूप बीज का महान् वृक्षरूप महाभारत को मानकर उसका भी जयनाम लें तो उचित
ही है।
इतना ही क्यों, शब्दकल्पद्रुम में उद्धृत निम्नोक्त वचन के आधार पर अठारह पुराण, रामायण, कृष्ण-
द्वैपायनोक्त पञ्चमवेद महाभारत, शाश्वत विष्णुधर्म एवं शिवधर्म इन सबका जय नाम है।
इस तरह महाभारत का ही जय नाम है उसी का भारत तथा महाभारत नाम है—
“अष्टादश पुराणानि रामस्य चरितं तथा ।
काष्णं वेदं पञ्चमं च यन्महाभारतं विदुः ॥
तथैव विष्णुधर्माश्च शिवधर्माश्च शाश्वताः ।
जयेति नाम तेषाञ्च प्रवदन्ति मनीषिणः ॥”
इसी दृष्टि से आरम्भ में और अनेकों बार महाभारत में—
“नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीञ्चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥
कहा गया है। अर्थात् नारायण परमेश्वर कृष्ण और नर अर्जुन तथा नरोत्तम प्रत्यक्चैतन्याभिन्न शुद्ध ब्रह्म
तथा ब्रह्मविद्यारूपिणी सरस्वती को नमस्कार करके ही जय का वर्णन करना चाहिये ।
पूर्वोक्त रीति से पुराणादि सभी का नाम जय है। तथापि विशेषरूप से १८ संख्यावाले महाभारत ग्रन्थ
का जय यह संकेत है। वाल्मीकिरामायण के टीकाकार सर्ग के श्लोकों की संख्या अक्षरों के संकेत से करते हैं। यथा—
“कादयोऽङ्गाष्टादयोऽङ्गा पाद्या पञ्च प्रकीर्तिताः ।
यादयोऽष्टौ ज्ञनो पूर्णे विजेयस्वरशास्त्रके ॥”
क से झ तक के अक्षर क्रमशः एक से नौ तक के वाचक हैं। ट से ध तक के अक्षर भी एक से नौ तक के
वाचक हैं। प से म तक एक से पाँच तक के वाचक हैं। य से ह तक के अक्षर एक से आठ तक के वाचक हैं।
ज्ञ और न ये दो अक्षर पूर्ण संख्या के वाचक हैं ।
जैमिनिसूत्र तथा आर्षसिद्धान्त भी ऐसी संख्या का वर्णन करते हैं ।
उपर्युक्त रीति से ज ८ का वाचक है और य एक का वाचक है । ‘अङ्कानां वामतो गतिः’ के अनुसार
जय शब्द १८ संख्या का बोधक है । महाभारत १८ पर्व का है, महाभारतयुद्ध भी अठारह दिन हुआ । दोनों दलों में
सेना १८ अक्षौहिणी थी । गीता १८ अध्याय की है । इस तरह ग्रन्थ का नाम जय हुआ ।
कुछ लोग कहते हैं, भारत के पात्र युधिष्ठिर, अर्जुन आदि ऐतिहासिक पुरुष नहीं हैं, किन्तु धर्म, अधर्म,
देव, असुर के तुल्य ही कौरव तथा पाण्डव कल्पनामात्र हैं, पर यह ठीक नहीं, क्योंकि महाभारत के पात्र यदि
कल्पित होते, ऐतिहासिक न होते तो दूसरे ग्रन्थ अपने ग्रन्थों में उन्हें स्थान न देते, परन्तु महाभारत के युधिष्ठिर आदि