रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 971, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसी को सौति ने भी शौनक को सुनाया—
“कृष्णद्वैपायनप्रोक्ताः सुपुण्या विविधाः कथाः ।
कथिताश्चापि विधिवद् या वैशम्पायनेन वै ॥
श्रुत्वाहं ता विचित्रार्था महाभारतसंश्रिताः ।” (म० भा० १।१।११)
कृष्णद्वैपायन व्यास के द्वारा कही हुई अतिशय पुण्यजनक जो कथाएँ वैशम्पायन ने कही थीं । महाभारत-
संश्रित उन्हीं कथाओं को उनसे सुनकर मैं विविध तीर्थों और आयतनों में घूमता हुआ उस क्षेत्र में गया जहाँ युद्ध
हुआ था। वहाँ से आप लोगों की दर्शनेच्छा से यहाँ आया हूँ ।
ये सबकी सब शङ्काएं मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदों के सम्बन्ध में भी उठती हैं ।
“वाचाविरूपनित्यया”, “अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा ।”
के अनुसार मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद नित्य हैं, उनका सम्प्रदाय-प्रवर्तन ही विभिन्न कल्पों में होता है, निर्माण
नहीं। परन्तु यदि घटना के अनुसार ग्रन्थ का उल्लेख माना जाय तब तो उर्वशीपुरूरवा तथा यम-यमी या यज्ञवल्क्य-
मैत्रेयी के अनन्तर ही तत्संवादरूप ग्रन्थ का निर्माण मानना होगा।
परन्तु यह मानना पूर्वोक्त वचनों के विरुद्ध ही होगा। अतः वहाँ यही मानना पड़ता है कि वे आख्यायिकाएँ
घटना पर निर्भर नहीं हैं। वे तो सुखावबोधनार्था आख्यायिकाएँ नित्य ही हैं। कभी उन्हीं के अनुसार घटनाएं भी
घट जाती हैं। इसीलिए वेद में घटनापूर्विका आख्यायिका नहीं, किन्तु आख्यायिकापूर्विका घटनाएं होती हैं, यह
सिद्धान्त देवताधिकरण में स्पष्टरूप से देखा जा सकता है।
महाभारत व्यास द्वारा ही रचित है इस सम्बन्ध में बालव्यास पं० ब्रह्मश्री सुब्रह्मण्य शास्त्री ने विभिन्न
पुराणों के भी प्रमाण दिये हैं ।
विष्णुपुराणे अ० ३ एवं पाद्मे सृष्टिखण्डं १
“कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम् ।
को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षाद् महाभारतकृद् भवेत् ॥”
मार्कण्डेयपुराणे अध्याय १
“तपःस्वाध्यायनिरतं मार्कण्डेयं महामुनिम् ।
व्यासशिष्यो महातेजा जैमिनिः पर्यपृच्छत ॥
भगवन् भारताख्यानं व्यासेनोक्तं महात्मना ।
पूर्णमस्तमलैः शुभ्रैः नानाशास्त्रसमुच्चयैः ॥
जातिशुद्धसमायुक्तं साधुशब्दोपशोभितम् ।
पूर्वपक्षोक्तिसिद्धान्तपरिनिष्ठासमन्वितम् ॥”
ततः “त्रिदशानां यथा विष्णुः” इत्यादि = “आचारस्थितिसाधनम् । इत्यन्तं भारतस्य बहु
प्रशंसां कृत्वा पुनः—
“प्रोक्तमेतन्महाभाग वेदव्यासेन धीमता ।
तथा तात कृतं ह्येतद् व्यासेनोदारकर्मणा ॥
यथा व्यासं महाशास्त्रं विरोधैर्नाभिभूयते ।
व्यासवाक्यजलौघेन कृतकंतरुहारिणा ॥