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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 958

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८८१
“ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्यः ।
स सोमं प्रथमः पपौ स चकार रसं विषम् ॥” ( अथ० सं० ४।६।१ )
में दसमुख रावण का वर्णन है—
“इन्द्रः सीतां निगृह्णातु” (ऋ०सं० ४।५७), “घृतेन सीता मधुना समक्ता” (अथ०सं० ३।१७।९)
में सीता का वर्णन है । “अघो रामो सवित्रिः” ( यजुःस० २९।५९ ) सवितृकुल के राम का वर्णन है । “भद्रो
भद्रया सचमान आगात्” ( ऋ० सं० १०।२।३ ) मे रामभद्र का उल्लेख है ।
वेदों में राम के पूर्वजों का संकेत निम्नोक्त प्रकार से मिलता है—
“मनुर्वे यत्किञ्चावदत् तद् भेषजमेवावदत् ।” ( का० सं० ११।५।४९ )
मनु की उक्ति को भेषज तुल्य कहा गया है ।
“यं त्वा वेद इक्ष्वाको” (अथ०सं० १९।३९।९) तथा “ईज इक्ष्वाको राज” (श० ब्रा० १३।५।४।
९५) में इक्ष्वाकु की चर्चा है ।
“सुद्युम्नो द्युम्नः यजमानाय धेहि” (मैत्रायणीसं० १।२।१९) में सुद्युम्न की चर्चा है ।
“विश्वामित्रो यदव हते सुदासम्” (ऋ० सं० ३।५३।९) में सुदास की चर्चा है।
“षष्टि सहस्रानवति च कोरम् ।” (अथ०सं० २०११२७।१) में सगर के साठ हजार पुत्रों का
संकेत है ।
“रघुः श्येनः पतयत् ।” (ऋ० सं० ५।४५।९) में रघु का संकेत है ।
“अथ किमेतैर्वाऽपरेऽन्ये महाधनुर्धराश्चक्रवर्तिनः केचित् सुद्युम्न-भूरिद्युम्नेन्द्रद्युम्नकुवलयाश्व-
यौवनाश्व-वध्यश्वाश्वपति-शशबिन्दुहरिश्चन्द्रऽम्बरीषो ननक्तुः शर्यातिर्ययातिरनरण्योऽश्वसेनादयोऽथ
मरुत्तभरतप्रभृतयो राजानो मिषतो बन्धुवर्गस्य महतीं श्रियं त्यक्त्वाऽस्माल्लोकादमुं लोकं प्रयाताः”
(मैत्रायणीयोपनिषद् अन्तिम आख्यायिका १।१४) में ।
“यो विद्याच्चतुरो वेदान् साङ्गोपनिषदो द्विजः ।
न चेत्पुराणं संविद्यान्नैव स स्याद्विचक्षणः ॥
इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ।
बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ॥” (वायुपु० १।२००, २०१)
“जातमात्रं च यं वेदः उपतस्थे ससंग्रहः ।” (वायुपु० १।४३)
“प्राजापत्या श्रुतिर्नित्या तद्विकल्पास्त्विमे स्मृताः ।
अनित्यभावाद् देवानां मन्त्रोत्पत्तिः पुनः पुनः ॥” (वायुपु० उपो० ६१।७५)
जो चारों साङ्गवेदों को जानकर भी पुराणों को नहीं जानता वह विचक्षण नहीं होता है । अल्पश्रुत से
वेद भयभीत होता है और यह समझता है कि यह अल्पश्रुत, अर्थ का अनर्थ कर, मुझपर प्रहार करेगा ।
भारतीय दृष्टिकोण से पैमाना—१८ निमेष की ( १ ) एक काष्ठा
३० काष्ठा की ( १ ) एक कला
३० कला का ( १ ) एक मुहूर्त
३० महर्त का ( १ ) एक अहोरात्र