रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८७९
आपस्तम्बधर्मसूत्र १।६।१९।१३।१४ पुराण के दो श्लोक उद्धृत हैं । यह कहा ही गया है कि सर्वप्राचीन
मनु ने भी इतिहास-पुराण को श्राद्ध में श्रवण करना कहा है । चरकसंहिता के शारीरस्थान ४।४४ में 'श्लोका-
ख्यायिकेतिहासपुराणेषु कुशलम्' उल्लेख है। यह बुद्ध से बहुत पहले का है। आरण्यकों और ब्राह्मणों में भी
पुराण शब्द है । 'ब्राह्मणानीतिहासान् पुराणानि कल्पान् नाराशंसीः' (तै० आ० २।९) । "तानुपदिशति
पुराणं वेदः सोऽयमिति सोऽयमिति किञ्चित् पुराणमाचक्षीत ।” ( श० ब्रा० ११।४।३।१३ ) ।
पराशरज्योतिषसंहिता में "वेदवेदाङ्गेतिहासपुराणशास्त्रावदातम् ।” पुराण इतिहास की चर्चा है ।
वा० रा० बालकाण्ड अ० २ "नरेन्द्र श्रूयतां तावत् पुराणे यन्मया श्रुतम्” ।।५।।
अथर्ववेद ( १५।३०१) में अनेक विद्याओं के साथ पुराणों का भी वर्णन है । तमितिहासं पुराणं च
ऋचः सामानिच्छन्दांसि । पुराणं यजुषा सह उच्छिष्टाज्जज्ञिरे तस्माद्दिवि देवाः ।।
प्रसिद्ध ऐतिहासिक अलवेरूनी सं० १०८७, १८ पुराणों की स्वल्पभेदवाली दो सूचियाँ देता है।
राजशेखर ९९७ काव्यमीमांसा अ० २ में कहता है 'तत्र वेदार्थानोपनिबन्धनप्रायं पुराण-
मष्टादशधा ।' बालभारत में “राजशेखर अष्टादशपुराणसारसंग्रहकारिन् ।” (पृ० ४)
गौतमधर्मसूत्रमस्करीभाष्य ( ८।६) 'पुराणं ब्रह्माण्डादि' । वाचस्पतिमिश्र ८०८ योगभाष्य टीका में
विष्णुपुराण २।३२—५२।५४ में और १।१९-२५, ४।१ में वायुपुराण की चर्चा करते हैं । आद्यशङ्कराचार्य
विष्णुसहस्रनामभाष्य में भविष्योत्तरपुराण, विष्णुपुराण, ब्रह्मपुराण तथा पद्मपुराण की चर्चा करते हैं ।
६३७ संवत् के बाणभट्ट ने हर्षचरित में लिखा है 'पवनप्रोक्तं पुराणं पपाठ । महाभारत के वनपर्व
( १९४।१९ ) में वायुप्रोक्त पुराण का उल्लेख है । महाभारत दा० पा० में पुराणविदों की दाशरथिरामविषयक गाथाएँ
उद्धृत हैं । ये गाथाएँ वायुपुराण ( ८८।१९६ ) में हैं ।
कुमारिल ने तन्त्रवार्तिक १।३ में पुराणप्रामाण्य कहा हैं । सांख्यकारिका माठरवृत्ति ( १२।० ) में पुराण-
वर्णित भविष्य, कलिक का उल्लेख है । योगभाष्य ( ३।२३ ) का एक वचन न्यायवार्तिक एवं न्यायभाष्य ( १।६ ) में
मिलता है—
“यस्मिन् परिणम्यमाने तत्त्वं न विहन्यते तन्नित्यम् ।”
महाभाष्यकार ने भी लिखा है--
“तदपि नित्यं यस्मिन् तत्त्वं न विहन्यते ।”
“स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात् स्वाध्यायमासते ।
स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्मा प्रकाशते ॥”
यहाँ वाचस्पतिमिश्र कहते हैं 'वैयासिकीं गाथामुदाहरति' यह वचन विष्णुपुराण ( ६।६।२) में मिलता है ।
बाण हर्षचरित में पुरूरवा के मरने की एक कथा लिखते हैं । सुबन्धु की वासवदत्ता, अश्वघोष का
बुद्धचरित तथा कौटिल्य भी इसका संकेत करते हैं । यह कथा वायुपुराण में मिलती है ।
“पुरूरवा ब्राह्मणधनतृष्णया विननाश ।” ( वायु० पु० ३।२०-२३ )
पाश्चात्यों ने अर्थशास्त्र को ई० ३री शती का माना है । वस्तुतः वे मौर्य सम्राट् चन्द्रगुप्त के महामात्य
थे । ई० सन् पूर्व के थे । दण्डी ने दशकुमारचरित में कहा है विष्णुगुप्त ने ६००० श्लोकों के परिमाण में
अर्थशास्त्र रचा—